खाद्य श्रृंखला

1. पारिस्थितिकी तंत्र और खाद्य श्रृंखला

पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व ऊर्जा के निरंतर प्रवाह पर निर्भर करता है। हमारे सौरमंडल में सूर्य (Sun) ही पृथ्वी पर सभी जीवों के लिए ऊर्जा का अंतिम और सबसे बड़ा स्रोत है। कोई भी जीव (कुछ सूक्ष्मजीवों को छोड़कर) सूर्य की ऊर्जा का सीधे उपयोग नहीं कर सकता; इस ऊर्जा को ग्रहण करने और उसे जैविक ऊर्जा (भोजन) में बदलने का कार्य केवल हरे पौधे करते हैं।

पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) में एक जीव से दूसरे जीव में भोजन (ऊर्जा) के स्थानांतरित होने की एक रेखीय और क्रमिक प्रक्रिया को ‘खाद्य श्रृंखला’ (Food Chain) कहा जाता है। सरल शब्दों में, “कौन किसे खाता है” (Who eats whom) के अनुक्रम को ही खाद्य श्रृंखला कहते हैं।

इस प्रक्रिया में ऊर्जा का प्रवाह हमेशा एकदिशीय (Unidirectional) होता है, यानी ऊर्जा सूरज से पौधों में, पौधों से शाकाहारियों में, और शाकाहारियों से मांसाहारियों में जाती है; यह कभी वापस नहीं लौटती। खाद्य श्रृंखला प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने और पोषक तत्वों के चक्रण (Nutrient Cycling) का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है।

2. खाद्य श्रृंखला के पोषण स्तर (Trophic Levels of Food Chain)

खाद्य श्रृंखला में प्रत्येक कदम या कड़ी, जहाँ ऊर्जा का स्थानांतरण होता है, उसे ‘पोषण स्तर’ (Trophic Level) कहा जाता है। इसे मुख्य रूप से चार या पांच स्तरों में विभाजित किया जाता है:

A. प्रथम पोषण स्तर: उत्पादक (Producers / Autotrophs)

हरे पौधे, शैवाल (Algae), और फाइटोप्लैंकटन (Phytoplankton) इस स्तर में आते हैं। ये सूर्य के प्रकाश, पानी और कार्बन डाइऑक्साइड की मदद से ‘प्रकाश संश्लेषण’ (Photosynthesis) की प्रक्रिया द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। चूंकि वे अपना भोजन खुद बनाते हैं, इसलिए उन्हें स्वपोषी (Autotrophs) कहा जाता है। पृथ्वी की संपूर्ण खाद्य श्रृंखला इन्हीं पर टिकी है।

B. द्वितीय पोषण स्तर: प्राथमिक उपभोक्ता (Primary Consumers / Herbivores)

ये वे जीव हैं जो सीधे पौधों या उनके उत्पादों (पत्तियां, फल, बीज) को खाते हैं। ये पूर्णतः शाकाहारी (Herbivores) होते हैं।

  • उदाहरण: स्थलीय तंत्र में गाय, हिरण, बकरी, टिड्डा (Grasshopper), और जलीय तंत्र में ज़ूप्लैंकटन (Zooplankton)।

C. तृतीय पोषण स्तर: द्वितीयक उपभोक्ता (Secondary Consumers / Carnivores)

ये मांसाहारी जीव होते हैं जो प्राथमिक उपभोक्ताओं (शाकाहारियों) का शिकार करके अपना भोजन प्राप्त करते हैं।

  • उदाहरण: मेंढक (जो टिड्डे को खाता है), छोटी मछलियाँ, लोमड़ी, और सांप।

D. चतुर्थ पोषण स्तर: तृतीयक या शीर्ष उपभोक्ता (Tertiary / Apex Consumers)

ये खाद्य श्रृंखला के सबसे उच्च स्तर के मांसाहारी (Top Carnivores) होते हैं। ये द्वितीयक उपभोक्ताओं को खाते हैं और सामान्यतः प्रकृति में इनका शिकार करने वाला कोई अन्य जीव नहीं होता (जब तक कि उनकी प्राकृतिक मृत्यु न हो जाए)।

  • उदाहरण: बाघ, शेर, चील (Eagle), शार्क और मगरमच्छ।

E. अपघटक (Decomposers / Saprotrophs) – प्रकृति के सफाईकर्मी

यद्यपि इन्हें अक्सर पोषण स्तर के पिरामिड में अलग से रखा जाता है, लेकिन इनका महत्व सबसे अधिक है। जीवाणु (Bacteria) और कवक (Fungi) अपघटक कहलाते हैं। जब पौधे या जानवर मर जाते हैं, तो ये उनके मृत शरीर के जटिल कार्बनिक पदार्थों को तोड़कर सरल अकार्बनिक तत्वों में बदल देते हैं, जो वापस मिट्टी में मिल जाते हैं और पौधों द्वारा फिर से उपयोग कर लिए जाते हैं।

3. खाद्य श्रृंखला के प्रकार (Types of Food Chains)

प्रकृति में मुख्य रूप से दो प्रकार की खाद्य श्रृंखलाएं पाई जाती हैं:

1. चारण खाद्य श्रृंखला (Grazing Food Chain – GFC)

यह खाद्य श्रृंखला सीधे सूर्य के प्रकाश पर निर्भर करती है और हरे पौधों (उत्पादकों) से शुरू होकर मांसाहारियों तक जाती है। अधिकांश पारिस्थितिक तंत्र इसी पर आधारित हैं।

  • स्थलीय (Terrestrial) उदाहरण:

    घास (उत्पादक) $\rightarrow$ टिड्डा (प्राथमिक उपभोक्ता) $\rightarrow$ मेंढक (द्वितीयक उपभोक्ता) $\rightarrow$ सांप (तृतीयक उपभोक्ता) $\rightarrow$ बाज/चील (शीर्ष उपभोक्ता)।

  • जलीय (Aquatic) उदाहरण:

    फाइटोप्लैंकटन $\rightarrow$ ज़ूप्लैंकटन $\rightarrow$ छोटी मछली $\rightarrow$ बड़ी मछली $\rightarrow$ पेलिकन पक्षी।

2. अपरद खाद्य श्रृंखला (Detritus Food Chain – DFC)

यह खाद्य श्रृंखला हरे पौधों से शुरू न होकर मृत कार्बनिक पदार्थों (सड़े-गले पौधों और जानवरों के अवशेषों) से शुरू होती है। यह सूर्य के प्रकाश पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर नहीं होती।

  • प्रक्रिया: मृत पत्तियां/जानवर (Detritus) $\rightarrow$ केंचुआ/दीमक (Detritivores) $\rightarrow$ छोटे पक्षी/मेंढक $\rightarrow$ बाज/सांप।

  • महत्व: यह मैंग्रोव जंगलों (Mangroves) और घने जंगलों में ऊर्जा प्रवाह का एक बहुत बड़ा माध्यम है और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण (Recycling) के लिए अपरिहार्य है।

4. ऊर्जा प्रवाह और लिंडेमैन का 10% नियम (Energy Flow & 10% Law)

खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह हमेशा ‘ऊष्मागतिकी के नियमों’ (Laws of Thermodynamics) का पालन करता है। ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है, यह केवल एक रूप से दूसरे रूप में बदलती है।

वर्ष 1942 में रेमंड लिंडेमैन (Raymond Lindeman) ने पारिस्थितिकी तंत्र में ‘ऊर्जा प्रवाह का 10% नियम’ प्रस्तुत किया था।

  • 10% का नियम: इस नियम के अनुसार, जब ऊर्जा एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर (जैसे पौधों से हिरण में) में स्थानांतरित होती है, तो केवल 10% ऊर्जा ही अगले स्तर के जीव के शरीर (बायोमास) में संचित होती है।

  • बाकी 90% ऊर्जा का क्या होता है? शेष 90% ऊर्जा जीव द्वारा अपनी जैविक क्रियाओं (जैसे श्वसन, पाचन, दौड़ना, शरीर का तापमान बनाए रखना) में खर्च कर दी जाती है और ऊष्मा (Heat) के रूप में पर्यावरण में खो जाती है।

उदाहरण से समझें:

यदि पौधों (उत्पादकों) के पास 10,000 जूल (Joules) ऊर्जा है, तो:

  1. हिरण (प्राथमिक उपभोक्ता) को केवल 1000 जूल ऊर्जा मिलेगी।

  2. बाघ (द्वितीयक उपभोक्ता) को केवल 100 जूल ऊर्जा मिलेगी।

महत्व: यही कारण है कि प्रकृति में खाद्य श्रृंखलाएं आमतौर पर 3 या 4 पोषण स्तरों से अधिक लंबी नहीं होती हैं, क्योंकि 5वें या 6ठे स्तर तक पहुंचने के लिए पर्याप्त ऊर्जा ही नहीं बचती। इसी कारण से दुनिया में शाकाहारियों की संख्या मांसाहारियों (जैसे बाघों) से हमेशा बहुत अधिक होती है।

5. खाद्य जाल (Food Web): प्रकृति की जटिलता और स्थिरता

प्रकृति में कोई भी ‘खाद्य श्रृंखला’ एक सीधी रेखा में स्वतंत्र रूप से काम नहीं करती है। एक पारिस्थितिकी तंत्र में कई खाद्य श्रृंखलाएं आपस में जुड़ी और उलझी हुई होती हैं।

“विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं के आपस में जुड़ने से बने जटिल नेटवर्क को ‘खाद्य जाल’ (Food Web) कहा जाता है।”

  • क्यों आवश्यक है? मान लीजिए एक खाद्य श्रृंखला में केवल टिड्डा ही घास खाता है और मेंढक केवल टिड्डे को खाता है। यदि किसी बीमारी से सारे टिड्डे मर जाएं, तो मेंढक भी भूखे मर जाएंगे। लेकिन खाद्य जाल में, मेंढक के पास अन्य कीड़ों को खाने का विकल्प होता है।

  • पारिस्थितिक स्थिरता: एक खाद्य जाल जितना अधिक जटिल होगा (यानी उसमें जितने अधिक विकल्प होंगे), वह पारिस्थितिकी तंत्र उतना ही अधिक स्थायी और स्थिर (Stable) होगा। खाद्य जाल जीवों को भोजन के कई विकल्प (Alternative sources of food) प्रदान करता है।

6. जैव संचय और जैव आवर्धन (Bioaccumulation & Biomagnification) – UPSC का पसंदीदा विषय

खाद्य श्रृंखला केवल ऊर्जा का ही प्रवाह नहीं करती, बल्कि प्रदूषण के कारण इसके माध्यम से खतरनाक रसायन भी हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

A. जैव संचय (Bioaccumulation)

यह वह प्रक्रिया है जिसमें कोई विषैला रसायन (जैसे कीटनाशक या भारी धातु) पर्यावरण से किसी जीव के शरीर में प्रवेश करता है और समय के साथ धीरे-धीरे उस ‘एक ही जीव’ के वसा (Fat) ऊतकों में जमा होता रहता है, क्योंकि जीव उसे उत्सर्जित (Excrete) नहीं कर पाता।

B. जैव आवर्धन (Biomagnification / Bioamplification)

जब कोई विषैला और गैर-बायोडिग्रेडेबल (Non-biodegradable) रसायन खाद्य श्रृंखला के माध्यम से एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर में जाता है, तो प्रत्येक उच्च स्तर पर उस रसायन की सांद्रता (Concentration) कई गुना बढ़ जाती है। इसे ‘जैव आवर्धन’ कहते हैं।

  • DDT का उदाहरण: खेतों में मच्छरों को मारने के लिए DDT का छिड़काव किया गया। यह पानी में गया (0.003 ppb)। इसे ज़ूप्लैंकटन ने खाया (0.04 ppm), उन्हें छोटी मछलियों ने खाया (0.5 ppm), छोटी मछलियों को बड़ी मछलियों ने खाया (2 ppm), और बड़ी मछलियों को पक्षियों (जैसे पेलिकन या चील) ने खाया (25 ppm)।

  • प्रभाव: उच्च सांद्रता के कारण पक्षियों के अंडों का छिलका इतना पतला हो गया कि वे समय से पहले ही टूट गए, जिससे पक्षियों की कई प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गईं। ‘मिनामाता रोग’ (पारे या Mercury के कारण) भी इसी का एक भयानक उदाहरण है।

7. पारिस्थितिक पिरामिड (Ecological Pyramids)

पारिस्थितिकी तंत्र में विभिन्न पोषण स्तरों के बीच संबंधों को जब चित्र के रूप में (पिरामिड के आकार में) दर्शाया जाता है, तो उसे ‘पारिस्थितिक पिरामिड’ कहते हैं। इसकी अवधारणा चार्ल्स एल्टन (Charles Elton – 1927) ने दी थी।

  1. संख्या का पिरामिड (Pyramid of Numbers): यह प्रत्येक स्तर पर जीवों की संख्या दर्शाता है। घास के मैदान में यह ‘सीधा’ (Upright) होता है (घास बहुत, शेर कम)। लेकिन एक पेड़ के पारिस्थितिकी तंत्र में यह ‘उल्टा’ (Inverted) हो सकता है (एक पेड़, कई पक्षी, उन पर हजारों परजीवी)।

  2. बायोमास का पिरामिड (Pyramid of Biomass): यह प्रत्येक स्तर पर जीवों के कुल शुष्क भार (Dry weight) को दर्शाता है। स्थलीय तंत्र में यह हमेशा ‘सीधा’ होता है। लेकिन तालाब या समुद्र में यह ‘उल्टा’ होता है, क्योंकि फाइटोप्लैंकटन (उत्पादक) का भार मछलियों के भार से बहुत कम होता है।

  3. ऊर्जा का पिरामिड (Pyramid of Energy): यह सबसे महत्वपूर्ण है। 10% के नियम के कारण, ऊर्जा का पिरामिड हमेशा और हर परिस्थिति में ‘सीधा’ (Upright) ही होता है। यह कभी उल्टा नहीं हो सकता क्योंकि ऊर्जा हमेशा निचले स्तर से उच्च स्तर की ओर कम होती जाती है।

8. खाद्य श्रृंखला पर मानवीय प्रभाव (Human Impact on Food Chains)

मनुष्य अपने स्वार्थ और औद्योगिक विकास के लिए खाद्य श्रृंखलाओं को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है:

  • वनों की कटाई और आवास विनाश: उत्पादकों (पेड़ों) को नष्ट करने से पूरे शाकाहारी और मांसाहारी जीव खतरे में आ जाते हैं।

  • अवैध शिकार (Poaching): खाद्य श्रृंखला से बाघ या शेर (Keystone species) को हटा देने से हिरणों की संख्या बेतहाशा बढ़ जाएगी, जो सारे जंगल की घास चर जाएंगे और जंगल नष्ट हो जाएगा।

  • प्रदूषण और रसायन: खेतों में कीटनाशकों और कारखानों के रसायनों (Heavy metals) के उपयोग से खाद्य जाल जहरीला हो रहा है।

  • विदेशी प्रजातियों का प्रवेश (Invasive Species): किसी नए पारिस्थितिकी तंत्र में बाहरी प्रजाति (जैसे जलकुंभी) को लाने से स्थानीय खाद्य श्रृंखला पूरी तरह से नष्ट हो जाती है।

9. निष्कर्ष (Conclusion)

प्रकृति ने हर एक जीव को, चाहे वह एक सूक्ष्म जीवाणु हो या एक विशाल व्हेल, खाद्य श्रृंखला में एक विशिष्ट भूमिका (Ecological Niche) प्रदान की है। खाद्य श्रृंखलाएं और खाद्य जाल ही वह धागे हैं जो जीवन के इस विशाल पारिस्थितिकी तंत्र को एक साथ बांध कर रखते हैं। ‘लिंडेमैन के 10% नियम’ से हमें यह समझ आता है कि पृथ्वी के संसाधन असीमित नहीं हैं। पर्यावरण संरक्षण, कीटनाशकों के सीमित उपयोग और वनों के बचाव के माध्यम से ही हम अपनी पृथ्वी की खाद्य श्रृंखलाओं को टूटने से बचा सकते हैं, क्योंकि जब प्रकृति का यह जाल टूटता है, तो अंततः मानव जाति का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाता है।

10. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)

प्रश्न 1: खाद्य श्रृंखला (Food Chain) और खाद्य जाल (Food Web) में क्या मूलभूत अंतर है? पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता के लिए खाद्य जाल क्यों अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है? (250 शब्द)

प्रश्न 2: रेमंड लिंडेमैन के ‘ऊर्जा प्रवाह के 10% नियम’ (10% Law of Energy) की व्याख्या कीजिए। यह नियम इस बात को कैसे स्पष्ट करता है कि खाद्य श्रृंखलाएं चार या पांच पोषण स्तरों से अधिक लंबी क्यों नहीं हो सकतीं? (200 शब्द)

प्रश्न 3: जैव संचय (Bioaccumulation) और जैव आवर्धन (Biomagnification) के बीच के अंतर को स्पष्ट करें। DDT के उदाहरण के माध्यम से समझाइए कि जैव आवर्धन शीर्ष मांसाहारी पक्षियों को कैसे प्रभावित करता है। (250 शब्द)

प्रश्न 4: ‘चारण खाद्य श्रृंखला’ (Grazing Food Chain) और ‘अपरद खाद्य श्रृंखला’ (Detritus Food Chain) में क्या अंतर है? पर्यावरण में पोषक तत्वों के चक्रण में अपघटकों की भूमिका का विश्लेषण करें। (150 शब्द)

प्रश्न 5: पारिस्थितिक पिरामिड (Ecological Pyramids) क्या हैं? कारण सहित स्पष्ट कीजिए कि बायोमास का पिरामिड समुद्र में उल्टा क्यों होता है, जबकि ऊर्जा का पिरामिड सदैव सीधा क्यों रहता है। (200 शब्द)

11. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)

  1. पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) में एक जीव से दूसरे जीव में ऊर्जा (भोजन) के स्थानांतरण के रैखिक अनुक्रम को ‘खाद्य श्रृंखला’ (Food Chain) कहा जाता है।

  2. पृथ्वी पर लगभग सभी खाद्य श्रृंखलाओं के लिए ऊर्जा का अंतिम और सबसे बड़ा प्राथमिक स्रोत ‘सूर्य’ (Sun) है।

  3. खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह हमेशा ‘एकदिशीय’ (Unidirectional) होता है, अर्थात यह कभी वापस उल्टी दिशा में नहीं बहता है।

  4. खाद्य श्रृंखला में उस प्रत्येक चरण या स्तर को जहाँ ऊर्जा का स्थानांतरण होता है, ‘पोषण स्तर’ (Trophic Level) कहा जाता है।

  5. सभी हरे पौधे, शैवाल और फाइटोप्लैंकटन ‘उत्पादक’ (Producers) कहलाते हैं, जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा सौर ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलते हैं और प्रथम पोषण स्तर बनाते हैं।

  6. वे जीव जो सीधे पौधों को खाते हैं (जैसे गाय, हिरण, टिड्डा) उन्हें ‘प्राथमिक उपभोक्ता’ (Primary Consumers) या शाकाहारी कहा जाता है।

  7. मेंढक, सांप और लोमड़ी जैसे जानवर जो शाकाहारियों का शिकार करते हैं, उन्हें ‘द्वितीयक उपभोक्ता’ (Secondary Consumers) कहा जाता है।

  8. खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर रहने वाले जीव, जिनका प्राकृतिक रूप से कोई शिकार नहीं करता (जैसे बाघ, शेर, चील), ‘तृतीयक या शीर्ष उपभोक्ता’ कहलाते हैं।

  9. कवक (Fungi) और जीवाणु (Bacteria) ‘अपघटक’ (Decomposers) कहलाते हैं, जो मृत पौधों और जानवरों के जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल तत्वों में तोड़कर वापस मिट्टी में मिला देते हैं।

  10. ‘चारण खाद्य श्रृंखला’ (Grazing Food Chain) हमेशा हरे पौधों (उत्पादकों) से शुरू होती है और स्थलीय तथा जलीय तंत्र दोनों में पाई जाती है।

  11. ‘अपरद खाद्य श्रृंखला’ (Detritus Food Chain) मृत कार्बनिक पदार्थों (सड़े-गले अवशेषों) से शुरू होती है और इसके लिए सूर्य के प्रकाश की प्रत्यक्ष आवश्यकता नहीं होती है।

  12. वर्ष 1942 में रेमंड लिंडेमैन द्वारा पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा प्रवाह का प्रसिद्ध ‘10% का नियम’ (10% Law) प्रतिपादित किया गया था।

  13. 10% के नियम के अनुसार, एक पोषण स्तर से अगले पोषण स्तर तक केवल 10% ऊर्जा ही पहुँच पाती है, शेष 90% ऊर्जा श्वसन और जैविक कार्यों में ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है।

  14. ऊर्जा के इसी भारी नुकसान के कारण प्रकृति में खाद्य श्रृंखलाएं आमतौर पर तीन या अधिकतम चार पोषण स्तरों तक ही सीमित रहती हैं।

  15. किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र में विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं के आपस में जुड़ने और एक-दूसरे को पार करने से बने जटिल नेटवर्क को ‘खाद्य जाल’ (Food Web) कहा जाता है।

  16. खाद्य श्रृंखला की तुलना में ‘खाद्य जाल’ अधिक वास्तविक है क्योंकि यह जीवों को भोजन के अनेक विकल्प प्रदान करता है।

  17. एक पारिस्थितिकी तंत्र का ‘खाद्य जाल’ जितना अधिक जटिल और बड़ा होगा, वह तंत्र उतना ही अधिक स्थिर (Stable) और सुरक्षित माना जाता है।

  18. ‘जैव संचय’ (Bioaccumulation) वह प्रक्रिया है जिसमें प्रदूषक (जैसे कीटनाशक) पर्यावरण से किसी जीव के शरीर में प्रवेश करते हैं और उसके वसा ऊतकों में जमा होते रहते हैं।

  19. ‘जैव आवर्धन’ (Biomagnification) वह प्रक्रिया है जिसमें एक विषैले रसायन की सांद्रता (Concentration) खाद्य श्रृंखला में नीचे से ऊपर जाने पर प्रत्येक उच्च पोषण स्तर में कई गुना बढ़ती जाती है।

  20. जैव आवर्धन के लिए यह आवश्यक है कि रसायन गैर-बायोडिग्रेडेबल (जो प्रकृति में आसानी से नष्ट न हो) और वसा में घुलनशील (Fat-soluble) होना चाहिए।

  21. DDT एक ऐसा ही खतरनाक कीटनाशक है, जिसके भारी जैव आवर्धन के कारण बाज और पेलिकन जैसे शीर्ष पक्षियों के अंडों के छिलके पतले होकर टूटने लगे थे, जिससे उनकी आबादी घट गई।

  22. जापान में ‘मिनामाता रोग’ (Minamata Disease) एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी थी जो समुद्री खाद्य श्रृंखला में ‘पारे’ (Mercury/Methylmercury) के भारी जैव आवर्धन के कारण फैली थी।

  23. पारिस्थितिक पिरामिड (Ecological Pyramids) की अवधारणा सबसे पहले 1927 में ब्रिटिश इकोलॉजिस्ट चार्ल्स एल्टन द्वारा प्रस्तुत की गई थी।

  24. ‘संख्या का पिरामिड’ (Pyramid of Numbers) घास के मैदान के पारिस्थितिकी तंत्र में हमेशा ‘सीधा’ (Upright) होता है क्योंकि घास की संख्या शाकाहारियों और मांसाहारियों से बहुत अधिक होती है।

  25. एक अकेले पेड़ के पारिस्थितिकी तंत्र (Tree Ecosystem) में संख्या का पिरामिड ‘उल्टा’ (Inverted) हो सकता है क्योंकि एक पेड़ पर कई पक्षी और उन पर हजारों परजीवी (Parasites) रहते हैं।

  26. ‘बायोमास का पिरामिड’ (Pyramid of Biomass) स्थलीय (Terrestrial) जंगलों में हमेशा सीधा होता है क्योंकि उत्पादकों (पेड़ों) का कुल शुष्क भार उपभोक्ताओं से बहुत अधिक होता है।

  27. तालाब, झील या महासागर के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में बायोमास का पिरामिड हमेशा ‘उल्टा’ (Inverted) होता है क्योंकि सूक्ष्म फाइटोप्लैंकटन का कुल भार बड़ी मछलियों की तुलना में बहुत कम होता है।

  28. ‘ऊर्जा का पिरामिड’ (Pyramid of Energy) प्रकृति का एकमात्र ऐसा पिरामिड है जो हमेशा और हर स्थिति में ‘सीधा’ (Upright) ही होता है, यह कभी भी उल्टा नहीं हो सकता।

  29. ऊर्जा का पिरामिड सीधा इसलिए होता है क्योंकि ऊष्मागतिकी के नियमों के अनुसार ऊर्जा हमेशा उत्पादकों से शीर्ष उपभोक्ताओं की ओर घटती (10% नियम) जाती है।

  30. ‘कीस्टोन प्रजाति’ (Keystone Species) वह प्रजाति है (जैसे जंगल में बाघ या समुद्र में शार्क) जिसके खाद्य श्रृंखला से हटा दिए जाने पर पूरा पारिस्थितिकी तंत्र चरमरा कर नष्ट हो सकता है।

  31. महासागरों में खाद्य श्रृंखला की शुरुआत ‘फाइटोप्लैंकटन’ (Phytoplankton) नामक सूक्ष्म प्रकाश-संश्लेषक जीवों से होती है जो समुद्री जीवन का मूल आधार हैं।

  32. जलीय खाद्य श्रृंखला में फाइटोप्लैंकटन को खाने वाले सूक्ष्म जीवों को ‘ज़ूप्लैंकटन’ (Zooplankton) कहा जाता है जो प्राथमिक उपभोक्ता की श्रेणी में आते हैं।

  33. अपघटकों को प्रकृति का ‘सफाईकर्मी’ (Scavengers of Nature) कहा जाता है, क्योंकि वे कार्बन, नाइट्रोजन और फास्फोरस जैसे आवश्यक खनिजों को मृत शरीरों से निकालकर वापस मिट्टी में चक्रित करते हैं।

  34. एक आदर्श स्थलीय खाद्य श्रृंखला का क्रम है: उत्पादक $\rightarrow$ प्राथमिक उपभोक्ता $\rightarrow$ द्वितीयक उपभोक्ता $\rightarrow$ तृतीयक उपभोक्ता $\rightarrow$ अपघटक।

  35. यदि किसी जंगल से सभी बाघ (शीर्ष मांसाहारी) समाप्त हो जाएं, तो हिरणों (शाकाहारी) की आबादी बहुत तेजी से बढ़ेगी और वे पूरे जंगल को खाकर चरागाह में बदल देंगे।

  36. ‘डाइक्लोफेनैक’ (Diclofenac) नामक दर्द निवारक दवा के कारण भारत और एशिया में ‘गिद्धों’ (Vultures) की आबादी 99% तक नष्ट हो गई, जो खाद्य श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण सफाईकर्मी थे।

  37. किसी जीव की खाद्य जाल में स्थिति और पर्यावरण के साथ उसकी कार्यात्मक भूमिका को ‘पारिस्थितिक निके’ (Ecological Niche) कहा जाता है।

  38. ‘यूट्रोफिकेशन’ (Eutrophication) वह प्रक्रिया है जिसमें खेतों से उर्वरक (Nitrogen & Phosphorus) बहकर तालाबों में जाते हैं, जिससे शैवाल (Algal bloom) तेजी से बढ़ते हैं और जलीय खाद्य श्रृंखला नष्ट हो जाती है।

  39. एक पारिस्थितिकी तंत्र में जीवों के कुल शुष्क भार (Dry weight of living organic matter) को उस स्तर का ‘बायोमास’ (Biomass) कहा जाता है।

  40. खाद्य जाल में सर्वाहारी (Omnivores) जैसे मनुष्य, भालू और कौवे एक ही समय में कई पोषण स्तरों (जैसे पौधे और मांस दोनों खाकर) पर कार्य कर सकते हैं।

  41. ‘लेंडिक’ (Lentic) पारिस्थितिकी तंत्र स्थिर जल (जैसे तालाब और झील) की खाद्य श्रृंखला को दर्शाता है, जबकि ‘लोटिक’ (Lotic) बहते जल (जैसे नदी) की खाद्य श्रृंखला को दर्शाता है।

  42. टुंड्रा (Tundra) और मरुस्थल (Desert) जैसे कठोर क्षेत्रों में खाद्य श्रृंखलाएं बहुत छोटी और सरल होती हैं, इसलिए वहाँ का पारिस्थितिकी तंत्र अत्यधिक नाजुक (Fragile) होता है।

  43. उष्णकटिबंधीय वर्षावनों (Tropical Rainforests) में अत्यधिक जैव विविधता के कारण खाद्य जाल सबसे विशाल, जटिल और स्थिर (Stable) होता है।

  44. जब बाहरी प्रजातियों (Invasive Alien Species) को किसी नए पर्यावरण में लाया जाता है, तो प्राकृतिक शिकारियों के अभाव में वे तेजी से बढ़ती हैं और स्थानीय खाद्य श्रृंखला को नष्ट कर देती हैं।

  45. किसी पारिस्थितिकी तंत्र की ‘वहन क्षमता’ (Carrying Capacity) वह अधिकतम आबादी है जिसे वहां उपलब्ध संसाधनों और खाद्य श्रृंखलाओं द्वारा बिना किसी गिरावट के अनिश्चित काल तक समर्थन दिया जा सकता है।

  46. ऊर्जा प्रवाह में सूरज की कुल सौर ऊर्जा का केवल 1% से 2% हिस्सा ही हरे पौधों (उत्पादकों) द्वारा प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से ग्रहण किया जाता है।

  47. डोडो पक्षी के विलुप्त होने के बाद मॉरीशस में ‘डोडो पेड़’ (Calvaria tree) भी विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गया था, क्योंकि इस पेड़ के बीजों का अंकुरण डोडो पक्षी की पाचन क्रिया से होकर गुजरने पर ही संभव था; यह खाद्य श्रृंखला में ‘सहजीविता’ का उत्कृष्ट उदाहरण था।

  48. समुद्री खाद्य जाल में ‘क्रिल’ (Krill) एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्राथमिक उपभोक्ता है जिस पर नीली व्हेल (Blue Whale) जैसी विशाल मछलियां प्रत्यक्ष रूप से निर्भर करती हैं।

  49. ऊर्जा प्रवाह को मापने के लिए किलोकैलोरी (kcal) या जूल प्रति वर्ग मीटर प्रति वर्ष ($J/m^2/year$) इकाई का उपयोग किया जाता है।

  50. प्रकृति में खाद्य श्रृंखला और अपघटन की प्रक्रियाएं यह सुनिश्चित करती हैं कि पृथ्वी पर पदार्थ और खनिजों का ‘पुनर्चक्रण’ (Nutrient Cycling) अनंत काल तक अबाध रूप से चलता रहे।

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