पाषाण कालीन कला

पाषाण कालीन कला एवं शैलचित्र

1. विस्तृत प्रस्तावना: पाषाण कालीन कला क्या है? 

जब आदिमानव के पास न कोई भाषा थी, न लिपि थी और न ही कोई विकसित सभ्यता, तब भी उसके अंदर अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने की एक तीव्र लालसा थी। इसी लालसा ने पाषाण कालीन कला (Stone Age Art) को जन्म दिया। गुफाओं की अंधेरी दीवारों पर उकेरे गए ये शैलचित्र (Rock Paintings) केवल चित्र नहीं हैं, बल्कि यह उस आदिमानव की ‘डायरी’ हैं, जिसमें उसने अपने दैनिक जीवन, संघर्ष, शिकार और उत्सवों को हमेशा के लिए दर्ज कर दिया।

भारत में पाषाण कालीन कला की खोज का इतिहास बहुत रोचक है। स्पेन की प्रसिद्ध ‘अल्तामिरा’ (Altamira) गुफाओं की खोज से भी 12 साल पहले, वर्ष 1867-68 में एक अंग्रेज अधिकारी आर्चीबाल्ड कार्लाइल (Archibald Carlleyle) ने उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले (सुहागीघाट) में भारत के पहले शैलचित्रों की खोज की थी।

2. पाषाण कालीन कला के विभिन्न चरण

भारतीय इतिहास में पाषाण कालीन कला का विकास अचानक नहीं हुआ, बल्कि यह समय के साथ उन्नत होती गई। इसे मुख्य रूप से तीन चरणों में देखा जा सकता है:

A. उच्च पुरापाषाण काल (Upper Paleolithic Period)

इस काल में पाषाण कालीन कला का जन्म हुआ।

  • चित्रों की विशेषता: इस समय के चित्र बहुत बड़े, रैखिक (Linear) और चपटे होते थे। इनमें मुख्य रूप से जानवरों (जैसे गैंडा, हाथी, बाघ, सूअर) को विशाल आकार में दर्शाया गया है।

  • रंग: इस काल के चित्रों में मुख्य रूप से गहरे लाल (Geru) और हरे (Green) रंगों का प्रयोग किया गया है। हरा रंग कैल्सेडोनी (Chalcedony) नामक पत्थर से और लाल रंग हेमेटाइट (लोहे के अयस्क) से बनाया जाता था।

  • मानव आकृतियों को बहुत कम और तीली (Stick-like) के समान दर्शाया गया है।

B. मध्य पाषाण काल (Mesolithic Period) – कला का स्वर्ण युग

पाषाण कालीन कला का सबसे बेहतरीन और सबसे बड़ा संग्रह इसी काल का है।

  • चित्रों की विशेषता: इस काल में चित्रों का आकार छोटा हो गया, लेकिन विषयों में भारी विविधता आ गई। जानवरों के साथ-साथ अब मानव जीवन के हर पहलू को चित्रित किया जाने लगा।

  • विषय (Themes): शिकार करते हुए समूह, तीर-कमान और भाले लिए हुए शिकारी, जानवरों को हांकना, नृत्य (Dancing), और यहाँ तक कि पारिवारिक जीवन (माँ और बच्चे) के चित्र बहुतायत में मिलते हैं।

  • इस काल की पाषाण कालीन कला यह स्पष्ट बताती है कि अब मानव ने अकेले रहने के बजाय ‘समूह’ (Community) में रहना शुरू कर दिया था।

C. नवपाषाण काल और ताम्रपाषाण काल (Neolithic & Chalcolithic Period)

  • इस काल तक आते-आते पाषाण कालीन कला के चित्रों की संख्या कम होने लगी क्योंकि मानव कृषि करने लगा था और गुफाओं से बाहर आकर बस्तियां बसाने लगा था।

  • चित्रों में अब जंगली जानवरों की जगह ‘पालतू जानवरों’ (जैसे कुत्ता, बैल, भेड़) ने ले ली थी।

  • ताम्रपाषाण काल के चित्रों में धातु के हथियारों (तांबे की कुल्हाड़ी) का चित्रण भी देखने को मिलता है।

पाषाण कालीन कला

3. पाषाण कालीन कला के प्रमुख केंद्र (Major Sites in India)

भारत के विभिन्न राज्यों में पाषाण कालीन कला के उत्कृष्ट उदाहरण बिखरे पड़े हैं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण निम्नलिखित हैं:

I. भीमबेटका (Bhimbetka) – मध्य प्रदेश

  • खोज: वर्ष 1957-58 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद् डॉ. वी.एस. वाकणकर (V.S. Wakankar) ने इसकी खोज की थी। (उन्हें ट्रेन के सफर के दौरान यहाँ की चट्टानें दिखीं और उन्होंने जंगल में जाकर इन्हें खोज निकाला)।

  • विशेषता: यह दुनिया में पाषाण कालीन कला का सबसे बड़ा केंद्र है। यहाँ लगभग 700 से अधिक गुफाएं (Rock Shelters) हैं, जिनमें से 400 में चित्र मौजूद हैं।

  • यहाँ के शैलचित्र मुख्य रूप से ‘मध्य पाषाण काल’ के हैं। यहाँ शिकार, नृत्य, और जानवरों के बहुत जीवंत चित्र हैं।

  • इसे वर्ष 2003 में यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।

II. आदमगढ़ (Adamgarh) और पचमढ़ी – मध्य प्रदेश

  • आदमगढ़ (होशंगाबाद): यहाँ के शैलचित्रों में जिराफ और विशाल हाथियों के चित्र मिले हैं। यहाँ से पशुपालन के शुरुआती साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं।

  • पचमढ़ी (महादेव पहाड़ियां): यहाँ की पाषाण कालीन कला में सफेद और लाल रंगों का प्रयोग हुआ है। यहाँ युद्ध के दृश्य, तीर-कमान लिए सैनिक और शहद इकट्ठा (Honey Collection) करते हुए मानव का प्रसिद्ध चित्र मिला है।

III. लखुडियार (Lakhudiyar) – उत्तराखंड

  • अल्मोड़ा जिले में सुयाल नदी के तट पर स्थित लखुडियार का अर्थ है ‘एक लाख गुफाएं’।

  • यहाँ की पाषाण कालीन कला में लहरदार रेखाएं (Wavy lines), छिपकली जैसी आकृतियां और छड़ीनुमा मानव (Stick-like humans) आकृतियां बहुत प्रसिद्ध हैं। मानव आकृतियों को एक-दूसरे का हाथ पकड़कर नृत्य करते हुए दिखाया गया है।

IV. दक्षिण भारत के केंद्र (कुपगल्लू, पिक्लीहल, टेक्कलकोटा)

  • कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के इन क्षेत्रों में नवपाषाण काल और ताम्रपाषाण काल की कला के प्रमाण मिलते हैं।

  • यहाँ की पाषाण कालीन कला में कृषि और पालतू जानवरों (विशेषकर वृषभ / Humped Bull) को बहुत महत्व दिया गया है।

4. पाषाण कालीन कला में प्रयुक्त रंग और तकनीक

आदिमानव के पास कोई आधुनिक ब्रश या रंग नहीं थे, फिर भी उनकी पाषाण कालीन कला हजारों सालों बाद आज भी सुरक्षित है।

  • रंगों का निर्माण: वे प्राकृतिक खनिजों का उपयोग करते थे। लाल रंग के लिए ‘गेरू’ (Ochre) या हेमेटाइट, सफेद रंग के लिए चूना पत्थर (Limestone), और काले रंग के लिए कोयला (Charcoal) या मैंगनीज का प्रयोग होता था।

  • रंगों को पक्का करना: रंगों को टिकाऊ बनाने के लिए खनिजों को पीसकर उसमें जानवरों की चर्बी (Animal Fat), पेड़ों का गोंद (Resin), या पौधों का रस मिलाया जाता था।

  • ब्रश (Brush): वे चित्र बनाने के लिए जानवरों के बालों, पेड़ की टहनियों (Twigs), या अपनी उंगलियों का प्रयोग करते थे।

5. पाषाण कालीन कला का ऐतिहासिक महत्व (Significance)

इतिहासकारों के लिए पाषाण कालीन कला केवल पेंटिंग नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्रोत (Archaeological Source) है।

  1. सामाजिक जीवन की जानकारी: ये चित्र बताते हैं कि आदिमानव समाज में श्रम का विभाजन (Division of Labour) शुरू हो गया था। (पुरुष शिकार करते दिखते हैं और महिलाएं भोजन/बच्चों की देखभाल करती हैं)।

  2. पर्यावरण का ज्ञान: चित्रों में मौजूद जानवरों (जैसे बाघ, गैंडा) से पता चलता है कि उस समय उस विशेष क्षेत्र का पर्यावरण और जलवायु कैसी थी।

  3. धार्मिक विश्वास: जादुई टोटके, नृत्य और कुछ अजीब आकृतियों से पता चलता है कि आदिमानव अलौकिक शक्तियों में विश्वास करने लगा था।

6. निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहा जाए तो, पाषाण कालीन कला मानव के बौद्धिक विकास का पहला ठोस प्रमाण है। जब मनुष्य ने अपनी दैनिक उत्तरजीविता (Survival) की जद्दोजहद से ऊपर उठकर अपनी रचनात्मकता (Creativity) को चट्टानों पर उकेरा, तो उसने अनजाने में ही इतिहास का निर्माण कर दिया। भीमबेटका और लखुडियार के ये शैलचित्र आज भी हमें हमारे उन पूर्वजों की याद दिलाते हैं, जिन्होंने प्रकृति के सबसे कठोर प्रहारों के बीच भी जीवन का जश्न मनाना सीख लिया था। भारतीय संस्कृति की नींव वास्तव में इसी पाषाण कालीन कला से जुड़ी हुई है।

7. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)

प्रश्न 1: भारत में पाषाण कालीन कला के विकास क्रम को उच्च पुरापाषाण काल से नवपाषाण काल तक स्पष्ट करें। (250 शब्द)

प्रश्न 2: भीमबेटका के शैलचित्रों की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें। यह पाषाण कालीन कला तत्कालीन समाज और अर्थव्यवस्था के बारे में हमें क्या जानकारी देती है? (200 शब्द)

प्रश्न 3: पुरातात्विक स्रोत के रूप में पाषाण कालीन कला (Rock Art) के महत्व का मूल्यांकन कीजिए। क्या ये चित्र केवल सजावट के लिए थे या इनका कोई अनुष्ठानिक महत्व भी था? (150 शब्द)

प्रश्न 4: मध्य पाषाण काल (Mesolithic period) को भारत में पाषाण कालीन कला का ‘स्वर्ण युग’ क्यों कहा जाता है? (150 शब्द)

प्रश्न 5: आदिमानव द्वारा शैलचित्रों (Rock Paintings) के निर्माण में उपयोग किए गए रंगों (Pigments) और तकनीकों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करें। (150 शब्द)

8. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)

  1. दुनिया में सबसे पहले शैलचित्रों (Rock Paintings) की खोज स्पेन की ‘अल्तामिरा’ (Altamira) गुफाओं में हुई थी।

  2. भारत में पाषाण कालीन कला (शैलचित्रों) की खोज सबसे पहले 1867-68 में आर्चीबाल्ड कार्लाइल (Archibald Carlleyle) ने की थी।

  3. कार्लाइल ने भारत के पहले शैलचित्र उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले (सुहागीघाट) में खोजे थे।

  4. भारत में पाषाण कालीन कला का सबसे बड़ा और सबसे प्रसिद्ध केंद्र ‘भीमबेटका’ (मध्य प्रदेश) है।

  5. भीमबेटका की गुफाओं की खोज 1957-58 में डॉ. वी.एस. वाकणकर (V.S. Wakankar) ने की थी।

  6. वाकणकर महोदय को भीमबेटका की खोज का विचार तब आया जब वे नागपुर से भोपाल ट्रेन से जा रहे थे और उन्हें विंध्य पर्वतमाला की चट्टानें दिखीं।

  7. भीमबेटका मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के अंतर्गत स्थित है।

  8. यूनेस्को (UNESCO) ने वर्ष 2003 में भीमबेटका को ‘विश्व धरोहर स्थल’ (World Heritage Site) घोषित किया।

  9. भारत में पाषाण कालीन कला की शुरुआत मुख्य रूप से ‘उच्च पुरापाषाण काल’ (Upper Paleolithic) से मानी जाती है।

  10. उच्च पुरापाषाण काल के शैलचित्रों में मुख्य रूप से गहरे लाल और हरे रंग का प्रयोग किया गया है।

  11. हरा रंग ‘कैल्सेडोनी’ (Chalcedony) पत्थर से और लाल रंग ‘हेमेटाइट’ (गेरू) से बनाया जाता था।

  12. मध्य पाषाण काल (Mesolithic period) में पाषाण कालीन कला अपने चरम (Peak) पर पहुँच गई थी।

  13. मध्य पाषाण काल के शैलचित्रों में मानव आकृतियों को ‘छड़ीनुमा’ (Stick-like) या रेखाओं के रूप में दर्शाया गया है।

  14. शिकार (Hunting) और समूह नृत्य (Group Dancing) मध्य पाषाण काल की पाषाण कालीन कला के सबसे प्रमुख विषय (Themes) हैं।

  15. आदिमानव द्वारा रंगों को स्थायी (Permanent) बनाने के लिए खनिजों के पाउडर में जानवरों की चर्बी (Animal Fat) मिलाई जाती थी।

  16. उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में सुयाल नदी के किनारे ‘लखुडियार’ (Lakhudiyar) नामक महत्वपूर्ण शैलचित्र स्थल है।

  17. लखुडियार का शाब्दिक अर्थ ‘एक लाख गुफाएं’ होता है।

  18. लखुडियार की पाषाण कालीन कला में लहरदार रेखाओं और एक-दूसरे का हाथ पकड़कर नाचते हुए मानव समूह का चित्र बहुत प्रसिद्ध है।

  19. कश्मीर के ‘बुर्जहोम’ से एक चपटे पत्थर पर खुदा हुआ शिकार का दृश्य मिला है, जो शिकार कला का अनूठा उदाहरण है।

  20. मध्य प्रदेश के ‘आदमगढ़’ (होशंगाबाद) के शैलचित्रों में विशाल हाथी और जिराफ के चित्र मिले हैं।

  21. आदमगढ़ के चित्रों में पशुओं को चराने (पशुपालन) के दृश्य दिखाई देते हैं।

  22. पचमढ़ी (महादेव पहाड़ियां, म.प्र.) की पाषाण कालीन कला में ‘शहद इकट्ठा करते हुए’ (Honey gathering) मानव का चित्र मिला है।

  23. नवपाषाण काल आते-आते पाषाण कालीन कला में शिकार के दृश्यों की जगह कृषि और पालतू जानवरों के दृश्यों ने ले ली।

  24. दक्षिण भारत में कुपगल्लू, पिक्लीहल और टेक्कलकोटा (कर्नाटक) पाषाण कालीन कला के प्रमुख केंद्र हैं।

  25. दक्षिण भारत के शैलचित्रों में ‘कूबड़ वाले बैल’ (Humped Bull / वृषभ) को अत्यधिक महत्व दिया गया है।

  26. शैलचित्रों के अध्ययन से यह प्रमाणित होता है कि मध्य पाषाण काल में ‘श्रम का विभाजन’ (Division of Labour) अस्तित्व में आ चुका था।

  27. पाषाण कालीन कला में महिलाओं को मुख्य रूप से अन्न पीसते हुए या बच्चों की देखभाल करते हुए चित्रित किया गया है।

  28. भीमबेटका की एक गुफा में एक विशाल लाल सूअर (Boar) का चित्र है, जो मानव आकृतियों पर हमला कर रहा है।

  29. आदिमानव अपनी पाषाण कालीन कला के लिए ब्रश बनाने हेतु जानवरों के बालों या पेड़ की टहनियों को चबाकर उपयोग करते थे।

  30. शैलचित्रों में कहीं-कहीं मानव आकृतियों को जानवरों के सींग (Horns) पहने हुए दिखाया गया है, जो ‘जादुई या अनुष्ठानिक’ महत्व को दर्शाता है।

  31. महाराष्ट्र के ‘पाटणे’ (Patne) नामक स्थान से शुतुरमुर्ग के अंडे के छिलकों पर उकेरे गए चित्र (Engravings) मिले हैं।

  32. ताम्रपाषाण कालीन (Chalcolithic) शैलचित्रों में मानव को धातु (तांबे) के हथियारों के साथ शिकार करते हुए दिखाया गया है।

  33. भीमबेटका में लगभग 400 गुफाएं ऐसी हैं जिनमें पाषाण कालीन कला (चित्र) मौजूद हैं।

  34. भीमबेटका के चित्र विंध्याचल के घने जंगलों में बलुआ पत्थर (Sandstone) की चट्टानों पर बनाए गए हैं।

  35. शैलचित्रों में सफेद रंग बनाने के लिए मुख्य रूप से ‘चूना पत्थर’ (Limestone) का उपयोग किया जाता था।

  36. पाषाण कालीन कला में काले रंग के लिए लकड़ी के कोयले (Charcoal) या मैंगनीज का प्रयोग होता था।

  37. कुछ गुफाओं में चित्रों के ऊपर चित्र (Superimposition of paintings) मिले हैं, जो बताते हैं कि एक ही गुफा का कई पीढ़ियों तक उपयोग हुआ।

  38. चित्रों का गुफाओं की बहुत ऊँचाई या छत (Ceilings) पर बनाया जाना यह दर्शाता है कि इनका कुछ धार्मिक या जादुई महत्व भी रहा होगा।

  39. कर्नाटक के बेलारी (Bellary) जिले में फासेट (Fawcett) ने 1892 में दक्षिण भारत के पहले शैलचित्र खोजे थे।

  40. जोगिमारा गुफा (छत्तीसगढ़) भारत में प्राचीनतम भित्ति चित्रों (Mural paintings) में से एक है, यद्यपि यह मौर्य काल की मानी जाती है।

  41. पाषाण कालीन कला का एक बड़ा उद्देश्य शायद आने वाली पीढ़ी को शिकार के तरीके सिखाना (Communication/Education) भी था।

  42. भीमबेटका की गुफा संख्या III F-23 को ‘ऑडिटोरियम केव’ (Auditorium Cave) कहा जाता है, जो सबसे बड़ी है।

  43. ‘ज़ू रॉक’ (Zoo Rock) भीमबेटका की एक प्रसिद्ध चट्टान है जहाँ एक साथ कई प्रकार के जानवरों को चित्रित किया गया है।

  44. आदिमानवों ने अपनी पाषाण कालीन कला में सांपों (Snakes) का चित्रण बहुत ही कम या न के बराबर किया है।

  45. मध्य पाषाण काल के चित्रों में शिकारियों को मुखौटे (Masks) पहने हुए भी दिखाया गया है।

  46. शैलचित्रों के अलावा आदिमानव ने हड्डियों पर नक्काशी (Bone Engravings) करके भी अपनी कला का प्रदर्शन किया है।

  47. इलाहाबाद के पास ‘लोहदा नाला’ (बेलन घाटी) से हड्डी की बनी हुई एक ‘मातृदेवी’ (Mother Goddess) की मूर्ति मिली है।

  48. शैलचित्रों में ‘एक्स-रे शैली’ (X-Ray Style) का भी प्रयोग मिलता है, जिसमें जानवर के शरीर के आंतरिक अंगों को रेखाओं से दर्शाया गया है।

  49. पाषाण कालीन कला से हमें उस समय के ‘शिकार-संग्राहक’ (Hunter-Gatherer) समाज की अर्थव्यवस्था का पता चलता है।

  50. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) भीमबेटका और अन्य महत्वपूर्ण शैलचित्रों के संरक्षण का कार्य करता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top