
IUPAC नामकरण
1. विस्तृत प्रस्तावना: IUPAC नामकरण क्या है और इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी?
रसायन विज्ञान (Chemistry) की दुनिया में आज लगभग 1 करोड़ से अधिक कार्बनिक यौगिक (Organic Compounds) मौजूद हैं। जब प्रारंभिक दौर में कार्बनिक यौगिकों की खोज हो रही थी, तो उनके नाम उनके स्रोत (Source) या उनके गुण के आधार पर रख दिए जाते थे। इसे ‘रूढ़ नामकरण’ (Trivial System) कहा जाता था।
उदाहरण के लिए, लाल चींटियों (Red Ants) से मिलने वाले अम्ल को ‘फॉर्मिक अम्ल’ (Formic Acid) कहा गया क्योंकि लैटिन भाषा में चींटी को ‘फॉर्मिका’ (Formica) कहते हैं। दलदली स्थानों (Marshy lands) से निकलने वाली गैस को ‘मार्श गैस’ (Marsh Gas – CH_4) कहा गया। लेकिन जैसे-जैसे यौगिकों की संख्या हजारों से लाखों में पहुँचने लगी, हर एक का अलग नाम याद रखना वैज्ञानिकों के लिए असंभव हो गया।
इस वैश्विक समस्या को सुलझाने के लिए 1919 में रसायनज्ञों की एक अंतरराष्ट्रीय संस्था का गठन किया गया, जिसे IUPAC (International Union of Pure and Applied Chemistry) कहा जाता है। इस संस्था ने कार्बनिक यौगिकों का नाम रखने के लिए एक वैज्ञानिक, तार्किक और सार्वभौमिक (Universal) प्रणाली विकसित की, जिसे हम IUPAC नामकरण कहते हैं। इस प्रणाली के तहत दुनिया भर में एक यौगिक का केवल एक ही प्रामाणिक नाम होता है, चाहे आप भारत में हों या अमेरिका में।
2. IUPAC नामकरण का मास्टर फॉर्मूला (The Master Formula of IUPAC Naming)
IUPAC नामकरण कोई रटने वाली विद्या नहीं है, बल्कि यह गणित के एक सूत्र (Formula) की तरह काम करता है। किसी भी कार्बनिक यौगिक का IUPAC नाम मुख्य रूप से 5 हिस्सों से मिलकर बनता है। इस फॉर्मूले को दिमाग में सेट कर लीजिए:
IUPAC नाम = 2° पूर्वलग्न + 1° पूर्वलग्न + मूल शब्द + 1° अनुलग्न + 2° अनुलग्न
(Secondary Prefix + Primary Prefix + Word Root + Primary Suffix + Secondary Suffix)
आइए, IUPAC नामकरण के इन पांचों स्तंभों का गहराई से ‘पोस्टमार्टम’ (विस्तृत विश्लेषण) करते हैं:
A. मूल शब्द (Word Root)
यह IUPAC नामकरण का सबसे मुख्य भाग है। यह बताता है कि यौगिक की मुख्य कार्बन श्रृंखला (Principal Carbon Chain) में कितने कार्बन परमाणु मौजूद हैं।
C_1 (1 कार्बन) = मेथ (Meth)
C_2 (2 कार्बन) = एथ (Eth)
C_3 (3 कार्बन) = प्रोप (Prop)
C_4 (4 कार्बन) = ब्यूट (But)
C_5 (5 कार्बन) = पेंट (Pent)
C_6 (6 कार्बन) = हेक्स (Hex)
C_7 (7 कार्बन) = हेप्ट (Hept)
C_8 (8 कार्बन) = ऑक्ट (Oct)
C_9 (9 कार्बन) = नन (Non)
C_10 (10 कार्बन) = डेक (Dec)
C_11 (11 कार्बन) = अनडेक (Undec)
C_12 (12 कार्बन) = डोडेक (Dodec)
B. प्राथमिक अनुलग्न (Primary Suffix – 1° Suffix)
मूल शब्द के ठीक बाद प्राथमिक अनुलग्न लगाया जाता है। यह बताता है कि कार्बन श्रृंखला ‘संतृप्त’ (Saturated – सिंगल बॉन्ड) है या ‘असंतृप्त’ (Unsaturated – डबल या ट्रिपल बॉन्ड)।
यदि सभी कार्बन के बीच सिंगल बॉन्ड (C-C) है, तो अनुलग्न लगेगा = ऐन (ane)
यदि श्रृंखला में एक भी डबल बॉन्ड (C=C) है, तो अनुलग्न लगेगा = ईन (ene)
यदि श्रृंखला में एक भी ट्रिपल बॉन्ड (C \equiv C) है, तो अनुलग्न लगेगा = आइन (yne)
(यदि 2 डबल बॉन्ड हों तो ‘डाईईन’ (diene) और 3 हों तो ‘ट्राईईन’ (triene) का प्रयोग होता है)।
C. द्वितीयक अनुलग्न (Secondary Suffix – 2° Suffix)
यह प्राथमिक अनुलग्न के बाद जुड़ता है। यह यौगिक में मौजूद मुख्य ‘क्रियात्मक समूह’ (Principal Functional Group) को दर्शाता है, जो यौगिक के रासायनिक गुणों को तय करता है।
एल्कोहल (-OH) = ऑल (ol)
एल्डिहाइड (-CHO) = अल (al)
कीटोन (>C=O) = ओन (one)
कार्बोक्सिलिक अम्ल (-COOH) = ओइक अम्ल (oic acid)
एमाइन (-NH_2) = एमाइन (amine)
D. प्राथमिक पूर्वलग्न (Primary Prefix – 1° Prefix)
यह मूल शब्द (Word Root) से ठीक पहले लगता है। इसका प्रयोग केवल तब किया जाता है जब कार्बन श्रृंखला ‘चक्रीय’ (Cyclic / Ring-shaped) हो।
चक्रीय यौगिकों के लिए = साइक्लो (Cyclo) शब्द का प्रयोग होता है। (जैसे- Cyclohexane)। यदि श्रृंखला खुली (Open) है, तो इसका प्रयोग नहीं होता।
E. द्वितीयक पूर्वलग्न (Secondary Prefix – 2° Prefix)
यह IUPAC नामकरण में सबसे पहले लिखा जाता है। यह उन प्रतिस्थापियों (Substituents) या साइड चेन्स (Side chains) को दर्शाता है जिन्हें मुख्य श्रृंखला या मुख्य क्रियात्मक समूह में जगह नहीं मिल पाई है।
-F = फ्लोरो (Fluoro)
-Cl = क्लोरो (Chloro)
-Br = ब्रोमो (Bromo)
-I = आयोडो (Iodo)
-CH_3 = मिथाइल (Methyl)
-C_2H_5 = इथाइल (Ethyl)
-NO_2 = नाइट्रो (Nitro)
-OR = एल्कोक्सी (Alkoxy / जैसे $-OCH_3$ = Methoxy)

3. मुख्य कार्बन श्रृंखला का चयन (Selection of Principal Carbon Chain)
IUPAC नामकरण का सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि आपको कार्बन परमाणुओं की सबसे सही ‘मुख्य श्रृंखला’ (Parent Chain) का चुनाव करना होता है। इसके नियम इस प्रकार हैं:
नियम 1: सबसे लंबी श्रृंखला का नियम (Longest Chain Rule)
सबसे पहले उस लगातार कार्बन श्रृंखला का चयन करें जिसमें कार्बन परमाणुओं की संख्या अधिकतम हो। यह जरूरी नहीं है कि मुख्य श्रृंखला हमेशा बिल्कुल सीधी (Straight) हो; यह टेढ़ी-मेढ़ी (Zig-zag) भी हो सकती है।
नियम 2: बहु-आबंध (Multiple Bonds) का नियम
यदि यौगिक में डबल बॉन्ड (C=C) या ट्रिपल बॉन्ड (C \equiv C) मौजूद है, तो मुख्य श्रृंखला में उस डबल/ट्रिपल बॉन्ड का शामिल होना अनिवार्य है, भले ही ऐसा करने से कार्बन की सबसे लंबी श्रृंखला छोटी क्यों न हो जाए। बहु-आबंध की प्राथमिकता कार्बन की संख्या से अधिक होती है।
नियम 3: क्रियात्मक समूह (Functional Group) का नियम
यदि यौगिक में कोई ऐसा क्रियात्मक समूह है जिसमें कार्बन मौजूद है (जैसे -COOH, -CHO, -CN), तो उस क्रियात्मक समूह के कार्बन को मुख्य श्रृंखला में शामिल करना और उसे नंबर 1 (No. 1) देना 100% अनिवार्य है।
नियम 4: समान लंबाई की दो श्रृंखलाएं (Rule for Equal Length Chains)
यदि किसी यौगिक में समान कार्बन संख्या वाली दो या दो से अधिक श्रृंखलाएं बन रही हों, तो उस श्रृंखला को मुख्य श्रृंखला माना जाएगा जिसमें प्रतिस्थापियों (Substituents / साइड ब्रांच) की संख्या अधिकतम हो।
4. कार्बन श्रृंखला के अंकन या नंबरिंग के नियम (Rules for Numbering)
मुख्य श्रृंखला का चयन करने के बाद, अगला सबसे बड़ा काम होता है कार्बन परमाणुओं को नंबर देना (1, 2, 3…)। IUPAC नामकरण में नंबरिंग हमेशा श्रृंखला के किसी एक सिरे (Terminal) से ही शुरू की जाती है।
नियम 1: न्यूनतम अंकन का नियम (Lowest Locant Rule)
नंबरिंग उस सिरे से शुरू की जाती है जिधर से प्रतिस्थापी (Substituent) या साइड ब्रांच को सबसे छोटा नंबर (Lowest number) मिले।
उदाहरण: CH_3-CH(Cl)-CH_2-CH_3
इसमें यदि हम बाएं से नंबरिंग करें तो क्लोरीन (Cl) को 2 नंबर मिलेगा। यदि दाएं से करें तो 3 मिलेगा। इसलिए बाएं से नंबरिंग सही है (2-Chlorobutane)।
नियम 2: न्यूनतम योग का नियम (Lowest Sum Rule / Lowest Locant Set)
यदि श्रृंखला में एक से अधिक प्रतिस्थापी हैं, तो नंबरिंग दोनों सिरों से करके देखें। जिस तरफ से प्रतिस्थापियों के स्थानों (Positions) का कुल योग या उनका सेट (Set of locants) न्यूनतम हो, वही नंबरिंग सही मानी जाएगी। (जैसे 2,3,4 सही है, न कि 3,4,5)।
नियम 3: वर्णमाला क्रम का नियम (Alphabetical Order Rule)
यदि दो अलग-अलग प्रतिस्थापी (जैसे Methyl और Ethyl) श्रृंखला के दोनों सिरों से समान दूरी पर हों, तो नंबरिंग वर्णमाला (Alphabet) के अनुसार की जाएगी।
चूंकि Ethyl का ‘E’, Methyl के ‘M’ से पहले आता है, इसलिए नंबरिंग उस सिरे से होगी जिधर से Ethyl को कम नंबर मिले।
नियम 4: डबल और ट्रिपल बॉन्ड का नियम (Double vs Triple Bond)
नंबरिंग हमेशा उस सिरे से होगी जिधर से डबल बॉन्ड या ट्रिपल बॉन्ड को कम नंबर मिले (प्रतिस्थापियों की तुलना में बहु-आबंध को अधिक प्राथमिकता दी जाती है)।
महा-नियम (UPSC/JEE Fact): यदि किसी यौगिक में डबल बॉन्ड और ट्रिपल बॉन्ड दोनों मौजूद हों और दोनों सिरों से समान दूरी पर (Identical positions) हों, तो डबल बॉन्ड (Double Bond) को प्राथमिकता दी जाएगी और नंबरिंग उधर से होगी जिधर से डबल बॉन्ड पास पड़े। (लेकिन नाम लिखते समय ‘ene’ हमेशा ‘yne’ से पहले लिखा जाएगा)।
5. क्रियात्मक समूहों की प्राथमिकता सूची (Priority Order of Functional Groups)
IUPAC नामकरण का यह सबसे जटिल और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब किसी यौगिक में एक से अधिक (दो या तीन) अलग-अलग क्रियात्मक समूह आ जाते हैं, तो उनमें से केवल एक को ‘मुख्य’ (Principal) माना जाता है (जो अनुलग्न/Suffix बनता है) और बाकी सभी को ‘प्रतिस्थापी’ (Substituent / Prefix) मान लिया जाता है।
इसे तय करने के लिए IUPAC ने एक सख्त प्राथमिकता सूची (Priority Table) बनाई है। जो इस सूची में ऊपर है, वह राजा (मुख्य समूह) है।
प्राथमिकता का घटता क्रम (Decreasing Order of Priority):
कार्बोक्सिलिक अम्ल (-COOH): (अनुलग्न = oic acid | पूर्वलग्न = carboxy)
सल्फोनिक अम्ल (-SO_3H): (अनुलग्न = sulphonic acid | पूर्वलग्न = sulpho)
एनहाइड्राइड (-COOCO-): (अनुलग्न = oic anhydride)
एस्टर (-COOR): (अनुलग्न = oate | पूर्वलग्न = alkoxy carbonyl)
एसिड हैलाइड (-COX): (अनुलग्न = oyl halide | पूर्वलग्न = halo formyl)
एमाइड (-CONH_2): (अनुलग्न = amide | पूर्वलग्न = carbamoyl)
साइनाइड / नाइट्राइल (-CN): (अनुलग्न = nitrile | पूर्वलग्न = cyano)
आइसोसाइनाइड (-NC): (अनुलग्न = isonitrile | पूर्वलग्न = isocyano)
एल्डिहाइड (-CHO): (अनुलग्न = al | पूर्वलग्न = formyl / oxo)
कीटोन (>C=O): (अनुलग्न = one | पूर्वलग्न = oxo / keto)
एल्कोहल (-OH): (अनुलग्न = ol | पूर्वलग्न = hydroxy)
थायोल (-SH): (अनुलग्न = thiol | पूर्वलग्न = mercapto)
एमाइन (-NH_2): (अनुलग्न = amine | पूर्वलग्न = amino)
डबल बॉन्ड (=) > ट्रिपल बॉन्ड (\equiv$)
(नोट: हैलोजन (-X), नाइट्रो (-NO_2), और ईथर (-OR) को हमेशा प्रतिस्थापी/Prefix ही माना जाता है, वे कभी अनुलग्न/Suffix नहीं बनते)।
6. जटिल प्रतिस्थापियों (Complex Substituents) का नामकरण
जब मुख्य कार्बन श्रृंखला से जुड़ी हुई साइड चेन (प्रतिस्थापी) स्वयं आगे शाखित (Branched) हो जाए, तो उसे ‘जटिल प्रतिस्थापी’ कहते हैं।
नियम: जटिल प्रतिस्थापी का नामकरण करते समय, उस कार्बन को हमेशा नंबर 1 (C-1) दिया जाता है जो मुख्य श्रृंखला से सीधे जुड़ा होता है।
जटिल प्रतिस्थापी का पूरा नाम हमेशा कोष्ठक (Brackets) के अंदर लिखा जाता है, ताकि वह मुख्य नाम से अलग दिखाई दे।
जटिल प्रतिस्थापियों में ‘di, tri, tetra’ शब्दों के वर्णमाला क्रम को भी ध्यान में रखा जाता है। इसके अलावा, यदि दो समान जटिल प्रतिस्थापी आ जाएं, तो उनके लिए ‘bis, tris, tetrakis’ शब्दों का प्रयोग होता है।
7. चक्रीय यौगिकों (Cyclic Compounds) का IUPAC नामकरण
जब कार्बन परमाणु एक बंद रिंग (Closed Ring) बनाते हैं, तो उनके नामकरण के नियम थोड़े बदल जाते हैं।
A. साइक्लोएल्केन (Cycloalkanes)
IUPAC नामकरण करते समय मूल शब्द से पहले ‘Cyclo’ (साइक्लो) लगा दिया जाता है। (जैसे- 3 कार्बन की रिंग = Cyclopropane, 5 कार्बन की रिंग = Cyclopentane)।
यदि रिंग में केवल एक प्रतिस्थापी है, तो नंबरिंग की कोई आवश्यकता नहीं है।
यदि रिंग में और सीधी श्रृंखला (Open chain) दोनों में कार्बन की संख्या समान है, तो रिंग (Ring) को ही मुख्य श्रृंखला माना जाता है। लेकिन यदि ओपन चेन में कार्बन ज्यादा हैं या कोई बड़ा क्रियात्मक समूह है, तो रिंग को प्रतिस्थापी (Cycloalkyl) मान लिया जाता है।
B. एरोमैटिक यौगिक (Aromatic Compounds – बेंजीन डेरिवेटिव्स)
बेंजीन (C_6H_6) रसायन विज्ञान का सबसे प्रसिद्ध चक्रीय यौगिक है।
IUPAC ने बेंजीन के कई रूढ़ नामों (Trivial Names) को ही मानक IUPAC नामकरण के रूप में स्वीकार कर लिया है।
जैसे: बेंजीन रिंग के ऊपर -CH_3 हो तो उसे टॉलूईन (Toluene) कहते हैं।
बेंजीन पर -OH हो तो फिनोल (Phenol)।
बेंजीन पर -NH_2 हो तो एनिलीन (Aniline)।
बेंजीन पर -OCH_3 हो तो एनिसोल (Anisole)।
नंबरिंग करते समय ऑर्थो (ortho – 1,2), मेटा (meta – 1,3) और पैरा (para – 1,4) स्थितियों का ध्यान रखा जाता है (यद्यपि IUPAC में नंबरिंग 1,2,3… ही ज्यादा प्रामाणिक है)।
8. IUPAC नाम लिखते समय ध्यान रखने योग्य कुछ स्वर्ण नियम (Golden Rules)
अंक और अक्षर (Numbers and Letters): IUPAC नाम लिखते समय किसी अंक (Number) और अक्षर (Letter) के बीच हमेशा हाइफन (-) लगाया जाता है। (जैसे: 2-Methyl)।
अंक और अंक (Numbers and Numbers): दो या दो से अधिक अंकों के बीच हमेशा अल्पविराम (Comma ,) लगाया जाता है। (जैसे: 2,3-Dimethyl)।
निरंतरता (Continuity): पूरा IUPAC नाम हमेशा एक ही शब्द (Single word) में लिखा जाता है, उसमें कोई खाली स्थान (Space) नहीं छोड़ा जाता है। (केवल कार्बोक्सिलिक एसिड और एस्टर के नाम में स्पेस आता है)।
स्वर का विलोपन (Dropping of Vowel): यदि प्राथमिक अनुलग्न (ane, ene, yne) के बाद जुड़ने वाले द्वितीयक अनुलग्न का पहला अक्षर कोई स्वर (Vowel – a, e, i, o, u) या ‘y’ है, तो प्राथमिक अनुलग्न का अंतिम ‘e’ हटा दिया जाता है।
उदाहरण: Propane + ol = Propanol (यहाँ ‘e’ हटा दिया गया है)। लेकिन Propane + nitrile = Propanenitrile (यहाँ ‘e’ नहीं हटेगा क्योंकि nitrile ‘n’ से शुरू होता है)।
9. निष्कर्ष (Conclusion)
विस्तृत विश्लेषण के बाद हम यह कह सकते हैं कि IUPAC नामकरण वास्तव में कार्बनिक रसायन विज्ञान की ‘व्याकरण’ (Grammar) है। जिस प्रकार बिना व्याकरण के कोई भी भाषा निरर्थक और भ्रमित करने वाली हो जाती है, उसी प्रकार बिना IUPAC नियमों के लाखों कार्बनिक यौगिकों को पहचानना और उनका अध्ययन करना पूरी तरह असंभव है। जिनेवा सम्मेलन (1892) से लेकर आज तक, IUPAC संस्था ने अपने नियमों में कई बदलाव (जैसे 1993 की सिफारिशें) किए हैं ताकि नामकरण को और अधिक सटीक, तार्किक और कंप्यूटर-सुलभ (Machine-readable) बनाया जा सके। चाहे आप स्कूल के छात्र हों, शोधकर्ता (Researcher) हों, या फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री के वैज्ञानिक हों—प्राथमिकता सूची (Priority Order), न्यूनतम अंकन का नियम (Lowest Locant Rule) और श्रृंखला चयन के ये स्वर्णिम नियम जीवन भर आपके काम आएंगे।
10. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)
कार्बनिक यौगिकों के वैज्ञानिक नामकरण की वैश्विक संस्था का नाम IUPAC (International Union of Pure and Applied Chemistry) है।
IUPAC की स्थापना वर्ष 1919 में हुई थी, जिसका मुख्यालय ज्यूरिख (स्विट्जरलैंड) में है।
IUPAC नामकरण का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में एक यौगिक को एक ही अद्वितीय (Unique) नाम प्रदान करना है।
पुराने समय में यौगिकों के नाम उनके स्रोत के आधार पर रखे जाते थे, जिसे रूढ़ नामकरण (Trivial Nomenclature) कहा जाता था।
लाल चींटियों से प्राप्त होने के कारण मेथेनोइक अम्ल को ‘फॉर्मिक अम्ल’ (Formic Acid) कहा जाता था।
दलदली स्थानों से प्राप्त होने के कारण मीथेन (CH4) को ‘मार्श गैस’ (Marsh Gas) कहा जाता था।
सिरके (Vinegar) में पाए जाने के कारण एथेनोइक अम्ल को ‘एसिटिक अम्ल’ (Acetic Acid) का रूढ़ नाम मिला।
IUPAC नाम के पांच मुख्य भाग होते हैं: द्वितीयक पूर्वलग्न, प्राथमिक पूर्वलग्न, मूल शब्द, प्राथमिक अनुलग्न और द्वितीयक अनुलग्न।
‘मूल शब्द’ (Word Root) कार्बन श्रृंखला में कार्बन परमाणुओं की कुल संख्या को दर्शाता है।
1 कार्बन के लिए ‘मेथ’ (Meth) और 2 कार्बन के लिए ‘एथ’ (Eth) का प्रयोग किया जाता है।
20 कार्बन परमाणुओं की लंबी श्रृंखला को IUPAC में ‘आकोस’ (Icos) कहा जाता है।
प्राथमिक अनुलग्न (Primary Suffix) यौगिक की संतृप्तता या असंतृप्तता (सिंगल, डबल, ट्रिपल बॉन्ड) को दर्शाता है।
सिंगल बॉन्ड (C-C) के लिए ‘ऐन’ (ane) का प्रयोग होता है, जिसका सामान्य सूत्र CnH2n+2 है।
डबल बॉन्ड (C=C) के लिए ‘ईन’ (ene) का प्रयोग होता है, जिसका सामान्य सूत्र CnH2n है।
ट्रिपल बॉन्ड (C≡C) के लिए ‘आइन’ (yne) का प्रयोग होता है, जिसका सामान्य सूत्र CnH2n−2 है।
IUPAC नामकरण में मुख्य श्रृंखला वह होती है जिसमें कार्बन परमाणुओं की संख्या सबसे अधिक (Longest Chain) होती है।
यदि यौगिक में बहु-आबंध (Multiple bonds) हैं, तो उन्हें मुख्य श्रृंखला में शामिल करना अनिवार्य है, भले ही श्रृंखला छोटी हो जाए।
यदि समान लंबाई की दो श्रृंखलाएं बन रही हों, तो उस श्रृंखला को मुख्य माना जाएगा जिसमें प्रतिस्थापियों (Substituents) की संख्या अधिक हो।
कार्बन की नंबरिंग उस सिरे से की जाती है जिधर से प्रतिस्थापी या क्रियात्मक समूह को सबसे कम अंक (Lowest Locant) मिले।
यदि दो प्रतिस्थापी दोनों सिरों से समान दूरी पर हों, तो नंबरिंग ‘वर्णमाला क्रम’ (Alphabetical Order) के अनुसार की जाती है।
यदि डबल बॉन्ड और ट्रिपल बॉन्ड दोनों सिरों से समान दूरी पर हों, तो नंबरिंग में ‘डबल बॉन्ड’ (Double Bond) को प्राथमिकता दी जाती है।
IUPAC में ‘द्वितीयक अनुलग्न’ (Secondary Suffix) मुख्य क्रियात्मक समूह (Functional Group) को दर्शाता है।
क्रियात्मक समूहों की प्राथमिकता सूची में ‘कार्बोक्सिलिक अम्ल’ (-COOH) सबसे शीर्ष (Top priority) पर आता है।
जब -COOH मुख्य समूह होता है, तो उसका अनुलग्न ‘ओइक अम्ल’ (oic acid) लगाया जाता है।
एल्डिहाइड (-CHO) समूह के लिए IUPAC अनुलग्न ‘अल’ (al) का प्रयोग किया जाता है।
कीटोन (>C=O) समूह के लिए IUPAC अनुलग्न ‘ओन’ (one) का प्रयोग किया जाता है।
एल्कोहल (-OH) समूह के लिए IUPAC अनुलग्न ‘ऑल’ (ol) का प्रयोग किया जाता है।
जब एल्डिहाइड (-CHO) प्रतिस्थापी (Prefix) के रूप में कार्य करता है, तो इसे ‘फॉर्मिल’ (formyl) कहा जाता है।
जब कीटोन (>C=O) प्रतिस्थापी के रूप में कार्य करता है, तो इसे ‘ऑक्सो’ (oxo) या कीटो कहा जाता है।
हैलोजन समूह (-F, -Cl, -Br, -I) को IUPAC में कभी भी मुख्य क्रियात्मक समूह (Suffix) नहीं माना जाता; ये हमेशा पूर्वलग्न (Prefix) होते हैं।
नाइट्रो समूह (−NO2) और ईथर (-OR) को भी हमेशा प्रतिस्थापी (Substituent/Prefix) के रूप में ही लिखा जाता है।
चक्रीय यौगिकों (Cyclic compounds) के नाम से पहले प्राथमिक पूर्वलग्न के रूप में ‘साइक्लो’ (Cyclo) शब्द जोड़ा जाता है।
यदि चक्रीय रिंग से जुड़ी खुली श्रृंखला (Open chain) में कार्बन की संख्या रिंग से अधिक है, तो रिंग को प्रतिस्थापी माना जाएगा।
जटिल प्रतिस्थापियों (Complex substituents) का नाम हमेशा कोष्ठक (Brackets) के अंदर लिखा जाता है।
जटिल प्रतिस्थापी में उस कार्बन को हमेशा नंबर 1 दिया जाता है, जो मुख्य श्रृंखला से सीधे जुड़ा होता है।
IUPAC नाम लिखते समय अंकों (Numbers) के बीच हमेशा अल्पविराम (Comma) का प्रयोग किया जाता है (जैसे: 2,3)।
अंक (Number) और अक्षर (Letter) के बीच हमेशा हाइफन (-) का प्रयोग किया जाता है (जैसे: 2-Methyl)।
IUPAC नामकरण में पूरा नाम एक ही शब्द (Single word) में लिखा जाता है, उसमें खाली जगह (Space) नहीं छोड़ी जाती।
यदि द्वितीयक अनुलग्न किसी स्वर (a, e, i, o, u) या ‘y’ से शुरू होता है, तो प्राथमिक अनुलग्न का अंतिम ‘e’ (ane, ene, yne का) हटा दिया जाता है।
बेंजीन रिंग के ऊपर −CH3 समूह लगा हो, तो उस यौगिक का स्वीकृत IUPAC नाम ‘टॉलूईन’ (Toluene) है।
बेंजीन रिंग के ऊपर -OH समूह लगा हो, तो उस यौगिक का स्वीकृत IUPAC नाम ‘फिनोल’ (Phenol) है।
बेंजीन रिंग के ऊपर −NH2 समूह लगा हो, तो उस यौगिक का स्वीकृत IUPAC नाम ‘एनिलीन’ (Aniline) है।
बेंजीन रिंग के ऊपर −OCH3 समूह लगा हो, तो उसे ‘एनिसोल’ (Anisole) कहा जाता है।
एक ही यौगिक में दो समान समूहों के लिए ‘डाई’ (di), तीन के लिए ‘ट्राई’ (tri) और चार के लिए ‘टेट्रा’ (tetra) का प्रयोग होता है।
जटिल प्रतिस्थापियों की समानता दर्शाने के लिए ‘डाई/ट्राई’ के स्थान पर ‘बिस’ (bis), ‘ट्रिस’ (tris) और ‘टेट्राकिस’ (tetrakis) का प्रयोग किया जाता है।
वर्णमाला क्रम (Alphabetical Order) तय करते समय di, tri, tetra जैसे शब्दों के प्रथम अक्षर को शामिल नहीं किया जाता है।
लेकिन यदि di, tri जटिल प्रतिस्थापी (Complex Substituent) के नाम का हिस्सा हैं, तो उन्हें वर्णमाला क्रम में गिना जाता है।
यदि किसी यौगिक में -COOH, -CHO, या -CN जैसे समूह 3 या 3 से अधिक बार सीधे मुख्य श्रृंखला से जुड़े हों, तो उनके लिए विशेष अनुलग्न (जैसे Tricarboxylic acid) का प्रयोग होता है।
ईथर (R-O-R’) के IUPAC नामकरण में छोटी एल्काइल श्रृंखला को ऑक्सीजन के साथ जोड़कर ‘एल्कोक्सी’ (Alkoxy) और बड़ी श्रृंखला को एल्केन (Alkane) माना जाता है (उदा: Methoxyethane)।
एस्टर (R-COOR’) के नामकरण में ऑक्सीजन से जुड़े एल्काइल समूह का नाम सबसे पहले अलग से (Space के साथ) लिखा जाता है, और फिर बाकी श्रृंखला के लिए ‘ओएट’ (oate) लगाया जाता है।