
मेंढक
1. विस्तृत प्रस्तावना: मेंढक (Frog) क्या है?
मेंढक एक ऐसा जंतु है जो जल और थल दोनों जगह आसानी से रह सकता है। इसलिए इसे जंतु जगत (Animal Kingdom) के ‘उभयचर वर्ग’ (Class Amphibia) में रखा गया है। भारत में पाई जाने वाली मेंढक की सबसे सामान्य प्रजाति ‘राना टिग्रिना’ (Rana tigrina) है, जिसे ‘इंडियन बुलफ्रॉग’ (Indian Bullfrog) भी कहा जाता है।
मेंढक की कुछ प्रमुख विशेषताएं:
असमतापी (Cold-blooded / Poikilotherm): मेंढक के शरीर का तापमान स्थिर नहीं रहता। यह वातावरण के तापमान के अनुसार बदलता रहता है।
छद्मावरण (Camouflage): दुश्मनों से बचने के लिए मेंढक अपने आसपास के वातावरण के अनुसार अपनी त्वचा का रंग बदल सकता है।
शीत निष्क्रियता और ग्रीष्म निष्क्रियता (Hibernation & Aestivation): अत्यधिक सर्दी और अत्यधिक गर्मी से बचने के लिए मेंढक मिट्टी के बहुत गहरे बिलों में छिप जाता है। सर्दियों में इसे ‘शीत निष्क्रियता’ (Winter sleep) और गर्मियों में इसे ‘ग्रीष्म निष्क्रियता’ (Summer sleep) कहते हैं। इस दौरान यह केवल अपनी त्वचा (Skin) से सांस लेता है।
2. बाह्य आकारिकी (Morphology – बाहरी बनावट)
मेंढक (Frog) का शरीर मुख्य रूप से दो भागों में बंटा होता है: सिर (Head) और धड़ (Trunk)। इनमें गर्दन (Neck) और पूँछ (Tail) का पूर्णतः अभाव होता है।
त्वचा (Skin): मेंढक (Frog) की त्वचा बहुत चिकनी, श्लेष्मी (Mucous) और हमेशा नम (Moist) रहती है। इसकी त्वचा पर कभी शल्क (Scales) नहीं होते। पीठ का रंग जैतूनी हरा (Olive green) और पेट का रंग हल्का पीला होता है।
आंखें (Eyes): इसकी आंखें उभरी हुई होती हैं। आंखों की रक्षा के लिए एक पारदर्शी झिल्ली होती है जिसे ‘निमेषक झिल्ली’ (Nictitating membrane) कहते हैं। यह झिल्ली पानी के अंदर आंखों को सुरक्षित रखती है और देखने में मदद करती है।
कान (Ear): मेंढक (Frog) में बाहर से दिखने वाले कान (Pinna) नहीं होते। आंखों के ठीक पीछे एक गोल पर्दा होता है जिसे ‘टिम्पैनम’ (Tympanum / कर्णपटह) कहते हैं, जो ध्वनि तरंगों को ग्रहण करता है।
पैर (Limbs):
अग्र पाद (Forelimbs – आगे के पैर): ये छोटे होते हैं और इनमें 4 उंगलियां होती हैं।
पश्च पाद (Hindlimbs – पीछे के पैर): ये लंबे और मजबूत होते हैं, जो छलांग लगाने में मदद करते हैं। इनमें 5 उंगलियां होती हैं और उंगलियों के बीच एक ‘झिल्ली’ (Web) होती है, जो तैरने (Swimming) में चप्पू की तरह काम करती है।
UPSC फैक्ट (लैंगिक द्विरूपता – Sexual Dimorphism): बाहर से देखकर नर (Male) और मादा (Female) मेंढक (Frog) को आसानी से पहचाना जा सकता है। नर मेंढक के गले में टरटराने के लिए ‘वाक कोश’ (Vocal sacs) होते हैं, और आगे के पैरों की पहली उंगली पर ‘मैथुनांग पैड’ (Copulatory pad) पाया जाता है, जो मादा में नहीं होता।



3. आंतरिक शरीर रचना (Anatomy of Frog)
मेंढक (Frog) के शरीर के अंदर सभी अंग तंत्र (पाचन, श्वसन, तंत्रिका आदि) पूरी तरह विकसित होते हैं, जो मानव शरीर रचना से काफी मिलते-जुलते हैं।
A. पाचन तंत्र (Digestive System)
मेंढक (Frog) एक मांसाहारी (Carnivore) जंतु है जो मुख्य रूप से कीड़े-मकोड़े खाता है। इसलिए इसकी आहारनाल (Alimentary canal) बहुत छोटी होती है (क्योंकि मांस जल्दी पचता है)।
इसका मुँह एक चौड़ी ग्रसनी (Pharynx) में खुलता है। इसकी जीभ (Tongue) आगे की तरफ जुड़ी होती है और पीछे से स्वतंत्र तथा द्विपालित (Bifid/दो सिरों वाली) होती है, जिसे यह झटके से बाहर निकालकर शिकार पकड़ता है।
भोजन आमाशय (Stomach) से पचकर छोटी आंत (Intestine) और फिर मलाशय (Rectum) में जाता है।
अंत में अपशिष्ट पदार्थ, मूत्र और जनन कोशिकाएं (शुक्राणु/अंडाणु) एक ही सामान्य छिद्र से बाहर निकलते हैं जिसे ‘अवस्कर’ (Cloaca) कहा जाता है।
यकृत (Liver) पित्त रस (Bile) बनाता है और अग्न्याशय (Pancreas) पाचक एंजाइम बनाता है।
B. श्वसन तंत्र (Respiratory System)
मेंढक (Frog) जल और थल दोनों जगह रहता है, इसलिए इसमें श्वसन के दो अलग-अलग तरीके होते हैं:
त्वचीय श्वसन (Cutaneous Respiration): जब मेंढक (Frog) पानी के अंदर होता है या शीत/ग्रीष्म निष्क्रियता (मिट्टी के अंदर) में होता है, तब वह केवल अपनी नम त्वचा (Skin) के माध्यम से ऑक्सीजन ग्रहण करता है।
फुफ्फुसीय श्वसन (Pulmonary Respiration): जब मेंढक जमीन पर होता है, तब वह फेफड़ों (Lungs) और मुख गुहा (Buccal cavity) द्वारा सांस लेता है। इसके फेफड़े गुलाबी रंग के और थैलीनुमा होते हैं।
C. परिसंचरण तंत्र (Circulatory System)
मेंढक (Frog) का परिसंचरण तंत्र बंद प्रकार (Closed type) का होता है।
हृदय (Heart): इसका हृदय 3-कक्षीय (3-Chambered) होता है। इसमें दो अलिंद (Auricles) और एक निलय (Ventricle) होता है।
अतिरिक्त संरचनाएं: हृदय के ऊपर एक तिकोनी संरचना होती है जिसे ‘शिरा कोटर’ (Sinus venosus) कहते हैं, जहाँ से अशुद्ध रक्त हृदय में आता है। हृदय के नीचे एक मोटी नली होती है जिसे ‘धमनी शंकु’ (Conus arteriosus) कहते हैं।
रक्त (Blood): इसके रक्त में प्लाज्मा और रक्त कणिकाएं होती हैं। UPSC फैक्ट: मानव के विपरीत, मेंढक की लाल रक्त कणिकाओं (RBCs) में ‘केंद्रक’ (Nucleus) पाया जाता है और इनका आकार अंडाकार (Oval) होता है।
पोर्टल सिस्टम: मेंढक (Frog)में यकृत निवाहिका तंत्र (Hepatic portal system – आंतों और यकृत के बीच) और वृक्क निवाहिका तंत्र (Renal portal system – निचले शरीर और किडनी के बीच) दोनों पूर्णतः विकसित होते हैं।
D. उत्सर्जन तंत्र (Excretory System)
उत्सर्जन के लिए मेंढक (Frog) में गहरे लाल रंग की दो ‘किडनी’ (Kidney / वृक्क) पाई जाती हैं।
ये ‘मीसोनेफ्रिक’ (Mesonephric) प्रकार की किडनी होती हैं।
किडनी से मूत्रवाहिनी निकलकर ‘अवस्कर’ (Cloaca) में खुलती है।
UPSC फैक्ट: मेंढक (Frog)यूरिया (Urea) का उत्सर्जन करता है, इसलिए इसे ‘यूरियोटेलिक’ (Ureotelic) जंतु कहा जाता है।
E. तंत्रिका तंत्र और संवेदी अंग (Nervous System & Senses)
इसका तंत्रिका तंत्र केंद्रीय (मस्तिष्क और स्पाइनल कॉर्ड), परिधीय और स्वायत्त तंत्रिका तंत्र में बंटा होता है।
मस्तिष्क (Brain) खोपड़ी (Cranium) के अंदर सुरक्षित रहता है। मस्तिष्क से 10 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएं (Cranial Nerves) निकलती हैं।
संवेदी अंग:
स्पर्श के लिए संवेदी पिपिला (Sensory papillae)।
स्वाद के लिए स्वाद कलिकाएं (Taste buds)।
सूंघने के लिए नासा उपकला (Olfactory epithelium)।
देखने के लिए आंखें।
सुनने के लिए टिम्पैनम (Tympanum)।
F. प्रजनन तंत्र (Reproductive System)
मेंढक (Frog) एकलिंगी (Dioecious) होते हैं, यानी नर और मादा अलग-अलग होते हैं।
नर मेंढक (Male Frog): इसमें एक जोड़ी पीले रंग के वृषण (Testes) होते हैं, जो किडनी के ऊपरी हिस्से से चिपके रहते हैं। शुक्राणु वृषण से निकलकर वासा एफरेंशिया द्वारा किडनी में जाते हैं और फिर मूत्रवाहिनी के रास्ते ‘अवस्कर’ (Cloaca) से बाहर निकलते हैं।
मादा मेंढक (Female Frog): इसमें किडनी के पास एक जोड़ी अंडाशय (Ovaries) होते हैं। मादा एक बार में 2500 से 3000 अंडे दे सकती है। मादा में मूत्रवाहिनी और अंडवाहिनी अलग-अलग ‘अवस्कर’ में खुलती हैं।
निषेचन (Fertilization): मेंढक (Frog) में ‘बाह्य निषेचन’ (External fertilization) होता है, जो पानी (Water) में होता है।
विकास (Development): अंडे से सीधा मेंढक (Frog) नहीं बनता। अंडे से मछली जैसा दिखने वाला एक लार्वा निकलता है, जिसे ‘टैडपोल’ (Tadpole) कहते हैं। टैडपोल ‘गिल्स’ (गलफड़ों) से सांस लेता है। बाद में कायांतरण (Metamorphosis) द्वारा यह वयस्क मेंढक में बदल जाता है। (कायांतरण के लिए थायरॉक्सिन हार्मोन बहुत आवश्यक है)।
4. मेंढक (Frog) और टोड (Toad) में अंतर
अक्सर लोग मेंढक (Frog) और टोड (Toad) को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन जीव विज्ञान में दोनों अलग हैं:
| आधार | मेंढक (Frog) | टोड (Toad) |
| त्वचा | चिकनी, नम और श्लेष्मी होती है। | खुरदरी (Rough), सूखी और मस्सेदार होती है। |
| आवास | मुख्य रूप से पानी या उसके बहुत करीब रहता है। | मुख्य रूप से जमीन पर (सूखी जगह) रहता है। |
| दांत | इसके ऊपरी जबड़े में दांत होते हैं। | टोड में दांत बिल्कुल नहीं होते। |
| पैर | पिछले पैर बहुत लंबे होते हैं (छलांग लगाने के लिए)। | पिछले पैर छोटे होते हैं (रेंगने/चलने के लिए)। |
| विष ग्रंथियां | अनुपस्थित (नहीं होती हैं)। | कान के पीछे विष ग्रंथियां (Parotoid glands) पाई जाती हैं। |
5. पारिस्थितिक महत्व (Ecological Importance)
खाद्य श्रृंखला (Food Chain): मेंढक (Frog) प्रकृति की खाद्य श्रृंखला का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़े-मकोड़ों (Pests) को खाता है, जिससे यह किसानों का मित्र है। दूसरी ओर, यह सांपों, पक्षियों और मछलियों का भोजन है।
पारिस्थितिक संतुलन: अगर मेंढकों की आबादी अचानक कम हो जाए, तो कीड़ों और मच्छरों की आबादी बेतहाशा बढ़ जाएगी, जिससे बीमारियां फैलेंगी।
भोजन के रूप में: चीन, जापान और कुछ दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में मेंढक के मांसल पिछले पैरों का उपयोग भोजन के रूप में किया जाता है।
6. निष्कर्ष (Conclusion)
राना टिग्रिना (Rana tigrina) केवल बरसात में टरटराने वाला एक जीव नहीं है, बल्कि यह विकासवाद (Evolution) की उस महत्वपूर्ण कड़ी का प्रतिनिधित्व करता है, जब जीवन ने पानी (मछली) से निकलकर पहली बार जमीन (स्थलीय जीवन) पर कदम रखा था। जल और थल दोनों जगह श्वसन करने की इसकी क्षमता, इसका बंद परिसंचरण तंत्र और टैडपोल लार्वा का कायांतरण जीव विज्ञान के छात्रों के लिए प्रकृति का सबसे बड़ा और जीवित प्रयोगशाला (Living Laboratory) है।
7. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)
प्रश्न 1: मेंढक (Frog) को ‘उभयचर’ (Amphibian) क्यों कहा जाता है? शीत निष्क्रियता (Hibernation) और ग्रीष्म निष्क्रियता (Aestivation) के दौरान मेंढक अपना जीवन कैसे व्यतीत करता है? (150 शब्द)
प्रश्न 2: मेंढक (Frog) की बाह्य आकारिकी (Morphology) का वर्णन करें। नर और मादा मेंढक को बाहर से देखकर कैसे पहचाना जा सकता है (लैंगिक द्विरूपता)? (150 शब्द)
प्रश्न 3: मेंढक के श्वसन तंत्र की विस्तृत व्याख्या करें। जल और थल पर होने वाले श्वसन (त्वचीय और फुफ्फुसीय) में क्या अंतर है? (200 शब्द)
प्रश्न 4: मानव के हृदय और रक्त की तुलना में मेंढक के हृदय (Heart) और लाल रक्त कणिकाओं (RBCs) में पाए जाने वाले मूलभूत अंतरों को स्पष्ट करें। (150 शब्द)
प्रश्न 5: मेंढक के प्रजनन तंत्र और जीवन चक्र का वर्णन करें। ‘टैडपोल’ लार्वा से वयस्क मेंढक बनने की प्रक्रिया (कायांतरण) में जल और थायरॉइड ग्रंथि की क्या भूमिका है? (250 शब्द)
8. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)
मेंढक जंतु जगत के ‘कॉर्डेटा’ संघ और ‘एम्फीबिया’ (Amphibia – उभयचर) वर्ग का प्राणी है।
भारत में पाई जाने वाली मेंढक की सबसे सामान्य प्रजाति का वैज्ञानिक नाम ‘राना टिग्रिना’ (Rana tigrina) है।
हाल ही में वैज्ञानिकों ने राना टिग्रिना का वैज्ञानिक नाम बदलकर ‘होपलोबैट्राकस टिगरिनस’ (Hoplobatrachus tigerinus) कर दिया है।
मेंढक असमतापी (Cold-blooded / Poikilotherm) जीव है, इसके शरीर का तापमान वातावरण के साथ बदलता रहता है।
सर्दियों में मिट्टी के नीचे छिपने को ‘शीत निष्क्रियता’ (Hibernation) और गर्मियों में छिपने को ‘ग्रीष्म निष्क्रियता’ (Aestivation) कहते हैं।
मेंढक की त्वचा (Skin) हमेशा श्लेष्मा के कारण नम (Moist) और चिकनी रहती है।
मेंढक की त्वचा पर कभी शल्क (Scales) नहीं पाए जाते हैं।
पानी के अंदर मेंढक की आंखों की रक्षा एक पारदर्शी झिल्ली करती है जिसे ‘निमेषक झिल्ली’ (Nictitating membrane) कहते हैं।
मेंढक में बाहरी कान (Pinna) नहीं होते; ध्वनि तरंगों को ग्रहण करने के लिए आंखों के पीछे ‘टिम्पैनम’ (Tympanum) होता है।
मेंढक के अग्र पाद (आगे के पैर) में 4 उंगलियां और पश्च पाद (पीछे के पैर) में 5 उंगलियां होती हैं।
तैरने के लिए मेंढक के पिछले पैरों की उंगलियों के बीच एक झिल्ली (Web) पाई जाती है।
नर मेंढक में टरटराने (आवाज निकालने) के लिए गले में ‘वाक कोश’ (Vocal sacs) पाए जाते हैं।
नर मेंढक के आगे के पैरों की पहली उंगली पर ‘मैथुनांग पैड’ (Copulatory pad) होता है, जो प्रजनन में मदद करता है (यह मादा में नहीं होता)।
मेंढक मांसाहारी होता है, इसलिए इसकी आहारनाल (Alimentary canal) मानव की तुलना में छोटी होती है।
मेंढक की जीभ आगे की तरफ से जुड़ी होती है और पीछे से स्वतंत्र तथा द्विपालित (दो सिरों वाली) होती है।
मेंढक के ऊपरी जबड़े (Upper jaw) में ही दांत होते हैं, निचले जबड़े में दांत नहीं होते।
पाचन के बाद अपशिष्ट पदार्थ, मूत्र और युग्मक (अंडे/शुक्राणु) एक ही छिद्र से बाहर निकलते हैं, जिसे ‘अवस्कर’ (Cloaca) कहते हैं।
पानी के अंदर और निष्क्रियता के समय मेंढक केवल अपनी ‘त्वचा’ (Cutaneous respiration) द्वारा सांस लेता है।
जमीन पर मेंढक फेफड़ों (Lungs) और मुख गुहा (Buccal cavity) दोनों से सांस ले सकता है।
मेंढक का हृदय 3-कक्षीय (3-Chambered) होता है, जिसमें दो अलिंद (Auricles) और एक निलय (Ventricle) होता है।
हृदय के ऊपर स्थित तिकोनी संरचना को ‘शिरा कोटर’ (Sinus venosus) कहते हैं, जहाँ पूरे शरीर का अशुद्ध रक्त आता है।
हृदय के निलय के नीचे स्थित मोटी नली को ‘धमनी शंकु’ (Conus arteriosus) कहा जाता है।
मानव के विपरीत, मेंढक की लाल रक्त कणिकाओं (RBCs) में ‘केंद्रक’ (Nucleus) पाया जाता है।
मेंढक की RBCs का आकार अंडाकार (Oval) होता है, जबकि मानव की RBCs उभयावतल (Biconcave) होती हैं।
मेंढक में आंत और यकृत के बीच ‘यकृत निवाहिका तंत्र’ (Hepatic portal system) पूर्ण रूप से विकसित होता है।
मेंढक में निचले शरीर और वृक्क (किडनी) के बीच ‘वृक्क निवाहिका तंत्र’ (Renal portal system) पाया जाता है।
मेंढक के उत्सर्जन तंत्र में दो गहरे लाल रंग की ‘मीसोनेफ्रिक’ (Mesonephric) किडनी पाई जाती हैं।
मेंढक मुख्य रूप से ‘यूरिया’ (Urea) का उत्सर्जन करता है, इसलिए इसे ‘यूरियोटेलिक’ (Ureotelic) जंतु कहते हैं।
मेंढक के मस्तिष्क (Brain) से 10 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएं (Cranial nerves) निकलती हैं। (मानव में 12 जोड़ी होती हैं)।
नर मेंढक में शुक्राणु वृषण से निकलकर 10-12 पतली नलिकाओं ‘वासा एफरेंशिया’ (Vasa efferentia) द्वारा किडनी में प्रवेश करते हैं।
मादा मेंढक में मूत्रवाहिनी (Ureter) और अंडवाहिनी (Oviduct) दोनों अलग-अलग ‘अवस्कर’ (Cloaca) में खुलती हैं।
मादा मेंढक एक बार में पानी में लगभग 2500 से 3000 अंडे देती है।
मेंढक में प्रजनन के लिए ‘बाह्य निषेचन’ (External fertilization) होता है, जो हमेशा पानी में ही होता है।
अंडे से निकलने वाले लार्वा को ‘टैडपोल’ (Tadpole) कहा जाता है।
टैडपोल लार्वा पूरी तरह से जलीय (Aquatic) होता है और यह मछलियों की तरह ‘गिल्स’ (गलफड़ों) से सांस लेता है।
टैडपोल का वयस्क मेंढक में बदलना ‘कायांतरण’ (Metamorphosis) कहलाता है।
कायांतरण (Metamorphosis) के लिए पानी में ‘आयोडीन’ की उपस्थिति और मेंढक की ‘थायरॉइड ग्रंथि’ (Thyroxine हार्मोन) का होना अनिवार्य है।
यदि पानी में आयोडीन की कमी हो, तो टैडपोल कभी वयस्क मेंढक नहीं बन पाएगा और टैडपोल ही रह जाएगा।
टैडपोल शाकाहारी (Herbivorous) होता है, जबकि वयस्क मेंढक मांसाहारी (Carnivorous) होता है।
टैडपोल अमोनिया (Ammonia) का उत्सर्जन करता है, जबकि वयस्क मेंढक यूरिया (Urea) का उत्सर्जन करता है।
‘टोड’ (Toad) की त्वचा खुरदरी और सूखी होती है, जबकि मेंढक की त्वचा चिकनी और नम होती है।
टोड (Toad) के जबड़े में दांत बिल्कुल नहीं पाए जाते।
टोड (Toad) के कान के ठीक पीछे एक विशेष ‘विष ग्रंथि’ (Parotoid gland) पाई जाती है, जो मेंढक में नहीं होती।
मेंढक कभी पानी नहीं पीता; वह अपनी त्वचा के माध्यम से ही पानी को अवशोषित (Absorb) कर लेता है।
मेंढक के गर्दन न होने के कारण यह अपने सिर को दाएं-बाएं नहीं घुमा सकता।
मेंढक पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) में द्वितीयक उपभोक्ता (Secondary consumer) की श्रेणी में आता है।
किसानों के लिए मेंढक मित्र है क्योंकि यह फसलों को नष्ट करने वाले कीटों और टिड्डियों (Insects/Pests) को खाता है।
मेंढक के खून (Blood) में भी प्लाज्मा, RBC, WBC और प्लेटलेट्स पाए जाते हैं।
मेंढक में पसलियों (Ribs) का पूर्णतः अभाव होता है।
भारतीय वन जीव संरक्षण अधिनियम के तहत मेंढकों को मारना या व्यापार करना प्रतिबंधित है क्योंकि ये पारिस्थितिक संतुलन के लिए आवश्यक हैं।