
ताम्रपाषाण काल: धातु युग का आरंभ और ताम्रपाषाण काल का अर्थ
मानव सभ्यता के क्रमिक विकास में एक समय ऐसा आया जब आदिमानव ने पाषाण (पत्थर) के उपकरणों की सीमाओं को समझ लिया। इसके बाद उसने अपनी बौद्धिक क्षमता का प्रयोग करते हुए धातुओं की खोज की। इस क्रम में तांबा (Copper) वह पहली धातु थी जिसे मानव ने खोजा और उसका उपयोग करना सीखा।
‘ताम्रपाषाण काल’ (Chalcolithic Period) मूल रूप से दो शब्दों से मिलकर बना है—’ताम्र’ (तांबा) और ‘पाषाण’ (पत्थर)। अंग्रेजी का शब्द ‘Chalcolithic’ ग्रीक भाषा के ‘Chalcos’ (तांबा) और ‘Lithos’ (पत्थर) से लिया गया है। यह वह संक्रमणकालीन युग था जब मानव ने तांबे के हथियारों और उपकरणों के साथ-साथ पत्थर के सूक्ष्म औजारों (Microliths) का भी प्रयोग जारी रखा। तकनीकी दृष्टि से यह नवपाषाण काल (Neolithic Age) के बाद का चरण है, लेकिन भारत के संदर्भ में यह अत्यंत रोचक है कि कई ताम्रपाषाणिक संस्कृतियाँ सिंधु घाटी की कांस्य युगीन नगरीय सभ्यता के पतन के बाद भी फलती-फूलती रहीं।
यह काल मुख्यतः एक ग्रामीण और कृषक सभ्यता का काल था, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप में क्षेत्रीय स्तर पर स्थायी बस्तियों का जाल बिछा दिया।
2. कालक्रम और भौगोलिक विस्तार (Chronology & Geographical Extent)
भारतीय उपमहाद्वीप में ताम्रपाषाण काल का उदय एकसाथ नहीं हुआ, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में इसका कालक्रम अलग-अलग रहा है।
सामान्य कालक्रम: रेडियोकार्बन (C-14) डेटिंग के आधार पर भारतीय ताम्रपाषाण संस्कृतियों का समय मुख्य रूप से 3000 ईसा पूर्व से 700 ईसा पूर्व के मध्य माना जाता है।
भौगोलिक फैलाव: इसका विस्तार भारत के बड़े भू-भाग में था, जिनमें दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश का पश्चिमी भाग (मालवा क्षेत्र), पश्चिमी महाराष्ट्र, और दक्षिण-पूर्वी भारत (बिहार, पश्चिम बंगाल) प्रमुख थे।
अपवाद: सिंधु और गंगा के दोआब क्षेत्र तथा घने जंगलों वाले क्षेत्रों में इस संस्कृति के साक्ष्य कम मिलते हैं। यह मुख्य रूप से नदियों की घाटियों और काले/लाल मिट्टी वाले क्षेत्रों में विकसित हुई।
3. भारत की प्रमुख ताम्रपाषाणिक संस्कृतियाँ (Major Chalcolithic Cultures)
क्षेत्रीय विविधताओं के आधार पर पुरातात्विक विद्वानों ने इस काल को कई प्रमुख संस्कृतियों में विभाजित किया है:
A. आहार-बनास संस्कृति (Ahar-Banas Culture), राजस्थान (लगभग 2100 – 1500 ई.पू.)
विस्तार: यह संस्कृति राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में बनास नदी और उसकी सहायक नदियों की घाटियों में फली-फूली।
प्रमुख स्थल: आहड़ (Ahar), गिलूंड (Gilund), बालाथल (Balathal) और ओझियाना।
विशिष्टता: आहड़ का प्राचीन नाम ‘ताम्रवती’ (तांबे वाली जगह) था क्योंकि यहाँ तांबे के अयस्क प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे। अन्य संस्कृतियों के विपरीत, यहाँ के लोग पत्थर के सूक्ष्म औजारों का प्रयोग कम करते थे और कुल्हाड़ी, चूड़ियाँ और चादरें बनाने के लिए तांबे का भारी प्रयोग करते थे। गिलूंड इस संस्कृति का एकमात्र ऐसा स्थल है जहाँ से पकी हुई ईंटों (Burnt bricks) के साक्ष्य मिले हैं।
B. कायथा संस्कृति (Kayatha Culture), मध्य प्रदेश (लगभग 2400 – 2000 ई.पू.)
विस्तार: चंबल नदी की सहायक ‘कालीसिंध’ नदी के किनारे स्थित।
विशिष्टता: यह सबसे प्रारंभिक ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों में से एक है। कायथा से भारी मात्रा में तांबे की कुल्हाड़ियाँ (Copper axes), छेनियां, और स्टेटाइट (Steatite) तथा कार्नेलियन के कीमती मनके (Beads) प्राप्त हुए हैं। यहाँ के मृदभांडों (Pottery) पर प्राक्-हड़प्पा (Pre-Harappan) संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
C. मालवा संस्कृति (Malwa Culture), मध्य प्रदेश (लगभग 1700 – 1200 ई.पू.)
विस्तार: नर्मदा नदी घाटी में विकसित। इसके प्रमुख स्थल नवदाटोली (Navdatoli), एरण (Eran) और नागदा हैं।
विशिष्टता: मालवा संस्कृति अपने उत्कृष्ट मृदभांडों (Malwa Pottery) के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है। ये बर्तन मोटे होते थे जिन पर लाल या गुलाबी रंग का लेप होता था और काले रंग से ज्यामितीय डिजाइन तथा पशु-पक्षियों के चित्र उकेरे जाते थे। नवदाटोली (जिसका उत्खनन एच.डी. सांकलिया ने किया था) से भारत में उगाई जाने वाली सभी प्रमुख फसलों (गेहूं, जौ, चावल, दालें) के साक्ष्य एक ही स्थान से प्राप्त हुए हैं।
D. जॉरवे संस्कृति (Jorwe Culture), महाराष्ट्र (लगभग 1400 – 700 ई.पू.)
विस्तार: गोदावरी और उसकी सहायक प्रवरा नदी की घाटियों में।
प्रमुख स्थल: जॉरवे, नेवासा (Nevasa), दायमाबाद (Daimabad), और इनामगाँव (Inamgaon)।
विशिष्टता: यह ताम्रपाषाण काल की सबसे विस्तृत और सबसे लंबे समय तक चलने वाली संस्कृति थी।
दायमाबाद: यहाँ से कांसे (Bronze) की चार वस्तुएं—रथ चलाता हुआ मनुष्य, हाथी, गैंडा और भैंसा—प्राप्त हुई हैं, जो हड़प्पा सभ्यता के प्रभाव को दर्शाती हैं। यह ताम्रपाषाण काल का सबसे बड़ा स्थल (लगभग 20 हेक्टेयर) था।
इनामगाँव: यहाँ से 130 से अधिक मिट्टी के घर, किलेबंदी (Fortification), खाई और बड़े अन्नागार मिले हैं। इनामगाँव स्पष्ट रूप से ‘सामाजिक पदानुक्रम’ (Social Hierarchy) का साक्ष्य देता है जहाँ सरदार/मुखिया का घर बस्ती के बीच में बड़ा होता था, जबकि कारीगरों के घर किनारे पर छोटे होते थे।
4. ताम्रपाषाण कालीन सामाजिक और आर्थिक जीवन
A. कृषि और पशुपालन (Agriculture and Domestication)
कृषि: ये लोग कुशल कृषक थे। वे रबी और खरीफ दोनों फसलें उगाते थे। मुख्य फसलों में गेहूं, जौ, चावल, बाजरा, रागी, मसूर, उड़द और मूंग शामिल थीं। कपास (Cotton) की खेती भी की जाती थी।
पशुपालन: गाय, बैल, भेड़, बकरी, सुअर और कुत्ते पाले जाते थे। दिलचस्प बात यह है कि ये लोग पशुओं का उपयोग दूध के लिए कम और उनके मांस के लिए अधिक करते थे। घोड़े के साक्ष्य स्पष्ट रूप से नहीं मिलते हैं।
B. शिल्प और तकनीकी ज्ञान (Crafts & Metallurgy)
मृदभांड कला: ‘काले और लाल रंग के मृदभांड’ (Black and Red Ware – BRW) इस काल की सर्वव्यापी विशेषता थी। इन्हें चाक (Wheel) पर बनाया जाता था और पकाया जाता था।
धातु कर्म: ये लोग कुशल ‘ताम्रकार’ (Coppersmiths) थे। वे तांबे को पिघलाकर (Smelting) तीर के अग्रभाग (Arrowheads), भाले, चूड़ियाँ और मछली पकड़ने के कांटे (Fish hooks) बनाते थे।
अन्य शिल्प: सूत कातने और कपड़े बुनने (Spinning and Weaving) की कला में वे पारंगत थे, जिसके साक्ष्य मालवा और जॉरवे से मिले चरखों और तकलियों (Spindle whorls) से मिलते हैं।
C. गृह निर्माण (Housing Pattern)
बस्तियाँ आम तौर पर नदियों या पहाड़ियों के पास बसाई जाती थीं। घर वर्गाकार, आयताकार या गोल होते थे। घरों की दीवारें बांस और लकड़ी के खंभों पर मिट्टी और गोबर का लेप (Wattle and Daub) लगाकर बनाई जाती थीं। फर्श को चिकना करने के लिए मिट्टी और कंकड़ का उपयोग होता था। पक्की ईंटों का प्रयोग अपवाद (जैसे गिलूंड) को छोड़कर नगण्य था।
5. धार्मिक मान्यताएं और समाधान प्रथाएं (Religious Beliefs & Burials)
A. धार्मिक जीवन
मातृदेवी की पूजा: मिट्टी से बनी नग्न स्त्री मूर्तियां बड़ी संख्या में मिली हैं, जो यह प्रमाणित करती हैं कि वे धरती को ‘उर्वरता की देवी’ (Mother Goddess) मानकर पूजते थे।
वृषभ (बैल) पूजा: मालवा और अन्य क्षेत्रों से मिट्टी के वृषभ (Terracotta Bulls) प्राप्त हुए हैं, जिन्हें संभवतः एक धार्मिक प्रतीक या शिव के वाहन के रूप में पूजा जाता था।
अग्नि पूजा: कई स्थलों से अग्नि कुंड (Fire altars) के साक्ष्य मिले हैं।
B. समाधान प्रथाएं (Burial Practices)
ताम्रपाषाण कालीन लोगों का ‘जीवन के बाद के अस्तित्व’ में गहरा विश्वास था।
महाराष्ट्र (जॉरवे): यहाँ मृतकों को कलश (Urn) में रखकर घर के फर्श के नीचे दफनाया जाता था। इनकी दिशा उत्तर-दक्षिण (North-South) होती थी।
दक्षिण भारत: यहाँ कब्रों की दिशा पूर्व-पश्चिम (East-West) हुआ करती थी।
कब्रों में मृतकों के साथ मिट्टी के बर्तन और तांबे की वस्तुएं रखी जाती थीं, ताकि परलोक में वे उनका उपयोग कर सकें। बच्चों के समाधान (Child burials) के साक्ष्य भी प्रचुर मात्रा में मिले हैं।

6. ताम्रपाषाणिक संस्कृति की सीमाएं और पतन (Limitations and Decline)
इतने उन्नत कृषि और शिल्प के बावजूद, ताम्रपाषाण कालीन संस्कृतियाँ नगरीय सभ्यता (Urbanization) में परिवर्तित नहीं हो सकीं। इसके प्रमुख कारण थे:
कांसे के ज्ञान का अभाव: तांबा एक मुलायम धातु है। चूंकि ये लोग तांबे में टिन मिलाकर कांसा (Bronze) बनाना नहीं जानते थे, इसलिए वे कठोर धातु के हथियार और गहरे जंगल साफ करने के लिए भारी कुल्हाड़ियाँ नहीं बना सके।
लेखन कला का अभाव: ये लोग पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे (सिंधु सभ्यता के विपरीत), जिससे उनका व्यापार और ज्ञान एक सीमा से आगे नहीं बढ़ सका।
शहरीकरण का अभाव: पक्की ईंटों का उपयोग न जानने के कारण वे बड़े शहर या स्थायी आधारभूत संरचना नहीं बना पाए।
पतन: 1200 ई.पू. के बाद लगातार सूखे, अकाल और जलवायु परिवर्तन (वर्षा में कमी) के कारण कृषि चौपट हो गई, जिससे ये बस्तियां धीरे-धीरे वीरान हो गईं और लोग घुमंतू जीवन की ओर लौट गए।
7. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions)
प्रश्न 1: भारतीय इतिहास में ताम्रपाषाण काल की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करते हुए स्पष्ट कीजिए कि यह काल सिंधु घाटी सभ्यता से किस प्रकार भिन्न था? (250 शब्द)
प्रश्न 2: आहार-बनास संस्कृति और मालवा संस्कृति की पुरातात्विक विशेषताओं की तुलनात्मक विवेचना कीजिए। मालवा के मृदभांडों को विशिष्ट क्यों माना जाता है? (200 शब्द)
प्रश्न 3: इनामगाँव के पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर ताम्रपाषाण कालीन ‘सामाजिक पदानुक्रम’ (Social Hierarchy) और आवास व्यवस्था का विश्लेषण कीजिए। (200 शब्द)
प्रश्न 4: ताम्रपाषाण कालीन लोगों की धार्मिक मान्यताओं और समाधान प्रथाओं (Burial Practices) का वर्णन कीजिए। दिशाओं का इसमें क्या महत्व था? (150 शब्द)
प्रश्न 5: एक उन्नत ग्रामीण और कृषक अर्थव्यवस्था होने के बावजूद, ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ नगरीय क्रांति में क्यों नहीं बदल सकीं? इसके पतन के कारणों की समीक्षा कीजिए। (250 शब्द)
8. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)
ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic Age) मानव इतिहास का वह पहला चरण है जब पाषाण (पत्थर) के उपकरणों के साथ-साथ तांबे (Copper) धातु का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू हुआ।
भारतीय उपमहाद्वीप में ‘तांबा’ वह पहली धातु थी जिसे आदिमानव ने खोजा और उसका प्रयोग कृषि उपकरणों तथा हथियारों के निर्माण में किया।
तकनीकी दृष्टि से ताम्रपाषाण काल नवपाषाण काल के बाद आता है, परंतु भारत के कई हिस्सों में यह सिंधु घाटी की नगरीय सभ्यता के पतन के बाद विकसित हुआ।
आहार-बनास संस्कृति मुख्य रूप से राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी भाग (मेवाड़ क्षेत्र) में अरावली पर्वतमाला और बनास नदी की घाटियों में फली-फूली।
आहार संस्कृति के मुख्य केंद्र ‘आहड़’ का प्राचीन नाम ‘ताम्रवती’ था क्योंकि यहाँ तांबे के अयस्क प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे और लोग धातु-कर्म में निपुण थे।
राजस्थान के ‘गिलूंड’ नामक ताम्रपाषाणिक स्थल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पूरी संस्कृति का एकमात्र स्थल है जहाँ से पकी हुई ईंटों (Burnt Bricks) के साक्ष्य मिले हैं।
मध्य प्रदेश के चंबल घाटी क्षेत्र में विकसित ‘कायथा संस्कृति’ को भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों में से एक माना जाता है।
कायथा संस्कृति के मृदभांडों पर हड़प्पा पूर्व (Pre-Harappan) संस्कृतियों का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है, जहाँ से स्टेटाइट और कार्नेलियन के कीमती मनके प्राप्त हुए हैं।
मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग में नर्मदा नदी के तट पर ‘मालवा संस्कृति’ विकसित हुई, जो अपने उत्कृष्ट कोटि के चित्रित मृदभांडों के लिए संपूर्ण भारत में विख्यात है।
एच.डी. सांकलिया द्वारा उत्खनित मालवा का ‘नवदाटोली’ स्थल इसलिए अद्वितीय है क्योंकि यहाँ से भारत में उगाई जाने वाली सभी प्रमुख फसलों के एकमुश्त साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
महाराष्ट्र की गोदावरी और प्रवरा नदी घाटी में विकसित ‘जॉरवे संस्कृति’ ताम्रपाषाण काल की सबसे विस्तृत और भौगोलिक रूप से सबसे व्यापक संस्कृति थी।
महाराष्ट्र का ‘दायमाबाद’ ताम्रपाषाण काल का सबसे बड़ा ज्ञात स्थल है, जहाँ से कांसे (Bronze) का रथ चलाते हुए मनुष्य और जानवरों की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।
‘इनामगाँव’ जॉरवे संस्कृति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है, जहाँ की बस्तियों के विन्यास से समाज में ‘सरदार’ (मुखिया) और ‘कारीगरों’ के बीच सामाजिक पदानुक्रम (Social Hierarchy) का स्पष्ट पता चलता है।
इनामगाँव में बस्तियों के चारों ओर सुरक्षा दीवार (किलेबंदी) और खाई के साक्ष्य मिले हैं, जो बाहरी आक्रमणों या बाढ़ से बचाव के लिए बनाए गए थे।
ताम्रपाषाण काल की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ग्रामीण और ‘कृषि-पशुपालन’ पर आधारित थी, जहाँ लोग स्थायी बस्तियां बनाकर रहते थे।
इस काल के लोग रबी और खरीफ दोनों प्रकार की फसलें उगाते थे, जिनमें गेहूं, जौ, चावल, मसूर, उड़द, मूंग और बाजरा प्रमुख थे।
पशुपालन के क्षेत्र में गाय, बैल, भेड़, बकरी और सुअर पाले जाते थे, परंतु ऐसा माना जाता है कि पशुओं का उपयोग दूध से ज्यादा मांस के लिए किया जाता था।
अधिकांश ताम्रपाषाणिक स्थलों से घोड़े की उपस्थिति के स्पष्ट और प्रामाणिक साक्ष्य प्राप्त नहीं होते हैं, जो इसे अन्य समकालीन संस्कृतियों से अलग करता है।
‘काले और लाल रंग के मृदभांड’ (Black and Red Ware – BRW) इस पूरे कालखंड की सर्वव्यापी पहचान हैं, जिन्हें कुम्हार के चाक पर अत्यंत कुशलता से बनाया जाता था।
ताम्रपाषाणिक मानव कताई और बुनाई (Spinning and Weaving) की कला से भलीभांति परिचित था, जिसके प्रमाण मालवा क्षेत्र से मिले चरखों और तकलियों से मिलते हैं।
घरों का निर्माण मुख्य रूप से बांस और लकड़ी के खंभों पर मिट्टी और गोबर का लेप (Wattle and Daub) लगाकर किया जाता था।
घरों का आकार वर्गाकार, आयताकार या वृत्ताकार होता था और फर्श को चिकना करने के लिए मिट्टी में कंकड़ मिलाकर पीटा जाता था।
धार्मिक मान्यताओं में ‘मातृदेवी’ (Mother Goddess) की पूजा सबसे प्रमुख थी, जो उर्वरता और कृषि उत्पादन की देवी के रूप में स्थापित थीं।
मालवा और अन्य क्षेत्रों से प्राप्त मिट्टी के वृषभ (Terracotta Bulls) इस बात की पुष्टि करते हैं कि बैल को एक पवित्र धार्मिक प्रतीक माना जाता था।
अग्नि पूजा का प्रचलन भी विद्यमान था, जिसके साक्ष्य कुछ ताम्रपाषाणिक स्थलों से प्राप्त अग्निकुंडों (Fire altars) के रूप में सामने आए हैं।
महाराष्ट्र (जॉरवे संस्कृति) में मृतकों को अस्थि कलश (Urn) में रखकर घर के फर्श के नीचे ‘उत्तर-दक्षिण’ (North-South) दिशा में दफनाया जाता था।
दक्षिण भारत के ताम्रपाषाणिक स्थलों में मृतकों को दफनाने की दिशा ‘पूर्व-पश्चिम’ (East-West) हुआ करती थी, जो क्षेत्रीय सांस्कृतिक भिन्नता को दर्शाती है।
कब्रों में मृतकों के साथ मिट्टी के बर्तन और तांबे की वस्तुएं रखी जाती थीं, जो उनके ‘जीवन के बाद के अस्तित्व’ (Life after death) में प्रबल विश्वास को प्रमाणित करता है।
बच्चों की मृत्यु दर इस काल में काफी अधिक थी, क्योंकि जॉरवे संस्कृति के कई स्थलों से बड़ी संख्या में बच्चों के कलश शवाधान प्राप्त हुए हैं।
ताम्रपाषाण संस्कृतियां ग्रामीण तो थीं, परंतु वे सिंधु घाटी की तरह नगरीय सभ्यता (Urbanization) में विकसित नहीं हो सकीं।
इस संस्कृति के नगरीकरण न होने का सबसे बड़ा कारण यह था कि ये लोग तांबे में टिन मिलाकर ‘कांसा’ (Bronze) बनाने की तकनीक से पूर्णतः अनभिज्ञ थे।
कांसे के अभाव के कारण वे अत्यंत कठोर धातु के औजार नहीं बना सके, जो घने जंगलों को काटने और बड़े पैमाने पर कृषि भूमि तैयार करने के लिए आवश्यक थे।
हड़प्पा वासियों के विपरीत, ताम्रपाषाण कालीन लोगों को ‘लेखन कला’ (Art of Writing) का ज्ञान नहीं था, जिससे व्यापार और ज्ञान का विस्तार सीमित रहा।
पकी हुई ईंटों का उपयोग न जानने के कारण वे सिंधु सभ्यता की तरह बहुमंजिला इमारतें, पक्की सड़कें और सुव्यवस्थित जल निकासी प्रणाली नहीं बना पाए।
पूर्वी भारत में बिहार का ‘चिरांद’ और पश्चिम बंगाल का ‘पांडु राजार ढिबी’ प्रमुख ताम्रपाषाणिक स्थल हैं जहाँ से चावल की खेती और हड्डी के उपकरण मिले हैं।
मध्य प्रदेश के ‘एरण’ (Eran) नामक स्थल से ताम्रपाषाण कालीन बस्तियों की सुरक्षा के लिए बनाए गए एक विशाल मिट्टी के परकोटे (Mud Rampart) के साक्ष्य मिले हैं।
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (प्रयागराज) जिले में स्थित ‘झूंसी’ और ‘खैराडीह’ से भी ताम्रपाषाण कालीन मृदभांड और बस्तियों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
ताम्रपाषाण काल में ‘श्रम विभाजन’ (Division of Labour) अत्यंत स्पष्ट हो गया था, जहाँ समाज में कृषक, कुम्हार, ताम्रकार और बुनकर जैसे अलग-अलग वर्ग उभर कर सामने आए।
भोजन पकाने और अनाज को लंबे समय तक सुरक्षित भंडारित करने के लिए उन्होंने विशाल आकार के घड़ों (Storage Jars) का निर्माण करना सीख लिया था।
तांबे के जो उपकरण इन स्थलों से मिले हैं, उनमें कुल्हाड़ियाँ, छेनियां, मछली पकड़ने के कांटे (Fish hooks), और बालों में लगाने वाली पिनें (Hairpins) प्रमुख हैं।
आहार के लोग तांबे का इतना अधिक उपयोग करते थे कि उन्होंने पत्थर के औजारों (Microliths) का प्रयोग लगभग पूरी तरह से छोड़ दिया था।
यह सभ्यता वस्तु-विनिमय (Barter System) पर आधारित थी क्योंकि इस काल में किसी भी प्रकार की मुद्रा या सिक्कों का प्रचलन नहीं था।
महाराष्ट्र के ‘चंदोली’ और ‘नेवासा’ स्थलों से बच्चों के कंकालों के गले में तांबे के मोतियों (Copper beads) का हार मिला है, जो आभूषण प्रेम को दर्शाता है।
ताम्रपाषाण कालीन बस्तियाँ मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में पनपीं जहाँ काली मिट्टी (Black Cotton Soil) उपलब्ध थी, जो कृषि के लिए अत्यंत उपजाऊ होती है।
इस संस्कृति में लोग यातायात के लिए मुख्य रूप से बैलगाड़ियों का उपयोग करते थे, जिसके प्रमाण खिलौना गाड़ियों (Toy Carts) के रूप में उत्खनन से मिले हैं।
1200 ईसा पूर्व के आसपास इन संस्कृतियों का पतन शुरू हो गया, जिसका सबसे प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन और वर्षा की मात्रा में भारी कमी (सूखा) माना जाता है।
लगातार पड़ने वाले अकाल के कारण कृषि अर्थव्यवस्था चौपट हो गई और लोग स्थायी बस्तियाँ छोड़कर फिर से घुमंतू चरवाहा जीवन की ओर लौटने लगे।
इनामगाँव के अंतिम चरण के साक्ष्यों से पता चलता है कि कृषि के विफल होने के बाद वहाँ के लोग मुख्य रूप से जंगली जानवरों के शिकार पर निर्भर हो गए थे।
यद्यपि इन संस्कृतियों का पतन हो गया, परंतु इनके द्वारा विकसित की गई कृषि तकनीकें, फसलें और ग्रामीण जीवन शैली आज भी भारतीय उपमहाद्वीप के गांवों का आधार हैं।
संपूर्ण ताम्रपाषाण काल भारतीय इतिहास की उस महान कड़ी का प्रतिनिधित्व करता है जिसने पाषाण युग की बर्बरता को समाप्त कर आने वाले लौह युग की नींव को अत्यंत मजबूती प्रदान की।