
धोलावीरा का इतिहास (History of Dholavira): सिंधु घाटी सभ्यता का अद्वितीय और सर्वोत्कृष्ट नगर
1. विस्तृत प्रस्तावना: धोलावीरा का इतिहास और इसका महत्व
सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) के महान नगरों—हड़प्पा और मोहनजोदड़ो—के बाद जब भी किसी ऐसे नगर की बात होती है जिसने अपने समय की इंजीनियरिंग और वास्तुकला की तमाम हदों को पार कर दिया था, तो सबसे पहला नाम धोलावीरा (Dholavira) का आता है। यह नगर केवल ईंटों का एक ढांचा नहीं था, बल्कि यह प्रकृति की सबसे कठोर परिस्थितियों (कच्छ के रेगिस्तान) में मानव के संघर्ष और विजय की कहानी है।
धोलावीरा का इतिहास हमें यह बताता है कि कैसे एक समाज ने बिना किसी आधुनिक मशीनरी के बारिश की एक-एक बूंद को सहेजा, पत्थरों को तराशा और एक ऐसा त्रि-स्तरीय (Three-tier) शहर बसाया जो अपने समय में एक अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र (International Trade Hub) था। राखीगढ़ी (हरियाणा) के बाद यह भारत में स्थित हड़प्पा सभ्यता का दूसरा सबसे बड़ा स्थल है (लगभग 100 हेक्टेयर में फैला हुआ)। जुलाई 2021 में, इसके उत्कृष्ट जल-संरक्षण मॉडल को देखते हुए यूनेस्को (UNESCO) ने इसे भारत का 40वां ‘विश्व धरोहर स्थल’ (World Heritage Site) घोषित किया है।
2. भौगोलिक अवस्थिति, सामरिक महत्व और खोज का सफर
धोलावीरा का इतिहास और इसकी सफलता का सबसे बड़ा रहस्य इसकी भौगोलिक स्थिति में छिपा है।
A. भौगोलिक स्थिति (Geographical Location)
स्थान: यह प्राचीन नगर वर्तमान में गुजरात राज्य के ‘कच्छ जिले’ के भचाऊ (Bhachau) तालुका में स्थित है।
खादिर बेट (Khadir Bet): यह कच्छ के रण (Great Rann of Kutch) के बीचों-बीच स्थित ‘खादिर बेट’ नामक एक द्वीप (Island) पर बसा हुआ है।
नदियां: मोहनजोदड़ो की तरह यहाँ कोई बारहमासी बड़ी नदी नहीं थी। यह शहर दो बरसाती (मौसमी) नदियों के बीच बसा था—उत्तर दिशा में मनसर (Mansar) और दक्षिण दिशा में मनहर (Manhar) नदी।
B. सामरिक महत्व (Strategic Importance)
इतनी बंजर जगह पर शहर क्यों बसाया गया? पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार, 4500 साल पहले कच्छ का रण कोई सूखा रेगिस्तान नहीं था, बल्कि यह समुद्र का एक उथला हिस्सा (Navigable sea) था। धोलावीरा एक प्रमुख ‘व्यापारिक बंदरगाह’ था जो सिंध (पाकिस्तान) के मुख्य शहरों को सौराष्ट्र और ओमान (Oman/Magan) के समुद्री मार्गों से जोड़ता था।
C. खोज और उत्खनन (Discovery & Excavation)
इस स्थल की खोज सबसे पहले वर्ष 1967-68 में जे.पी. जोशी (Jagat Pati Joshi) द्वारा की गई थी।
लेकिन, धोलावीरा का इतिहास अपने पूरे पुरातात्विक गौरव के साथ तब सामने आया, जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व महानिदेशक डॉ. आर.एस. बिष्ट (R.S. Bisht) के नेतृत्व में 1990 से लेकर 2005 तक यहाँ व्यापक उत्खनन कार्य किया गया।
3. अद्वितीय त्रि-स्तरीय नगर नियोजन (Tripartite Town Planning)
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सहित लगभग सभी बड़े नगर मुख्य रूप से दो हिस्सों में बंटे थे (दुर्ग और निचला नगर)। लेकिन धोलावीरा का इतिहास इसकी सबसे अनोखी स्थापत्य विशेषता के लिए जाना जाता है—यहाँ का नगर तीन अलग-अलग भागों (Tripartite Division) में विभाजित था, जो एक-दूसरे से जुड़े हुए भी थे और अलग-अलग रक्षा दीवारों से घिरे भी थे।
I. दुर्ग (The Citadel / Acropolis)
यह शहर का सबसे सुरक्षित, सबसे भव्य और सबसे ऊंचा हिस्सा था। यह शासकों (Rulers) और प्रशासकों के रहने का स्थान था। धोलावीरा के दुर्ग को भी दो हिस्सों में बांटा गया था:
कैसल (Castle): जहाँ शासक का मुख्य निवास और प्रशासनिक भवन था। इसकी दीवारें 15 से 18 मीटर मोटी थीं!
बेली (Bailey): यह कैसल के ठीक बगल में स्थित था जहाँ उच्च अधिकारी रहते थे। पूरे दुर्ग को एक दोहरे (Double) मजबूत रक्षा प्राचीर से घेरा गया था, जिसमें भव्य प्रवेश द्वार (Gateways) बने थे।
II. मध्यम नगर (The Middle Town)
यह विशेषता पूरी सिंधु सभ्यता में केवल और केवल धोलावीरा में पाई गई है।
यह दुर्ग के उत्तर में स्थित था और इसकी भी अपनी एक अलग किलेबंदी (Fortification wall) थी।
इस नगर में शासक के करीबी रिश्तेदार, अमीर व्यापारी और कुलीन वर्ग के लोग रहते थे।
यहाँ के घरों का आकार बहुत बड़ा था और सड़कें पूरी तरह से चौड़ी और ग्रिड (Grid) पैटर्न पर बनी थीं।
III. निचला नगर (The Lower Town)
यह शहर का सबसे बड़ा लेकिन बिना किलेबंदी वाला क्षेत्र था।
यहाँ आम जनता, किसान, कारीगर, शिल्पी और मजदूर वर्ग रहता था। हालांकि यह निचला नगर था, फिर भी यहाँ की सड़कें और घर व्यवस्थित ढंग से बनाए गए थे।
निर्माण सामग्री (Construction Material): हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में जहाँ पकी हुई ईंटों का वर्चस्व था, वहीं धोलावीरा में ईंटों का प्रयोग बहुत कम हुआ है। यहाँ के घरों, दीवारों और जलाशयों के निर्माण में सफेद और लाल बलुआ पत्थरों (Sandstone) का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया है।
4. विश्व की सबसे प्राचीन और उन्नत जल प्रबंधन प्रणाली (Water Management System)
धोलावीरा का इतिहास जिस एक चीज के लिए आधुनिक विश्व के लिए एक केस स्टडी (Case Study) बना हुआ है, वह है इनकी जल-संरक्षण (Water Conservation) और हार्वेस्टिंग तकनीक। कच्छ के रण में मीठे पानी की भयंकर कमी थी और बारिश बहुत कम होती थी। ऐसे में धोलावीरा के लोगों ने प्रकृति को चुनौती देते हुए इंजीनियरिंग का अद्भुत कारनामा किया।
A. नदियों पर बांध और नहरें (Dams and Canals)
धोलावीरा के इंजीनियरों ने शहर के उत्तर में बहने वाली ‘मनसर’ और दक्षिण में बहने वाली ‘मनहर’ नदी के मार्ग में पत्थर के बड़े-बड़े बांध (Check Dams) बनाए। इन बांधों से नहरें (Canals) निकालकर पानी को शहर के अंदर लाया गया।
B. विशाल रॉक-कट जलाशय (Rock-cut Reservoirs)
बारिश और नदी के पानी को जमा करने के लिए शहर की बाहरी दीवारों के भीतर पत्थरों को काटकर (Rock-cut) 16 विशाल जल-कुंड (Reservoirs) बनाए गए थे।
ये 16 कुंड शहर को एक ‘हार’ (Necklace) की तरह घेरे हुए थे।
सबसे बड़े जलाशय (पूर्वी जलाशय) का आकार लगभग 73.4 मीटर लंबा, 29.3 मीटर चौड़ा और 10 मीटर गहरा है। इसमें उतरने के लिए पत्थरों की शानदार सीढ़ियां बनी हुई थीं। (यह मोहनजोदड़ो के ‘विशाल स्नानागार’ से कई गुना बड़ा था)।
यह जल प्रणाली दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे कुशल ‘वर्षा जल संचयन प्रणाली’ (Rainwater Harvesting System) मानी जाती है।
C. जल शुद्धिकरण प्रणाली (Water Purification System)
इन जलाशयों में पानी सीधे नहीं जाता था। पानी पहले एक ‘गाद निस्तारण कक्ष’ (Desilting Chamber) में गिरता था, जहाँ पानी की सारी मिट्टी और कचरा नीचे बैठ जाता था, और उसके बाद साफ पानी मुख्य कुंड में जाता था।
5. धोलावीरा की प्रमुख पुरातात्विक खोजें (Major Archaeological Findings)
उत्खनन के दौरान कई ऐसी चीजें मिली हैं जिन्होंने धोलावीरा का इतिहास और इसकी रहस्यमयी संस्कृति पर नई रोशनी डाली है:
I. धोलावीरा का महान ‘साइनबोर्ड’ (The Great Signboard)
दुर्ग (Citadel) के उत्तरी प्रवेश द्वार के पास जमीन पर एक बहुत बड़ा तख्ता (Board) गिरा हुआ मिला, जिस पर हड़प्पा लिपि के 10 बहुत बड़े अक्षर (Signs) उकेरे गए थे।
यह अक्षर सफेद जिप्सम (Gypsum) के पत्थरों को बारीक तराश कर बनाए गए थे और उन्हें एक बड़े लकड़ी के तख्ते पर जड़ा गया था (लकड़ी समय के साथ नष्ट हो गई)।
प्रत्येक अक्षर की ऊंचाई लगभग 37 सेंटीमीटर है।
पुरातत्वविदों ने इसे दुनिया का सबसे पुराना ‘साइनबोर्ड’ या सूचना पट्ट (Information Board) नाम दिया है।
यह साइनबोर्ड संभवतः शहर का नाम, शासक का आदेश, या कोई भव्य स्वागत संदेश था (हालांकि इसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है)। यह दर्शाता है कि हड़प्पावासी केवल छोटी मुहरों पर नहीं, बल्कि बड़े अक्षरों में भी लिखते थे और उनकी साक्षरता दर (Literacy rate) अच्छी थी।
II. विश्व का प्रथम स्टेडियम (The Multipurpose Stadium)
दुर्ग (Citadel) और मध्यम नगर (Middle Town) के बीच में एक बहुत बड़ा और खुला मैदान (लगभग 283 मीटर लंबा और 47 मीटर चौड़ा) मिला है।
इसके चारों ओर दर्शकों के बैठने के लिए पत्थरों की सीढ़ियां (Terraced stands) बनी हुई थीं।
इतिहासकारों का मानना है कि यह दुनिया का पहला बहुउद्देशीय खेल का मैदान (Stadium), बाजार या सार्वजनिक समारोहों (Festivals) का स्थल था।
III. प्रतीकात्मक शवाधान (Symbolic Burials – The Cenotaphs)
धोलावीरा के पश्चिम में एक बड़ा कब्रिस्तान मिला है जहाँ गुंबद के आकार की संरचनाएं (Hemispherical structures – जैसे बौद्ध स्तूप होते हैं) प्राप्त हुई हैं।
हैरानी की बात यह है कि इन कब्रों के अंदर मिट्टी के बर्तन, गहने और राख तो मिली, लेकिन मानव कंकाल (Skeletons) बहुत कम या बिल्कुल नहीं मिले।
इसे ‘प्रतीकात्मक शवाधान’ (Symbolic burial) कहा जाता है। यानी, अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु शहर से बाहर या युद्ध में हो जाती थी, तो उसकी याद में बिना शव के कब्र बना दी जाती थी।
IV. पत्थर काटने और पॉलिश करने की कला (Stone Masonry)
धोलावीरा के कारीगरों को पत्थरों पर अद्भुत पॉलिश (Stone Polishing) करने की कला आती थी। यहाँ से प्राप्त पत्थर के स्तंभों के अवशेषों (Pillar elements) पर शीशे जैसी चमक (Mirror-like polish) देखने को मिलती है, जो मौर्य काल के स्तंभों की याद दिलाती है।
6. अर्थव्यवस्था, व्यापार और उद्योग (Economy and Trade)
शंख और सीप उद्योग (Shell Industry): खादिर बेट समुद्र के बहुत करीब था। यहाँ के कारीगर सीप (Shells) से चूड़ियां, मनके (Beads), और पच्चीकारी का सामान बनाने में सिद्धहस्त थे।
गोमेद पत्थर (Agate): यहाँ से बड़ी मात्रा में अर्द्ध-कीमती पत्थरों (Agate, Lapis Lazuli) को तराशने के कारखाने मिले हैं।
विदेशी व्यापार: यहाँ से ओमान (Oman – जिसे हड़प्पाई लोग ‘मगन’ कहते थे) की सीसे/तांबे की वस्तुएं और मेसोपोटामिया की शैली के कुछ अवशेष मिले हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि धोलावीरा एक समृद्ध बंदरगाह और व्यापारिक हब था।
7. धोलावीरा के 7 सांस्कृतिक चरण और पतन (7 Stages and Decline of Dholavira)
आर.एस. बिष्ट ने धोलावीरा का इतिहास केवल एक कालखंड में नहीं, बल्कि इसके क्रमिक विकास और पतन के 7 सांस्कृतिक चरणों (7 Cultural Stages) में विभाजित किया है:
चरण I से III (विकास काल): शहर बसना शुरू हुआ, पहली किलेबंदी हुई, और मध्यम नगर का निर्माण हुआ।
चरण IV और V (स्वर्ण युग): यह धोलावीरा का चरम (Peak) था। इस समय शहर अपनी सबसे बेहतरीन अवस्था में था, साइनबोर्ड बना, और व्यापार जोरों पर था।
चरण VI और VII (पतन का काल – Late Harappan): 2000 ईसा पूर्व के बाद शहर का पतन शुरू हो गया। भव्य पत्थर के मकानों की जगह गोल झुग्गी-झोपड़ियां (Circular huts) बनने लगीं। जल प्रणाली टूट-फूट गई। इसे ‘झुकर संस्कृति’ (Jhukar culture) का प्रभाव माना जाता है।
पतन के मुख्य कारण (Reasons for Decline):
विवर्तनिक हलचल (Tectonic shifts): गुजरात का कच्छ क्षेत्र आज भी तीव्र भूकंपों (Earthquakes) का केंद्र है। भयंकर भूकंपों के कारण नदियों (सरस्वती नदी तंत्र) ने अपना मार्ग बदल लिया।
जल संकट और सूखा: समुद्र का स्तर पीछे खिसक गया और कच्छ का नौगम्य (Navigable) क्षेत्र सूखकर दलदल और नमक के रेगिस्तान में बदल गया। नदियां सूखने से उनके विशाल जलाशय खाली हो गए।
समुद्री व्यापार का अंत: पानी और व्यापार दोनों के खत्म होने के कारण लोगों ने शहर को हमेशा के लिए छोड़ दिया और सौराष्ट्र तथा गुजरात के अन्य हिस्सों की ओर पलायन कर गए।
8. निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में कहा जाए तो, धोलावीरा का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता का ‘क्राउन ज्वेल’ (Crown Jewel / मुकुट का रत्न) है। यह नगर इस बात का जीता-जागता सबूत है कि अगर इंसान के पास इच्छाशक्ति और वैज्ञानिक ज्ञान हो, तो वह बंजर रेगिस्तान में भी 16 विशाल झीलों का निर्माण कर सकता है। सफेद पत्थरों से बना यह त्रि-स्तरीय शहर, 10 अक्षरों वाला रहस्यमयी साइनबोर्ड और दुनिया का पहला स्टेडियम—ये सब मिलकर धोलावीरा को प्राचीन विश्व के सबसे उन्नत नगरों में सबसे ऊपर खड़ा करते हैं।
9. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)
प्रश्न 1: धोलावीरा का इतिहास और उसकी भौगोलिक स्थिति का विस्तार से वर्णन करें। कच्छ के रण की कठोर परिस्थितियों में इस नगर को क्यों बसाया गया था? (150 शब्द)
प्रश्न 2: सिंधु घाटी सभ्यता के अन्य नगरों (जैसे हड़प्पा/मोहनजोदड़ो) की तुलना में धोलावीरा का ‘त्रि-स्तरीय नगर नियोजन’ (Tripartite Town Planning) किस प्रकार भिन्न और अद्वितीय था? दुर्ग, मध्यम नगर और निचले नगर की विशेषताओं का विश्लेषण करें। (250 शब्द)
प्रश्न 3: “धोलावीरा की जल प्रबंधन प्रणाली (Water Management System) प्राचीन विश्व की इंजीनियरिंग का एक अद्भुत अजूबा है।” नदियों पर बांध, रॉक-कट जलाशयों और गाद-निस्तारण प्रणाली के संदर्भ में इस कथन की विस्तृत व्याख्या कीजिए। (250 शब्द)
प्रश्न 4: धोलावीरा से प्राप्त ‘साइनबोर्ड’ (The Great Signboard) और ‘स्टेडियम’ (Stadium) के साक्ष्य तत्कालीन समाज की प्रशासनिक, साक्षरता और सांस्कृतिक व्यवस्था के बारे में क्या महत्वपूर्ण संकेत देते हैं? (200 शब्द)
प्रश्न 5: डॉ. आर.एस. बिष्ट द्वारा बताए गए धोलावीरा के 7 सांस्कृतिक चरणों (7 Cultural Stages) के आधार पर इस नगर के क्रमिक विकास और विवर्तनिक/जलवायु परिवर्तनों के कारण हुए अंतिम पतन (Decline) का मूल्यांकन करें। (200 शब्द)
10. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)
धोलावीरा गुजरात राज्य के कच्छ जिले (भचाऊ तालुका) में ‘कच्छ के रण’ में स्थित है।
यह प्राचीन नगर ‘खादिर बेट’ (Khadir Bet) नामक एक द्वीप (Island) पर बसा हुआ था।
धोलावीरा का इतिहास दो मौसमी नदियों—उत्तर में ‘मनसर’ (Mansar) और दक्षिण में ‘मनहर’ (Manhar) के बीच विकसित हुआ।
धोलावीरा की खोज सबसे पहले वर्ष 1967-68 में भारतीय पुरातत्वविद् ‘जे.पी. जोशी’ (Jagat Pati Joshi) ने की थी।
इस स्थल का व्यापक और विस्तृत उत्खनन 1990 से 2005 के बीच ‘डॉ. आर.एस. बिष्ट’ (R.S. Bisht) के नेतृत्व में किया गया।
भारत में स्थित हड़प्पा सभ्यता के स्थलों में राखीगढ़ी (हरियाणा) के बाद धोलावीरा दूसरा सबसे बड़ा नगर (Second Largest in India) है।
जुलाई 2021 में, यूनेस्को (UNESCO) ने धोलावीरा को भारत का 40वां ‘विश्व धरोहर स्थल’ (World Heritage Site) घोषित किया।
यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल होने वाला धोलावीरा प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता का भारत में पहला (First in India) स्थल है।
हड़प्पा के अन्य नगर दो भागों में बंटे थे, लेकिन धोलावीरा एकमात्र ऐसा शहर था जो ‘तीन भागों’ (Tripartite division) में बंटा था।
- धोलावीरा के तीन मुख्य भाग थे: दुर्ग (Citadel), मध्यम नगर (Middle Town) और निचला नगर (Lower Town)।
कांसे के बने हुए पशुओं के छोटे-छोटे खिलौने और तांबे गलाने की भट्टियां धोलावीरा की खुदाई से प्राप्त हुई हैं।
धोलावीरा के पत्थरों पर ‘पॉलिश’ (Stone Polishing) करने की एक विशेष कला देखने को मिलती है, जो मौर्य काल के पॉलिश किए गए स्तंभों के समान चमकती है।
इस नगर का व्यापार मेसोपोटामिया (Mesopotamia) के साथ-साथ ओमान (Magan) क्षेत्र से भी बहुत बड़े स्तर पर समुद्री मार्ग द्वारा होता था।
धोलावीरा के निवासी सीप (Shell) से आभूषण, चूड़ियां और पच्चीकारी का सामान बनाने में अत्यंत निपुण थे।
यहाँ से बड़ी मात्रा में गोमेद (Agate) और लाजवर्द मणि (Lapis Lazuli) को तराशने के कारखाने मिले हैं।
डॉ. आर.एस. बिष्ट ने धोलावीरा के क्रमिक विकास और पतन को ‘7 सांस्कृतिक चरणों’ (7 Cultural Stages) में विभाजित किया है।
कुछ भूवैज्ञानिकों का मानना है कि धोलावीरा की अत्यंत मोटी बाहरी दीवारों का निर्माण शायद ‘सुनामी’ (Tsunami) जैसी समुद्री आपदाओं से बचने के लिए किया गया था।
भूकंपों (Earthquakes) के कारण बार-बार हुए विनाश और पुनर्निर्माण के साक्ष्य धोलावीरा का इतिहास स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
इस शहर में प्रवेश के लिए बहुत ही भव्य और विस्तृत ‘प्रवेश द्वार’ (Gateways) बनाए गए थे, जिनमें सुरक्षा कक्ष (Guard rooms) भी थे।
धोलावीरा से एक विशेष प्रकार का ‘छेद वाला पत्थर’ (Ring stone) मिला है, जिसका उपयोग खंभों को सहारा देने के लिए किया जाता था।
हड़प्पा सभ्यता के पतन के अंतिम चरण (Late Harappan Phase) के सबसे स्पष्ट प्रमाण धोलावीरा से ही प्राप्त हुए हैं।
पतन के अंतिम चरण (चरण VI और VII) में यहाँ के लोगों ने भव्य पत्थरों का उपयोग छोड़कर ‘गोलाकार झोपड़ियां’ (Circular huts) बनानी शुरू कर दी थीं।
इन गोलाकार झोपड़ियों के चरण को ‘झुकर संस्कृति’ (Jhukar culture) का प्रभाव माना जाता है।
तीव्र जल संकट, नदियों के सूखने और विवर्तनिक हलचलों के कारण धोलावीरा का पतन लगभग 2000 ईसा पूर्व (2000 BCE) के आसपास शुरू हो गया था।
स्थानीय भाषा (गुजराती) में धोलावीरा के इस ऐतिहासिक टीले को ‘कोटड़ा टिम्बा’ (Kotada Timba) कहा जाता है।
‘धोलावीरा’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘सफेद कुआं’ (Dhol = सफेद, Vira = कुआं), जो यहाँ मिले मीठे पानी के कुएं के नाम पर पड़ा है।
यहाँ की किलेबंदी (Fortification) में वर्गाकार (Square) और आयताकार (Rectangular) बुर्जों (Bastions) का भारी प्रयोग किया गया था।
धोलावीरा से प्राप्त मुहरें (Seals) बिना किसी लेख के भी मिली हैं, जो केवल व्यापारिक चिह्नों (Trade marks) का कार्य करती थीं।
‘कालीबंगा’ की तरह, धोलावीरा से भी भूकंप (Earthquake) के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
यहाँ से सोने, चांदी और सुलेमानी (Agate) पत्थर से बने बेहद सूक्ष्म (Micro-beads) मनके मिले हैं, जिनके छेद अत्यंत बारीक हैं।
धोलावीरा का कुल जल-भंडारण क्षेत्र (Water storage area) पूरे शहर के क्षेत्रफल का लगभग 10% (दसवां हिस्सा) था।
बारिश के पानी को छतों से नीचे जलाशयों तक लाने के लिए पत्थरों को काटकर ‘परनाले’ (Spouts/Water chutes) बनाए गए थे।
ओमान के साथ इनके सीधे व्यापारिक संबंधों की पुष्टि इस बात से होती है कि ओमान में भी धोलावीरा जैसी ही विशिष्ट प्रकार की ईंटें और मिट्टी के बर्तन मिले हैं।
धोलावीरा का इतिहास हमें बताता है कि यह शहर लगभग 1500 वर्षों (3000 ई.पू. से 1500 ई.पू.) तक लगातार आबाद (Inhabited) रहा।
आज भी गुजरात के पर्यटन विभाग द्वारा धोलावीरा में हर साल कच्छ के रण उत्सव के दौरान पर्यटकों के लिए विशेष व्यवस्था की जाती है।
धोलावीरा में ‘मध्यम नगर’ (Middle Town) की उपस्थिति इसकी सबसे विशिष्ट और अनोखी स्थापत्य विशेषता है।
यहाँ इमारतों के निर्माण में पकी ईंटों के बजाय मुख्य रूप से ‘सफेद और लाल बलुआ पत्थरों’ (Sandstone) का भारी मात्रा में उपयोग किया गया था।
पत्थरों को काटकर (Rock-cut architecture) बनाए गए कुएं और विशाल जलाशय धोलावीरा की वैश्विक पहचान हैं।
धोलावीरा पूरी दुनिया में अपनी ‘विश्व की सबसे प्राचीन और उन्नत जल प्रबंधन प्रणाली’ (Water Management System) के लिए जाना जाता है।
बारिश के पानी को संरक्षित करने के लिए यहाँ ‘रेन वाटर हार्वेस्टिंग’ (Rainwater Harvesting) तकनीक का प्रयोग किया गया था।
धोलावीरा के उत्खनन से कुल 16 छोटे-बड़े कृत्रिम ‘जलाशयों’ (Reservoirs) के प्रमाण मिले हैं, जो शहर को एक हार की तरह घेरे हुए थे।
नदियों के पानी को शहर के जलाशयों में लाने के लिए धोलावीरा के इंजीनियरों ने नदियों पर पत्थर के ‘बांध’ (Check Dams) बनाए थे।
जल को शुद्ध करने के लिए जलाशयों से पहले ‘गाद निस्तारण कक्ष’ (Desilting chambers) बनाए गए थे ताकि पानी की गंदगी नीचे बैठ जाए।
हड़प्पा लिपि के ’10 बड़े अक्षरों’ वाला दुनिया का सबसे पुराना ‘साइनबोर्ड’ (Signboard/सूचना पट्ट) धोलावीरा से ही मिला है।
इस साइनबोर्ड के अक्षर सफेद ‘जिप्सम’ (Gypsum) को काटकर बनाए गए थे, जिनकी ऊंचाई लगभग 37 सेमी है।
दुर्ग और मध्यम नगर के बीच एक विशाल खुला मैदान मिला है, जिसे विश्व का ‘सबसे प्राचीन स्टेडियम’ (Stadium / Ceremonial Ground) माना जाता है।
स्टेडियम के चारों ओर दर्शकों के बैठने के लिए पत्थरों की सीढ़ियां (Stands) बनी हुई थीं।
धोलावीरा से ‘नेवले’ (Mongoose) की पत्थर की बनी हुई एक खूबसूरत मूर्ति प्राप्त हुई है।
यहाँ से ‘प्रतीकात्मक शवाधान’ (Symbolic Burials – Cenotaphs) के प्रमाण मिले हैं, जिनमें कब्र के अंदर मानव कंकाल (Skeleton) नहीं हैं।
धोलावीरा के कब्रिस्तानों में बौद्ध स्तूपों (Stupas) जैसी अर्ध-गोलाकार (Hemispherical) संरचनाएं प्राप्त हुई हैं।