जीव जगत का वर्गीकरण

जीव जगत का वर्गीकरण (Biological Classification)

1. विस्तृत प्रस्तावना: वर्गीकरण की आवश्यकता और इतिहास

पृथ्वी पर लाखों प्रकार के पौधे और जानवर मौजूद हैं। मानव सभ्यता की शुरुआत से ही इंसान ने अपनी मूलभूत आवश्यकताओं (भोजन, आश्रय और कपड़े) के लिए जीवों को बाँटने का प्रयास किया है। लेकिन जीवों का पहला ‘वैज्ञानिक वर्गीकरण’ (Scientific Classification) यूनानी दार्शनिक अरस्तु (Aristotle) ने किया था। अरस्तु ने पौधों को उनके आकार के आधार पर ‘वृक्ष, झाड़ी और शाक’ (Trees, Shrubs, Herbs) में बाँटा, और जंतुओं को दो समूहों में—जिनमें लाल रक्त (Red blood) होता है और जिनमें नहीं होता।

इसके बाद वर्गीकरण विज्ञान के जनक कैरोलस लीनियस (Carolus Linnaeus) ने ‘द्वि-जगत प्रणाली’ (Two Kingdom Classification) प्रस्तुत की, जिसमें सभी जीवों को ‘पादप’ (Plantae) और ‘जंतु’ (Animalia) में बाँट दिया गया। लेकिन यह प्रणाली अपर्याप्त थी क्योंकि इसमें प्रकाश-संश्लेषी (हरे पौधे) और अप्रकाश-संश्लेषी (कवक), एककोशिकीय और बहुकोशिकीय, तथा प्रोकैरियोटिक (जीवाणु) और यूकैरियोटिक जीवों को एक ही साथ रख दिया गया था।

इसी समस्या को सुलझाने के लिए आर.एच. व्हिटेकर (R.H. Whittaker) ने 1969 में अपनी प्रसिद्ध ‘पाँच जगत प्रणाली’ (Five Kingdom Classification) दी।

2. व्हिटेकर की पाँच जगत प्रणाली का आधार

व्हिटेकर ने जीवों को 5 जगतों (मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, पादप, जंतु) में बाँटने के लिए निम्नलिखित 5 मुख्य मापदंडों (Criteria) का प्रयोग किया:

  1. कोशिका संरचना (Cell Structure): प्रोकैरियोटिक (अविकसित केंद्रक) या यूकैरियोटिक (विकसित केंद्रक)।

  2. शारीरिक संगठन (Thallus Organization): एककोशिकीय (Unicellular) या बहुकोशिकीय (Multicellular)।

  3. पोषण की विधि (Mode of Nutrition): स्वपोषी (Autotrophic) या विषमपोषी (Heterotrophic)।

  4. प्रजनन की विधि (Reproduction): अलैंगिक या लैंगिक।

  5. जातिवृत्तीय संबंध (Phylogenetic Relationships): जीवों का विकासवादी (Evolutionary) इतिहास।

3. जगत मोनेरा (Kingdom Monera)

मोनेरा जगत में सभी जीवाणुओं (Bacteria) को रखा गया है। ये सूक्ष्मजीव पृथ्वी पर लगभग हर जगह (गर्म झरनों से लेकर बर्फ और गहरे समुद्र तक) पाए जाते हैं। ये प्रोकैरियोटिक और एककोशिकीय होते हैं।

आकार के आधार पर जीवाणु 4 प्रकार के होते हैं: कोकस (गोलाकार), बेसिलस (छड़ के आकार का), विब्रियो (कॉमा के आकार का) और स्पाइरिलम (सर्पिलाकार)।

मोनेरा को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है:

A. आर्कीबैक्टीरिया (Archaebacteria)

ये ‘प्राचीन जीवाणु’ हैं जो पृथ्वी के सबसे चरम और कठोर वातावरण में जीवित रह सकते हैं। इनकी कोशिका भित्ति की संरचना सामान्य जीवाणुओं से अलग होती है, जो इन्हें चरम स्थितियों में बचाती है।

  • हैलॉफाइल्स (Halophiles): अत्यधिक खारे (नमक वाले) पानी में रहने वाले।

  • थर्मोएसिडोफाइल्स (Thermoacidophiles): गर्म झरनों (Hot springs) में रहने वाले।

  • मिथेनोजेन्स (Methanogens): दलदली क्षेत्रों (Marshy areas) और गाय-भैंस (जुगाली करने वाले जानवरों) के पेट में पाए जाने वाले। ये बायोगैस (मीथेन) का उत्पादन करते हैं।

B. यूबैक्टीरिया (Eubacteria – ‘सत्य जीवाणु’)

इनमें एक कठोर कोशिका भित्ति (Cell wall) होती है।

  • साइनोबैक्टीरिया (नील-हरित शैवाल): इनमें पौधों की तरह क्लोरोफिल ‘a’ होता है और ये प्रकाश-संश्लेषी स्वपोषी होते हैं। कुछ साइनोबैक्टीरिया (जैसे- नोस्टॉक और एनाबीना) ‘हेटेरोसिस्ट’ (Heterocyst) नामक विशेष कोशिकाओं द्वारा वायुमंडलीय ‘नाइट्रोजन का स्थिरीकरण’ (Nitrogen Fixation) करते हैं।

  • विषमपोषी जीवाणु (Heterotrophic Bacteria): ये प्रकृति में सबसे अधिक पाए जाते हैं। ये दूध से दही बनाने (Lactobacillus), एंटीबायोटिक्स बनाने, और लेग्यूम (दलहन) पौधों की जड़ों में नाइट्रोजन फिक्स करने (Rhizobium) में मदद करते हैं। कुछ जीवाणु मानव में हैजा, टाइफाइड और टिटनेस जैसी बीमारियां फैलाते हैं।

  • माइकोप्लाज्मा (Mycoplasma): ये सबसे छोटी ज्ञात जीवित कोशिकाएं हैं। इनमें कोशिका भित्ति बिल्कुल नहीं पाई जाती है और ये बिना ऑक्सीजन के भी जीवित रह सकते हैं।

4. जगत प्रोटिस्टा (Kingdom Protista)

जीव जगत में सभी एककोशिकीय यूकैरियोटिक (Unicellular Eukaryotic) जीवों को रखा गया है। यह जीव जगत जंतुओं, पौधों और कवक के बीच एक ‘योजक कड़ी’ (Connecting link) है। ये मुख्य रूप से जलीय (Aquatic) होते हैं।

इसे 5 मुख्य समूहों में बाँटा गया है:

  1. क्राइसोफाइट्स (Chrysophytes): इनमें डायटम (Diatoms) और सुनहरे शैवाल (Desmids) आते हैं। डायटम की कोशिका भित्ति में ‘सिलिका’ (Silica) धंसी होती है, जो नष्ट नहीं होती। लाखों वर्षों में समुद्र की तलहटी में जमा हुए डायटम की सिलिका से ‘डायटमी मृदा’ (Diatomaceous earth) बनती है, जिसका उपयोग पॉलिश करने और तेल/सिरप के निस्पंदन (Filtration) में होता है।

  2. डाइनोफ्लैजेलेट्स (Dinoflagellates): ये मुख्य रूप से समुद्री और प्रकाश-संश्लेषी होते हैं। लाल डाइनोफ्लैजेलेट्स (जैसे- Gonyaulax) के तेजी से बढ़ने के कारण समुद्र का पानी लाल दिखने लगता है, जिसे ‘लाल ज्वार’ (Red Tide) कहते हैं। ये जहरीले पदार्थ (Toxins) छोड़ते हैं जिससे मछलियां मर जाती हैं।

  3. यूग्लीनॉइड्स (Euglenoids): (उदाहरण – यूग्लीना)। इनमें कोशिका भित्ति की जगह प्रोटीन से बनी एक लचीली परत ‘पेलिकल’ (Pellicle) होती है। सूर्य के प्रकाश में ये स्वपोषी होते हैं, और प्रकाश न होने पर जंतुओं की तरह शिकार करते हैं।

  4. अवपंक कवक (Slime Moulds): ये मृतोपजीवी (Saprophytic) प्रोटिस्ट हैं जो सड़ी-गली टहनियों से पोषण लेते हैं।

  5. प्रोटोजोआ (Protozoans): ये सभी विषमपोषी होते हैं और शिकारियों या परजीवियों के रूप में रहते हैं। इन्हें जंतुओं का ‘आदिम रिश्तेदार’ (Primitive relative) माना जाता है। अमीबा (Amoeba) और मलेरिया फैलाने वाला परजीवी प्लाज्मोडियम (Plasmodium) इसी समूह में आते हैं।

विषाणु (Viruses), वायरोइड (Viroids) और प्रियन (Prions)

5. जगत कवक (Kingdom Fungi)

यह विषमपोषी (Heterotrophic) जीवों का एक अनूठा जगत है। फफूंदी (Mould), मशरूम और टोडस्टूल इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

  • कोशिका भित्ति: कवक की कोशिका भित्ति ‘काइटिन’ (Chitin) और पॉलीसैकराइड से बनी होती है (पौधों की तरह सेल्युलोज से नहीं)।

  • पोषण: ये अपना भोजन मृत सड़े-गले पदार्थों से अवशोषित करते हैं, इसलिए इन्हें मृतोपजीवी (Saprophytes) कहते हैं।

  • संरचना: ‘यीस्ट’ (Yeast) को छोड़कर (जो एककोशिकीय है), सभी कवक बहुकोशिकीय होते हैं। इनका शरीर लंबे, पतले धागे जैसी संरचनाओं से बना होता है जिसे ‘कवक तंतु’ (Hyphae) कहते हैं। कवक तंतुओं के जाल को ‘माइसीलियम’ (Mycelium) कहा जाता है।

  • सहजीवी संबंध (Symbiosis): जब कवक ‘शैवाल’ (Algae) के साथ मिलकर रहते हैं, तो उस संबंध को ‘लाइकेन’ (Lichen) कहते हैं। जब कवक उच्च पौधों की जड़ों (Roots) के साथ सहजीवी संबंध बनाते हैं, तो उसे ‘माइकोराइजा’ (Mycorrhiza) कहा जाता है।

6. विषाणु (Viruses), वायरोइड (Viroids) और प्रियन (Prions)

व्हिटेकर की 5-जगत प्रणाली की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें विषाणु, वायरोइड और लाइकेन जैसे जीवों को कोई जगह नहीं दी गई है।

A. विषाणु (Viruses)

  • विषाणु ‘अकोशिकीय’ (Acellular) जीव हैं। शरीर के बाहर ये निर्जीव रवे (Crystals) की तरह होते हैं, लेकिन किसी जीवित (Host) कोशिका में प्रवेश करते ही उस कोशिका की मशीनरी पर कब्जा करके सजीव (Living) हो जाते हैं।

  • संरचना: विषाणु एक प्रोटीन आवरण से बने होते हैं जिसे ‘कैप्सिड’ (Capsid) कहते हैं, जिसके अंदर अनुवांशिक पदार्थ (DNA या RNA) होता है। किसी भी वायरस में DNA और RNA दोनों एक साथ नहीं होते।

  • खोज: वायरस की खोज 1892 में ‘दिमित्री इवानोव्स्की’ (D. Ivanowsky) ने तंबाकू के मोज़ेक रोग (TMV) की जाँच करते समय की थी।

B. वायरोइड (Viroids)

  • 1971 में टी.ओ. डायनर (T.O. Diener) ने एक नया संक्रामक कारक खोजा जो वायरस से भी छोटा था।

  • इनमें वायरस की तरह प्रोटीन का आवरण (Capsid) नहीं होता। ये केवल स्वतंत्र RNA (Free RNA) होते हैं।

  • इनके कारण आलू में ‘पोटैटो स्पिंडल ट्यूबर’ (Potato Spindle Tuber) नामक रोग होता है।

C. प्रियन (Prions)

  • ये असामान्य रूप से ‘मुड़े हुए प्रोटीन’ (Abnormally folded proteins) होते हैं, जो आकार में वायरस के बराबर होते हैं।

  • ये मवेशियों (गायों) में ‘मैड काउ रोग’ (Bovine Spongiform Encephalopathy – BSE) और मनुष्यों में इसका समान रूप (Cr-Jacob Disease) पैदा करते हैं।

7. पादप और जंतु जगत (Plantae and Animalia) – एक नज़र

  • पादप जगत: इसमें सभी यूकैरियोटिक, क्लोरोफिल वाले स्वपोषी जीव आते हैं। इनकी कोशिका भित्ति सेल्युलोज की बनी होती है। (शैवाल, ब्रायोफाइट्स, टेरिडोफाइट्स, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म)। इनका विस्तृत अध्ययन हम अगले ब्लॉग में करेंगे।

  • जंतु जगत: इसमें बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक विषमपोषी जीव आते हैं। इनमें कोशिका भित्ति नहीं पाई जाती है। ये अपना भोजन जठरांत्र (आहार नाल) में पचाते हैं और ‘ग्लाइकोजन’ (Glycogen) या वसा के रूप में ऊर्जा संचित करते हैं।

8. निष्कर्ष (Conclusion)

जैविक वर्गीकरण का विज्ञान न केवल हमारी प्रकृति को व्यवस्थित ढंग से समझने में मदद करता है, बल्कि यह विकासवाद (Evolution) के रहस्यों को भी खोलता है। मोनेरा के सरल जीवाणुओं से लेकर जंतुओं और पादपों की जटिल बहुकोशिकीय संरचना तक का सफर यह सिद्ध करता है कि जीवन एक निरंतर बहने वाली धारा है। व्हिटेकर की प्रणाली आज भी जीव विज्ञान की रीढ़ है। यद्यपि वायरस और वायरोइड्स जैसे ‘सजीव-निर्जीव की सीमा’ पर बैठे जीवों ने कुछ चुनौतियां खड़ी की हैं, फिर भी वर्गीकरण विज्ञान निरंतर नई खोजों के साथ खुद को अपडेट कर रहा है।

9. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)

प्रश्न 1: आर.एच. व्हिटेकर द्वारा प्रतिपादित ‘पाँच जगत वर्गीकरण’ के आधारभूत मापदंड (Criteria) क्या हैं? लीनियस की द्वि-जगत प्रणाली की तुलना में यह क्यों अधिक वैज्ञानिक और व्यावहारिक है? (250 शब्द)

प्रश्न 2: मोनेरा जगत के अंतर्गत ‘आर्कीबैक्टीरिया’ (Archaebacteria) और ‘यूबैक्टीरिया’ (Eubacteria) के बीच संरचनात्मक और कार्यात्मक अंतरों का विश्लेषण कीजिए। (150 शब्द)

प्रश्न 3: ‘प्रोटिस्टा जगत (Protista) पादप, जंतु और कवक जगत के बीच एक योजक कड़ी (Connecting link) के रूप में कार्य करता है।’ डायटम और यूग्लीना के उदाहरणों के साथ इस कथन की पुष्टि करें। (200 शब्द)

प्रश्न 4: विषाणु (Viruses), वायरोइड (Viroids) और प्रियन (Prions) की संरचना और उनके द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले प्रमुख रोगों का संक्षिप्त वर्णन करें। इन्हें पाँच जगत प्रणाली में स्थान क्यों नहीं मिला? (200 शब्द)

प्रश्न 5: कवक (Fungi) जगत की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख करते हुए पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) में एक मृतोपजीवी (Saprophyte) और सहजीवी (Symbiont – लाइकेन/माइकोराइजा) के रूप में उनके महत्व पर प्रकाश डालिए। (150 शब्द)

10. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)

  1. जीवों का सबसे पहला ‘वैज्ञानिक वर्गीकरण’ (Scientific classification) प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक अरस्तु (Aristotle) द्वारा किया गया था।

  2. कैरोलस लीनियस (Carolus Linnaeus) ने ‘द्वि-जगत प्रणाली’ (Two Kingdom Classification) दी थी, जिसमें जीवों को ‘पादप’ और ‘जंतु’ में बाँटा गया था।

  3. आर.एच. व्हिटेकर (R.H. Whittaker) ने वर्ष 1969 में जीवों की ‘पाँच जगत प्रणाली’ (Five Kingdom System) का प्रस्ताव रखा था।

  4. व्हिटेकर की प्रणाली के 5 जगत हैं: मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक (Fungi), पादप (Plantae) और जंतु (Animalia)।

  5. ‘मोनेरा जगत’ (Monera) में सभी प्रोकैरियोटिक (अविकसित केंद्रक वाले) और एककोशिकीय जीवों (जीवाणुओं) को रखा गया है।

  6. आर्कीबैक्टीरिया (Archaebacteria) पृथ्वी के सबसे कठोर और चरम स्थानों (गर्म झरने, खारे पानी) में रहने वाले सबसे प्राचीन जीवाणु हैं।

  7. गाय और भैंस (जुगाली करने वाले जानवरों) के पेट (Rumen) में ‘मिथेनोजेन्स’ (Methanogens) नामक आर्कीबैक्टीरिया पाए जाते हैं जो बायोगैस (मीथेन) बनाते हैं।

  8. साइनोबैक्टीरिया (Cyanobacteria) को ‘नील-हरित शैवाल’ (Blue-green algae) भी कहा जाता है और ये अपना भोजन पौधों की तरह स्वयं बनाते हैं।

  9. नोस्टॉक (Nostoc) और एनाबीना (Anabaena) जैसे साइनोबैक्टीरिया ‘हेटेरोसिस्ट’ (Heterocyst) नामक कोशिका द्वारा नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen fixation) करते हैं।

  10. ‘माइकोप्लाज्मा’ (Mycoplasma) अब तक ज्ञात सबसे छोटी जीवित कोशिकाएं हैं।

  11. माइकोप्लाज्मा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें ‘कोशिका भित्ति’ (Cell wall) बिल्कुल नहीं पाई जाती है और ये बिना ऑक्सीजन के जीवित रह सकते हैं।

  12. जीवाणुओं (Bacteria) का आकार मुख्य रूप से 4 प्रकार का होता है: कोकस (गोल), बेसिलस (छड़), विब्रियो (कॉमा) और स्पाइरिलम (सर्पिल)।

  13. दूध को दही में बदलने का कार्य ‘लैक्टोबैसिलस’ (Lactobacillus) नामक विषमपोषी जीवाणु द्वारा किया जाता है।

  14. ‘प्रोटिस्टा जगत’ (Protista) में उन सभी जीवों को रखा गया है जो एककोशिकीय (Unicellular) होने के साथ-साथ यूकैरियोटिक (Eukaryotic – विकसित केंद्रक वाले) हैं।

  15. प्रोटिस्टा जगत के अधिकांश सदस्य मुख्य रूप से जलीय (Aquatic) होते हैं।

  16. ‘क्राइसोफाइट्स’ (Chrysophytes) समूह में डायटम और सुनहरे शैवाल (Desmids) आते हैं, जो समुद्र के मुख्य उत्पादक (Chief producers) माने जाते हैं।

  17. डायटम (Diatoms) की कोशिका भित्ति में ‘सिलिका’ (Silica) घुली होती है, जिसके कारण यह अविनाशी (Indestructible) होती है।

  18. समुद्र की तलहटी में डायटम के जमाव से ‘डायटमी मृदा’ (Diatomaceous earth) का निर्माण होता है, जिसका उपयोग पॉलिश करने और तेल छानने में होता है।

  19. लाल डाइनोफ्लैजेलेट्स (Dinoflagellates – जैसे गोन्याउलैक्स) की संख्या समुद्र में अचानक बढ़ने से ‘लाल ज्वार’ (Red Tide) आता है।

  20. ‘यूग्लीना’ (Euglena) को पादप और जंतु के बीच की ‘योजक कड़ी’ (Connecting link) कहा जाता है।

  21. यूग्लीना में कोशिका भित्ति नहीं होती; इसके शरीर पर प्रोटीन युक्त एक लचीली परत होती है जिसे ‘पेलिकल’ (Pellicle) कहते हैं।

  22. ‘अवपंक कवक’ (Slime moulds) मृतोपजीवी (Saprophytic) प्रोटिस्ट हैं जो सड़ी-गली लकड़ियों पर वृद्धि करते हैं।

  23. सभी प्रोटोजोआ (Protozoans) विषमपोषी (Heterotrophic) होते हैं; मलेरिया परजीवी (Plasmodium) ‘स्पोरोजोआ’ समूह का एक प्रोटोजोआ है।

  24. ‘कवक जगत’ (Fungi) में मशरूम, यीस्ट और फफूंदी (Moulds) जैसे विषमपोषी जीवों को शामिल किया गया है।

  25. कवक अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते क्योंकि इनमें प्रकाश-संश्लेषण के लिए ‘क्लोरोफिल’ (Chlorophyll) नहीं होता।

  26. कवक (Fungi) की कोशिका भित्ति ‘काइटिन’ (Chitin) और पॉलीसैकराइड से बनी होती है।

  27. कवक का शरीर लंबे धागों जैसी संरचनाओं से बना होता है, जिन्हें ‘कवक तंतु’ (Hyphae / हाइफी) कहा जाता है।

  28. कवक तंतुओं (Hyphae) के एक बड़े जाल को ‘माइसीलियम’ (Mycelium / कवक जाल) कहा जाता है।

  29. ‘यीस्ट’ (Yeast / खमीर) एकमात्र ऐसा कवक है जो एककोशिकीय (Unicellular) होता है; इसका उपयोग बेकिंग और शराब (Alcohol) उद्योग में होता है।

  30. दुनिया की पहली एंटीबायोटिक (पेनिसिलिन) का निर्माण ‘पेनिसिलियम नोटेटम’ (Penicillium notatum) नामक कवक से किया गया था।

  31. कवक (Fungi) और शैवाल (Algae) के परस्पर लाभप्रद ‘सहजीवी संबंध’ (Symbiotic relationship) को ‘लाइकेन’ (Lichen) कहा जाता है।

  32. कवक और उच्च पौधों (जैसे चीड़/Pine) की जड़ों के बीच के सहजीवी संबंध को ‘माइकोराइजा’ (Mycorrhiza) कहा जाता है।

  33. पादप जगत (Plantae) की कोशिकाओं में कोशिका भित्ति (Cell wall) ‘सेल्युलोज’ (Cellulose) की बनी होती है।

  34. जंतु जगत (Animalia) के जीवों की कोशिकाओं में ‘कोशिका भित्ति’ (Cell wall) का पूर्णतः अभाव होता है।

  35. जंतु अपना भोजन पेट (आहार नाल) में पचाते हैं और ‘ग्लाइकोजन’ (Glycogen) या ‘वसा’ (Fat) के रूप में अतिरिक्त भोजन संचित करते हैं।

  36. विषाणु (Viruses), वायरोइड (Viroids) और प्रियन (Prions) को व्हिटेकर की 5-जगत प्रणाली में स्थान नहीं दिया गया क्योंकि वे ‘अकोशिकीय’ (Acellular) जीव हैं।

  37. ‘विषाणु’ (Virus) सजीव और निर्जीव के बीच की कड़ी हैं; ये जीवित कोशिका के बाहर निर्जीव रवे (Crystals) की तरह व्यवहार करते हैं।

  38. वायरस (Virus) नाम का अर्थ होता है ‘विषैला तरल’ (Venom) जिसे पाश्चर (Pasteur) ने दिया था।

  39. वायरस की खोज 1892 में ‘दिमित्री इवानोव्स्की’ (Dimitri Ivanowsky) ने की थी, जब उन्होंने तंबाकू में मोज़ेक रोग (TMV) के कारणों का अध्ययन किया।

  40. एम.डब्ल्यू. बीजेरिनक (M.W. Beijerinck) ने संक्रमित तंबाकू के रस को ‘कंटेजियम विवम फ्लुइडम’ (Contagium vivum fluidum – संक्रामक जीवित तरल) नाम दिया।

  41. डब्ल्यू.एम. स्टेनली (W.M. Stanley) ने पहली बार यह सिद्ध किया कि वायरस को रवाकृत (Crystallized) किया जा सकता है।

  42. वायरस के शरीर का बाहरी आवरण प्रोटीन का बना होता है जिसे ‘कैप्सिड’ (Capsid) कहते हैं।

  43. किसी भी वायरस में अनुवांशिक पदार्थ के रूप में या तो ‘डीएनए’ (DNA) या ‘आरएनए’ (RNA) होता है, दोनों कभी एक साथ नहीं होते।

  44. जीवाणुओं (Bacteria) को संक्रमित करने वाले वायरसों को ‘जीवाणुभोजी’ (Bacteriophage) कहा जाता है (आमतौर पर इनमें डबल-स्ट्रैंडेड DNA होता है)।

  45. ‘वायरोइड’ (Viroids) की खोज टी.ओ. डायनर (T.O. Diener) ने 1971 में की थी।

  46. वायरोइड वायरस से भी छोटे होते हैं, इनमें प्रोटीन आवरण (Capsid) नहीं होता, ये केवल स्वतंत्र ‘आरएनए’ (Free RNA) होते हैं।

  47. वायरोइड के कारण आलू में ‘पोटैटो स्पिंडल ट्यूबर’ (Potato spindle tuber) नामक संक्रामक रोग होता है।

  48. ‘प्रियन’ (Prions) असामान्य रूप से मुड़े हुए ‘प्रोटीन’ (Abnormally folded proteins) के कण होते हैं, जो आकार में वायरस के समान होते हैं।

  49. प्रियन (Prions) के कारण मवेशियों में ‘मैड काउ रोग’ (BSE) और इंसानों में ‘सीआर-जैकब रोग’ (CJD) नामक घातक न्यूरोलॉजिकल बीमारियां होती हैं।

  50. ‘लाइकेन’ (Lichens) वायु प्रदूषण, विशेषकर ‘सल्फर डाइऑक्साइड’ (SO2) के अत्यंत संवेदनशील और अच्छे प्राकृतिक संकेतक (Indicators) होते हैं; प्रदूषित इलाकों में लाइकेन नहीं उगते।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top