
पुष्पी पादपों की शारीरिकी
1. विस्तृत प्रस्तावना: पुष्पी पादपों की शारीरिकी क्या है?
पिछले Blog में हमने पौधों की ‘आकारिकी’ (Morphology) यानी उनके बाहरी स्वरूप (जड़, तना, पत्ती) का अध्ययन किया था। लेकिन जब हम किसी पौधे के तने या जड़ को काटकर माइक्रोस्कोप के नीचे उसकी आंतरिक संरचना (Internal Structure) और ऊतकों की व्यवस्था का अध्ययन करते हैं, तो जीव विज्ञान की उस शाखा को पुष्पी पादपों की शारीरिकी (Anatomy of Flowering Plants) कहा जाता है।
पौधों के अंदर मुख्य रूप से कोशिकाएं मिलकर ‘ऊतक’ (Tissues) बनाती हैं। पुष्पी पादपों की शारीरिकी को गहराई से समझने के लिए हमें सबसे पहले पौधों के ‘ऊतक तंत्र’ (Tissue System) को समझना होगा, जो पौधों को मजबूती, सुरक्षा और भोजन-पानी के परिवहन में मदद करते हैं।
2. पुष्पी पादपों के ऊतक तंत्र (Tissue Systems in Plants)
संरचना और स्थिति के आधार पर पुष्पी पादपों की शारीरिकी में ऊतक तंत्र को तीन मुख्य भागों में बांटा गया है:
A. बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र (Epidermal Tissue System)
यह पौधे का सबसे बाहरी आवरण होता है जो पौधे की रक्षा करता है।
बाह्यत्वचा (Epidermis): यह सबसे बाहरी परत है। पानी की हानि को रोकने के लिए तने और पत्तियों की बाह्यत्वचा पर मोम जैसी एक परत होती है, जिसे ‘क्यूटिकल’ (Cuticle) कहते हैं। (जड़ों में क्यूटिकल नहीं होती)।
रंध्र (Stomata): पत्तियों की बाह्यत्वचा पर छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जो गैसों के आदान-प्रदान और वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) को नियंत्रित करते हैं। रंध्र दो ‘रक्षक कोशिकाओं’ (Guard cells) से घिरे होते हैं।
मूलरोम और ट्राइकोम: जड़ों पर एककोशिकीय ‘मूलरोम’ (Root hairs) होते हैं जो पानी सोखते हैं। तने पर बहुकोशिकीय बाल होते हैं जिन्हें ‘ट्राइकोम’ (Trichomes) कहते हैं, जो पानी को उड़ने से रोकते हैं।
B. भरण ऊतक तंत्र (Ground Tissue System)
बाह्यत्वचा और संवहन बंडल को छोड़कर, पौधे का बाकी पूरा हिस्सा भरण ऊतक कहलाता है। यह पौधे का मुख्य ‘मांसल’ भाग बनाता है। इसमें पैरेन्काइमा, कॉलेन्काइमा और स्क्लेरेन्काइमा ऊतक आते हैं। पत्तियों में इसी ऊतक को ‘पर्णमध्योतक’ (Mesophyll) कहते हैं, जहाँ प्रकाश-संश्लेषण होता है।
C. संवहन ऊतक तंत्र (Vascular Tissue System)
पुष्पी पादपों की शारीरिकी का यह सबसे महत्वपूर्ण तंत्र है, जो जल और भोजन के परिवहन का कार्य करता है। यह जटिल ऊतकों—जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem) से मिलकर बना होता है।
जाइलम: जड़ों से पानी और खनिजों को पत्तियों तक पहुँचाता है।
फ्लोएम: पत्तियों में बने भोजन को पौधे के विभिन्न भागों तक ले जाता है।
जाइलम और फ्लोएम मिलकर ‘संवहन बंडल’ (Vascular Bundle) बनाते हैं।

3. द्विबीजपत्री और एकबीजपत्री मूल (जड़) की शारीरिकी
जब हम जड़ों को अनुप्रस्थ (Transverse) काटते हैं, तो उनकी पुष्पी पादपों की शारीरिकी कुछ इस प्रकार दिखती है:
मूलत्वचा (Epiblema): सबसे बाहरी परत, जिससे मूलरोम निकलते हैं।
वल्कुट (Cortex): यह पैरेन्काइमा कोशिकाओं की कई परतें होती हैं जो पानी को अंदर जाने देती हैं।
अंतस्त्वचा (Endodermis): यह वल्कुट की सबसे भीतरी परत है। इसमें पानी को रोकने वाली सुबेरिन (Suberin) की परत पाई जाती है जिसे ‘कैस्पेरियन पट्टियां’ (Casparian strips) कहते हैं। (UPSC का पसंदीदा प्रश्न)।
परिरंभ (Pericycle): यहीं से जड़ों की पार्श्व शाखाएं (Lateral roots) निकलती हैं।
मज्जा (Pith): द्विबीजपत्री जड़ों में मज्जा बहुत छोटी या अनुपस्थित होती है, जबकि एकबीजपत्री जड़ों (जैसे मक्का) में मज्जा बहुत बड़ी और विकसित होती है।

4. द्विबीजपत्री और एकबीजपत्री तने की शारीरिकी
तने की आंतरिक संरचना जड़ों से अलग होती है। पुष्पी पादपों की शारीरिकी के अंतर्गत द्विबीजपत्री और एकबीजपत्री तनों में सबसे बड़ा अंतर उनके ‘संवहन बंडलों’ (Vascular Bundles) में होता है:
द्विबीजपत्री तना (Dicot Stem – उदा: सूरजमुखी):
इनके संवहन बंडल एक ‘छल्ले’ (Ring) के आकार में बहुत ही सुव्यवस्थित ढंग से सजे होते हैं।
जाइलम और फ्लोएम के बीच ‘कैम्बियम’ (Cambium – एधा) नामक ऊतक पाया जाता है। कैम्बियम की उपस्थिति के कारण ही ये तने मोटाई में बढ़ सकते हैं (इन्हें ‘खुले’ संवहन बंडल कहते हैं)।
एकबीजपत्री तना (Monocot Stem – उदा: मक्का/घास):
इनके संवहन बंडल पूरे भरण ऊतक में बिखरे (Scattered) रहते हैं।
इनमें कैम्बियम नहीं पाया जाता है, इसलिए घास या मक्के का तना मोटाई में नहीं बढ़ता (इन्हें ‘बंद’ संवहन बंडल कहते हैं)।

5. पत्ती की शारीरिकी (Anatomy of Leaf)
पत्तियों की पुष्पी पादपों की शारीरिकी मुख्य रूप से प्रकाश-संश्लेषण के लिए अनुकूलित (Adapted) होती है।
द्विबीजपत्री पत्ती (Dorsiventral Leaf): इसमें ऊपरी और निचली सतह अलग-अलग होती है। रंध्र (Stomata) मुख्य रूप से निचली सतह पर पाए जाते हैं। पर्णमध्योतक (Mesophyll) दो भागों में बंटा होता है: खंभ ऊतक (Palisade) और स्पंजी ऊतक (Spongy)।
एकबीजपत्री पत्ती (Isobilateral Leaf): इनकी ऊपरी और निचली सतह एक समान होती है। रंध्र (Stomata) दोनों सतहों पर समान रूप से पाए जाते हैं। घासों में कुछ विशेष बड़ी कोशिकाएं होती हैं जिन्हें ‘बुलीफॉर्म कोशिकाएं’ (Bulliform cells) कहते हैं, जो सूखे के समय पत्ती को मोड़ने (पानी बचाने) में मदद करती हैं।
6. द्वितीयक वृद्धि (Secondary Growth) और वार्षिक वलय
जड़ों और तने का लंबाई में बढ़ना ‘प्राथमिक वृद्धि’ कहलाता है। लेकिन जब पेड़ों का तना ‘मोटाई या परिधि’ (Girth) में बढ़ता है, तो उसे द्वितीयक वृद्धि (Secondary Growth) कहते हैं। यह मुख्य रूप से द्विबीजपत्री पौधों और जिम्नोस्पर्म में पाई जाती है (एकबीजपत्री में नहीं)।
यह वृद्धि दो प्रकार के पार्श्व विभज्योतकों के कारण होती है:
संवहनी कैम्बियम (Vascular Cambium): यह तने के अंदर द्वितीयक जाइलम (लकड़ी) और द्वितीयक फ्लोएम बनाता है।
कॉर्क कैम्बियम (Cork Cambium): यह तने के बाहर की तरफ कॉर्क (छाल) का निर्माण करता है, जो पेड़ को सुरक्षित रखता है।
वार्षिक वलय (Annual Rings):
वसंत ऋतु (Spring) में कैम्बियम बहुत सक्रिय होता है और अधिक चौड़ी वाहिकाएं बनाता है, जिसे ‘वसंत काष्ठ’ (Spring wood) कहते हैं। यह हल्के रंग की होती है।
सर्दियों (Autumn) में कैम्बियम कम सक्रिय होता है और संकरी वाहिकाएं बनाता है, जिसे ‘शरद काष्ठ’ (Autumn wood) कहते हैं। यह गहरे रंग की होती है।
इन दोनों (वसंत और शरद काष्ठ) के मिलने से एक वर्ष में जो घेरा बनता है, उसे ‘वार्षिक वलय’ (Annual Ring) कहते हैं।
UPSC फैक्ट: पेड़ के तने को काटकर इन वार्षिक वलयों को गिनकर किसी भी पेड़ की सही आयु (Age) का पता लगाया जा सकता है। इस विज्ञान को डेंड्रोक्रोनोलॉजी (Dendrochronology) कहा जाता है।

7. निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में, पुष्पी पादपों की शारीरिकी (Plant Anatomy) केवल सूक्ष्मदर्शी के नीचे दिखाई देने वाली कोशिकाओं का जाल नहीं है, बल्कि यह प्रकृति की सबसे बेहतरीन जल-प्रबंधन और संरचनात्मक इंजीनियरिंग (Engineering) का जीता-जागता उदाहरण है। जड़ों की कैस्पेरियन पट्टियों से लेकर पत्तियों की बुलीफॉर्म कोशिकाओं तक, हर एक ऊतक का अपना विशिष्ट कार्य है जो पौधे को पृथ्वी के कठोर वातावरण में जीवित रखता है। इसी शारीरिकी के अध्ययन से मानव ने इमारती लकड़ी (Timber), रेशे (Fibers) और कागज उद्योग में क्रांतिकारी प्रगति की है।
8. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)
प्रश्न 1: पुष्पी पादपों की शारीरिकी के आधार पर एकबीजपत्री (Monocot) और द्विबीजपत्री (Dicot) तने की आंतरिक संरचना के बीच पाए जाने वाले प्रमुख अंतरों की विवेचना करें। (250 शब्द)
प्रश्न 2: संवहन ऊतक तंत्र (Vascular Tissue System) से आप क्या समझते हैं? जाइलम और फ्लोएम की संरचना और उनके विशिष्ट कार्यों का वर्णन करें। (200 शब्द)
प्रश्न 3: द्वितीयक वृद्धि (Secondary Growth) क्या है? द्विबीजपत्री तने में संवहनी कैम्बियम (Vascular cambium) की भूमिका और ‘वार्षिक वलय’ (Annual rings) के निर्माण को स्पष्ट करें। (200 शब्द)
प्रश्न 4: द्विबीजपत्री जड़ों की ‘अंतस्त्वचा’ (Endodermis) में पाई जाने वाली ‘कैस्पेरियन पट्टियों’ (Casparian strips) का क्या महत्व है? (150 शब्द)
प्रश्न 5: पुष्पी पादपों की शारीरिकी के संदर्भ में एकबीजपत्री पत्तियों में पाई जाने वाली ‘बुलीफॉर्म कोशिकाओं’ (Bulliform cells) के संरचनात्मक और पारिस्थितिक महत्व को स्पष्ट करें। (150 शब्द)
9. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)
पौधों की आंतरिक संरचना (Internal structure) और ऊतकों के संगठन के वैज्ञानिक अध्ययन को पुष्पी पादपों की शारीरिकी (Anatomy) कहा जाता है।
नेहेमिया ग्रू (Nehemiah Grew) को पादप शारीरिकी (Plant Anatomy) का जनक माना जाता है।
पौधों का सबसे बाहरी सुरक्षात्मक आवरण ‘बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र’ (Epidermal tissue system) कहलाता है।
तने और पत्तियों से पानी को उड़ने से रोकने के लिए बाह्यत्वचा पर ‘क्यूटिकल’ (Cuticle) की मोम जैसी परत होती है।
जड़ों (Roots) की बाह्यत्वचा (मूलत्वचा) पर कभी भी ‘क्यूटिकल’ की परत नहीं पाई जाती है।
पत्तियों पर गैसों के आदान-प्रदान के लिए ‘रंध्र’ (Stomata) होते हैं, जो रक्षक कोशिकाओं (Guard cells) से घिरे होते हैं।
द्विबीजपत्री पौधों के रंध्रों की रक्षक कोशिकाएं सेम के बीज (Bean-shaped) के आकार की होती हैं।
एकबीजपत्री (घास) पौधों के रंध्रों की रक्षक कोशिकाएं डंबलाकार (Dumb-bell shaped) होती हैं।
तने के ऊपर पाए जाने वाले बहुकोशिकीय बालों को ‘ट्राइकोम’ (Trichomes) कहते हैं, जो वाष्पोत्सर्जन रोकते हैं।
जड़ों के ‘मूलरोम’ (Root hairs) हमेशा एककोशिकीय (Unicellular) होते हैं।
पुष्पी पादपों की शारीरिकी में बाह्यत्वचा और संवहन बंडल को छोड़कर पौधे का सारा हिस्सा ‘भरण ऊतक’ (Ground tissue) कहलाता है।
पत्तियों के भरण ऊतक को ‘पर्णमध्योतक’ (Mesophyll) कहते हैं, जिसमें क्लोरोप्लास्ट होता है और प्रकाश-संश्लेषण होता है।
जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem) को पौधों का ‘जटिल ऊतक’ (Complex tissue) कहा जाता है।
जड़ों की अंतस्त्वचा (Endodermis) में पानी को रोकने वाले पदार्थ ‘सुबेरिन’ (Suberin) का जमाव होता है।
सुबेरिन के इस जमाव को ही ‘कैस्पेरियन पट्टियां’ (Casparian strips) कहा जाता है (खोजकर्ता: कैस्परी)।
जड़ों से निकलने वाली ‘पार्श्व जड़ें’ (Lateral roots) हमेशा ‘परिरंभ’ (Pericycle) ऊतक से उत्पन्न होती हैं।
द्विबीजपत्री जड़ों में ‘मज्जा’ (Pith) बहुत छोटी या पूरी तरह अनुपस्थित होती है।
एकबीजपत्री जड़ों में ‘मज्जा’ (Pith) बहुत बड़ी और स्पष्ट रूप से विकसित होती है।
जब जाइलम और फ्लोएम एक ही त्रिज्या (Radius) पर स्थित होते हैं, तो उन्हें ‘संयुक्त संवहन बंडल’ (Conjoint) कहते हैं (तने और पत्तियों में)।
द्विबीजपत्री तने में जाइलम और फ्लोएम के बीच ‘कैम्बियम’ (Cambium) पाया जाता है, जो इसे मोटाई में बढ़ने में मदद करता है।
कैम्बियम की उपस्थिति के कारण द्विबीजपत्री तने के संवहन बंडल को ‘खुला’ (Open) संवहन बंडल कहते हैं।
एकबीजपत्री तने में संवहन बंडल पूरे भरण ऊतक में ‘बिखरे’ (Scattered) रहते हैं।
एकबीजपत्री तने में ‘कैम्बियम’ नहीं पाया जाता, इसलिए इसे ‘बंद’ (Closed) संवहन बंडल कहते हैं।
द्विबीजपत्री पत्तियों को ‘पृष्ठाधर पत्ती’ (Dorsiventral leaf) कहते हैं क्योंकि इनकी ऊपरी और निचली सतह अलग-अलग होती है।
द्विबीजपत्री पत्तियों में रंध्र (Stomata) मुख्य रूप से ‘निचली सतह’ (Lower epidermis) पर अधिक पाए जाते हैं।
एकबीजपत्री पत्तियों (जैसे मक्का) को ‘समद्विपार्श्व पत्ती’ (Isobilateral leaf) कहते हैं क्योंकि इनकी दोनों सतहें समान होती हैं।
एकबीजपत्री पत्तियों की दोनों सतहों पर रंध्रों (Stomata) की संख्या लगभग बराबर होती है।
घासों (एकबीजपत्री) की ऊपरी बाह्यत्वचा पर पाई जाने वाली बड़ी, खाली और रंगहीन कोशिकाओं को ‘बुलीफॉर्म कोशिकाएं’ (Bulliform cells) कहते हैं।
सूखे के मौसम में पानी की कमी होने पर बुलीफॉर्म कोशिकाएं सिकुड़ जाती हैं और पत्ती मुड़ जाती है, जिससे वाष्पोत्सर्जन कम हो जाता है।
तने या जड़ की परिधि (Girth / मोटाई) में होने वाली वृद्धि को ‘द्वितीयक वृद्धि’ (Secondary Growth) कहते हैं।
पुष्पी पादपों की शारीरिकी के अनुसार, द्वितीयक वृद्धि केवल द्विबीजपत्री पौधों और जिम्नोस्पर्म में होती है (एकबीजपत्री में नहीं)।
‘संवहनी कैम्बियम’ (Vascular cambium) अंदर की ओर द्वितीयक जाइलम और बाहर की ओर द्वितीयक फ्लोएम बनाता है।
आम भाषा में जिसे हम ‘लकड़ी’ (Wood) कहते हैं, वह वास्तव में ‘द्वितीयक जाइलम’ (Secondary Xylem) ही होता है।
वसंत ऋतु (Spring) में बनने वाली लकड़ी को ‘वसंत काष्ठ’ (Spring wood / Early wood) कहते हैं, जो हल्के रंग की होती है और इसकी वाहिकाएं चौड़ी होती हैं।
सर्दियों (Autumn) में बनने वाली लकड़ी को ‘शरद काष्ठ’ (Autumn wood / Late wood) कहते हैं, जो गहरे रंग की और भारी होती है।
एक ‘वसंत काष्ठ’ और एक ‘शरद काष्ठ’ के घेरे को मिलाकर एक ‘वार्षिक वलय’ (Annual Ring) बनता है।
वार्षिक वलयों को गिनकर पेड़ों की आयु (Age) का सटीक पता लगाया जा सकता है।
पेड़ों की आयु का अध्ययन करने वाले विज्ञान को ‘डेंड्रोक्रोनोलॉजी’ (Dendrochronology) कहा जाता है।
समुद्र तटों (जहाँ मौसम एक समान रहता है) पर उगने वाले पेड़ों में स्पष्ट वार्षिक वलय (Annual rings) नहीं बनते हैं।
पुराने पेड़ों में तने के बीच का हिस्सा बहुत कठोर, गहरे रंग का और निर्जीव हो जाता है, जिसे ‘अंतःकाष्ठ’ (Heartwood) कहते हैं।
‘अंतःकाष्ठ’ (Heartwood) में टेनिन, रेजिन और गोंद जमा हो जाते हैं, जिससे यह दीमक (Termites) और सूक्ष्मजीवों के प्रति प्रतिरोधी (Resistant) हो जाती है।
तने के बाहरी हिस्से की लकड़ी जो हल्के रंग की होती है और पानी का संवहन करती है, उसे ‘रसकाष्ठ’ (Sapwood) कहते हैं।
‘कॉर्क कैम्बियम’ (Cork Cambium) को वैज्ञानिक भाषा में ‘फेलोजेन’ (Phellogen) कहा जाता है।
फेलोजेन (कॉर्क कैम्बियम) बाहर की तरफ जो कॉर्क बनाता है, उसे ‘फेलम’ (Phellem) कहते हैं।
कॉर्क (Cork) की कोशिकाओं में भी ‘सुबेरिन’ (Suberin) का जमाव होता है, जो इसे पानी के प्रति अभेद्य बनाता है।
वाणिज्यिक कॉर्क (Commercial Cork) जो बोतलों के ढक्कन बनाने में काम आता है, वह ‘क्वेरकस सुबर’ (Quercus suber) नामक ओक के पेड़ से प्राप्त होता है।
पेड़ों की छाल (Bark) पर गैसों के आदान-प्रदान के लिए लेंस (Lens) के आकार के छोटे छिद्र पाए जाते हैं जिन्हें ‘वात-रंध्र’ (Lenticels) कहते हैं।
जाइलम मुख्य रूप से मृत कोशिकाओं (Tracheids और Vessels) से बना होता है, जो गुरुत्वाकर्षण के विपरीत पानी ले जाता है।
फ्लोएम मुख्य रूप से जीवित कोशिकाओं (Sieve tubes और Companion cells) से बना होता है, जो भोजन का परिवहन दोनों दिशाओं (ऊपर और नीचे) में करता है।
पुष्पी पादपों की शारीरिकी का ज्ञान ग्राफ्टिंग (Grafting), कृषि और इमारती लकड़ी के चुनाव के लिए अत्यंत आवश्यक है।