“भारतीय संविधान की प्रारूप समिति (Drafting Committee) संविधान निर्माण के इतिहास में सबसे अहम थी…”हमने जाना कि संविधान सभा ने अलग-अलग कामों के लिए कुल 22 समितियां बनाई थीं।
लेकिन उन सबमें एक समिति ऐसी थी, जिसका काम सबसे मुश्किल और सबसे महत्वपूर्ण था। वह थी— प्रारूप समिति (Drafting Committee)।
इसे संविधान का ‘ब्लूप्रिंट’ या कच्चा मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। आज के इस आर्टिकल में, हम इसी समिति के बारे में गहराई से जानेंगे—इसके 7 सदस्य कौन थे, उन्हें याद करने की जादुई ट्रिक क्या है, और क्यों एक आलोचक ने इसे ‘Drifting Committee’ कह दिया था।

1. भारतीय संविधान की प्रारूप समिति का गठन क्यों हुआ? (Formation & Objective)
संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार बी.एन. राव (B.N. Rau) ने दुनिया भर के संविधानों का अध्ययन करके अक्टूबर 1947 में संविधान का एक पहला कच्चा ड्राफ्ट तैयार किया था।
इस कच्चे ड्राफ्ट की जांच करने और उसे अंतिम रूप देने के लिए, स्वतंत्रता के ठीक 14 दिन बाद, 29 अगस्त 1947 को एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया। यही ‘प्रारूप समिति’ कहलाई।
मुख्य कार्य: भारत के लिए एक ऐसा संविधान लिखना जो यहां की विविधता को संभाल सके।
अध्यक्ष: इस भारी भरकम काम के लिए कानून के सबसे बड़े जानकार डॉ. बी.आर. अंबेडकर को अध्यक्ष चुना गया।
2. भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के 7 सदस्य (The 7 Members of Drafting Committee)
इस समिति में कुल 7 सदस्य थे (एक अध्यक्ष + 6 अन्य सदस्य)। प्रतियोगी परीक्षाओं में इनके नामों पर अक्सर सवाल पूछे जाते हैं।
ये 7 सदस्य भारत के सर्वश्रेष्ठ कानूनी दिमाग थे:
डॉ. बी.आर. अंबेडकर (अध्यक्ष): इन्हें ‘भारतीय संविधान का जनक’ और ‘आधुनिक मनु’ भी कहा जाता है। उन्होंने समिति का नेतृत्व किया और हर अनुच्छेद पर विस्तृत बहस की।
एन. गोपालस्वामी आयंगर (N. Gopalaswami Ayyangar): ये जम्मू-कश्मीर के पूर्व प्रधानमंत्री थे और प्रशासकीय मामलों के विशेषज्ञ थे। (अनुच्छेद 370 का ड्राफ्ट इन्होंने ही तैयार किया था)।
अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर (Alladi Krishnaswami Ayyar): संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि “ये मुझसे भी बड़े कानून के जानकार हैं।” ये मद्रास के एडवोकेट जनरल थे।
डॉ. के.एम. मुंशी (Dr. K.M. Munshi): कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी। ये मूल रूप से इस समिति में शामिल एकमात्र प्रमुख कांग्रेसी नेता थे। ये एक प्रसिद्ध साहित्यकार भी थे।
सैयद मोहम्मद सादुल्ला (Syed Mohammad Saadulla): ये असम के पूर्व मुख्यमंत्री थे और मुस्लिम लीग की पृष्ठभूमि से आए थे, लेकिन देश के विभाजन के बाद भारत में ही रहे।
नोट: दो सदस्य बाद में बदले गए थे (महत्वपूर्ण):
एन. माधव राव (N. Madhava Rau): इन्हें बी.एल. मित्तर (B.L. Mitter) की जगह नियुक्त किया गया था, क्योंकि खराब स्वास्थ्य के कारण मित्तर ने इस्तीफा दे दिया था।
टी.टी. कृष्णामचारी (T.T. Krishnamachari): इन्हें 1948 में डी.पी. खेतान (D.P. Khaitan) की मृत्यु के बाद शामिल किया गया था।
3. सदस्यों को याद करने की धांसू ट्रिक (Trick to Remember)
इन 7 नामों को याद रखना मुश्किल होता है। अगर आप ध्यान से देखें, तो इनमें से अधिकतर नामों में भगवान ‘कृष्ण’ या ‘राम’ का पर्यायवाची शब्द छिपा है।
Trick: “अंबेडकर के मित्र मुंशी, कृष्णा के साथ खेत पर आए।”
अंबेडकर → डॉ. बी.आर. अंबेडकर
मित्र → बी.एल. मित्तर (बाद में एन. माधव राव)
मुंशी → के.एम. मुंशी
कृष्णा → अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर
साथ → सैयद मोहम्मद सादुल्ला (थोड़ा अलग है, याद रखें)
खेत → डी.पी. खेतान (बाद में टी.टी. कृष्णामचारी)
आए → एन. गोपालस्वामी आयंगर
4. कार्यप्रणाली और आलोचना (Working and Criticism)
प्रारूप समिति ने कुल 141 दिन बैठकें कीं और 6 महीने से भी कम समय में संविधान का पहला ड्राफ्ट तैयार कर दिया (फरवरी 1948)l
‘ भारतीय संविधान की प्रारूप समिति ‘ का तंज: समिति के एक सदस्य, टी.टी. कृष्णामचारी ने बाद में बताया कि हालांकि सदस्य 7 थे, लेकिन संविधान लिखने का मुख्य भार अकेले डॉ. अंबेडकर पर था। बाकी सदस्य या तो बीमार थे, या दिल्ली से बाहर थे, या अन्य कार्यों में व्यस्त थे।
इसी देरी और लंबी बहसों के कारण, संविधान सभा के एक आलोचक सदस्य नज़रुद्दीन अहमद ने व्यंग्य में इसे “अपवहन समिति” (भारतीय संविधान की प्रारूप समिति) कहा था, यानी ऐसी समिति जो बस समय बर्बाद कर रही है।
निष्कर्ष (Conclusion)
तमाम आलोचनाओं और चुनौतियों के बावजूद, डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में प्रारूप समिति ने जो काम किया, वह अतुलनीय है। उन्होंने दुनिया का सबसे बड़ा और विस्तृत संविधान तैयार किया, जिसने पिछले 75 वर्षों से भारत के लोकतंत्र को जीवित रखा है।