
1. मेहरगढ़ सभ्यता: नवपाषाणिक क्रांति और मेहरगढ़ का उदय
मानव इतिहास में एक समय ऐसा आया जब आदिमानव जंगलों में कंद-मूल खोजने और जानवरों का शिकार करने (Hunter-Gatherer) के घुमंतू जीवन से थक चुका था। उसने बीजों को अंकुरित होते देखा, जानवरों को पालतू बनाना सीखा और एक ही स्थान पर घर बनाकर रहना शुरू किया। इस महान परिवर्तन को इतिहास में ‘नवपाषाणिक क्रांति’ (Neolithic Revolution) कहा जाता है।
भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) के संदर्भ में, यह महान क्रांति जिस स्थान पर सबसे पहले और सबसे स्पष्ट रूप से घटित हुई, वह है—मेहरगढ़ (Mehrgarh)।
मेहरगढ़ केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं है; यह वह प्रयोगशाला है जहाँ भारतीय उपमहाद्वीप के पहले किसानों ने खेती की, कुम्हारों ने पहले बर्तन बनाए, और समाज ने एक स्थायी ग्राम्य जीवन की नींव रखी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मेहरगढ़ को “सिंधु घाटी सभ्यता की पूर्वपीठिका” (Precursor to the Indus Valley Civilization) माना जाता है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के विशाल नगर कोई रातों-रात हुए चमत्कार नहीं थे, बल्कि वे मेहरगढ़ के लोगों द्वारा हजारों वर्षों में विकसित की गई कृषि और शिल्प तकनीकों का ही अंतिम परिणाम थे।
2. भौगोलिक स्थिति और खोज (Geography & Discovery)
भौगोलिक स्थिति: मेहरगढ़ वर्तमान पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में कच्छी के मैदान (Kacchi Plain) में स्थित है। यह बोलन नदी (Bolan River) के तट पर और प्रसिद्ध बोलन दर्रे (Bolan Pass) के ठीक पास स्थित है।
रणनीतिक महत्व: बोलन दर्रा ईरान, अफगानिस्तान और सिंधु घाटी के बीच प्राचीन काल से ही एक प्रमुख व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्ग रहा है।
खोज: इस विश्व प्रसिद्ध स्थल की खोज और व्यापक उत्खनन कार्य 1974 में फ्रांसीसी पुरातत्वविदों की एक टीम द्वारा किया गया था, जिसका नेतृत्व जीन-फ्रांस्वा जारिज (Jean-François Jarrige) और उनकी पत्नी कैथरीन जारिज (Catherine Jarrige) ने किया था। 1974 से 1986 तक और फिर 1997 से 2000 तक यहाँ निरंतर खुदाई की गई।
3. मेहरगढ़ के ऐतिहासिक चरण (Chronological Periods of Mehrgarh)
पुरातत्वविदों ने मेहरगढ़ के सांस्कृतिक और तकनीकी विकास को मुख्य रूप से 7 चरणों (Periods) में विभाजित किया है। परीक्षा की दृष्टि से पहले तीन चरण सबसे महत्वपूर्ण हैं:
A. चरण I: असीरेमिक नवपाषाण काल (Aceramic Neolithic Period) – 7000 ई.पू. से 5500 ई.पू.
‘असीरेमिक’ का अर्थ: इस काल के लोग मिट्टी के बर्तन (Pottery) बनाना नहीं जानते थे।
कृषि की शुरुआत: यह भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि का सबसे प्राचीन प्रामाणिक साक्ष्य है। यहाँ के लोगों ने जंगली जौ (Barley) और गेहूं (Einkorn and Emmer Wheat) उगाना शुरू कर दिया था। खजूर (Dates) और बेर के भी साक्ष्य मिलते हैं।
पशुपालन: शुरुआत में वे जंगली जानवरों (गज़ेल, हिरण) का शिकार करते थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने भेड़, बकरी और ज़ेबू मवेशियों (Zebu Cattle) को पालतू बना लिया।
वास्तुकला: लोग धूप में सुखाई गई कच्ची ईंटों (Mud Bricks) से बने आयताकार घरों में रहते थे।
दंत चिकित्सा का प्रथम साक्ष्य: विश्व के इतिहास में दांतों की ड्रिलिंग (Dentistry) का सबसे प्राचीन ज्ञात उदाहरण (लगभग 7000 ई.पू. से 5500 ई.पू.) मेहरगढ़ के इसी चरण से मिला है, जहाँ फ्लिंट (Flint) के औजारों से जीवित मनुष्यों के दांतों में छेद किए गए थे।
B. चरण II और III: सिरेमिक नवपाषाण काल (Ceramic Neolithic) – 5500 ई.पू. से 3500 ई.पू.
कुम्हार के चाक का आविष्कार: इस चरण में मिट्टी के बर्तन (Pottery) बनने लगे। शुरुआत में बर्तन हाथ से बनाए जाते थे, लेकिन चरण III तक कुम्हार के चाक (Potter’s Wheel) का उपयोग शुरू हो गया। बर्तनों पर ज्यामितीय आकृतियां और जानवरों के चित्र बनाए जाने लगे।
तांबे का प्रथम प्रयोग: चरण III (लगभग 4000 ई.पू.) में आकर पत्थर के औजारों के साथ-साथ तांबे (Copper) के पिघलाने (Smelting) और उसके मोतियों (Beads) के साक्ष्य मिलते हैं, जो इसे ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic Age) की ओर ले जाता है।
विशाल अन्नागार (Granaries): अधिशेष अनाज को सुरक्षित रखने के लिए कई छोटे कमरों वाले आयताकार संरचनाएं (अन्नागार) बनाई गईं।
C. चरण IV से VII: ताम्रपाषाण और कांस्य युग की ओर (3500 ई.पू. से 2000 ई.पू.)
इस समय तक मेहरगढ़ एक बहुत बड़े और समृद्ध नगर में बदल चुका था। मिट्टी के बर्तनों का बड़े पैमाने पर (Mass production) उत्पादन होने लगा।
व्यापारिक नेटवर्क अत्यंत विस्तृत हो गया था। हालांकि, लगभग 2000 ईसा पूर्व (सिंधु घाटी सभ्यता के चरम के समय), मेहरगढ़ के लोगों ने इस स्थान को छोड़ना शुरू कर दिया और संभवतः वे सिंधु नदी की उपजाऊ घाटी की ओर पलायन कर गए। अंततः यह स्थल वीरान हो गया।
4. शिल्प, उद्योग और सुदूर व्यापार (Crafts and Trade Network)
मेहरगढ़ के लोग केवल किसान और चरवाहे नहीं थे, बल्कि वे उत्कृष्ट शिल्पकार (Craftsmen) और व्यापारी भी थे।
आभूषण और मनके (Bead Making): यहाँ से भारी मात्रा में कीमती और अर्ध-कीमती पत्थरों के मनके प्राप्त हुए हैं। इन मनकों को बनाने के लिए विशेष प्रकार की पत्थर की ड्रिल (Stone drills) का उपयोग किया जाता था।
टेराकोटा की मूर्तियां (Terracotta Figurines): मेहरगढ़ से बड़ी संख्या में पकी हुई मिट्टी (टेराकोटा) की मूर्तियां मिली हैं। इनमें मातृदेवी (Mother Goddess) की मूर्तियां बहुत प्रसिद्ध हैं। बाद के चरणों में इन मूर्तियों को विस्तृत हेयर स्टाइल और भारी आभूषणों से सजाया गया है।
व्यापारिक संपर्क (Trade Links): मेहरगढ़ कोई अलग-थलग गांव नहीं था। उत्खनन में समुद्री सीपियाँ (Sea Shells – अरब सागर से), लैपिस लाजुली (Lapis Lazuli – अफगानिस्तान के बदख्शां से) और फिरोजा (Turquoise – मध्य एशिया से) प्राप्त हुए हैं। यह साबित करता है कि 7000 ईसा पूर्व में भी इनका एक मजबूत लंबी दूरी का व्यापारिक नेटवर्क था।
5. दफन प्रथाएं (Burial Practices): जीवन के बाद के अस्तित्व में विश्वास
मेहरगढ़ के लोगों का ‘परलोक’ या मृत्यु के बाद के जीवन (Life after death) में गहरा विश्वास था। यह उनके शवाधान (Burials) के तरीकों से स्पष्ट होता है:
मृतकों को आम तौर पर उनके घरों के बीच या विशेष कब्रिस्तानों में दफनाया जाता था।
कब्रों में शवों को लाल गेरू (Red Ochre) से रंगा जाता था।
मृतक के साथ भारी मात्रा में ‘कब्र का सामान’ (Grave goods) रखा जाता था, जिसमें कीमती पत्थरों के मनके, सीपियों के आभूषण, पत्थर की कुल्हाड़ियां और मिट्टी के बर्तन शामिल थे।
पालतू जानवरों की बलि: कई कब्रों में शवों के साथ बकरियों और भेड़ों के कंकाल भी मिले हैं, जिन्हें संभवतः परलोक में मृतक के भोजन के लिए बलि चढ़ाया गया था।
6. मेहरगढ़ और सिंधु घाटी सभ्यता के बीच संबंध (Precursor to Indus Valley)
यूपीएससी (UPSC) के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक बिंदु है कि मेहरगढ़ को हड़प्पा सभ्यता की जननी (Mother) क्यों कहा जाता है।
कृषि का आधार: सिंधु घाटी सभ्यता की विशाल आबादी का भरण-पोषण जिस गेहूं, जौ और कपास (Cotton) की खेती पर निर्भर था, उसकी शुरुआत 3000 साल पहले मेहरगढ़ में ही हो चुकी थी। कपास की खेती का विश्व का सबसे प्राचीन साक्ष्य (लगभग 5000 ई.पू.) मेहरगढ़ से ही मिलता है।
नगर नियोजन (Town Planning): हड़प्पा के सुव्यवस्थित नगरों की ग्रिड प्रणाली का मूल रूप मेहरगढ़ के आयताकार घरों और अन्नागारों में देखा जा सकता है।
शिल्प और धातु कर्म: सिंधु घाटी के प्रसिद्ध ‘मनके बनाने के कारखाने’ (Bead making factories – जैसे चन्हुदड़ो में) और तांबा पिघलाने की तकनीक मेहरगढ़ के शिल्पकारों द्वारा ही विकसित और परिष्कृत की गई थी।
मातृदेवी की पूजा: हड़प्पा में जो मातृदेवी की पूजा अपने चरम पर थी, उसकी शुरुआत मेहरगढ़ की टेराकोटा मूर्तियों से ही हुई थी।
7. निष्कर्ष (Conclusion)
मेहरगढ़ का पुरातात्विक महत्व इस बात में निहित है कि इसने भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास को हजारों साल पीछे धकेल दिया। इससे पहले दुनिया मानती थी कि कृषि और स्थायी ग्राम्य जीवन का विकास केवल मध्य पूर्व (Mesopotamia) में हुआ था, लेकिन मेहरगढ़ ने यह साबित कर दिया कि बलूचिस्तान के पहाड़ों में भी मनुष्य ने स्वतंत्र रूप से एक उन्नत कृषि क्रांति को जन्म दिया था। मेहरगढ़ की वह छोटी सी बस्ती, जहाँ पहली बार जौ के बीज बोए गए थे, धीरे-धीरे उस महान सिंधु घाटी सभ्यता में बदल गई जिसने पूरे विश्व को अपने नगर नियोजन और शांतिपूर्ण समाज से चकित कर दिया।
8. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)
प्रश्न 1: “मेहरगढ़ को नवपाषाणिक क्रांति का उद्गम स्थल और सिंधु घाटी सभ्यता की पूर्वपीठिका (Precursor) माना जाता है।” पुरातात्विक साक्ष्यों के आलोक में इस कथन की विस्तृत पुष्टि कीजिए। (250 शब्द)
प्रश्न 2: मेहरगढ़ के ऐतिहासिक चरणों (Period I से Period III) के दौरान कृषि, पशुपालन और तकनीकी विकास (जैसे मृदभांड और धातु कर्म) में आए क्रमिक परिवर्तनों का विश्लेषण करें। (200 शब्द)
प्रश्न 3: मेहरगढ़ में प्राप्त शवाधान (Burial Practices) साक्ष्यों से वहां के लोगों की धार्मिक मान्यताओं और ‘परलोक में विश्वास’ के बारे में क्या जानकारी मिलती है? (150 शब्द)
प्रश्न 4: यद्यपि मेहरगढ़ एक प्रारंभिक कृषक बस्ती थी, लेकिन इसके सुदूर क्षेत्रों (जैसे अफगानिस्तान और अरब सागर) के साथ व्यापक व्यापारिक संपर्क थे। इसके पक्ष में पुरातात्विक प्रमाण प्रस्तुत करें। (200 शब्द)
प्रश्न 5: विश्व के दंत चिकित्सा (Dentistry) इतिहास और टेराकोटा मूर्तिकला के विकास में मेहरगढ़ के अद्वितीय योगदान का मूल्यांकन कीजिए। (150 शब्द)
9. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)
मेहरगढ़ (Mehrgarh) वर्तमान पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में कच्छी के मैदान में स्थित नवपाषाण काल का सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है।
यह स्थल प्राचीन व्यापारिक मार्ग ‘बोलन दर्रे’ (Bolan Pass) के ठीक मुहाने पर बोलन नदी के तट पर स्थित है।
मेहरगढ़ की खोज और व्यापक उत्खनन 1974 में फ्रांसीसी पुरातत्वविद् जीन-फ्रांस्वा जारिज और उनकी टीम द्वारा किया गया था।
मेहरगढ़ भारतीय उपमहाद्वीप का वह पहला स्थान है जहाँ से कृषि (Agriculture) और पशुपालन के सबसे प्राचीन प्रामाणिक साक्ष्य (लगभग 7000 ई.पू.) प्राप्त हुए हैं।
इसे ‘नवपाषाणिक क्रांति’ (Neolithic Revolution) का सबसे ज्वलंत उदाहरण और ‘सिंधु घाटी सभ्यता की पूर्वपीठिका’ (Precursor) माना जाता है।
मेहरगढ़ के इतिहास को मुख्य रूप से 7 सांस्कृतिक चरणों (Periods) में विभाजित किया गया है।
‘चरण I’ (7000-5500 ई.पू.) को ‘असीरेमिक नवपाषाण काल’ (Aceramic) कहा जाता है क्योंकि इस समय लोग मिट्टी के बर्तन बनाना नहीं जानते थे।
मेहरगढ़ के लोगों ने सबसे पहले जिस अनाज की खेती शुरू की, वह ‘जंगली जौ’ (Barley) और गेहूं (Einkorn & Emmer wheat) था।
विश्व में ‘कपास’ (Cotton) की खेती का सबसे प्राचीन साक्ष्य (लगभग 5000 ई.पू.) मेहरगढ़ से ही प्राप्त हुआ है।
पशुपालन के क्षेत्र में, उन्होंने सबसे पहले जंगली गज़ेल का शिकार छोड़कर भेड़, बकरी और ज़ेबू मवेशियों (Zebu Cattle – कुबड़ वाले बैल) को पालतू बनाया।
मेहरगढ़ के प्रारंभिक घर धूप में सुखाई गई ‘कच्ची ईंटों’ (Mud Bricks) से बनाए गए थे और ये आकार में वर्गाकार या आयताकार होते थे।
विश्व के इतिहास में ‘दांतों की ड्रिलिंग’ (दंत चिकित्सा / Dentistry) का सबसे प्राचीन ज्ञात साक्ष्य (लगभग 7000 ई.पू.) मेहरगढ़ के मानव कंकालों से ही मिला है।
दंत चिकित्सा के लिए उन्होंने चकमक पत्थर (Flint) से बनी सूक्ष्म ड्रिलों का उपयोग किया था, जो उनके उन्नत ज्ञान को दर्शाता है।
‘चरण II’ (5500-4800 ई.पू.) में मेहरगढ़ में पहली बार हाथ से बने ‘मिट्टी के बर्तनों’ (Pottery) का निर्माण शुरू हुआ।
‘चरण III’ (4800-3500 ई.पू.) तक आते-आते वे बर्तनों के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए ‘कुम्हार के चाक’ (Potter’s Wheel) का उपयोग करने लगे थे।
अनाज को चूहों और नमी से सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने कई छोटे कमरों वाले विशाल ‘अन्नागार’ (Granaries) का निर्माण किया था।
नवपाषाण काल में कार्बोहाइड्रेट (अनाज) के अधिक सेवन के कारण मेहरगढ़ के लोगों के दांतों में सड़न (Dental decay) की समस्या बढ़ने लगी थी।
लगभग 4000 ईसा पूर्व (चरण III) में मेहरगढ़ में पहली बार ‘तांबे’ (Copper) के पिघलाने और उपयोग के प्रामाणिक साक्ष्य मिलते हैं।
तांबे के उपयोग के साथ ही मेहरगढ़ नवपाषाण काल से ‘ताम्रपाषाण काल’ (Chalcolithic Age) में प्रवेश कर गया।
मेहरगढ़ की खुदाई में ‘टेराकोटा’ (पकी हुई मिट्टी) की बड़ी संख्या में मूर्तियां मिली हैं, जो उस समय की उत्कृष्ट मूर्तिकला का प्रतीक हैं।
इनमें महिलाओं की मूर्तियां (मातृदेवी) विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं, जिन्हें विस्तृत हेयर स्टाइल, हार और भारी आभूषणों से सजाया गया है।
मातृदेवी (Mother Goddess) की पूजा, जो सिंधु घाटी सभ्यता का प्रमुख अंग थी, उसकी स्पष्ट शुरुआत मेहरगढ़ में ही देखी जा सकती है।
मेहरगढ़ के लोग मनके (Beads) बनाने में अत्यधिक कुशल थे; वे स्टीटाइट (Steatite), कार्नेलियन और अन्य कीमती पत्थरों का उपयोग करते थे।
मनकों में अत्यंत बारीक छेद करने के लिए उन्होंने ‘माइक्रोलिथ’ (सूक्ष्म पाषाण) ड्रिलों का एक विशेष उद्योग स्थापित कर लिया था।
मेहरगढ़ कोई अलग-थलग गांव नहीं था, बल्कि 7000 ई.पू. में भी इसके सुदूर क्षेत्रों के साथ मजबूत ‘व्यापारिक संबंध’ (Trade links) थे।
उत्खनन में अफगानिस्तान के बदख्शां क्षेत्र से आयातित कीमती नीला पत्थर ‘लैपिस लाजुली’ (Lapis Lazuli) बड़ी मात्रा में मिला है।
मध्य एशिया से आयातित ‘फिरोजा’ (Turquoise) और अरब सागर (मकरान तट) से आयातित ‘समुद्री सीपियों’ (Sea Shells) के आभूषण भी यहाँ से प्राप्त हुए हैं।
मेहरगढ़ के लोगों का ‘जीवन के बाद के अस्तित्व’ (Life after death) में बहुत गहरा और दृढ़ विश्वास था।
मृतकों को अक्सर घरों के कमरों के बीच या विशेष कब्रिस्तानों (Burial grounds) में दफनाया जाता था।
कब्रों के अंदर शवों के साथ भारी मात्रा में ‘कब्र का सामान’ (Grave goods) रखा जाता था, जिसमें बर्तन, आभूषण और पत्थर के औजार शामिल थे।
कई कब्रों में मानव कंकाल के साथ भेड़ या बकरी के कंकाल भी मिले हैं, जो परलोक में मृतक के भोजन के लिए ‘बलि’ (Sacrifice) का साक्ष्य हैं।
कुछ कब्रों में शवों को लाल रंग के ‘गेरू’ (Red Ochre) से रंगा गया था, जो संभवतः रक्त या नवजीवन का प्रतीक माना जाता था।
एक कब्र में ऐसा मानव कंकाल मिला है जिसके दांतों के पास एक छोटा तांबे का उपकरण था, जिसे शायद ताबीज के रूप में पहना जाता होगा।
मेहरगढ़ के उत्खनन से यह सिद्ध हो गया कि कृषि का विकास केवल मध्य पूर्व (Mesopotamia) में ही नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में भी स्वतंत्र रूप से हुआ था।
हड़प्पा सभ्यता की प्रसिद्ध ‘ग्रिड प्रणाली’ (Grid System) और नगर नियोजन की शुरुआत मेहरगढ़ के आयताकार और विभाजित घरों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
सिंधु घाटी के लोगों ने जिस ‘तांबा पिघलाने’ की तकनीक से कांसे का निर्माण किया, वह तकनीक मेहरगढ़ के शिल्पकारों द्वारा ही खोजी गई थी।
मेहरगढ़ से प्राप्त कई मिट्टी के बर्तनों पर स्वास्तिक (Swastika) और पीपल के पत्तों के चित्र बने हैं, जो बाद में हिंदू धर्म और हड़प्पा के पवित्र प्रतीक बन गए।
‘बिटुमेन’ (Bitumen) का उपयोग मेहरगढ़ में मिट्टी की टोकरियों को वाटरप्रूफ (जलरोधी) बनाने के लिए किया जाता था।
लगभग 2500 ई.पू. से 2000 ई.पू. के बीच (जब सिंधु घाटी सभ्यता अपने चरम पर थी), मेहरगढ़ का पतन होना शुरू हो गया।
माना जाता है कि जलवायु परिवर्तन (सूखा) या सिंधु नदी घाटी के अत्यधिक उपजाऊ मैदानों के आकर्षण के कारण मेहरगढ़ के लोगों ने अपना मूल स्थान छोड़ दिया।
मेहरगढ़ के अंतिम चरणों (Period VII) में यहाँ एक प्रकार का सामूहिक कब्रिस्तान मिला है, जो शायद किसी महामारी या बड़े पलायन का संकेत देता है।
पाकिस्तान के बलूचिस्तान में ‘नौशेरो’ (Nausharo) और ‘पीरक’ (Pirak) मेहरगढ़ के ही समकालीन और उससे जुड़े हुए अन्य महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल हैं।
नौशेरो के उत्खनन से मेहरगढ़ की संस्कृति और हड़प्पा की विकसित नगरीय संस्कृति के बीच एक स्पष्ट ‘संक्रमण काल’ (Transitional phase) का पता चलता है।
मेहरगढ़ से जानवरों के सींगों और हड्डियों से बने उत्कृष्ट सूए (Awls), सूइयां (Needles) और खुरचनी (Scrapers) भी बड़ी मात्रा में प्राप्त हुए हैं।
यह स्थल बताता है कि घुमंतू शिकारियों का ‘स्थायी कृषक’ में परिवर्तन कोई अचानक हुई घटना नहीं, बल्कि हजारों वर्षों का क्रमिक विकास (Evolution) था।
मेहरगढ़ की खुदाई ने पश्चिमी विद्वानों के उस मिथक को तोड़ दिया जिसमें माना जाता था कि भारतीय उपमहाद्वीप में सभ्यता का प्रकाश पश्चिम (Mesopotamia) से आयातित हुआ था।
मेहरगढ़ में जौ की दो और गेहूं की तीन अलग-अलग किस्मों की खेती के प्रामाणिक साक्ष्य मिले हैं, जो उनकी उन्नत कृषि तकनीकों को दर्शाते हैं।
चरण II में यहाँ से कपास के बीजों (Cotton seeds) की प्राप्ति यह सिद्ध करती है कि यहाँ के लोग सूती कपड़े बुनने (Weaving) की कला से भलीभांति परिचित हो चुके थे।
मेहरगढ़ के घरों में चूल्हे (Hearths) भी मिले हैं, जिनका उपयोग खाना पकाने और सर्दियों में घर को गर्म रखने के लिए किया जाता था।
संपूर्ण भारतीय इतिहास में मेहरगढ़ वह ‘टर्निंग पॉइंट’ (Turning Point) है जहाँ से प्रकृति पर मानव के नियंत्रण (कृषि) और एक सुसंस्कृत मानव समाज का वास्तविक अध्याय शुरू होता है।