One Nation One Election: पक्ष, विपक्ष और Top 5 चुनौतियां (Notes)

One Nation One Election Pros and Cons (ONOE)

“भारत में हर 3-4 महीने में कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं। क्या हम हमेशा ‘इलेक्शन मोड’ में ही रहेंगे, या कभी विकास पर भी फोकस करेंगे?”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लाल किले की प्राचीर से कही गई यह बात आज देश में सबसे बड़ी बहस का मुद्दा बन गई है। मुद्दा है—One Nation One Election यानी ‘एक देश, एक चुनाव’।

हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च-स्तरीय समिति ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपी है, जिसमें “एक देश एक चुनाव” को लागू करने की सिफारिश की गई है। इसके बाद से यह सवाल हर किसी की जुबान पर है—क्या अब हमें लोकसभा और विधानसभा के लिए अलग-अलग वोट नहीं डालने होंगे?  

हम इतिहास में पीछे जाएंगे, संविधान के पन्ने पलटेंगे और समझेंगे कि यह विचार भारत की तस्वीर कैसे बदल सकता है।

1. आखिर क्या है 'One Nation One Election'? (The Concept)

आम भाषा में समझें तो ‘एक देश, एक चुनाव’ का मतलब है कि पूरे भारत में लोकसभा (केंद्र सरकार) और सभी राज्यों की विधानसभाओं (राज्य सरकार) के चुनाव एक साथ, एक ही समय पर कराए जाएं।

वर्तमान स्थिति: अभी भारत में चुनाव एक ‘चक्र’ (Cycle) की तरह चलते रहते हैं। कभी लोकसभा चुनाव, तो कभी यूपी का चुनाव, कभी कर्नाटक का तो कभी बिहार का। हर 6 महीने में किसी न किसी राज्य में चुनाव होता है।

ONOEलागू होने के बाद: पूरे देश का वोटर एक ही दिन (या एक ही चरण में) पोलिंग बूथ पर जाएगा। वह वहां दो वोट डालेगा:

  1. पहला वोट अपने सांसद (MP) के लिए (केंद्र सरकार बनाने हेतु)।

  2. दूसरा वोट अपने विधायक (MLA) के लिए (राज्य सरकार बनाने हेतु)। (इसके बाद 5 साल तक कोई चुनाव नहीं होगा।)

2. क्या यह विचार नया है? (इतिहास के पन्ने)

कई लोगों को लगता है कि यह बीजेपी सरकार का नया आइडिया है, लेकिन सच यह है कि भारत में यह व्यवस्था पहले से मौजूद थी!

1952 से 1967 का सुनहरा दौर: आजादी के बाद, भारत में पहले चार आम चुनाव (1952, 1957, 1962 और 1967) एक साथ ही हुए थे। उस समय लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ चलते थे और यह सिस्टम बिल्कुल सही काम कर रहा था।

फिर यह साइकिल टूटी कैसे? यह सिलसिला 1960 के दशक के अंत में टूटा।

  • 1968 और 1969: कुछ राज्यों में विधानसभाएं 5 साल का कार्यकाल पूरा करने से पहले ही भंग हो गईं (दल-बदल और गठबंधन टूटने के कारण)।

  • 1970: लोकसभा को भी समय से पहले भंग कर दिया गया।

  • इसके बाद चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे और यह अंतर बढ़ता ही गया।

आज स्थिति यह है कि चुनाव आयोग को साल भर किसी न किसी राज्य में मशीनें और सुरक्षा बल भेजने पड़ते हैं।

3. 'एक देश एक चुनाव' की जरूरत क्यों है? (इसके पक्ष में तर्क)

रामनाथ कोविंद कमेटी और इस विचार के समर्थकों का मानना है कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए बार-बार चुनाव कराना एक बोझ है। इसके मुख्य 4 कारण हैं:

(A) पैसों की भारी बचत (Cost Cutting)

चुनाव कराना एक महंगा सौदा है।

  • 2019 लोकसभा चुनाव: इसमें लगभग 60,000 करोड़ रुपये खर्च हुए (सरकारी और पार्टियों का खर्च मिलाकर)।

  • इसके अलावा, हर साल राज्यों के चुनाव में हजारों करोड़ अलग से खर्च होते हैं।

  • अगर चुनाव एक साथ होंगे, तो वोटर लिस्ट एक होगी, सुरक्षा इंतजाम एक होंगे और सरकारी खजाने के हजारों करोड़ रुपये बचेंगे, जिनका उपयोग स्कूल, अस्पताल और सड़कों में हो सकता है।

(B) आचार संहिता और रुका हुआ विकास (Model Code of Conduct)

जब भी चुनाव की घोषणा होती है, आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) लागू हो जाती है। इसका मतलब है कि सरकार कोई नई योजना शुरू नहीं कर सकती, न ही कोई बड़ा फैसला ले सकती है। चूंकि भारत में हर समय कहीं न कहीं चुनाव होते हैं, इसलिए अक्सर किसी न किसी राज्य में आचार संहिता लगी रहती है और विकास कार्य ठप पड़ जाते हैं। ONOE से यह “Policy Paralysis” खत्म होगा।

(C) काले धन पर रोक (Check on Black Money)

बार-बार चुनाव का मतलब है पार्टियों द्वारा बार-बार चंदा जमा करना और खर्च करना। इससे भ्रष्टाचार और काले धन का प्रवाह बढ़ता है। 5 साल में एक बार चुनाव होने से इस पर लगाम लग सकती है।

(D) सामाजिक सौहार्द (Social Harmony)

चुनावों के दौरान अक्सर धर्म और जाति के नाम पर भाषण दिए जाते हैं, जिससे समाज में तनाव पैदा होता है। बार-बार चुनाव यानी बार-बार तनाव। एक बार चुनाव होने से समाज को 5 साल शांति मिलेगी।

One Nation One Election Pros and Cons (ONOE)

4. विपक्ष और विशेषज्ञों का डर क्या है? (इसके विपक्ष में तर्क)

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। विपक्ष और कई संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि यह विचार सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन यह संघात्मक ढांचे (Federal Structure) के लिए खतरनाक है।

(A) राष्ट्रीय मुद्दे बनाम स्थानीय मुद्दे (National vs Local Issues)

यह सबसे बड़ा डर है।

  • जब एक वोटर पोलिंग बूथ पर जाता है, तो उसकी मानसिकता अलग होती है।

  • अगर लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ होंगे, तो वोटर “राष्ट्रीय लहर” में बह सकता है।

  • उदाहरण: मान लीजिए देश में प्रधानमंत्री पद का कोई बहुत लोकप्रिय चेहरा है। हो सकता है वोटर उसी चेहरे को देखकर राज्य में भी उसी पार्टी को वोट दे दे, भले ही वहां का स्थानीय उम्मीदवार खराब हो। इससे क्षेत्रीय दलों (Regional Parties) का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।

  • IDFC स्टडी (2015): एक रिसर्च के अनुसार, अगर चुनाव साथ होते हैं, तो 77% चांस है कि वोटर एक ही पार्टी को दोनों जगह वोट देगा।

(B) अगर सरकार गिर गई तो? (The Big Question)

संसदीय प्रणाली में सरकार 5 साल चलेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं होती।

  • मान लीजिए 2029 में एक साथ चुनाव हुए।

  • लेकिन 2030 में किसी राज्य सरकार (जैसे बिहार या महाराष्ट्र) में गठबंधन टूट गया और सरकार गिर गई।

  • तो क्या वहां 4 साल तक राष्ट्रपति शासन रहेगा? या फिर वहां दोबारा चुनाव होंगे?

  • अगर दोबारा चुनाव हुए, तो “One Nation One Election” का चक्र फिर से टूट जाएगा।

(C) संसाधनों की कमी (Logistical Challenge)

चुनाव आयोग के लिए एक साथ चुनाव कराना ‘एवरेस्ट चढ़ने’ जैसा है।

  • इसके लिए आयोग को अभी के मुकाबले दोगुनी या तीन गुनी EVM और VVPAT मशीनों की जरूरत होगी।

  • लाखों सुरक्षाकर्मियों को एक ही दिन पूरे देश में तैनात करना लगभग असंभव काम है।

5. रामनाथ कोविंद समिति की सिफारिशें (Key Highlights)

मार्च 2024 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी 18,000 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी। इसमें उन्होंने इसे लागू करने का रोडमैप दिया है:

  1. दो चरणों में लागू करें:

    • पहला चरण: लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाएं।

    • दूसरा चरण: इसके 100 दिनों के भीतर नगर पालिका और पंचायत चुनाव कराए जाएं।

  2. अनुच्छेद 356 का उपयोग: अगर कोई राज्य सरकार बीच में गिर जाती है, तो वहां नए चुनाव होंगे, लेकिन नई सरकार सिर्फ “बचे हुए कार्यकाल” (Remainder Term) के लिए होगी, पूरे 5 साल के लिए नहीं। (ताकि अगला चुनाव देश के साथ ही हो)।

  3. कॉमन वोटर लिस्ट: लोकसभा, विधानसभा और पंचायत के लिए एक ही मतदाता सूची होगी।https://studypsc.com

6. संवैधानिक चुनौतियां: किन अनुच्छेदों को बदलना होगा?

“One Nation One Election” को लागू करना इतना आसान नहीं है। इसके लिए संविधान में कम से कम 5 बड़े संशोधन करने होंगे:

  1. अनुच्छेद 83 और 172 (Article 83 & 172): जो संसद और विधानसभाओं के 5 साल के कार्यकाल की बात करते हैं।

  2. अनुच्छेद 85 और 174 (Article 85 & 174): जो लोकसभा और विधानसभा को भंग (Dissolve) करने की शक्ति देते हैं।

  3. अनुच्छेद 356 (Article 356): राष्ट्रपति शासन लगाने के नियम।

  4. अनुच्छेद 324: चुनाव कराने की शक्तियां।

इसके अलावा, सबसे बड़ी चुनौती यह है कि चूंकि यह मामला राज्यों के अधिकारों से जुड़ा है, इसलिए संविधान संशोधन के लिए कम से कम 50% राज्यों की विधानसभाओं की सहमति (Ratification) भी लेनी होगी।

7. दुनिया के अन्य देशों में क्या होता है? (Global Context)

क्या हम अकेले ऐसा सोच रहे हैं? नहीं, कई देशों में यह सिस्टम है:

  • दक्षिण अफ्रीका (South Africa): यहाँ राष्ट्रीय और प्रांतीय चुनाव एक साथ होते हैं।

  • स्वीडन (Sweden): यहाँ राष्ट्रीय संसद (Riksdag), काउंटी काउंसिल और नगर पालिका के चुनाव एक ही दिन तय होते हैं।

  • बेल्जियम: यहाँ भी संघीय संसद और यूरोपीय संसद के चुनाव एक साथ होते हैं।

  • अमेरिका: यहाँ राष्ट्रपति और कांग्रेस के चुनाव एक निश्चित तारीख पर होते हैं, चाहे कुछ भी हो जाए।

लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि स्वीडन और दक्षिण अफ्रीका की जनसंख्या भारत के एक छोटे राज्य से भी कम है। भारत जैसे विशाल और विविध देश में इसे लागू करना कहीं ज्यादा मुश्किल है।

8. निष्कर्ष: क्या यह भारत के लिए सही है?

One Nation One Election निश्चित रूप से एक साहसिक और दूरदर्शी विचार है। आर्थिक और प्रशासनिक नजरिए से देखें तो इसके फायदे बहुत ज्यादा हैं। यह भारत को बार-बार के चुनावी शोर से मुक्ति दिला सकता है।

लेकिन, लोकतंत्र में सिर्फ पैसा बचाना ही मकसद नहीं होता। संघात्मक ढांचा (Federalism) और क्षेत्रीय विविधता भारतीय लोकतंत्र की आत्मा हैं। (जैसा कि हमने केशवानंद भारती केस वाले ब्लॉग में पढ़ा था – ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ महत्वपूर्ण है)।

अगर इसे लागू करना है, तो सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि:

  1. क्षेत्रीय पार्टियों की आवाज न दबे।

  2. अगर सरकार बीच में गिरे, तो उसका ठोस समाधान हो।

  3. सभी राजनीतिक दलों के बीच सहमति (Consensus) बने।

बिना आम सहमति के इसे थोपना भारतीय लोकतंत्र के लिए हानिकारक हो सकता है। यह ‘सुविधा’ बनाम ‘लोकतंत्र की आत्मा’ के बीच संतुलन बनाने का मामला है।

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FAQ (One Nation One Election)

Q1. क्या 2029 में एक देश एक चुनाव लागू हो सकता है? कोविंद समिति की रिपोर्ट और सरकार की मंशा को देखते हुए यह संभव है, लेकिन इसके लिए संविधान संशोधन बिल को संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पास होना होगा और आधे राज्यों की मंजूरी लेनी होगी।

Q2. अगर किसी राज्य में 2 साल बाद सरकार गिर गई तो क्या होगा? कोविंद समिति के सुझाव के अनुसार, वहां दोबारा चुनाव होंगे लेकिन नई सरकार पूरे 5 साल के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ बचे हुए 3 साल (शेष कार्यकाल) के लिए ही बनेगी।

Q3. क्या इससे EVM की कमी पड़ेगी? हाँ, चुनाव आयोग का अनुमान है कि एक साथ चुनाव कराने के लिए हजारों करोड़ रुपये की नई EVM और VVPAT मशीनें खरीदनी होंगी, जिसका शुरुआती खर्चा बहुत ज्यादा होगा।

Q4. क्या इससे क्षेत्रीय पार्टियां खत्म हो जाएंगी? विपक्ष का यही डर है। कई रिपोर्ट्स कहती हैं कि वोटर राष्ट्रीय मुद्दों पर ज्यादा फोकस करेगा, जिससे राज्य-स्तरीय पार्टियों को नुकसान हो सकता है।

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