पुरापाषाण काल (Paleolithic Age) का सम्पूर्ण इतिहास: 40+ अद्भुत तथ्य और स्थल | UPSC, PSC स्पेशल Notes

Table of Contents मानव सभ्यता का सुदूर अतीत इतिहास के उस विशाल कालखंड को, जिसके बारे में हमें कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिलता और जिसका

By StudyPSC Team
June 16, 2026

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मानव सभ्यता का सुदूर अतीत

इतिहास के उस विशाल कालखंड को, जिसके बारे में हमें कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिलता और जिसका पूरा ज्ञान केवल पत्थरों के औजारों और पुरातात्विक खुदाई पर निर्भर है, प्रागैतिहासिक काल कहा जाता है। इस प्रागैतिहासिक काल का सबसे पहला और सबसे लंबा हिस्सा ‘पुरापाषाण काल’ (Paleolithic Age) कहलाता है। यह वह दौर था जब इंसान ने धरती पर अपने अस्तित्व की लड़ाई की शुरुआत की थी।

वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर पुरापाषाण काल की शुरुआत आज से लगभग 25 लाख वर्ष पूर्व हुई थी, जब मानव के पूर्वजों ने पहली बार पत्थर को हथियार की तरह इस्तेमाल करना सीखा। भारत के संदर्भ में यह कालखंड लगभग 5 लाख वर्ष पूर्व से लेकर 10,000 ईसा पूर्व तक माना जाता है। मानव इतिहास का 99 प्रतिशत से अधिक का सफर इसी युग में तय हुआ है, इसलिए मानव सभ्यता के क्रमिक विकास को समझने के लिए इसका गहराई से अध्ययन करना अनिवार्य है।

पुरापाषाण काल

भूवैज्ञानिक पृष्ठभूमि: हिमयुग (The Ice Age) का प्रभाव

पुरापाषाण काल का इतिहास समझने के लिए उस समय की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों को जानना बेहद जरूरी है। यह पूरा कालखंड भूविज्ञान के ‘प्लीस्टोसीन युग’ (Pleistocene Epoch) यानी ‘हिमयुग’ के अंतर्गत बीता। इस दौर में पृथ्वी का तापमान आज की तुलना में बेहद कम था। ध्रुवों की बर्फ खिसककर मैदानी इलाकों तक आ चुकी थी और आधी से ज्यादा धरती बर्फ की मोटी चादरों से ढकी हुई थी।

इस अत्यधिक कड़ाके की ठंड और हिंसक वातावरण के बीच आदिमानव का जीवित रहना किसी चमत्कार से कम नहीं था। हिमयुग की इस विषम परिस्थिति ने ही मानव को यह सिखाया कि पत्थरों को आकार कैसे दिया जाए, गुफाओं को आश्रय कैसे बनाया जाए और खुद को सुरक्षित रखने के लिए समूहों में कैसे रहा जाए। इस काल के अंतिम चरण में जाकर जलवायु धीरे-धीरे गर्म होनी शुरू हुई, जिसे हम वर्तमान युग यानी ‘होलोसीन’ (Holocene) की शुरुआत कहते हैं।

आदिमानव की जीवन शैली: शिकारी और खाद्य संग्राहक

पुरापाषाण काल का मानव आज के इंसान से बिल्कुल अलग था। वह न तो घर बनाना जानता था, न कपड़े पहनना और न ही अनाज उगाना। वह पूरी तरह से प्रकृति का एक ‘उपभोक्ता’ (Consumer) था, ‘उत्पादक’ (Producer) नहीं। इतिहासकारों ने उसकी इस जीवन शैली को ‘खाद्य संग्राहक और आखेटक’ (Food Gatherer and Hunter) का नाम दिया है।

आखेट या शिकार: आदिमानव की आजीविका का मुख्य आधार जंगली जानवरों का शिकार करना था। वे विशालकाय हाथियों, गेंडों, जंगली भैंसों से लेकर छोटे हिरणों और खरगोशों का शिकार करते थे। चूंकि हथियार बेडौल थे, इसलिए शिकार सामूहिक रूप से किया जाता था।

खाद्य संग्रहण: शिकार के अलावा, जब जानवरों की कमी होती थी, तो वे जंगलों से कंद-मूल, जंगली फल, बेरीज, पत्तियां और जंगली अनाज के दाने इकट्ठा करते थे। नदियों और झीलों के किनारे रहने के कारण वे मछलियां पकड़ना भी सीख चुके थे।

खानाबदोश जीवन: भोजन और शिकार की तलाश में आदिमानव का पूरा जीवन भटकते हुए बीतता था। जब किसी एक इलाके के फल-फूल या जानवर खत्म हो जाते थे, तो वे अपने पूरे झुंड के साथ नई जगह चले जाते थे। उनके पास निजी संपत्ति या जमीन की कोई अवधारणा नहीं थी, क्योंकि वे स्थायी रूप से कहीं नहीं रहते थे।

आग की खोज: सभ्यता का पहला टर्निंग पॉइंट

मानव इतिहास की सबसे बड़ी और युगांतकारी खोजों में से एक थी— आग की खोज। पुरापाषाण काल के उत्तरार्ध में आदिमानव ने दो पत्थरों को आपस में टकराते समय या जंगलों में लगने वाली दावानल (जंगली आग) को देखकर आग के रहस्य को समझा।

हालांकि, यहाँ एक महत्वपूर्ण तकनीकी अंतर को समझना जरूरी है जो अक्सर परीक्षाओं में पूछा जाता है। आदिमानव ने पुरापाषाण काल में आग की ‘खोज’ तो कर ली थी, लेकिन वह इसका नियमित और नियंत्रित ‘उपयोग’ करना नहीं सीख पाया था। वह आग जलाकर खाना पकाना या धातु पिघलाना नहीं जानता था।

इस काल में आग का उपयोग बेहद सीमित था। आदिमानव रात के समय गुफाओं के मुहाने पर आग जलाकर रखता था ताकि खूंखार जंगली जानवर अंदर न आ सकें। इसके अलावा, कड़ाके की ठंड से बचने के लिए और अंधेरी गुफाओं में रोशनी करने के लिए आग की चिंगारियों का सहारा लिया जाता था।

सामाजिक ढांचा: बैंड सोसाइटी का उदय

पुरापाषाण काल का मनुष्य अकेला नहीं रहता था, क्योंकि अकेले रहने का सीधा मतलब था किसी हिंसक जानवर का निवाला बन जाना। आत्मरक्षा और शिकार की मजबूरी ने इंसानों को एक सामाजिक बंधन में बांधा, जिसे इतिहास में ‘बैंड सोसाइटी’ (Band Society) कहा जाता है।

एक ‘बैंड’ या समूह में आमतौर पर 20 से 50 लोग शामिल होते थे। यह समाज पूरी तरह से समतावादी (Egalitarian) था। इसका मतलब है कि समाज में कोई अमीर-गरीब, राजा-प्रजा या ऊंच-नीच नहीं थी। शिकार में जो भी भोजन मिलता था, उसे पूरे समूह में बराबर बांट दिया जाता था। निजी संपत्ति की कोई भावना न होने के कारण आपस में युद्ध या लालच जैसी भावनाएं भी उस दौर के समाज में विकसित नहीं हुई थीं।

पुरापाषाण काल

पुरापाषाण काल का विस्तृत वर्गीकरण (Three Main Phases)

पत्थरों के औजारों की बनावट में आने वाले बदलावों और जलवायु परिवर्तन की गति के आधार पर इतिहासकारों ने पुरापाषाण काल को तीन बड़े चरणों में विभाजित किया है।

पुरापाषाण काल (Paleolithic Age)
 ├── 1. निम्न पुरापाषाण काल (Lower Paleolithic) - कोर उपकरण, हस्तकुठार
 ├── 2. मध्य पुरापाषाण काल (Middle Paleolithic) - फलक उपकरण, खुरचनी
 └── 3. उच्च पुरापाषाण काल (Upper Paleolithic) - ब्लेड उपकरण, होमो सेपियन्स

आइए अब इन तीनों चरणों का बिंदुवार और अत्यंत गहराई से विश्लेषण करते हैं।

1. निम्न पुरापाषाण काल (Lower Paleolithic Age)

यह पुरापाषाण काल का सबसे पहला और सबसे लंबा चरण है। वैश्विक स्तर पर यह लगभग 25 लाख वर्ष पूर्व से 50,000 ईसा पूर्व तक माना जाता है। भारत में इसका समय 5 लाख ईसा पूर्व से 50,000 ईसा पूर्व तक स्वीकार किया गया है।

जलवायु की स्थिति: यह वह समय था जब हिमयुग (Ice Age) अपने चरम पर था। चारों तरफ अत्यधिक ठंड और बर्फबारी होती थी। इस कारण वनस्पति बहुत सीमित थी और मानव को पूरी तरह बड़े जानवरों के शिकार पर निर्भर रहना पड़ता था।

औजारों की तकनीक (Core Tools): इस काल के मानव के पास हथियारों को बारीक या नुकीला बनाने की तकनीक नहीं थी। वे ‘कोर’ (Core) तकनीक का इस्तेमाल करते थे। कोर तकनीक का मतलब है कि एक बड़े प्राकृतिक पत्थर को लेकर, उसे किसी दूसरे पत्थर से चोट मारकर उसकी बाहरी परतें निकाल दी जाती थीं। इसके बाद जो भारी और मुख्य केंद्र वाला पत्थर बचता था, उसे ही सीधे हथियार बना लिया जाता था।

प्रमुख पत्थर: इस काल के सभी उपकरण मुख्य रूप से ‘क्वाटजाइट’ (Quartzite) नाम के कड़े और मजबूत पत्थर से बनाए जाते थे। इसी कारण इस काल के आदिमानव को इतिहास में ‘क्वाटजाइट मानव’ भी कहा जाता है।

प्रमुख हथियार:

  • हस्तकुठार (Hand-axe): यह हाथ से पकड़ी जाने वाली बिना हैंडल की पत्थर की कुल्हाड़ी थी, जिसका उपयोग जानवरों को मारने या मांस काटने में होता था।

  • विदारणी (Cleaver): इसका आगे का हिस्सा चौड़ा और धारदार होता था, जिसका उपयोग पेड़ की छाल या जानवरों की खाल उतारने के लिए किया जाता था।

  • खंडक (Chopper): यह एक तरफ से भारी और धारदार पत्थर होता था जिससे हड्डियों या मांस के बड़े टुकड़े किए जाते थे।

भारतीय उपमहाद्वीप में दो सांस्कृतिक धाराएं: निम्न पुरापाषाण काल में भारत में दो अलग-अलग क्षेत्रों में दो तरह की संस्कृतियां विकसित हुईं:

  1. सोहन संस्कृति: यह उत्तर-पश्चिम भारत और वर्तमान पाकिस्तान की सोहन नदी घाटी में फली-फूली। यहाँ से मुख्य रूप से चॉपर और चॉपिंग (खंडक) उपकरण मिले हैं, इसलिए इसे ‘चॉपर-चॉपिंग संस्कृति’ भी कहते हैं।

  2. मद्रास संस्कृति: यह दक्षिण भारत में केंद्रित थी, विशेष रूप से मद्रास (चेन्नई) के पास पल्लवरम और अतीरमपक्कम में। यहाँ से बड़े पैमाने पर हस्तकुठार (Hand-axes) मिले हैं, जिसके कारण इसे ‘एश्यूलियन संस्कृति’ भी कहा जाता है।

2. मध्य पुरापाषाण काल (Middle Paleolithic Age)

यह पुरापाषाण काल का दूसरा चरण है, जिसका समय 50,000 ईसा पूर्व से 40,000 ईसा पूर्व तक माना जाता है। यद्यपि यह समय बहुत छोटा था, लेकिन तकनीकी दृष्टि से यह एक बड़ा बदलाव लेकर आया।

जलवायु में परिवर्तन: इस काल तक आते-आते हिमयुग की तीव्रता में थोड़ी कमी आई। तापमान में मामूली बढ़ोतरी के कारण बर्फ पिघली और कुछ नए घास के मैदानों तथा जंगलों का विस्तार हुआ। इसके कारण छोटे और फुर्तीले जानवरों की संख्या बढ़ी।

औजारों की तकनीक (The Flake Culture): बड़े और फुर्तीले जानवरों का शिकार करने के लिए भारी और बेडौल पत्थरों के हथियार बेकार साबित हो रहे थे। इसलिए मानव ने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल किया और कोर पत्थरों के बजाय उनसे टूटने वाली पतली कतरनों या ‘फलकों’ (Flakes) से औजार बनाना शुरू किया।

जब एक बड़े पत्थर पर चोट की जाती है, तो उससे जो पतली पपड़ी अलग होती है, उसे ‘फलक’ कहते हैं। ये फलक स्वाभाविक रूप से बहुत पतले और धारदार होते थे। प्रसिद्ध पुरातत्वविद एच.डी. सांकलिया ने इस तकनीकी बदलाव के कारण मध्य पुरापाषाण काल को ‘फलक संस्कृति’ (Flake Culture) का नाम दिया है।

पत्थरों के प्रकार में बदलाव: अब मानव ने साधारण क्वाटजाइट पत्थर को छोड़कर अधिक मजबूत और बारीक बनावट वाले पत्थरों का चयन किया, जैसे— चर्ट (Chert), जैस्पर (Jasper) और फ्लिंट (Flint)।

प्रमुख हथियार:

  • खुरचनी (Scraper): यह एक ऐसा फलक उपकरण था जिसके किनारों पर धार होती थी। इसका मुख्य उपयोग शिकार किए गए जानवर की चमड़ी को खुरचकर साफ करने के लिए किया जाता था।

  • बेधक (Borer/Point): यह आगे से नुकीला पत्थर होता था जिसका उपयोग चमड़े या लकड़ी में छेद करने के लिए किया जाता था।

  • तक्षणी (Burin): यह आज के स्क्रू-ड्राइवर या छेनी की तरह काम करता था, जिससे पत्थरों या हड्डियों पर नक्काशी जैसी धार बनाई जाती थी।

3. उच्च पुरापाषाण काल (Upper Paleolithic Age)

यह पुरापाषाण काल का अंतिम और तकनीकी रूप से सबसे उन्नत चरण है। इसका समय 40,000 ईसा पूर्व से 10,000 ईसा पूर्व तक माना जाता है। इस काल में मानव जाति ने शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर लंबी छलांग लगाई।

जलवायु का अवसान: यह हिमयुग (Ice Age) का अंतिम दौर था। जलवायु अब तेजी से गर्म और शुष्क होने लगी थी। पर्यावरण में आए इस बड़े बदलाव के कारण पृथ्वी पर आधुनिक वनस्पतियों और जीवों का विकास हुआ।

होमो सेपियन्स (Homo Sapiens) का उदय: इस काल की सबसे महान और क्रांतिकारी जैविक घटना थी— आधुनिक बुद्धिमान मानव यानी होमो सेपियन्स का पृथ्वी पर पहली बार आगमन। इससे पहले के मानव (जैसे नियंडरथल या होमो इरेक्टस) की तुलना में होमो सेपियन्स का मस्तिष्क अधिक विकसित था, जिससे सोचने, समझने और कलात्मक अभिव्यक्तियों की शुरुआत हुई।

औजारों की तकनीकी क्रांति (Blade Tools): इस काल के औजार अत्यधिक पतले, लंबे और दोनों तरफ से धारदार बनाए जाने लगे, जिन्हें ‘ब्लेड’ (Blade) कहा जाता था। इनकी लंबाई इनकी चौड़ाई से दोगुनी होती थी।

इसके अलावा, इस काल के मानव ने एक और अद्भुत शुरुआत की— उन्होंने केवल पत्थरों पर निर्भर रहना छोड़कर जानवरों की हड्डियों, दांतों और सींगों से उपकरण (Bone Tools) बनाना शुरू किया। हाथीदांत और हिरण के सींगों से सुइयां, भाले और बछियों के अग्रभाग बनाए गए, जिसने शिकार को और अधिक आसान बना दिया।

कला और आध्यात्मिक चेतना का प्रादुर्भाव

उच्च पुरापाषाण काल की एक और अद्भुत विशेषता थी— मानव के भीतर कलात्मक और रचनात्मक सोच का पैदा होना। गुफाओं के एकांत जीवन और विकसित होते मस्तिष्क ने आदिमानव को पेंटिंग और मूर्तियाँ बनाने के लिए प्रेरित किया।

गुफा चित्रकारी (Rock Art): मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका (Bhimbetka) की गुफाएं इसका सबसे बड़ा और जीवंत प्रमाण हैं। उच्च पुरापाषाण काल के मानव ने गुफाओं की छत और दीवारों पर खनिज रंगों (जैसे गेरू और मैंगनीज) से अद्भुत चित्र बनाए। इन चित्रों में इंसानों को नाचते हुए, हाथ में भाला लेकर जानवरों का पीछा करते हुए और सामूहिक उत्सव मनाते हुए दिखाया गया है। यह इस बात का सबूत है कि उस दौर का मानव सामाजिक रूप से एक-दूसरे के करीब आ रहा था।

मातृदेवी की मूर्ति: उत्तर प्रदेश की बेलन घाटी में स्थित ‘लोहंदा नाला’ नामक स्थान से उच्च पुरापाषाण काल की हड्डी से बनी एक स्त्री की मूर्ति मिली है, जिसे इतिहासकारों ने ‘मातृदेवी’ (Mother Goddess) की मूर्ति माना है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण साक्ष्य है, जो यह संकेत देता है कि शायद आदिमानव के मन में प्रकृति की प्रजनन शक्ति या किसी अलौकिक सत्ता के प्रति सम्मान और पूजा की भावना अंकुरित होने लगी थी।

भारत के प्रमुख पुरापाषाण कालीन स्थल (Gatest Archaeological Sites)

भारत का इतिहास पुरापाषाण कालीन स्थलों से समृद्ध है। परीक्षाओं में अक्सर इन स्थलों की भौगोलिक स्थिति पूछी जाती है:

  • हथनौरा (मध्य प्रदेश): नर्मदा नदी की घाटी में स्थित यह स्थल पूरे भारतीय इतिहास के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। यहाँ से पुरातत्वविद अरुण सोनकिया को मानव खोपड़ी का जीवाश्म मिला है। यह भारत में पाया गया अब तक का सबसे पहला और प्राचीनतम मानव अवशेष है, जिसे ‘नर्मदा मानव’ कहा जाता है।

  • भीमबेटका (मध्य प्रदेश): यहाँ के रॉक शेल्टर्स आदिमानव की कलाकारी का दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र हैं, जो वर्तमान में यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं।

  • बेलन घाटी (उत्तर प्रदेश): मिर्जापुर और प्रयागराज के पास स्थित यह घाटी अद्भुत है क्योंकि यहाँ निम्न, मध्य और उच्च पुरापाषाण काल के अवशेष एक के बाद एक क्रमिक परतों में मिले हैं, जिससे इतिहास का क्रम नहीं टूटता।

  • कर्नूल की गुफाएं (आंध्र प्रदेश): इन गुफाओं की खुदाई से बड़े पैमाने पर प्राचीन राख (Ash) के अवशेष मिले हैं। यह इस बात का अकाट्य पुरातात्विक प्रमाण है कि पुरापाषाण काल का मानव आग को पैदा करना और उससे परिचित होना सीख चुका था।

  • हुंसगी घाटी (कर्नाटक): इस क्षेत्र से चूना पत्थर (Limestone) से बने निम्न पुरापाषाण काल के हजारों औजार मिले हैं। इतिहासकारों का मानना है कि यह आदिमानव का औजार बनाने का एक बहुत बड़ा ‘कारखाना’ (Workshop Site) था।

  • डीडवाना (राजस्थान): थार मरुस्थल के इस इलाके से भी पुरापाषाण काल के औजार और उस समय की जलवायु के साक्ष्य मिले हैं।

परीक्षा के लिए 30+ अति महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Bullet Points for Exams)

  1. पाषाण काल पूरी तरह से प्रागैतिहासिक काल के अंतर्गत आता है क्योंकि इसका कोई लिखित विवरण नहीं है।

  2. भारत में प्रागैतिहासिक अध्ययन की शुरुआत करने का श्रेय रॉबर्ट ब्रूस फुट को जाता है।

  3. रॉबर्ट ब्रूस फुट ने 1863 ई. में मद्रास के पास पल्लवरम से पहला हस्तकुठार (Hand-axe) खोजा था।

  4. रॉबर्ट ब्रूस फुट को ‘भारतीय प्रागैतिहासिक इतिहास का जनक’ कहा जाता है।

  5. पुरापाषाण काल भूवैज्ञानिक दृष्टि से प्लीस्टोसीन या हिमयुग के अंतर्गत आता है।

  6. इस काल का मानव मुख्य रूप से खाद्य संग्राहक और शिकारी था।

  7. पुरापाषाण काल का मानव कृषि और पशुपालन से पूरी तरह अपरिचित था।

  8. क्वाटजाइट पत्थर की प्रधानता के कारण इस काल के मानव को ‘क्वाटजाइट मैन’ भी कहा जाता है।

  9. आग की खोज पुरापाषाण काल के अंतिम चरण (उच्च पुरापाषाण काल) में हुई थी।

  10. पुरापाषाण काल के मानव का समाज ‘बैंड सोसाइटी’ कहलाता था जो पूरी तरह समतावादी था।

  11. सोहन नदी घाटी वर्तमान में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है।

  12. सोहन संस्कृति को ‘चॉपर-चॉपिंग संस्कृति’ के नाम से भी जाना जाता है।

  13. दक्षिण भारत की मद्रास संस्कृति को ‘एश्यूलियन संस्कृति’ कहा जाता है।

  14. मध्य पुरापाषाण काल को उपकरणों की विशेषता के कारण ‘फलक संस्कृति’ कहा जाता है।

  15. फलक संस्कृति नाम प्रसिद्ध पुरातत्वविद एच.डी. सांकलिया ने दिया था।

  16. मध्य पुरापाषाण काल में मुख्य रूप से चर्ट, जैस्पर और फ्लिंट पत्थरों का उपयोग हुआ।

  17. आधुनिक मानव यानी ‘होमो सेपियन्स’ का उदय उच्च पुरापाषाण काल में हुआ था।

  18. उच्च पुरापाषाण काल के मुख्य उपकरणों को ‘ब्लेड उपकरण’ कहा जाता है।

  19. हड्डियों और सींगों से बने औजारों की शुरुआत उच्च पुरापाषाण काल में हुई।

  20. भारत में सबसे प्राचीन मानव जीवाश्म (खोपड़ी) मध्य प्रदेश के हथनौरा से मिला है।

  21. हथनौरा से मानव खोपड़ी की खोज 5 दिसंबर 1982 को अरुण सोनकिया ने की थी।

  22. हथनौरा से मिले जीवाश्म को इतिहास में ‘नर्मदा मानव’ का नाम दिया गया है।

  23. भीमबेटका की गुफाओं की खोज 1957-58 में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की थी।

  24. भीमबेटका मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में विंध्य पर्वत श्रेणियों में स्थित है।

  25. भीमबेटका को वर्ष 2003 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था।

  26. उत्तर प्रदेश की बेलन घाटी से पुरापाषाण काल के तीनों चरणों के अवशेष मिले हैं।

  27. हड्डी से बनी मातृदेवी की प्राचीनतम मूर्ति बेलन घाटी के लोहंदा नाला से प्राप्त हुई है।

  28. आंध्र प्रदेश की कर्नूल गुफाओं से मिले राख के अवशेष आग के प्रयोग को दर्शाते हैं।

  29. कर्नाटक की हुंसगी घाटी पुरापाषाण कालीन औजारों का एक प्रमुख कारखाना स्थल थी।

  30. पुरापाषाण काल का अंत लगभग 10,000 ईसा पूर्व में जलवायु के गर्म होने के साथ हुआ।

निष्कर्ष: सुदृढ़ नींव का निर्माण

सभ्यता के इस सुदूर अतीत के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि पुरापाषाण काल केवल आदिम या पिछड़े मानव का युग नहीं था। यह मानव प्रजाति के अस्तित्व, अनुकूलन और बौद्धिक विकास की सबसे कठिन परीक्षा का दौर था। कड़ाके की ठंड, संसाधनों की कमी और हिंसक पशुओं के बीच, बिना किसी आधुनिक तकनीक के, आदिमानव ने केवल पत्थरों के सहारे प्रकृति पर विजय प्राप्त करना शुरू किया।

आग की खोज, पत्थरों को फलक और ब्लेड का आकार देना और गुफाओं में कला की शुरुआत करना— ये सब ऐसी घटनाएं थीं जिन्होंने आने वाले मध्यपाषाण और नवपाषाण काल की कृषि क्रांति की सुदृढ़ पृष्ठभूमि तैयार की। इसी नींव पर आगे चलकर सिंधु घाटी जैसी महान नगरीय सभ्यताओं का विकास संभव हो सका।

अभ्यास प्रश्न (UPSC & State PSC Prelims Level)

प्रश्न 1: निम्नलिखित में से किस पुरास्थल से पाषाण संस्कृति से लेकर हड़प्पा सभ्यता तक के सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं? (A) आमरी (B) मेहरगढ़ (C) कोटदीजी (D) कालीबंगा उत्तर: (B) मेहरगढ़ (यहाँ पाषाण काल के अंतिम चरण और प्रारंभिक बस्तियों के साक्ष्य मिलते हैं)

प्रश्न 2: ‘मद्रास संस्कृति’ या ‘एश्यूलियन संस्कृति’ का संबंध पाषाण काल के किस चरण से है? (A) निम्न पुरापाषाण काल (B) मध्य पुरापाषाण काल (C) उच्च पुरापाषाण काल (D) नवपाषाण काल उत्तर: (A) निम्न पुरापाषाण काल

प्रश्न 3: भीमबेटका की गुफाओं से प्राप्त शैलचित्रों में मुख्य रूप से किस रंग का प्रयोग बहुतायत में देखने को मिलता है? (A) पीला और नीला (B) हरा और गहरा लाल (गेरू) (C) सफेद और काला (D) चमकीला बैंगनी उत्तर: (B) हरा और गहरा लाल (गेरू)

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