
मानव जनन
1. विस्तृत प्रस्तावना: मानव जनन क्या है?
प्रजनन (Reproduction) वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव अपने ही समान नई संतति (Offspring) को जन्म देते हैं, ताकि पृथ्वी पर उनकी प्रजाति का अस्तित्व बना रहे।
मानव जनन के बारे में दो सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्य यह हैं कि मनुष्य ‘लैंगिक रूप से जनन’ (Sexually reproducing) करने वाला प्राणी है और यह ‘जरायुज’ (Viviparous) है (अर्थात मनुष्य अंडे नहीं देता, बल्कि सीधे शिशु को जन्म देता है)।
मानव जनन की पूरी प्रक्रिया को मुख्य रूप से निम्नलिखित चरणों में बांटा जाता है:
युग्मकजनन (Gametogenesis): नर में शुक्राणु (Sperm) और मादा में अंडाणु (Ovum) का निर्माण।
वीर्यसेचन (Insemination): शुक्राणुओं का मादा के जनन पथ में प्रवेश।
निषेचन (Fertilization): शुक्राणु और अंडाणु का संलयन होकर युग्मनज (Zygote) बनना।
आरोपण (Implantation): भ्रूण का गर्भाशय की दीवार से जुड़ना।
सगर्भता (Gestation): भ्रूण का विकास (9 महीने)।
प्रसव (Parturition): विकसित शिशु का जन्म।
आइए, नर और मादा जनन तंत्र का गहराई से विश्लेषण करें।
2. नर जनन तंत्र (Male Reproductive System)
नर जनन तंत्र श्रोणि क्षेत्र (Pelvic region) में स्थित होता है। इसका मुख्य कार्य शुक्राणुओं (Sperms) का निर्माण करना और उन्हें मादा के जनन पथ तक पहुँचाना है। इसके प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं:
A. वृषण (Testes)
वृषण नर के प्राथमिक जनन अंग हैं। ये एक जोड़े के रूप में होते हैं और उदर गुहा के बाहर एक थैली में स्थित होते हैं जिसे वृषणकोष (Scrotum) कहते हैं।
वैज्ञानिक कारण: वृषणकोष का तापमान शरीर के सामान्य तापमान से 2 से 2.5°C कम होता है। यह कम तापमान शुक्राणुओं के निर्माण (Spermatogenesis) के लिए अत्यंत आवश्यक है।
वृषण के अंदर ‘शुक्रजनक नलिकाएं’ (Seminiferous tubules) होती हैं, जहाँ शुक्राणु बनते हैं। वृषण में मौजूद लेडिग कोशिकाएं (Leydig cells) नर हार्मोन ‘टेस्टोस्टेरोन’ (Testosterone) का स्राव करती हैं।
B. सहायक नलिकाएं (Accessory Ducts)
इनमें वृषण जालिकाएं (Rete testis), शुक्रवाहिकाएं (Vasa efferentia), अधिवृषण (Epididymis) और शुक्रवाहिनी (Vas deferens) शामिल हैं। अधिवृषण में शुक्राणु अस्थायी रूप से जमा होते हैं और परिपक्वता (Maturation) प्राप्त करते हैं।
C. सहायक ग्रंथियां (Accessory Glands)
शुक्राशय (Seminal Vesicles): ये वीर्य (Semen) का लगभग 60-70% तरल भाग बनाते हैं, जिसमें फ्रुक्टोज (Fructose) होता है जो शुक्राणुओं को ऊर्जा देता है।
पुरस्थ ग्रंथि (Prostate Gland): यह वीर्य को सफेद रंग और विशेष गंध प्रदान करती है तथा शुक्राणुओं की गतिशीलता बढ़ाती है।
बल्बोयूरेथ्रल ग्रंथि (Cowper’s Gland): यह संभोग से पहले मूत्रमार्ग को क्षारीय और चिकना बनाती है।
3. मादा जनन तंत्र (Female Reproductive System)
मादा जनन तंत्र का कार्य केवल अंडाणु बनाना ही नहीं है, बल्कि निषेचन, गर्भावस्था और शिशु के जन्म के लिए सुरक्षित वातावरण प्रदान करना भी है।
A. अंडाशय (Ovaries)
ये मादा के प्राथमिक जनन अंग हैं (एक जोड़ा)।
इनका कार्य अंडाणु (Ovum) का निर्माण करना और मादा हार्मोन एस्ट्रोजन (Estrogen) तथा प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) का स्राव करना है।
B. डिंबवाहिनी या फैलोपियन ट्यूब (Fallopian Tubes)
यह अंडाशय से गर्भाशय तक जाती है।
NEET/UPSC फैक्ट: निषेचन (Fertilization) की वास्तविक प्रक्रिया फैलोपियन ट्यूब के ‘एम्पुला’ (Ampulla) भाग में ही संपन्न होती है। इसके सिरे पर अंगुली जैसी संरचनाएं ‘झालर’ (Fimbriae) होती हैं जो अंडोत्सर्ग के समय अंडाणु को पकड़ती हैं।
C. गर्भाशय (Uterus / Womb)
यह उल्टे नाशपाती के आकार का होता है जहाँ भ्रूण का विकास होता है। गर्भाशय की दीवार में 3 परतें होती हैं:
पेरीमेट्रियम (Perimetrium): सबसे बाहरी पतली झिल्ली।
मायोमेट्रियम (Myometrium): मध्य की मोटी पेशीय परत। प्रसव (डिलीवरी) के समय इसी में भयंकर संकुचन (Contractions) होते हैं।
एंडोमेट्रियम (Endometrium): सबसे अंदर की परत। आर्तव चक्र (मासिक धर्म) के दौरान इसी परत में चक्रीय परिवर्तन होते हैं और यह टूटकर रक्त के रूप में बाहर आती है।
4. युग्मकजनन (Gametogenesis)
नर और मादा में युग्मकों (Gametes) के निर्माण की प्रक्रिया युग्मकजनन कहलाती है।
शुक्रजनन (Spermatogenesis): नर में शुक्राणु बनने की प्रक्रिया यौवनारंभ (Puberty) से शुरू होती है और जीवन भर चलती है। एक प्राथमिक स्पर्मेटोसाइट से 4 अगुणित (Haploid) शुक्राणु बनते हैं।
अंडजनन (Oogenesis): मादा में अंडाणु बनने की प्रक्रिया भ्रूणीय अवस्था (जन्म से पहले) में ही शुरू हो जाती है। जन्म के बाद कोई नया अंडाणु नहीं बनता। एक प्राथमिक ऊसाइट से केवल 1 परिपक्व अंडाणु और 3 पोलर बॉडीज (Polar bodies) बनती हैं।
5. आर्तव चक्र (Menstrual Cycle)
प्राइमेट्स (बंदर, लंगूर और मनुष्य) की मादाओं में पाए जाने वाले जनन चक्र को आर्तव चक्र या मासिक धर्म कहते हैं। यह चक्र औसतन 28/29 दिनों का होता है।
अंडोत्सर्ग (Ovulation): चक्र के ठीक बीच में (लगभग 14वें दिन) अंडाशय से अंडाणु बाहर निकलता है।
हार्मोनल खेल: 14वें दिन LH (Luteinizing Hormone) का स्तर अपने चरम पर होता है, जिसे ‘LH Surge’ कहते हैं। इसी के कारण अंडोत्सर्ग होता है। अंडा निकलने के बाद बचा हुआ हिस्सा ‘कॉर्पस ल्यूटियम’ (Corpus Luteum) में बदल जाता है, जो भारी मात्रा में प्रोजेस्टेरोन (Pregnancy hormone) निकालता है।
6. निषेचन और आरोपण (Fertilization & Implantation)
जब शुक्राणु फैलोपियन ट्यूब के एम्पुला में अंडाणु से मिलता है, तो उसे निषेचन कहते हैं।
शुक्राणु के सिर पर ‘एक्रोसोम’ (Acrosome) होता है, जो एंजाइम निकालकर अंडाणु की बाहरी परत (Zona pellucida) को भेदने में मदद करता है।
निषेचन के बाद युग्मनज (Zygote) बनता है। यह विभाजित होकर 8-16 कोशिकाओं वाला ‘मोरुला’ (Morula) बनाता है।
इसके बाद यह ‘ब्लास्टोसिस्ट’ (Blastocyst) में बदल जाता है और गर्भाशय की ‘एंडोमेट्रियम’ परत में धंस जाता है। इसे आरोपण (Implantation) कहते हैं और यहीं से गर्भावस्था (Pregnancy) की शुरुआत मानी जाती है।
7. सगर्भता और भ्रूणीय विकास (Pregnancy & Embryonic Development)
मानव में सगर्भता अवधि (Gestation period) लगभग 9 महीने की होती है।
अपरा या प्लेसेंटा (Placenta): आरोपण के बाद माँ और भ्रूण के बीच एक संपर्क स्थापित होता है जिसे प्लेसेंटा कहते हैं। यह भ्रूण को ऑक्सीजन और पोषण देता है और उसका मल-मूत्र बाहर निकालता है।
अंतःस्रावी ग्रंथि के रूप में प्लेसेंटा: प्लेसेंटा कई हार्मोन निकालता है जैसे hCG, hPL, एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन। (hCG हार्मोन की उपस्थिति के कारण ही प्रेगनेंसी टेस्ट किट का रिजल्ट पॉजिटिव आता है)।
भ्रूणीय विकास: पहले महीने के अंत में भ्रूण का ‘हृदय’ (Heart) बन जाता है। पहली बार भ्रूण की गति (Movement) पांचवें महीने में महसूस होती है।
8. प्रसव और दुग्धस्रवण (Parturition and Lactation)
प्रसव (Delivery): 9 महीने पूर्ण होने पर गर्भाशय में तीव्र संकुचन होते हैं। प्रसव के संकेत पूर्ण विकसित भ्रूण और प्लेसेंटा से उत्पन्न होते हैं, जिसे ‘गर्भ उत्क्षेपन प्रतिवर्त’ (Fetal Ejection Reflex) कहते हैं।
यह रिफ्लेक्स पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland) से ‘ऑक्सीटोसिन’ (Oxytocin) हार्मोन के स्राव को ट्रिगर करता है। ऑक्सीटोसिन गर्भाशय में भयंकर संकुचन कराता है जिससे शिशु बाहर आ जाता है। इसे ‘बर्थ हार्मोन’ भी कहते हैं।
कोलोस्ट्रम (Colostrum): प्रसव के बाद शुरुआती कुछ दिनों तक माँ के स्तनों से जो गाढ़ा पीला दूध निकलता है, उसे कोलोस्ट्रम (खीस) कहते हैं। इसमें IgA एंटीबॉडी प्रचुर मात्रा में होती है, जो नवजात शिशु को खतरनाक बीमारियों से बचाती है।
9. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)
प्रश्न 1: मानव जनन के संदर्भ में नर जनन तंत्र का नामांकित चित्र बनाते हुए ‘वृषण’ (Testes) के प्रमुख कार्यों और शुक्रजनन (Spermatogenesis) की प्रक्रिया का वर्णन करें।
प्रश्न 2: मादा में ‘आर्तव चक्र’ (Menstrual Cycle) क्या है? इस चक्र के दौरान अंडाशय और गर्भाशय में होने वाले परिवर्तनों तथा पीयूष ग्रंथि और अंडाशय के हार्मोनों की भूमिका को स्पष्ट करें।
प्रश्न 3: ‘निषेचन’ (Fertilization) की प्रक्रिया फैलोपियन ट्यूब के किस भाग में संपन्न होती है? निषेचन के बाद ‘आरोपण’ (Implantation) तक भ्रूण के विकास के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिए।
प्रश्न 4: सगर्भता (Pregnancy) के दौरान ‘प्लेसेंटा’ (Placenta) के निर्माण और उसके कार्यों का विस्तृत विवरण दें। प्लेसेंटा को एक अंतःस्रावी ग्रंथि (Endocrine gland) क्यों माना जाता है?
प्रश्न 5: प्रसव (Parturition) की प्रक्रिया को कौन-कौन से हार्मोन नियंत्रित करते हैं? ‘ऑक्सीटोसिन’ की भूमिका तथा ‘कोलोस्ट्रम’ (Colostrum) के रोग-प्रतिरोधक महत्व पर प्रकाश डालिए।
10. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)
मनुष्य लैंगिक रूप से जनन करने वाला और ‘जरायुज’ (Viviparous – सीधे बच्चे को जन्म देने वाला) प्राणी है।
नर में युग्मक (Gamete) ‘शुक्राणु’ और मादा में ‘अंडाणु’ कहलाता है।
वृषण (Testes) उदर गुहा के बाहर ‘वृषणकोष’ (Scrotum) में स्थित होते हैं।
वृषणकोष का तापमान शरीर के तापमान से 2-2.5°C कम होता है, जो शुक्राणु निर्माण के लिए आवश्यक है।
वृषण के अंदर ‘लेडिग कोशिकाएं’ (Leydig cells) ‘टेस्टोस्टेरोन’ (Testosterone) हार्मोन का स्राव करती हैं।
वृषण में मौजूद ‘सर्टोली कोशिकाएं’ (Sertoli cells) विकासशील शुक्राणुओं को पोषण (Nutrition) प्रदान करती हैं।
शुक्राशय (Seminal vesicle) के स्राव में ‘फ्रुक्टोज’ (Fructose) शर्करा प्रचुर मात्रा में होती है, जो शुक्राणुओं को ऊर्जा देती है।
शुक्राणु के सिर के अग्र भाग को ‘एक्रोसोम’ (Acrosome) कहते हैं, जिसमें निषेचन में मदद करने वाले एंजाइम होते हैं।
एक्रोसोम का निर्माण कोशिका के ‘गॉल्जीकाय’ (Golgi body) से होता है।
शुक्राणु के मध्य भाग (Middle piece) में अनेक ‘माइटोकॉन्ड्रिया’ होते हैं, जो पूंछ को गति के लिए ऊर्जा देते हैं।
एक स्वस्थ पुरुष एक बार के स्खलन में लगभग 20-30 करोड़ शुक्राणु निकालता है।
अंडाशय (Ovaries) मादा के प्राथमिक जनन अंग हैं जो अंडाणु और स्टेरॉयड हार्मोन (एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन) बनाते हैं।
मादा जनन तंत्र में निषेचन (Fertilization) की प्रक्रिया ‘फैलोपियन ट्यूब’ (डिंबवाहिनी) के ‘एम्पुला’ (Ampulla) क्षेत्र में होती है।
गर्भाशय (Uterus) को ‘बच्चेदानी’ (Womb) भी कहा जाता है, जिसका आकार उल्टे नाशपाती जैसा होता है।
प्रसव (Delivery) के समय गर्भाशय की ‘मायोमेट्रियम’ (Myometrium) परत में भयंकर संकुचन होते हैं।
मासिक धर्म (Menstruation) के दौरान गर्भाशय की सबसे भीतरी परत ‘एंडोमेट्रियम’ (Endometrium) टूटकर रक्त के रूप में बाहर आती है।
मादा में अंडजनन (Oogenesis) की प्रक्रिया जन्म से पहले भ्रूणीय अवस्था में ही शुरू हो जाती है।
जन्म के बाद मादा के अंडाशय में कोई नई ऊगोनिया (Oogonia) नहीं बनती है।
आर्तव चक्र (Menstrual Cycle) औसतन 28 या 29 दिनों का होता है।
महिलाओं में प्रथम बार होने वाले मासिक धर्म को ‘रजोदर्शन’ (Menarche) कहते हैं।
50 वर्ष की आयु के आसपास महिलाओं में मासिक धर्म स्थायी रूप से बंद हो जाता है, जिसे ‘रजोनिवृत्ति’ (Menopause) कहते हैं।
आर्तव चक्र के 14वें दिन ‘ल्युटिनाइजिंग हार्मोन’ (LH) का स्राव अपने चरम पर होता है (LH Surge)।
LH Surge के कारण ही ग्राफी पुटक (Graafian follicle) फटता है और ‘अंडोत्सर्ग’ (Ovulation) होता है।
अंडोत्सर्ग के बाद बचा हुआ ग्राफी पुटक ‘कॉर्पस ल्यूटियम’ (Corpus Luteum) नामक पीली ग्रंथि में बदल जाता है।
कॉर्पस ल्यूटियम भारी मात्रा में ‘प्रोजेस्टेरोन’ (Progesterone) हार्मोन निकालता है, जो गर्भावस्था को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
शुक्राणु और अंडाणु के संलयन (Fusion) को ‘निषेचन’ (Fertilization) कहते हैं।
निषेचन के परिणामस्वरूप एक द्विगुणित (Diploid) कोशिका बनती है जिसे ‘युग्मनज’ (Zygote) कहते हैं।
निषेचन के समय शुक्राणु का केवल सिर और मध्य भाग ही अंडाणु के अंदर प्रवेश करता है, पूंछ बाहर रह जाती है।
युग्मनज में होने वाले समसूत्री विभाजनों को ‘विदल’ (Cleavage) कहते हैं।
8 से 16 ब्लास्टोमियर (कोशिकाओं) वाले ठोस भ्रूण को ‘मोरुला’ (Morula) कहते हैं।
मोरुला लगातार विभाजित होकर ‘ब्लास्टोसिस्ट’ (Blastocyst) में बदल जाता है।
ब्लास्टोसिस्ट का गर्भाशय की एंडोमेट्रियम से जुड़ना ‘आरोपण’ (Implantation) कहलाता है।
मनुष्य में सगर्भता (Gestation period) की अवधि लगभग 9 महीने (या 280 दिन) होती है।
भ्रूण और माँ के गर्भाशय के बीच संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई को ‘प्लेसेंटा’ (Placenta / अपरा) कहते हैं।
प्लेसेंटा भ्रूण को ऑक्सीजन और पोषण प्रदान करता है तथा CO2 और उत्सर्जी पदार्थों को बाहर निकालता है।
भ्रूण एक ‘नाभिरज्जु’ (Umbilical cord) के माध्यम से प्लेसेंटा से जुड़ा होता है।
प्लेसेंटा द्वारा स्रावित ‘hCG’ (Human Chorionic Gonadotropin) हार्मोन की मूत्र में उपस्थिति से ‘प्रेगनेंसी टेस्ट’ की पुष्टि होती है।
गर्भावस्था के दौरान रिलैक्सिन (Relaxin) हार्मोन का स्राव अंडाशय द्वारा किया जाता है।
सगर्भता के पहले महीने के अंत में भ्रूण के ‘हृदय’ (Heart) का निर्माण हो जाता है।
भ्रूण की पहली गति (Movement) और सिर पर बालों का आना पाँचवें महीने में दिखाई देता है।
मानव में लिंग निर्धारण (Sex determination) नर के गुणसूत्रों (X या Y) पर निर्भर करता है, मादा (XX) पर नहीं।
प्रसव (Parturition) एक जटिल ‘तंत्रिका-अंतःस्रावी’ (Neuroendocrine) प्रक्रिया है।
प्रसव के संकेत पूर्ण विकसित भ्रूण और प्लेसेंटा से उत्पन्न होते हैं (गर्भ उत्क्षेपन प्रतिवर्त)।
प्रसव के समय माँ की पीयूष ग्रंथि से ‘ऑक्सीटोसिन’ (Oxytocin) हार्मोन भारी मात्रा में निकलता है।
ऑक्सीटोसिन गर्भाशय की पेशियों में तीव्र संकुचन कराता है, जिससे शिशु का जन्म होता है (इसे बर्थ हार्मोन कहते हैं)।
प्रसव के बाद स्तन ग्रंथियों (Mammary glands) से दूध निकलने की प्रक्रिया को ‘दुग्धस्रवण’ (Lactation) कहते हैं।
दुग्धस्रवण को प्रेरित करने वाला मुख्य हार्मोन ‘प्रोलैक्टिन’ (Prolactin) है।
प्रसव के बाद शुरुआती कुछ दिनों तक निकलने वाले गाढ़े पीले दूध को ‘कोलोस्ट्रम’ (Colostrum / खीस) कहते हैं।
कोलोस्ट्रम में ‘IgA’ एंटीबॉडी प्रचुर मात्रा में होती है, जो नवजात शिशु को रोगों से लड़ने की क्षमता देती है।
मानव जनन में अंडाणु की सतह पर पाई जाने वाली पारदर्शी परत को ‘जोना पेल्यूसिडा’ (Zona pellucida) कहते हैं, जो एक से अधिक शुक्राणुओं (Polyspermy) के प्रवेश को रोकती है।