1. विस्तृत प्रस्तावना: सिंधु सभ्यता की नगर योजना का ऐतिहासिक महत्व

जब हम प्राचीन विश्व के इतिहास का पन्ना पलटते हैं, तो समकालीन मिस्र (Egypt) और मेसोपोटामिया (Mesopotamia) जैसी महान सभ्यताओं के अवशेष भी हमारे सामने आते हैं। लेकिन उन सभ्यताओं के पास बड़े-बड़े पिरामिड और भव्य मंदिर तो थे, परंतु आम जनता के रहने के लिए कोई सुव्यवस्थित शहर नहीं थे। इसके ठीक विपरीत, भारतीय उपमहाद्वीप में आज से लगभग 4500 वर्ष पूर्व एक ऐसी संस्कृति का जन्म हुआ, जिसकी सबसे बड़ी पहचान उसके विशाल स्मारक नहीं, बल्कि उसका आम नागरिकों के लिए बनाया गया उत्कृष्ट शहरी ढांचा था। इसी अनूठी व्यवस्था को हम सिंधु सभ्यता की नगर योजना (Town Planning of Indus Valley Civilization) के नाम से जानते हैं.

सिंधु सभ्यता की नगर योजना केवल ईंट-पत्थरों का समूह नहीं थी, बल्कि यह आधुनिक ‘स्मार्ट सिटी’ (Smart City) की परिकल्पना का प्रथम और सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक उदाहरण है। चाहे वह सड़कों का एक-दूसरे को समकोण पर काटना हो, पकी हुई ईंटों का एक निश्चित अनुपात में होना हो, या फिर हर घर से जुड़ी ढकी हुई नालियों का जाल हो—यह सब यह प्रमाणित करता है कि सिंधु घाटी के लोगों के पास नागरिक इंजीनियरिंग (Civic Engineering) और नगर पालिका प्रशासन (Municipal Administration) का असाधारण ज्ञान था। आइए, इस नगर योजना के प्रत्येक आयाम का गहराई से और विश्लेषणात्मक अध्ययन करें.

सिंधु सभ्यता

2. नगरों का विभाजन: द्वि-स्तरीय एवं त्रि-स्तरीय विन्यास

सिंधु सभ्यता की नगर योजना के अंतर्गत खोदे गए अधिकांश नगरों को मुख्य रूप से दो स्पष्ट भागों में विभाजित किया गया था, जो उनकी सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था को दर्शाते हैं:

A. पश्चिमी टीला या दुर्ग (The Citadel / Acropolis)

  • यह नगर का पश्चिमी हिस्सा होता था, जो एक ऊंचे कृत्रिम चबूतरे (Artificial mud-brick platform) पर बनाया जाता था.

  • सुरक्षा प्राचीर: इस दुर्ग क्षेत्र को चारों ओर से भारी और विशाल सुरक्षा दीवारों (Fortification walls) से घेरा जाता था ताकि बाहरी आक्रमणों और नदियों की बाढ़ से इसकी रक्षा की जा सके.

  • उद्देश्य: इतिहासकारों का मानना है कि इस ऊंचे दुर्ग के भीतर शासक वर्ग, प्रशासनिक अधिकारी, पुरोहित और कुलीन लोग निवास करते थे. नगर की सभी विशाल और सार्वजनिक इमारतें (जैसे अन्नागार, स्नानागार, प्रशासनिक सभा भवन) इसी हिस्से में स्थित थीं.

B. पूर्वी टीला या निचला नगर (The Lower Town)

  • यह दुर्ग की तुलना में क्षेत्रफल में बहुत अधिक बड़ा होता था, लेकिन यह ऊंचाई में नीचे सामान्य धरातल पर बसा था.

  • उद्देश्य: इस क्षेत्र में समाज के आम नागरिक—जैसे व्यापारी, शिल्पकार, शिल्पी, सैनिक, किसान और मजदूर—निवास करते थे.

  • यद्यपि यह निचला नगर था, फिर भी सिंधु सभ्यता की नगर योजना के कड़े नियमों के तहत इसकी सड़कें और आवासीय कॉलोनियां अत्यंत सुव्यवस्थित और योजनाबद्ध ढंग से बनाई गई थीं.

  अपवाद और विविधताएं (Exceptions for UPSC)

  • धौलावीरा (गुजरात): यहाँ सिंधु सभ्यता की नगर योजना का सबसे अनोखा रूप मिलता है. यह एकमात्र ऐसा नगर था जो दो नहीं, बल्कि तीन भागों (दुर्ग, मध्यम नगर, और निचला नगर) में विभाजित था.

  • चन्हूदड़ो (सिंध): यह एकमात्र ऐसा औद्योगिक नगर था, जहाँ किसी भी प्रकार के दुर्ग (Citadel) या किलेबंदी के साक्ष्य नहीं मिले हैं.

  • लोथल और सुरकोटदा: इन नगरों में दुर्ग और निचला नगर अलग-अलग टीलों पर नहीं थे, बल्कि पूरा शहर एक ही रक्षा प्राचीर (सुरक्षा दीवार) के भीतर घिरा हुआ था.

3. सड़कों का जाल: ‘ऑक्सफोर्ड सर्कस’ और ग्रिड प्रणाली (Road Network)

सड़कों की बुनावट सिंधु सभ्यता की नगर योजना का सबसे मजबूत स्तंभ मानी जाती है। तत्कालीन विश्व में कहीं भी सड़कों के निर्माण में ऐसा अनुशासन देखने को नहीं मिलता।

  • ग्रिड प्रणाली (Grid System): सभी नगरों की मुख्य सड़कें और गलियां एक निश्चित योजना के तहत बनाई गई थीं। सड़कें उत्तर से दक्षिण (North to South) और पूर्व से पश्चिम (East to West) की ओर बिल्कुल सीधी चलती थीं।

  • समकोण पर कटाव: ये सड़कें एक-दूसरे को बिल्कुल 90 डिग्री (समकोण) के कोण पर काटती थीं। इस विन्यास के कारण पूरा शहर शतरंज के बोर्ड (Chessboard Pattern) या आयताकार खंडों (Blocks) में विभाजित हो जाता था। इतिहासकार इस व्यवस्था को ‘ऑक्सफोर्ड सर्कस’ या ग्रिड प्रणाली कहते हैं।

  • सड़कों की चौड़ाई: मोहनजोदड़ो में मुख्य सड़क (Main Highway) लगभग 10.5 मीटर चौड़ी थी, जिसे पुरातत्वविदों ने ‘राजपथ’ कहा है। सामान्य गलियां 3 से 4 मीटर चौड़ी होती थीं। सड़कें कच्ची मिट्टी की होती थीं, लेकिन उनकी सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता था। सड़कों के किनारों पर कूड़ा इकट्ठा करने के लिए ‘कूड़ेदान’ (Dustbins) या गड्ढे खोदे जाने के भी प्रमाण मिले हैं।

4. स्थापत्य कला: भवनों की बनावट और ईंटों का विज्ञान (Residential Architecture)

सिंधु सभ्यता की नगर योजना के अंतर्गत आवासीय भवनों का निर्माण विलासिता के लिए नहीं, बल्कि उपयोगिता, सुरक्षा और गोपनीयता (Privacy) को ध्यान में रखकर किया जाता था।

A. घरों की आंतरिक संरचना

  • केंद्रीय आँगन: प्रत्येक घर के ठीक बीच में एक बड़ा और खुला आँगन (Courtyard) होता था। इस आँगन के चारों ओर रहने के लिए कमरे, रसोईघर (Kitchen) और भंडार गृह बनाए जाते थे। आँगन घर का मुख्य केंद्र था जहाँ महिलाएं काम करती थीं और प्रकाश व हवा का आगमन होता था।

  • निजी सुविधाएं: लगभग हर मध्यम और बड़े घर में अपना एक स्वतंत्र स्नानघर (Bathroom) और पानी के लिए अपना एक निजी कुआं (Well) होता था।

  • बहु-मंजिला भवन: घरों में ऊपर की मंजिल पर जाने के लिए ईंटों या लकड़ी की बनी सीढ़ियां (Staircases) होती थीं, जो यह सिद्ध करती हैं कि भवन दो या तीन मंजिला भी होते थे।

B. गोपनीयता का नियम (Privacy Control)

सिंधु सभ्यता की नगर योजना में नागरिकों की प्राइवेसी का बहुत ध्यान रखा जाता था।

  • घरों के मुख्य दरवाजे (Main Gates) कभी भी मुख्य और चौड़ी सड़क की ओर नहीं खुलते थे, बल्कि वे पीछे की संकरी गलियों में खुलते थे (अपवाद: लोथल, जहाँ दरवाजे मुख्य सड़क पर खुलते थे)।

  • मुख्य द्वार के ठीक सामने एक दीवार या पर्दा होता था, ताकि बाहर सड़क पर खड़ा कोई भी व्यक्ति सीधे घर के अंदर के आँगन को न देख सके। घरों की जमीनी मंजिल (Ground Floor) की दीवारों पर सड़कों की तरफ खिड़कियां नहीं बनाई जाती थीं।

C. ईंटों का मानकीकरण (Standardization of Bricks)

  • भवनों के निर्माण में धूप में सुखाई गई ईंटों (Mud-bricks) और भट्ठों में पकाई गई ईंटों (Baked bricks) दोनों का प्रयोग होता था। जलभराव वाले क्षेत्रों (जैसे मोहनजोदड़ो) में पकी ईंटों का वर्चस्व था।

  • अचूक अनुपात: पूरी सभ्यता में, चाहे वह स्थल कश्मीर में हो या गुजरात में, ईंटों का आकार एक निश्चित और निश्चित अनुपात में होता था। यह अनुपात 4:2:1 (लंबाई:चौड़ाई:मोटाई) था। ईंटों को जोड़ने के लिए ‘जिप्सम’ और ‘मिट्टी के गारे’ का प्रयोग किया जाता था, और दीवारों को मजबूत बनाने के लिए ‘इंग्लिश बॉन्ड’ (English Bond – एक सीधी और एक लंबवत ईंट) तकनीक अपनाई जाती थी।

5. विश्व प्रसिद्ध जल निकासी प्रणाली (Advanced Drainage System)

यदि सिंधु सभ्यता की नगर योजना से उसकी जल निकासी व्यवस्था को हटा दिया जाए, तो यह सभ्यता अपनी आधी भव्यता खो देगी। समकालीन विश्व के इतिहास में ऐसी हाइजीनिक और वैज्ञानिक ड्रेनेज प्रणाली कहीं और अस्तित्व में नहीं थी।

  • घरों की नालियां: प्रत्येक घर की रसोई और स्नानघर का गंदा पानी दीवार के सहारे बनी एक पतली नाली से निकलकर बाहर गली की छोटी नाली में गिरता था।

  • गली और मुख्य सड़क की नालियां: गली की छोटी नालियां आपस में मिलकर मुख्य सड़क के नीचे बनी एक बहुत बड़ी और गहरी मुख्य नाली (Main Drain) में मिल जाती थीं।

  • नालियों का ढलान: नालियों को पकी हुई ईंटों से बहुत ही फिनिशिंग के साथ बनाया जाता था और उनमें पानी के सुचारू बहाव के लिए एक बहुत ही हल्का और वैज्ञानिक ‘ढलान’ (Slope) दिया जाता था।

  • ढका हुआ ढांचा: नालियां कभी भी खुली नहीं छोड़ी जाती थीं। उन्हें बड़ी ईंटों या पत्थरों की सिल्लियों से पूरी तरह ढका जाता था।

  • मैनहोल और सोखता गड्ढे (Manholes): नालियों की नियमित सफाई के लिए थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बड़े ‘मैनहोल’ या निरीक्षण छिद्र (Inspection Chambers) बनाए गए थे। नालियों के बीच-बीच में ‘सोखता गड्ढे’ (Cesspools) भी थे, जहाँ पानी का भारी कचरा नीचे बैठ जाता था और केवल साफ पानी आगे बहता था।

6. विशाल सार्वजनिक स्थापत्य (Public Architecture)

सिंधु सभ्यता की नगर योजना में केवल व्यक्तिगत आवासों पर ही नहीं, बल्कि सामुदायिक और सार्वजनिक उपयोग की विशाल इमारतों पर भी विशेष ध्यान दिया गया था। इसके तीन सर्वोत्कृष्ट उदाहरण मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में देखने को मिलते हैं:

I. विशाल स्नानागार (The Great Bath – मोहनजोदड़ो)

यह सिंधु सभ्यता की नगर योजना का सबसे भव्य और कलात्मक उदाहरण है।

  • यह एक विशाल सामूहिक जलकुंड था, जिसकी लंबाई 11.88 मीटर, चौड़ाई 7.01 मीटर और गहराई 2.43 मीटर थी。

  • वाटरप्रूफिंग तकनीक: कुंड के फर्श और दीवारों की चिनाई पकी ईंटों से की गई थी और पानी के रिसाव को रोकने के लिए ईंटों के ऊपर ‘जिप्सम के गारे’ और प्राकृतिक ‘बिटुमेन’ (डामर) की मोटी परत चढ़ाई गई थी।

  • इसके उत्तर और दक्षिण दिशा में उतरने के लिए सीढ़ियां थीं और चारों ओर कपड़े बदलने के कमरे बने थे। इसका उपयोग संभवतः किसी विशिष्ट धार्मिक उत्सव पर सामूहिक या पवित्र स्नान के लिए होता था।

II. विशाल अन्नागार (The Great Granary)

  • मोहनजोदड़ो और हड़प्पा दोनों स्थानों से विशाल अन्नागार (अनाज के गोदाम) मिले हैं। मोहनजोदड़ो का अन्नागार वहाँ की सबसे बड़ी इमारत है।

  • इनका निर्माण ऊंचे चबूतरे पर ईंटों के ब्लॉकों से किया जाता था, जिनके बीच में ‘हवा के आवागमन’ (Ventilation) के लिए संकरे मार्ग छोड़े जाते थे, ताकि अनाज नमी (Dampness) के कारण सड़ने न पाए। यह उनके बेहतरीन खाद्य-सुरक्षा प्रबंधन को दर्शाता है।

III. गोदीबाड़ा या बंदरगाह (The Dockyard – लोथल)

    • गुजरात के लोथल से प्राप्त गोदीबाड़ा सिंधु सभ्यता की नगर योजना की जलीय इंजीनियरिंग का चरमोत्कर्ष है।

    • यह पकी ईंटों से बना एक बहुत बड़ा बेसिन (218 x 37 मीटर) था, जिसे भोगवा नदी के माध्यम से खंभात की खाड़ी से जोड़ा गया था। इसमें ज्वार-भाटा (Tides) के समय जहाजों को आसानी से लाकर खड़ा किया जाता था और माल की लोडिंग-अनलोडिंग होती थी।

7. निष्कर्ष (Conclusion)

विस्तृत विश्लेषण के उपरांत यह कहा जा सकता है कि सिंधु सभ्यता की नगर योजना (Town Planning) तत्कालीन विश्व इतिहास का एक अनुपम और क्रांतिकारी चमत्कार थी। यह योजना इस बात को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है कि हड़प्पा संस्कृति के लोग युद्धप्रिय या महलों के शौकीन नहीं थे, बल्कि वे एक व्यावहारिक, अनुशासित, व्यापारिक और स्वच्छता-प्रिय समाज थे। सड़कों का सटीक ग्रिड सिस्टम, ईंटों का समरूप आकार, ढकी हुई नालियां और बहु-मंजिला मकान यह सिद्ध करते हैं कि उनके पास एक अत्यंत शक्तिशाली और कुशल केंद्रीय नागरिक प्रशासन (Municipal Corporation) मौजूद था जो नियमों का कड़ाई से पालन करवाता था। आज 4500 साल बाद भी, जब दुनिया ‘सतत शहरीकरण’ (Sustainable Urbanization) और जल-प्रबंधन के संकट से जूझ रही है, सिंधु सभ्यता की नगर योजना हमारे आधुनिक इंजीनियरों और नीति-निर्माताओं के लिए ज्ञान का एक अमर प्रकाश स्तंभ बनी हुई है।

8. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)

प्रश्न 1: सिंधु सभ्यता की नगर योजना की उन प्रमुख विशेषताओं का विस्तृत वर्णन कीजिए जो इसे अपने समकालीन विश्व की अन्य सभ्यताओं से विशिष्ट और उन्नत बनाती हैं। (250 शब्द)

प्रश्न 2: “सिंधु घाटी सभ्यता की जल निकासी प्रणाली (Drainage System) आधुनिक नगर पालिकाओं के लिए एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत करती है।” पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए। (250 शब्द)

प्रश्न 3: सिंधु सभ्यता की नगर योजना के अंतर्गत ‘दुर्ग’ (Citadel) और ‘निचले नगर’ (Lower Town) के बीच पाए जाने वाले संरचनात्मक और सामाजिक अंतरों को स्पष्ट करें। क्या इस योजना में कोई क्षेत्रीय विविधताएं भी मौजूद थीं? (200 शब्द)

प्रश्न 4: हड़प्पा संस्कृति के आवासीय भवनों में ‘गोपनीयता के नियम’ (Rules of Privacy) और ‘ईंटों के मानकीकरण’ (Standardization of Bricks) पर एक विश्लेषणात्मक टिप्पणी लिखिए। (150 शब्द)

प्रश्न 5: मोहनजोदड़ो के ‘विशाल स्नानागार’ (Great Bath) और लोथल के ‘गोदीबाड़ा’ (Dockyard) के स्थापत्य कौशल का विवरण देते हुए सिंधु निवासियों के इंजीनियरिंग ज्ञान का मूल्यांकन करें। (200 शब्द)

9. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)

  • सिंधु सभ्यता की नगर योजना की सबसे प्रमुख विशेषता इसका पूरी तरह से ‘नगरीय’ (Urbanized) और योजनाबद्ध होना था।

  • सिंधु सभ्यता के नगर मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित थे: पश्चिमी दुर्ग और पूर्वी निचला नगर।

  • पश्चिमी दुर्ग (Citadel) हमेशा एक ऊंचे कृत्रिम चबूतरे पर बनाया जाता था और चारों ओर से दीवारों से सुरक्षित होता था।

  • निचला नगर (Lower Town) आम नागरिकों, व्यापारियों और शिल्पकारों के रहने का मुख्य स्थान था।

  • गुजरात का ‘धौलावीरा’ एकमात्र ऐसा स्थल था जहाँ सिंधु सभ्यता की नगर योजना त्रि-स्तरीय (तीन भागों – दुर्ग, मध्यम नगर, निचला नगर) थी।

  • सिंध प्रांत का ‘चन्हूदड़ो’ एकमात्र ऐसा नगर था, जहाँ किसी भी दुर्ग (Citadel) का कोई साक्ष्य नहीं मिला है।

  • लोथल और सुरकोटदा ऐसे नगर थे जहाँ दुर्ग और निचला नगर अलग-अलग न होकर एक ही रक्षा दीवार से घिरे थे।

  • सिंधु सभ्यता की सड़कें एक-दूसरे को समकोण (90 डिग्री) पर काटती थीं, जिसे ‘ग्रिड प्रणाली’ कहते हैं।

  • इस समकोण कटाव की व्यवस्था को पुरातत्वविदों द्वारा ‘ऑक्सफोर्ड सर्कस’ (Oxford Circus) नाम दिया गया है।

  • सड़कों के ग्रिड पैटर्न के कारण पूरा शहर शतरंज के बोर्ड (Chessboard) की तरह आयताकार ब्लॉकों में बंट जाता था।

  • मोहनजोदड़ो की सबसे मुख्य सड़क लगभग 10.5 मीटर चौड़ी थी, जिसे ‘राजपथ’ कहा जाता है।

  • सामान्य गलियों की चौड़ाई मुख्य सड़कों की तुलना में कम, लगभग 3 से 4 मीटर होती थी।

  • सिंधु सभ्यता की नगर योजना में आवासीय भवनों के मुख्य दरवाजे मुख्य सड़क पर न खुलकर पीछे की गलियों में खुलते थे।

  • गुजरात का ‘लोथल’ एकमात्र ऐसा नगर था, जहाँ घरों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर खुलते थे।

  • नागरिक प्राइवेसी (गोपनीयता) को बनाए रखने के लिए घरों की जमीनी मंजिल की दीवारों पर सड़कों की तरफ खिड़कियां नहीं बनाई जाती थीं।

  • प्रत्येक मकान के ठीक बीच में एक खुला ‘आँगन’ (Courtyard) होता था, जो प्रकाश और हवा का मुख्य स्रोत था।

  • सिंधु सभ्यता के लगभग हर घर में अपना एक स्वतंत्र रसोईघर, स्नानघर और पानी का कुआं होता था।

  • मकानों की छतों पर जाने के लिए ईंटों या लकड़ी की बनी सीढ़ियों (Staircases) के साक्ष्य मिले हैं।

  • घरों की छतों से पानी नीचे गिराने के लिए पत्थरों या मिट्टी के बने ‘परनाले’ (Drain pipes) लगाए जाते थे।

  • भवनों के निर्माण में प्रयुक्त ईंटों का एक निश्चित वैश्विक अनुपात था, जो 4:2:1 (लंबाई:चौड़ाई:मोटाई) था।

  • सिंधु सभ्यता में दीवारों को अत्यधिक मजबूती देने के लिए ईंट जोड़ने की ‘इंग्लिश बॉन्ड’ तकनीक का प्रयोग किया जाता था।

  • ईंटों की चिनाई के लिए मुख्य रूप से मिट्टी के गारे (Mud Mortar) और जिप्सम का उपयोग किया जाता था।

  • कालीबंगा (राजस्थान) से अलंकृत ईंटों (Decorated bricks) और फर्श पर नक्काशी के एकमात्र साक्ष्य मिले हैं।

  • समकालीन विश्व में सिंधु सभ्यता की ‘जल निकासी प्रणाली’ (Drainage System) सबसे उत्कृष्ट और वैज्ञानिक थी।

  • प्रत्येक घर का गंदा पानी दीवार की मोरी के रास्ते गली की छोटी ढकी हुई नाली में जाकर गिरता था।

  • गली की छोटी नालियां आगे जाकर मुख्य सड़क के नीचे बनी बड़ी मुख्य नाली से जुड़ जाती थीं।

  • सभी नालियों को पकी हुई ईंटों से बनाया जाता था और उनमें पानी के बहाव के लिए उचित ‘ढलान’ दिया जाता था।

  • सिंधु सभ्यता की नगर योजना में नालियों को हमेशा बड़ी ईंटों या पत्थरों की सिल्लियों से ढका जाता था।

  • नालियों के बीच-बीच में कचरा इकट्ठा होने के लिए ‘सोखता गड्ढे’ (Cesspools) बनाए गए थे।

  • नालियों की नियमित सफाई के लिए थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बड़े ‘मैनहोल’ (निरीक्षण छिद्र) बनाए गए थे।

  • नालियों को साफ करने के बाद कचरे को एक जगह इकट्ठा करने के लिए सड़कों के किनारे गड्ढे या डस्टबिन बनाए जाने के प्रमाण हैं।

  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त ‘विशाल स्नानागार’ (The Great Bath) सार्वजनिक स्थापत्य का सबसे भव्य उदाहरण है।

  • विशाल स्नानागार के जलकुंड की लंबाई 11.88 मीटर, चौड़ाई 7.01 मीटर और गहराई 2.43 मीटर थी।

  • स्नानागार के फर्श से पानी का रिसाव रोकने के लिए पकी ईंटों के ऊपर ‘बिटुमेन’ (डामर) की वाटरप्रूफ कोटिंग की गई थी।

  • स्नानागार के कुंड में उतरने के लिए केवल उत्तर और दक्षिण दिशा में सीढ़ियां बनाई गई थीं।

  • स्नानागार को भरने के लिए पानी पास ही के एक बड़े कुएं से लाया जाता था।

  • मोहनजोदड़ो का ‘विशाल अन्नागार’ (Great Granary) वहाँ की सबसे बड़ी (45.71 मीटर लंबी) इमारत है।

  • हड़प्पा सभ्यता के अन्नागारों में हवा के आने-जाने (Ventilation) की उचित व्यवस्था थी ताकि अनाज नमी से खराब न हो।

  • लोथल (गुजरात) से पकी ईंटों का बना हुआ एक विशाल ‘गोदीबाड़ा’ या बंदरगाह (Dockyard) प्राप्त हुआ है।

  • लोथल का यह बंदरगाह भोगवा नदी के माध्यम से खंभात की खाड़ी और अरब सागर से जुड़ा हुआ था।

  • मोहनजोदड़ो के दुर्ग क्षेत्र से एक विशाल ‘सभा भवन’ (Assembly Hall) मिला है, जो 20 भारी स्तंभों पर टिका था।

  • सड़कों के चौराहों को साफ और खुला रखने के लिए घरों के कोनों को थोड़ा गोल (Rounded corners) बनाया जाता था।

  • कालीबंगा से लकड़ी को खुरचकर बनाई गई ‘लकड़ी की नाली’ (Wooden drain) का एकमात्र अपवाद साक्ष्य मिला है।

  • बनवाली (हरियाणा) एक ऐसा नगर था जहाँ सड़कों का ग्रिड पैटर्न नहीं था, बल्कि सड़कें ‘तारांकित’ (Radial/सर्कुलर) थीं।

  • धौलावीरा से विशाल पत्थरों को काटकर बनाए गए (Rock-cut) 16 भव्य जलाशयों के प्रमाण मिले हैं।

  • सिंधु सभ्यता की नगर योजना में किसी भी नगर से बड़े महलों या भव्य धार्मिक मंदिरों (Temples) के अवशेष नहीं मिले हैं।

  • नगरों की सुरक्षा दीवारें (Kilebandi) मुख्य रूप से कच्ची ईंटों और पत्थरों से बनाई जाती थीं।

  • हड़प्पा और मोहनजोदड़ो दोनों नगरों के नगर नियोजन में इतनी समानता थी कि इन्हें एक ही साम्राज्य की राजधानियां माना गया।

  • नगरों के योजनाबद्ध विकास से यह स्पष्ट होता है कि उस समय एक अत्यंत कुशल ‘नगर पालिका प्रशासन’ (Civic Administration) कार्यरत था।

  • सिंधु सभ्यता की नगर योजना आज भी आधुनिक सिविल इंजीनियरों के लिए शून्य-तकनीक में श्रेष्ठ शहरीकरण का सबसे बड़ा उदाहरण है।

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