चट्टानें

1.पृथ्वी की पर्पटी और चट्टानें

हमारी पृथ्वी का संपूर्ण धरातल या बाह्य परत, जिस पर हम निवास करते हैं और कृषि करते हैं, मुख्य रूप से चट्टानों (Rocks) से बनी है। साधारण बोलचाल की भाषा में ‘चट्टान’ शब्द से तात्पर्य किसी बहुत कठोर और विशाल पत्थर से होता है, लेकिन भूविज्ञान (Geology) में चट्टान की परिभाषा अत्यंत व्यापक है।

भूविज्ञान के अनुसार, चट्टानें (Rocks) एक या एक से अधिक खनिजों (Minerals) का एक ठोस और प्राकृतिक रूप से निर्मित समुच्चय (Aggregate) हैं। ये चट्टानें ग्रेनाइट और बेसाल्ट की तरह अत्यंत कठोर भी हो सकती हैं, और चीका मिट्टी (Clay), रेत (Sand) या बजरी की तरह मुलायम और भुरभुरी भी हो सकती हैं। चट्टानों के वैज्ञानिक अध्ययन को ‘शैल विज्ञान’ या ‘पेट्रोलॉजी’ (Petrology) कहा जाता है।

पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत, जिसे भू-पर्पटी (Crust) कहा जाता है, का निर्माण लगभग 2000 से अधिक प्रकार के खनिजों से हुआ है, लेकिन इनमें से केवल 24 खनिज ही ऐसे हैं जिन्हें ‘चट्टान निर्माता खनिज’ (Rock-forming minerals) माना जाता है (जैसे- फेल्सपार, क्वार्ट्ज, अभ्रक, एम्फीबोल आदि)। पृथ्वी की पर्पटी के निर्माण में मुख्य रूप से 8 तत्वों का 98% योगदान होता है, जिनमें ऑक्सीजन (46.6%) और सिलिकॉन (27.7%) सबसे प्रमुख हैं।

2. चट्टानों का वर्गीकरण (Classification of Rocks)

चट्टानों की उत्पत्ति (Mode of Formation), निर्माण प्रक्रिया, और उनके भौतिक व रासायनिक गुणों के आधार पर चट्टानों (Rocks) को मुख्य रूप से तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

  1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks)

  2. अवसादी चट्टानें (Sedimentary Rocks)

  3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks)

आइए, UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से इन तीनों प्रकारों का गहन और विश्लेषणात्मक अध्ययन करें।

3. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks): प्राथमिक चट्टानें

‘आग्नेय’ (Igneous) शब्द लैटिन भाषा के ‘Ignis’ से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है—’आग’ (Fire)। जब पृथ्वी के आंतरिक भाग में उपस्थित अत्यधिक गर्म और तरल पदार्थ, जिसे ‘मैग्मा’ (Magma) कहते हैं, धरातल के ऊपर या नीचे ठंडा होकर ठोस रूप धारण कर लेता है, तो उसे आग्नेय चट्टान कहा जाता है। चूंकि पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद सबसे पहले इन्ही चट्टानों का निर्माण हुआ था, इसलिए इन्हें ‘प्राथमिक चट्टानें’ (Primary Rocks) या ‘मातृ चट्टानें’ (Mother Rocks) भी कहा जाता है। अवसादी और रूपांतरित चट्टानें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन्हीं आग्नेय चट्टानों से बनती हैं।

A. आग्नेय चट्टानों की प्रमुख विशेषताएँ (Characteristics)

  • जीवाश्मों का अभाव (Absence of Fossils): मैग्मा का तापमान इतना अधिक होता है कि इसमें किसी भी वनस्पति या जीव के अवशेष (Fossils) जीवित नहीं रह सकते। इसलिए इनमें जीवाश्म बिल्कुल नहीं पाए जाते।

  • रवेदार संरचना (Crystalline Structure): ये चट्टानें रवेदार (Crystals) होती हैं। मैग्मा के ठंडे होने की गति के आधार पर इन रवों (Crystals) का आकार तय होता है।

  • कठोरता और संघटन: ये चट्टानें बहुत कठोर, सघन और रंध्रहीन (Non-porous) होती हैं। इसलिए इनमें पानी आसानी से प्रवेश नहीं कर पाता और इनका रासायनिक अपक्षय (Chemical Weathering) बहुत कम होता है।

  • परतों का अभाव (Absence of Layers): अवसादी चट्टानों की तरह इनमें परतें (Strata) नहीं पाई जाती हैं।

  • धात्विक खनिज: सोना, चांदी, लोहा, तांबा, सीसा, जस्ता और प्लैटिनम जैसे बहुमूल्य धात्विक खनिज मुख्य रूप से आग्नेय चट्टानों में ही पाए जाते हैं।

B. निर्माण स्थान के आधार पर आग्नेय चट्टानों के प्रकार

  1. अंतर्भेदी आग्नेय चट्टानें (Intrusive Igneous Rocks): जब ज्वालामुखी उद्गार के समय मैग्मा धरातल के बाहर नहीं आ पाता और पृथ्वी के अंदर ही दरारों या गुहाओं में धीरे-धीरे ठंडा होकर ठोस बन जाता है।

    • पातालीय (Plutonic Rocks): जो मैग्मा पृथ्वी में बहुत अधिक गहराई पर ठंडा होता है (जैसे- ग्रेनाइट)। गहराई में धीरे-धीरे ठंडा होने के कारण इनके रवे (Crystals) बहुत बड़े होते हैं।

    • अधिवितलीय या मध्यवर्ती (Hypabyssal Rocks): जो मैग्मा धरातल के ठीक नीचे दरारों में जमता है। इससे कई प्रकार की आकृतियां बनती हैं जैसे—बैथोलिथ (Batholith), लैकोलिथ (Laccolith), फैकोलिथ (Phacolith), सिल (Sill), और डाइक (Dyke)।

  2. बहिर्भेदी या ज्वालामुखीय चट्टानें (Extrusive Igneous Rocks): जब मैग्मा ज्वालामुखी विस्फोट के माध्यम से धरातल पर ‘लावा’ (Lava) के रूप में फैल जाता है और हवा के संपर्क में आकर तेजी से ठंडा होता है।

    • तेजी से ठंडा होने के कारण इनमें रवे बहुत छोटे होते हैं या बिल्कुल नहीं होते। (उदाहरण: बेसाल्ट (Basalt), ऑब्सीडियन (Obsidian), गैब्रो (Gabbro))। बेसाल्ट चट्टानों के टूटने से ही ‘काली मिट्टी’ (Black Soil) का निर्माण होता है।

C. रासायनिक संगठन (सिलिका की मात्रा) के आधार पर प्रकार

  • अम्लीय चट्टानें (Acidic Rocks): इनमें सिलिका (Silica) की मात्रा अधिक (65-85%) होती है। ये हल्के रंग की होती हैं और इनका घनत्व कम होता है। (उदाहरण: ग्रेनाइट)।

  • क्षारीय चट्टानें (Basic Rocks): इनमें सिलिका की मात्रा कम (40-55%) होती है और लोहे, मैग्नीशियम की मात्रा अधिक होती है। ये गहरे काले रंग की होती हैं और बहुत भारी होती हैं। (उदाहरण: बेसाल्ट)।

4. अवसादी चट्टानें (Sedimentary Rocks): परतदार चट्टानें

‘अवसादी’ (Sedimentary) शब्द लैटिन भाषा के ‘Sedimentum’ से बना है, जिसका अर्थ है—’नीचे बैठना’ या ‘जमा होना’ (Settling down)। पृथ्वी के धरातल पर मौजूद पहले से निर्मित चट्टानें (आग्नेय या रूपांतरित) जब अपक्षय (Weathering) और अपरदन (Erosion) के कारकों (जैसे—नदी, हिमनद, पवन, समुद्री लहरें) द्वारा छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाती हैं, तो इन टुकड़ों (अवसादों) को किसी स्थान (जैसे झील, समुद्र या गर्त) पर परत-दर-परत जमा कर दिया जाता है।

लाखों वर्षों के दबाव और रासायनिक खनिजों के जुड़ने (Cementation) की प्रक्रिया के कारण ये अवसाद ठोस चट्टान का रूप ले लेते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को ‘शिलीभवन’ (Lithification) कहा जाता है। पृथ्वी के संपूर्ण धरातल के लगभग 75% भाग पर अवसादी चट्टानों का ही विस्तार है, जबकि भू-पर्पटी के कुल आयतन में इनका योगदान मात्र 5% है।

A. अवसादी चट्टानों की प्रमुख विशेषताएँ

  • परतदार संरचना (Stratified Rocks): इन चट्टानों का निर्माण अवसादों के परत-दर-परत जमा होने से होता है, इसलिए इनमें स्पष्ट परतें (Layers/Beds) दिखाई देती हैं। इन्हें ‘परतदार चट्टानें’ भी कहते हैं।

  • जीवाश्मों की उपस्थिति (Presence of Fossils): परतों के जमाव के दौरान उनके बीच में पेड़-पौधे, जीव-जंतु और मछलियाँ दब जाती हैं, जो लाखों वर्षों बाद जीवाश्म (Fossils) बन जाती हैं।

  • रंध्रयुक्त और मुलायम (Porous and Soft): ये चट्टानें आग्नेय चट्टानों की तुलना में अपेक्षाकृत मुलायम होती हैं और इनमें छिद्र (Pores) पाए जाते हैं। यही कारण है कि भूमिगत जल (Groundwater) और खनिज तेल (Petroleum) इन्हीं चट्टानों में संचित रहते हैं।

  • कोयला और पेट्रोलियम (Fossil Fuels): दुनिया का संपूर्ण कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस केवल और केवल अवसादी चट्टानों से ही प्राप्त होता है।

B. निर्माण प्रक्रिया के आधार पर अवसादी चट्टानों के प्रकार

  1. यांत्रिक रूप से निर्मित (Mechanically Formed): जब जल, पवन या हिमनद द्वारा चट्टानों के भौतिक टुकड़ों को जमा किया जाता है।

    • उदाहरण: बलुआ पत्थर (Sandstone), शेल (Shale), कांग्लोमरेट (Conglomerate), और लोएस (Loess)।

  2. जैविक रूप से निर्मित (Organically Formed): जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के अवशेषों के जमा होने से।

    • उदाहरण: चूना पत्थर (Limestone), कोयला (Coal), खड़िया (Chalk), और पीट (Peat)।

  3. रासायनिक रूप से निर्मित (Chemically Formed): जब जल में घुले हुए खनिज वाष्पीकरण (Evaporation) के कारण अवक्षेपित (Precipitate) होकर ठोस बन जाते हैं।

    • उदाहरण: सेंधा नमक (Rock Salt), जिप्सम (Gypsum), और पोटाश।

5. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks)

‘मेटामाॅर्फिक’ (Metamorphic) शब्द दो ग्रीक शब्दों ‘Meta’ (परिवर्तन) और ‘Morph’ (रूप) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है—’रूप परिवर्तन’ (Change of Form)।

जब पहले से मौजूद आग्नेय या अवसादी चट्टानें (Rocks) अत्यधिक ताप (Heat) और दाब (Pressure) या रासायनिक रूप से सक्रिय तरल पदार्थों के संपर्क में आती हैं, तो बिना पिघले (Without Melting) उनके मूल खनिजों, संरचना और रंग में पूर्ण परिवर्तन हो जाता है। इस प्रकार बनी नई चट्टान को रूपांतरित चट्टान कहा जाता है। इस प्रक्रिया को ‘रूपांतरण’ (Metamorphism) कहते हैं।

A. रूपांतरण के प्रकार (Types of Metamorphism)

  • तापीय या संपर्क रूपांतरण (Thermal/Contact Metamorphism): जब चट्टानें किसी गर्म मैग्मा या लावा के सीधे संपर्क में आती हैं, तो अत्यधिक गर्मी के कारण उनका रूप बदल जाता है।

  • गतिक या क्षेत्रीय रूपांतरण (Dynamic/Regional Metamorphism): यह मुख्य रूप से टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने के समय होता है। जब पहाड़ों का निर्माण होता है, तो अत्यधिक ‘दबाव’ (Pressure) के कारण विशाल क्षेत्रों की चट्टानें रूपांतरित हो जाती हैं।

B. प्रमुख चट्टानों का रूपांतरण (Transformation Table – Very Important for UPSC)

मूल चट्टान (Original Rock)चट्टान का प्रकाररूपांतरित चट्टान (Metamorphic Rock)
ग्रेनाइट (Granite)आग्नेयनीस (Gneiss)
बेसाल्ट (Basalt)आग्नेयएम्फीबोलाइट / शिस्ट (Schist)
चूना पत्थर (Limestone)अवसादीसंगमरमर (Marble)
बलुआ पत्थर (Sandstone)अवसादीक्वार्टजाइट (Quartzite)
शेल या चीका मिट्टी (Shale/Clay)अवसादीस्लेट (Slate) -> फाइलाइट -> शिस्ट
कोयला (Coal – Bituminous)अवसादीग्रेफाइट (Graphite) / एंथ्रेसाइट / हीरा (Diamond)

C. रूपांतरित चट्टानों की विशेषताएँ

  • ये चट्टानें पृथ्वी की सबसे कठोर चट्टानें होती हैं (जैसे हीरा और क्वार्टजाइट)।

  • इनमें खनिजों के कणों का पुनर्गठन इस प्रकार होता है कि वे एक समानांतर रेखा या परत में व्यवस्थित हो जाते हैं। इस गुण को ‘फोलिएशन’ (Foliation) या ‘पत्रण’ कहा जाता है।

  • मूल चट्टान में यदि जीवाश्म होते भी हैं (जैसे चूना पत्थर में), तो अत्यधिक ताप और दाब के कारण वे नष्ट हो जाते हैं।

6. चट्टान चक्र (The Rock Cycle)

प्रकृति में कुछ भी स्थायी नहीं है और चट्टानें (Rocks) भी इसका अपवाद नहीं हैं। एक प्रकार की चट्टान का दूसरे प्रकार की चट्टान में परिवर्तित होने की निरंतर और चक्रीय प्रक्रिया को ‘चट्टान चक्र’ (Rock Cycle) कहा जाता है। यह पृथ्वी के आंतरिक (Endogenic) और बाह्य (Exogenic) बलों के बीच एक शाश्वत संतुलन है।

चट्टान चक्र के चरण:

  1. पृथ्वी के अंदर का गर्म मैग्मा बाहर आकर ठंडा होता है और आग्नेय चट्टान बनता है।

  2. इन आग्नेय चट्टानों पर मौसम की मार पड़ती है (अपक्षय और अपरदन), और ये टूटकर छोटे अवसादों में बदल जाती हैं।

  3. ये अवसाद नदियों द्वारा समुद्रों में जमा किए जाते हैं, जहाँ दबाव के कारण ‘शिलीभवन’ होता है और वे अवसादी चट्टान बन जाती हैं।

  4. जब आग्नेय या अवसादी चट्टानें विवर्तनिक हलचलों (Tectonic movements) के कारण पृथ्वी की गहराई में धंस जाती हैं, तो अत्यधिक ताप और दाब के कारण वे रूपांतरित चट्टान में बदल जाती हैं।

  5. अंततः, ये रूपांतरित चट्टानें (या कोई भी अन्य चट्टान) और अधिक गहराई में जाकर अत्यधिक ताप के कारण पिघल जाती हैं और वापस मैग्मा बन जाती हैं। और यह चक्र फिर से शुरू हो जाता है।

7. चट्टानों का आर्थिक और भौगोलिक महत्व (Economic & Geographical Importance)

भूगोल और अर्थव्यवस्था में चट्टानों का महत्व अपार है:

  • मृदा का निर्माण (Soil Formation): मिट्टी का निर्माण चट्टानों के अपक्षय (टूटने) से ही होता है। उदाहरण के लिए, दक्कन के पठार में बेसाल्ट चट्टानों के टूटने से कपास की खेती के लिए सर्वोत्तम ‘काली मिट्टी’ का निर्माण हुआ है।

  • खनिज संसाधन (Mineral Wealth): चट्टानें खनिजों का भंडार हैं। आग्नेय और रूपांतरित चट्टानें धात्विक खनिजों (लोहा, सोना, तांबा) का प्रमुख स्रोत हैं।

  • जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels): औद्योगिक क्रांति का आधार—कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस—विशेष रूप से अवसादी चट्टानों के छिद्रों और परतों के बीच ही पाए जाते हैं।

  • भवन निर्माण सामग्री: प्राचीन स्मारकों से लेकर आधुनिक इमारतों तक, चट्टानें आधार हैं। लाल किला (लाल बलुआ पत्थर), ताजमहल (संगमरमर), और आज के घरों में इस्तेमाल होने वाला ग्रेनाइट और सीमेंट (चूना पत्थर से) चट्टानों से ही प्राप्त होते हैं।

  • जल भंडार (Groundwater Reservoir): रंध्रयुक्त अवसादी चट्टानें (जैसे बलुआ पत्थर) भूमिगत जल को सोखकर उसे संचित रखती हैं, जो कुओं और ट्यूबवेल के माध्यम से हमें प्राप्त होता है।

8. भारत में चट्टानों का भौगोलिक वितरण (Geographical Distribution of Rocks in India)

UPSC की तैयारी के लिए भारत के रॉक सिस्टम (Rock System) को समझना जरूरी है:

  1. आर्कियन और धारवाड़ क्रम (Dharwar System): ये भारत की सबसे पुरानी रूपांतरित चट्टानें हैं जो मुख्य रूप से कर्नाटक, झारखंड और अरावली में पाई जाती हैं। भारत के अधिकांश धात्विक खनिज (सोना, लोहा, तांबा) धारवाड़ चट्टानों में मिलते हैं।

  2. कुडप्पा और विंध्यन क्रम (Vindhyan System): ये प्राचीन अवसादी चट्टानें हैं। विंध्यन चट्टानें मध्य प्रदेश और राजस्थान में फैली हैं, जो भवन निर्माण सामग्री (लाल बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, हीरा) के लिए प्रसिद्ध हैं। पन्ना और गोलकुंडा की खदानें विंध्यन क्रम में ही हैं।

  3. गोंडवाना क्रम (Gondwana System): भारत का 98% कोयला गोंडवाना क्रम की अवसादी चट्टानों (दामोदर, महानदी और गोदावरी नदी घाटियों) में ही पाया जाता है।

  4. दक्कन ट्रैप (Deccan Trap): यह ज्वालामुखी विस्फोट से निकले ‘बेसाल्ट’ लावा से बना है, जो महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश के बड़े हिस्से को कवर करता है और काली मिट्टी का जनक है।

  5. टर्शियरी क्रम (Tertiary System): हिमालय पर्वत का निर्माण इसी काल की अवसादी चट्टानों से हुआ है। असम और गुजरात में मिलने वाला खनिज तेल (Petroleum) इन्ही टर्शियरी चट्टानों में पाया जाता है।

9. निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहा जाए तो, पृथ्वी की चट्टानें (Rocks) न केवल हमारी भू-पर्पटी का भौतिक आधार हैं, बल्कि मानव सभ्यता के विकास और आर्थिक प्रगति की धुरी भी हैं। आग्नेय, अवसादी और रूपांतरित चट्टानों का यह विविधतापूर्ण स्वरूप और निरंतर चलने वाला चट्टान चक्र (Rock Cycle) पृथ्वी को एक जीवंत और गतिशील ग्रह बनाता है। इन चट्टानों के भूवैज्ञानिक अध्ययन से न केवल हमें पृथ्वी के लाखों वर्षों के इतिहास, जलवायु और जीवाश्मों को समझने में मदद मिलती है, बल्कि यह हमारे भविष्य के ऊर्जा और खनिज संसाधनों के प्रबंधन के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।

10. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)

प्रश्न 1: चट्टान चक्र (Rock Cycle) से आप क्या समझते हैं? आग्नेय, अवसादी और रूपांतरित चट्टानों के निर्माण में इस चक्र की भूमिका का विस्तार से वर्णन करें। (250 शब्द)

प्रश्न 2: अवसादी चट्टानें (Sedimentary Rocks) यद्यपि पृथ्वी के आयतन का एक बहुत छोटा हिस्सा हैं, फिर भी पृथ्वी के धरातल पर इनका विस्तार सर्वाधिक है और आर्थिक दृष्टि से ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस कथन की विवेचना कीजिए। (200 शब्द)

प्रश्न 3: आग्नेय चट्टानों (Igneous Rocks) को ‘प्राथमिक चट्टानें’ क्यों कहा जाता है? इनके उत्पत्ति के आधार पर प्रकारों (अंतर्भेदी और बहिर्भेदी) और प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें। (200 शब्द)

प्रश्न 4: “रूपांतरण (Metamorphism) एक ऐसी प्रक्रिया है जो चट्टानों के मूल स्वरूप को बिना पिघलाए पूरी तरह बदल देती है।” इस प्रक्रिया के विभिन्न कारकों (Heat and Pressure) की चर्चा करते हुए भारत में पाई जाने वाली प्रमुख रूपांतरित चट्टानों के उदाहरण दीजिए। (150 शब्द)

प्रश्न 5: भारत के भूवैज्ञानिक रॉक सिस्टम (Rock System of India) के संदर्भ में ‘धारवाड़ क्रम’ और ‘गोंडवाना क्रम’ की चट्टानों के आर्थिक और धात्विक महत्व पर प्रकाश डालिए। (250 शब्द)

11. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)

  1. भूविज्ञान की वह प्रमुख शाखा जिसमें चट्टानों (Rocks) की उत्पत्ति, संरचना, प्रकार और उनके वितरण का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है, ‘पेट्रोलॉजी’ (Petrology) कहलाती है।

  2. पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत जिसे भू-पर्पटी (Crust) कहा जाता है, मुख्य रूप से ऑक्सीजन (46.6%) और सिलिकॉन (27.7%) जैसे तत्वों से मिलकर बनी है जो खनिजों का निर्माण करते हैं।

  3. चट्टानें एक या एक से अधिक खनिजों (Minerals) का ठोस सम्मिश्रण होती हैं, और पूरे भू-पर्पटी के निर्माण में लगभग 24 खनिज ‘चट्टान निर्माता खनिज’ के रूप में जाने जाते हैं।

  4. आग्नेय चट्टानों (Igneous Rocks) को ‘प्राथमिक चट्टानें’ या ‘मातृ चट्टानें’ कहा जाता है क्योंकि पृथ्वी के निर्माण के समय सबसे पहले पिघले हुए मैग्मा के ठंडे होने से इन्हीं चट्टानों का जन्म हुआ था।

  5. आग्नेय चट्टानों में किसी भी प्रकार के जीवाश्म (Fossils) नहीं पाए जाते हैं क्योंकि इनके निर्माण के समय मैग्मा का अत्यधिक तापमान किसी भी जैविक अंश को पूरी तरह से जलाकर नष्ट कर देता है।

  6. आग्नेय चट्टानें संरचना में रवेदार (Crystalline) होती हैं, और मैग्मा जितनी धीमी गति से ठंडा होता है, चट्टानों में रवों (Crystals) का आकार उतना ही बड़ा और स्पष्ट होता है।

  7. ग्रेनाइट (Granite) एक पातालीय (Plutonic) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान का सबसे बेहतरीन उदाहरण है, जो पृथ्वी की गहराई में मैग्मा के बहुत धीरे-धीरे ठंडे होने के कारण विशाल रवों के साथ बनती है।

  8. जब ज्वालामुखी उद्गार के दौरान तरल लावा पृथ्वी के धरातल पर आ जाता है और तेजी से ठंडा होता है, तो उससे बारीक रवों वाली बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान ‘बेसाल्ट’ (Basalt) का निर्माण होता है।

  9. बेसाल्ट चट्टान में लोहे की मात्रा बहुत अधिक होती है और जब इस चट्टान का अपक्षय (टूट-फूट) होता है, तो भारत के दक्कन के पठार में पाई जाने वाली उपजाऊ ‘काली मिट्टी’ (Black Cotton Soil) का निर्माण होता है।

  10. रासायनिक संरचना के आधार पर अम्लीय आग्नेय चट्टानों (Acidic Rocks) में सिलिका की मात्रा 65% से अधिक होती है (जैसे ग्रेनाइट), जबकि क्षारीय चट्टानों (Basic Rocks) में सिलिका की मात्रा कम होती है (जैसे गैब्रो)।

  11. बैथोलिथ (Batholith), लैकोलिथ, फैकोलिथ, सिल (Sill) और डाइक (Dyke) वे विशिष्ट भूवैज्ञानिक आकृतियां हैं जो ज्वालामुखी के मैग्मा के पृथ्वी की दरारों में ही जम जाने से बनती हैं।

  12. अवसादी चट्टानों (Sedimentary Rocks) का निर्माण पहले से मौजूद चट्टानों के टूटने (अपक्षय और अपरदन) और फिर नदी, हवा या हिमनद द्वारा परतों में जमा होने की प्रक्रिया से होता है।

  13. छोटे-छोटे अवसादों (Sediments) के एक दूसरे से जुड़कर दबाव के कारण एक ठोस चट्टान में बदल जाने की इस भूवैज्ञानिक प्रक्रिया को ‘शिलीभवन’ (Lithification) कहा जाता है।

  14. यद्यपि पृथ्वी के कुल आयतन का मात्र 5% भाग अवसादी चट्टानों से बना है, लेकिन पृथ्वी के संपूर्ण धरातल (Crust surface) का लगभग 75% भाग इन्हीं परतदार चट्टानों से ढका हुआ है।

  15. अवसादी चट्टानों की सबसे बड़ी पहचान उनकी परतदार संरचना (Stratification) है, और दुनिया के सभी जीवाश्म (Fossils) केवल और केवल इन्हीं अवसादी चट्टानों की परतों के बीच सुरक्षित पाए जाते हैं।

  16. संपूर्ण विश्व में औद्योगिक विकास को गति देने वाले जीवाश्म ईंधन—जैसे कोयला, खनिज तेल (Petroleum), और प्राकृतिक गैस—केवल अवसादी चट्टानों की रंध्रयुक्त (Porous) संरचनाओं में ही संचित होते हैं।

  17. बलुआ पत्थर (Sandstone), शेल (Shale) और कांग्लोमरेट वे अवसादी चट्टानें हैं जो हवा या पानी के द्वारा चट्टानों के भौतिक टुकड़ों (यांत्रिक रूप से) के जमा होने से निर्मित होती हैं।

  18. चूना पत्थर (Limestone), खड़िया (Chalk) और कोयला जैविक रूप से निर्मित अवसादी चट्टानें हैं, जिनका निर्माण लाखों वर्षों में समुद्री जीवों के कंकालों और जंगलों की वनस्पतियों के दबने से हुआ है।

  19. सेंधा नमक (Rock Salt) और जिप्सम (Gypsum) रासायनिक अवसादी चट्टानों के उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जो समुद्र या झीलों के खारे पानी के वाष्पीकरण (Evaporation) के बाद पीछे बचे खनिजों के जमने से बनते हैं।

  20. अवसादी चट्टानों के सरंध्र (पोरस) होने के कारण ही ये भूमिगत जल (Groundwater) के सबसे अच्छे भंडार के रूप में कार्य करती हैं, जो कुओं के माध्यम से मानव उपयोग के लिए उपलब्ध होता है।

  21. जब प्राथमिक आग्नेय और द्वितीयक अवसादी चट्टानें अत्यधिक ताप (Heat) और दाब (Pressure) के संपर्क में आती हैं, तो उनके खनिजों का रूप बदल जाता है और वे ‘रूपांतरित चट्टानें’ (Metamorphic Rocks) बन जाती हैं।

  22. चट्टानों के रूपांतरण की प्रक्रिया में मूल चट्टान कभी पिघलती नहीं है (Without Melting), बल्कि उसके रासायनिक बांड टूटकर नए सिरे से व्यवस्थित होते हैं जिससे चट्टान अधिक कठोर और सघन हो जाती है।

  23. ‘तापीय रूपांतरण’ (Thermal/Contact Metamorphism) तब होता है जब कोई चट्टान सीधे गर्म मैग्मा के संपर्क में आती है, और उसकी अत्यधिक गर्मी के कारण चट्टान का स्वरूप बदल जाता है।

  24. ‘गतिक या क्षेत्रीय रूपांतरण’ (Dynamic/Regional Metamorphism) वह प्रक्रिया है जो टेक्टोनिक प्लेटों की गति के कारण पहाड़ों के निर्माण के समय उत्पन्न भारी ‘दबाव’ (Pressure) से होती है।

  25. रूपांतरित चट्टानों में खनिजों के एक विशिष्ट समानांतर रेखा या परत में व्यवस्थित होने के गुण को ‘फोलिएशन’ (Foliation) या पत्रण कहा जाता है।

  26. बलुआ पत्थर (Sandstone), जो कि एक अवसादी चट्टान है, अत्यधिक ताप और दाब के कारण रूपांतरित होकर ‘क्वार्टजाइट’ (Quartzite) नामक एक अत्यंत कठोर चट्टान में परिवर्तित हो जाता है।

  27. निर्माण कार्यों और मूर्तिकला में उपयोग होने वाला खूबसूरत ‘संगमरमर’ (Marble) वास्तव में चूना पत्थर (Limestone) नामक अवसादी चट्टान का तापीय रूपांतरित रूप है।

  28. ‘ग्रेनाइट’ जो कि एक कठोर आग्नेय चट्टान है, जब पृथ्वी की गहराई में अत्यधिक दबाव का सामना करती है, तो वह ‘नीस’ (Gneiss) नामक रूपांतरित चट्टान में बदल जाती है।

  29. शेल (Shale) या चीका मिट्टी का रूपांतरण पहले ‘स्लेट’ (Slate) में होता है, फिर अत्यधिक दबाव से वह ‘फाइलाइट’ और अंततः ‘शिस्ट’ (Schist) नामक कायांतरित चट्टान बन जाती है।

  30. विश्व का सबसे कठोर प्राकृतिक पदार्थ ‘हीरा’ (Diamond) और पेंसिल में उपयोग होने वाला ‘ग्रेफाइट’ दोनों ही कार्बन के अपररूप हैं और ये कोयले (Coal) के अत्यधिक कायांतरण से निर्मित होते हैं।

  31. भारत का प्रसिद्ध ताजमहल मकराना (राजस्थान) से लाए गए उच्च गुणवत्ता वाले सफेद संगमरमर (रूपांतरित चट्टान) से बना है, जबकि दिल्ली का लाल किला विंध्यन क्रम के लाल बलुआ पत्थर (अवसादी चट्टान) से बना है।

  32. ‘चट्टान चक्र’ (The Rock Cycle) एक निरंतर चलने वाली भूवैज्ञानिक प्रक्रिया है जो दर्शाती है कि आग्नेय, अवसादी और रूपांतरित चट्टानें किस प्रकार समय के साथ एक-दूसरे में परिवर्तित होती रहती हैं।

  33. चट्टान चक्र का मुख्य चालक बल (Driving Force) पृथ्वी के आंतरिक भाग की ऊष्मा (प्लेट टेक्टोनिक्स) और धरातल के ऊपर सूर्य की ऊर्जा (अपक्षय और अपरदन चक्र) है।

  34. भारत में ‘धारवाड़ क्रम’ की चट्टानें आर्थिक और धात्विक दृष्टिकोण से सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि भारत का लगभग सारा सोना (कोलार खदान), लोहा, तांबा और मैंगनीज इन्ही रूपांतरित चट्टानों में पाया जाता है।

  35. ‘विंध्यन क्रम’ की चट्टानें प्राचीन अवसादी चट्टानें हैं जो विशेष रूप से अपनी उच्च कोटि की भवन निर्माण सामग्री (लाल बलुआ पत्थर) और भारत में पाए जाने वाले हीरों (पन्ना और गोलकुंडा की खदानों) के लिए प्रसिद्ध हैं।

  36. भारत का 98% से अधिक कोयला भंडार ‘गोंडवाना क्रम’ की अवसादी चट्टानों में संचित है, जो मुख्य रूप से दामोदर, महानदी, सोन और गोदावरी नदियों की भ्रंश घाटियों में स्थित है।

  37. हिमालय पर्वत श्रृंखला का निर्माण टेथिस सागर के मलबे से हुआ है, इसलिए हिमालय मुख्य रूप से ‘टर्शियरी क्रम’ की नवीन अवसादी और रूपांतरित चट्टानों से मिलकर बना है।

  38. भारत के असम (डिगबोई) और गुजरात (अंकलेश्वर) में पाया जाने वाला खनिज तेल और पेट्रोलियम मुख्य रूप से टर्शियरी युग की इन्ही छिद्रयुक्त अवसादी चट्टानों से प्राप्त किया जाता है।

  39. दक्कन ट्रैप (Deccan Trap) का निर्माण क्रिटेशियस काल में हुए दरारी ज्वालामुखी विस्फोटों से निकले ‘क्षारीय बेसाल्ट लावा’ के विशाल क्षेत्र में बिछ जाने से हुआ है।

  40. ऑब्सीडियन (Obsidian) एक बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान है जो इतनी तेजी से ठंडी होती है कि इसमें बिल्कुल भी रवे नहीं बनते, और यह काले कांच (Volcanic Glass) जैसी दिखाई देती है।

  41. प्यूमिस (Pumice) एक मात्र ऐसी आग्नेय चट्टान है जिसका घनत्व पानी से भी कम होता है, इसलिए यह चट्टान पानी में तैर सकती है; इसका निर्माण लावा के झाग (Froth) के तेजी से ठंडे होने से होता है।

  42. ‘स्ट्रेटा’ (Strata) या संस्तर अवसादी चट्टानों में पाई जाने वाली उन विशिष्ट परतों को कहा जाता है जो एक के ऊपर एक जमा होती हैं और जिनके बीच अक्सर जीवाश्म पाए जाते हैं।

  43. कांग्लोमरेट (Conglomerate) एक ऐसी यांत्रिक अवसादी चट्टान है जिसमें गोल आकार के बड़े-बड़े पत्थर और कंकड़ (Pebbles) प्राकृतिक सीमेंट (जैसे सिलिका या कैल्शियम) के द्वारा आपस में जुड़े होते हैं।

  44. जब किसी रूपांतरित चट्टान पर एक बार फिर से अत्यधिक दबाव और ताप पड़ता है, तो वह पुनः किसी अन्य रूपांतरित चट्टान में बदल सकती है; इसे ‘पुनः रूपांतरण’ (Re-metamorphism) कहते हैं (जैसे स्लेट से शिस्ट)।

  45. मैदानी क्षेत्रों में पाई जाने वाली जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) वास्तव में हिमालय और पठारी क्षेत्रों की चट्टानों के नदियों द्वारा अपरदन और मैदानों में निक्षेपण (Deposition) का ही अंतिम परिणाम है।

  46. आग्नेय चट्टानों में खनिजों की बहुलता तो होती है, लेकिन वे बहुत गहराई में और अत्यंत कठोर अवस्था में होते हैं, जिससे उनका आर्थिक खनन (Mining) बहुत खर्चीला और मुश्किल होता है।

  47. पृथ्वी पर सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला खनिज ‘फेल्सपार’ (Feldspar) है, जो पृथ्वी की कुल पर्पटी का लगभग आधा हिस्सा बनाता है और आग्नेय चट्टानों का प्रमुख घटक है।

  48. चट्टानों के रासायनिक अपक्षय (Chemical Weathering) की प्रक्रिया में ऑक्सीकरण, कार्बोनेशन और जलयोजन (Hydration) शामिल हैं, जो विशेष रूप से गर्म और आर्द्र (Humid) जलवायु वाले क्षेत्रों में अधिक सक्रिय होते हैं।

  49. अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन अवशिष्ट पर्वत श्रृंखला है, जो मूल रूप से अत्यंत पुरानी और अत्यधिक कायांतरित (ग्रेनाइट और नीस) चट्टानों से मिलकर बनी है।

  50. चट्टानें (Rocks) पृथ्वी के अतीत की खुली किताब की तरह हैं; अवसादी चट्टानों में दबे जीवाश्मों और परतों का अध्ययन करके वैज्ञानिक करोड़ों वर्ष पुरानी जलवायु और पृथ्वी पर जीवन के क्रमिक विकास का सटीक इतिहास लिखते हैं।

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