
1. पाषाण कालीन औजार: औजारों का निर्माण और मानव विकास
मानव विकास की कहानी केवल दो पैरों पर खड़े होने (Bipedalism) और मस्तिष्क के आकार के बढ़ने तक सीमित नहीं है। इंसान को प्रकृति के अन्य सभी जीवों से अलग और श्रेष्ठ बनाने वाली सबसे बड़ी घटना थी—‘औजारों का निर्माण’ (Tool Making)। जानवरों के पास आत्मरक्षा और शिकार के लिए मजबूत दांत, पंजे और सींग थे, लेकिन प्रारंभिक मानव शारीरिक रूप से कमजोर था। अपनी इस कमजोरी को दूर करने और प्रकृति पर विजय प्राप्त करने के लिए आदिमानव ने पत्थरों को तराश कर अपने ‘कृत्रिम पंजे और दांत’ बनाए, जिन्हें हम ‘पाषाण कालीन औजार‘ कहते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, औजार बनाना केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं थी, बल्कि यह मानव के ‘संज्ञानात्मक विकास’ (Cognitive Development) का सबसे बड़ा प्रमाण था। यह दर्शाता है कि मानव मस्तिष्क अब भविष्य की जरूरतों को समझने और योजना बनाने में सक्षम हो गया था। इतिहास में ‘होमो हैबिलिस’ (Homo Habilis) को वह प्रथम मानव प्रजाति माना जाता है जिसने सबसे पहले जानबूझकर पत्थरों को तोड़कर औजार बनाए थे।
इन पत्थरों के औजारों के आधार पर ही प्रागैतिहासिक काल को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जाता है: पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल और नवपाषाण काल।
2. पाषाण औजार निर्माण की प्रमुख तकनीकें (Tool Making Techniques)
आदिमानव ने लाखों वर्षों के अनुभव से पत्थरों को मनचाहा आकार देने की कई वैज्ञानिक तकनीकें विकसित की थीं:
A. सीधा प्रहार तकनीक (Direct Percussion)
यह औजार बनाने की सबसे पुरानी और बुनियादी तकनीक है। इसमें एक बड़े पत्थर (Core) को एक हाथ में पकड़ा जाता था और दूसरे हाथ में पकड़े गए गोल पत्थर (Hammer stone / हथौड़े) से उस पर सीधे और जोर से वार किया जाता था। इससे पत्थर के छिलके (Flakes) टूटकर गिर जाते थे और एक धारदार किनारा बन जाता था।
B. ब्लॉक-ऑन-ब्लॉक तकनीक (Block-on-Block Technique)
इस तकनीक में, जिस पत्थर का औजार बनाना होता था (Core), उसे जमीन पर रखे एक बहुत बड़े और स्थिर पत्थर (Anvil) पर जोर से पटका जाता था। इस झटके से पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े (Flakes) अलग हो जाते थे। इस तकनीक का उपयोग बहुत बड़े और भारी औजार बनाने के लिए किया जाता था।
C. दबाव शल्कन तकनीक (Pressure Flaking)
यह उच्च पुरापाषाण और नवपाषाण काल की सबसे उन्नत तकनीक थी। इसमें पत्थर पर सीधे हथौड़े से वार नहीं किया जाता था, बल्कि हड्डी, सींग या लकड़ी के एक नुकीले औजार को पत्थर के किनारे पर रखकर उस पर ‘दबाव’ (Pressure) डाला जाता था। इससे पत्थर के बहुत पतले, बारीक और तीखे छिलके निकलते थे। इसी तकनीक से उन्नत तीरों के अग्रभाग (Arrowheads) और ब्लेड बनाए जाते थे।
3. पुरापाषाण कालीन औजार (Paleolithic Tools)
पुरापाषाण काल (Paleolithic Age) मानव इतिहास का सबसे लंबा कालखंड (लगभग 25 लाख वर्ष पूर्व से 10,000 ई.पू. तक) है। इस काल के औजारों को तीन क्रमिक चरणों में देखा जा सकता है:
A. निम्न पुरापाषाण काल (Lower Paleolithic) – कोर उपकरण (Core Tools)
इस काल में आदिमानव ने मुख्य रूप से ‘क्वार्टजाइट’ (Quartzite) पत्थर का उपयोग किया। इस काल की दो प्रमुख औजार संस्कृतियां थीं:
चॉपर-चॉपिंग संस्कृति (सोहन संस्कृति): ‘चॉपर’ वह बड़ा पत्थर (Pebble) होता था जिसे केवल एक तरफ से छीलकर धार बनाई जाती थी। ‘चॉपिंग’ में पत्थर को दोनों तरफ से छीलकर धारदार बनाया जाता था। (उपयोग: मांस काटने और हड्डियां तोड़ने के लिए)।
हैंड-एक्स संस्कृति (मद्रासी संस्कृति / Acheulean): ‘हैंड एक्स’ (Hand Axe) या हस्त-कुठार (कुल्हाड़ी) इस काल का सबसे प्रमुख औजार था। यह नाशपाती या बादाम के आकार का होता था, जिसे मुट्ठी में पकड़कर इस्तेमाल किया जाता था। इसके साथ ‘क्लीवर’ (Cleaver – विदारणी) का भी उपयोग पेड़ों की छाल छीलने और जानवरों की खाल उतारने के लिए होता था।
B. मध्य पुरापाषाण काल (Middle Paleolithic) – फलक संस्कृति (Flake Culture)
इस काल में औजार बनाने के लिए पत्थरों के कोर (Core) के बजाय उनसे निकले छिलकों यानी ‘फलकों’ (Flakes) का उपयोग बढ़ गया। इन औजारों के निर्माण के लिए चर्ट, जैस्पर और फ्लिंट जैसे अच्छे पत्थरों का उपयोग होने लगा।
प्रमुख औजार: ‘स्क्रेपर’ (Scraper – खुरचनी), जिसका उपयोग जानवरों की खाल को मांस से अलग करने के लिए होता था; और ‘बोरर’ (Borer – वेधनी), जिसका उपयोग लकड़ी या हड्डी में छेद करने के लिए किया जाता था। एच.डी. सांकलिया ने इसे ‘फलक संस्कृति’ का नाम दिया है।
C. उच्च पुरापाषाण काल (Upper Paleolithic) – ब्लेड और हड्डी के औजार
इस काल में औजार निर्माण की तकनीक अपने चरम पर पहुँच गई। आधुनिक मानव (Homo Sapiens) का उदय भी इसी काल में हुआ।
प्रमुख औजार: इस काल की मुख्य विशेषता ‘ब्लेड’ (Blades) और ‘ब्यूरिन’ (Burins – तक्षणी) का निर्माण था। ब्लेड वह पत्थर होता है जिसकी लंबाई उसकी चौड़ाई से कम से कम दोगुनी होती है। ब्यूरिन एक ऐसा औजार था जिसका किनारा छैनी (Chisel) के समान अत्यंत नुकीला होता था, जिसका उपयोग हड्डियों और लकड़ियों पर नक्काशी करने के लिए किया जाता था।
हड्डी के औजार: इस काल में पत्थरों के साथ-साथ जानवरों की हड्डियों और सींगों से बने औजारों (जैसे सुई, हारपून) का व्यापक प्रयोग शुरू हो गया (भारत में मुच्छतला चिंतामनु गावी गुफा से प्रमाण)।
4. मध्यपाषाण कालीन औजार (Mesolithic Tools) – सूक्ष्म पाषाण (Microliths)
जलवायु परिवर्तन (गर्मी बढ़ने) के कारण मध्यपाषाण काल (लगभग 10,000 ई.पू. से 4000 ई.पू.) में जानवरों का आकार छोटा हो गया और वे तेजी से भागने लगे। उनका शिकार करने के लिए भारी पत्थरों की जगह अत्यंत छोटे और हल्के औजारों की आवश्यकता थी।
माइक्रोलिथ्स (Microliths): इस काल के औजार आकार में बहुत छोटे (1 सेंटीमीटर से 5 सेंटीमीटर) होते थे, जिन्हें ‘सूक्ष्म पाषाण औजार’ कहा गया।
औजारों के प्रकार: इन औजारों को उनके आकार के आधार पर ‘ज्यामितीय’ (Geometric – जैसे त्रिभुज, समलंब/Trapeze, और अर्धचंद्राकार/Crescent) और ‘गैर-ज्यामितीय’ में बांटा गया।
समग्र औजार (Composite Tools) और तीर-कमान: माइक्रोलिथ्स को सीधे हाथ से नहीं पकड़ा जा सकता था। इसलिए इन्हें लकड़ी या हड्डी के खांचों (Grooves) में फंसाकर और पेड़ के गोंद से चिपकाकर भाले (Spears) और हंसिया (Sickle) बनाया जाता था। मानव इतिहास के सबसे महान आविष्कारों में से एक ‘तीर-कमान’ (Bow and Arrow) का आविष्कार भी इसी काल में हुआ था।
5. नवपाषाण कालीन औजार (Neolithic Tools) – पॉलिशदार औजारों का युग
नवपाषाण काल (लगभग 7000 ई.पू. से 1000 ई.पू.) कृषि और पशुपालन का काल था। इस नई जीवन शैली के लिए बिल्कुल नए प्रकार के औजारों की आवश्यकता थी।
पॉलिशदार औजार (Polished Stone Tools): इस काल की सबसे बड़ी तकनीकी विशेषता यह थी कि औजारों को केवल छीलकर नहीं, बल्कि उन्हें पत्थर पर घिसकर अत्यंत चिकना, धारदार और ‘पॉलिश’ किया जाने लगा।
सेल्ट (Celt) और कुल्हाड़ियां: लकड़ी काटने और कृषि भूमि तैयार करने के लिए भारी और पॉलिश की हुई पत्थर की कुल्हाड़ियां (Stone Axes) बनाई गईं जिन्हें ‘सेल्ट’ कहा जाता है।
कृषि उपकरण: अनाज को पीसने और कूटने के लिए भारी पत्थरों से बनी ‘ओखली और मूसल’ (Querns and Pestles) का आविष्कार नवपाषाण काल की सबसे बड़ी देन है। इसके अलावा, फसल काटने के लिए हड्डी के हत्थे वाले पत्थर के हंसिए (Sickles) का प्रयोग किया जाने लगा।
6. औजार निर्माण में प्रयुक्त प्रमुख सामग्रियां (Raw Materials Used)
पाषाण काल में आदिमानव ने अपनी भौगोलिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग कच्चे माल का उपयोग किया:
क्वार्टजाइट (Quartzite): निम्न पुरापाषाण काल में मुख्य रूप से इसी कठोर पत्थर का उपयोग किया गया।
चर्ट और फ्लिंट (Chert & Flint): मध्य और उच्च पुरापाषाण काल में इन उच्च कोटि के पत्थरों का उपयोग बढ़ा क्योंकि इनसे आसानी से पतले और तेज धार वाले छिलके (Flakes) निकाले जा सकते थे।
जैस्पर, एगेट और कैल्सेडोनी: मध्यपाषाण काल में सूक्ष्म औजार (Microliths) बनाने के लिए इन अर्ध-कीमती (Semi-precious) पत्थरों का बहुतायत में प्रयोग हुआ।
बेसाल्ट और ग्रेनाइट: नवपाषाण काल में भारी कुल्हाड़ियां और अनाज पीसने की ओखलियां बनाने के लिए इन कठोर आग्नेय चट्टानों को चुना गया।
हड्डियां और सींग (Bones & Antlers): मछली पकड़ने के कांटे (Fish hooks), सुईयां और तीर के अग्रभाग बनाने के लिए हिरण के सींगों और जानवरों की हड्डियों का व्यापक उपयोग किया गया।
7. निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में कहा जाए तो, पाषाण कालीन औजार केवल पत्थर के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि वे मानव की अदम्य इच्छाशक्ति और उसके मस्तिष्क के निरंतर विकास का साक्षात प्रमाण हैं। भद्दे और भारी ‘हैंड एक्स’ से लेकर अत्यंत सूक्ष्म और सटीक ‘माइक्रोलिथ्स’ तथा नवपाषाण काल की ‘पॉलिशदार कुल्हाड़ियों’ तक का सफर उस तकनीकी यात्रा को दर्शाता है जिसने मनुष्य को शिकारी से अन्नदाता (किसान) बना दिया। इन्हीं पाषाण औजारों ने उस धातु युग (ताम्रपाषाण और कांस्य युग) की मजबूत नींव रखी, जिस पर आगे चलकर मेहरगढ़ और सिंधु घाटी जैसी महान सभ्यताओं का निर्माण हुआ।
8. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)
प्रश्न 1: प्रागैतिहासिक काल में पत्थर के औजारों के निर्माण ने मानव के ‘संज्ञानात्मक विकास’ (Cognitive Development) और शारीरिक विकास को किस प्रकार प्रभावित किया? विस्तार से चर्चा करें। (250 शब्द)
प्रश्न 2: पुरापाषाण काल (Paleolithic Age) के तीन प्रमुख चरणों में पाषाण औजारों के निर्माण की तकनीकों और उनके प्रकारों (Core, Flake, and Blade) में आए क्रमिक परिवर्तनों का विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)
प्रश्न 3: मध्यपाषाण काल (Mesolithic Period) को ‘माइक्रोलिथ्स’ (सूक्ष्म पाषाण) का युग क्यों कहा जाता है? समग्र औजारों (Composite tools) और तीर-कमान के आविष्कार ने मानव जीवन शैली को कैसे बदल दिया? (200 शब्द)
प्रश्न 4: नवपाषाण काल (Neolithic Age) के पॉलिशदार पत्थर के औजार और कृषि उपकरण किस प्रकार पुरापाषाण काल के औजारों से भिन्न थे? इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव क्या पड़े? (200 शब्द)
प्रश्न 5: औजार निर्माण की विभिन्न तकनीकों, जैसे ‘सीधा प्रहार’ (Direct Percussion) और ‘दबाव शल्कन’ (Pressure Flaking) को स्पष्ट करते हुए पाषाण काल में प्रयुक्त विभिन्न प्रकार के कच्चे माल पर प्रकाश डालिए। (150 शब्द)
9. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)
मानव इतिहास में औजार बनाने की कला सबसे पहले ‘होमो हैबिलिस’ (Homo Habilis) प्रजाति के मानव द्वारा विकसित की गई थी।
पत्थरों को तराश कर औजार बनाने की प्रक्रिया मानव के मस्तिष्क के संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Evolution) का पहला प्रामाणिक संकेत थी।
पाषाण काल को औजारों की तकनीक और आकार के आधार पर तीन भागों में बांटा गया है: पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल और नवपाषाण काल।
‘कोर’ (Core) वह मूल और भारी पत्थर होता था जिससे छिलके उतारे जाते थे, और ‘फ्लैक’ (Flake) वह छिलका होता था जो प्रहार से टूटकर अलग हो जाता था।
निम्न पुरापाषाण काल के मानव ने औजार बनाने के लिए मुख्य रूप से अत्यंत कठोर ‘क्वार्टजाइट’ (Quartzite) पत्थर का उपयोग किया।
चॉपर (Chopper) वह औजार था जिसमें पत्थर के केवल एक तरफ (One-sided) से छिलके उतारकर धार बनाई जाती थी।
चॉपिंग (Chopping) उपकरण में पत्थर के दोनों किनारों (Two-sided) से छिलके उतारकर उसे धारदार और नुकीला बनाया जाता था।
भारत में चॉपर-चॉपिंग उपकरणों की प्राप्ति सबसे पहले पंजाब की ‘सोहन नदी घाटी’ (पाकिस्तान) से हुई थी, इसलिए इसे ‘सोहन संस्कृति’ भी कहा जाता है।
‘हैंड एक्स’ (Hand Axe) या हस्त-कुठार एक नाशपाती के आकार का पत्थर का औजार था जिसे बिना किसी हत्थे के सीधे मुट्ठी में पकड़कर इस्तेमाल किया जाता था।
भारत में पहला ‘हैंड एक्स’ वर्ष 1863 में रॉबर्ट ब्रूस फुट (Robert Bruce Foote) द्वारा मद्रास (चेन्नई) के पास पल्लवरम से खोजा गया था।
मद्रास के आसपास बड़ी संख्या में हैंड एक्स मिलने के कारण भारतीय पुरापाषाण संस्कृति को ‘मद्रासी संस्कृति’ (Madrasian Culture) भी कहा जाता है।
‘क्लीवर’ (Cleaver) या विदारणी एक चौड़े किनारे वाला औजार था जिसका उपयोग पेड़ों की छाल छीलने और जानवरों की खाल उतारने के लिए किया जाता था।
मध्य पुरापाषाण काल में औजार बनाने के लिए कोर (Core) के बजाय पत्थरों के ‘फ्लैक्स’ (फलक/छिलकों) का उपयोग बहुतायत में होने लगा।
प्रख्यात पुरातत्वविद् एच.डी. सांकलिया ने मध्य पुरापाषाण काल को इसकी विशिष्टता के कारण ‘फलक संस्कृति’ (Flake Culture) का नाम दिया था।
इस काल में चर्ट (Chert), जैस्पर (Jasper) और फ्लिंट (Flint) जैसे अच्छे पत्थरों का प्रयोग होने लगा जो क्वार्टजाइट की तुलना में आसानी से टूटते थे।
‘स्क्रेपर’ (Scraper) या खुरचनी मध्य पुरापाषाण काल का एक प्रमुख औजार था, जिसका उपयोग जानवरों की खाल से मांस और वसा (Fat) को खुरचने के लिए होता था।
‘बोरर’ (Borer) या वेधनी एक सुई के समान नुकीला औजार था, जिसका प्रयोग लकड़ियों और जानवरों की खालों में छेद करने के लिए किया जाता था।
उच्च पुरापाषाण काल औजार निर्माण में ‘ब्लेड और ब्यूरिन’ (Blade and Burin) संस्कृति का काल माना जाता है।
‘ब्लेड’ (Blade) पत्थर का वह पतला और लंबा छिलका होता है जिसकी लंबाई उसकी चौड़ाई की तुलना में कम से कम दोगुनी (Double) होती है।
‘ब्यूरिन’ (तक्षणी) एक अत्यंत नुकीले किनारे वाला पेचकस या छैनी जैसा औजार था, जिसका उपयोग हड्डियों और सींगों पर नक्काशी (Engraving) करने के लिए होता था।
आधुनिक मानव (Homo Sapiens) का विकास भी उच्च पुरापाषाण काल में ही हुआ, जिसने औजारों की तकनीक को अधिक परिष्कृत किया।
‘दबाव शल्कन’ (Pressure Flaking) तकनीक उच्च पुरापाषाण काल में विकसित हुई, जहाँ सीधे वार करने के बजाय दबाव डालकर पत्थर के पतले छिलके निकाले जाते थे।
मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age) के औजार आकार में बहुत छोटे (1 से 5 सेंटीमीटर) होते थे, जिन्हें ‘माइक्रोलिथ्स’ (Microliths) या सूक्ष्म पाषाण कहा गया।
जलवायु परिवर्तन के कारण शिकार छोटे और तेज भागने वाले हो गए थे, जिसके कारण ही भारी हैंड-एक्स की जगह इन माइक्रोलिथ्स का आविष्कार हुआ।
आकार के आधार पर माइक्रोलिथ्स को ज्यामितीय (Geometric) और गैर-ज्यामितीय (Non-geometric) श्रेणियों में बांटा गया है।
ज्यामितीय माइक्रोलिथ्स में मुख्य रूप से त्रिभुज (Triangle), समलंब (Trapeze) और अर्धचंद्राकार (Crescent) आकार के अत्यंत नुकीले पत्थर बनाए जाते थे।
मानव इतिहास के सबसे महान आविष्कारों में से एक ‘तीर-कमान’ (Bow and Arrow) का विकास मध्यपाषाण काल में ही हुआ था।
माइक्रोलिथ्स को सीधे हाथ से पकड़ना असंभव था, इसलिए उन्हें लकड़ी या हड्डी में खांचे (Groove) बनाकर और गोंद से चिपकाकर समग्र औजार (Composite Tools) बनाया गया।
इन सूक्ष्म पाषाण औजारों का उपयोग करके ही आदिमानव ने फसल काटने के लिए ‘हंसिया’ (Sickle) और दूर से शिकार करने के लिए ‘भाले’ (Spears) बनाए।
राजस्थान का ‘बागोर’ (Bagor) और मध्य प्रदेश का ‘आदमगढ़’ (Adamgarh) भारत में माइक्रोलिथ्स (मध्यपाषाण औजारों) के सबसे बड़े प्राप्ति स्थल हैं।
नवपाषाण काल (Neolithic Age) की सबसे बड़ी तकनीकी विशेषता पत्थर के औजारों को घिसकर ‘पॉलिश’ (Polishing) करना था।
औजारों पर पॉलिश करने से वे अत्यंत चिकने, टिकाऊ और उनकी धार (Edge) कई गुना तेज हो गई।
नवपाषाण काल की विशिष्ट पत्थर की कुल्हाड़ियों (Stone Axes) को पुरातात्विक भाषा में ‘सेल्ट’ (Celt) कहा जाता है।
कृषि की शुरुआत के कारण अनाज को पीसने और कूटने के लिए भारी पत्थरों से ‘ओखली और मूसल’ (Querns and Pestles) का आविष्कार नवपाषाण काल में ही हुआ।
नवपाषाण काल में भारी औजार बनाने के लिए ग्रेनाइट और बेसाल्ट जैसी कठोर आग्नेय चट्टानों (Igneous Rocks) का चुनाव किया गया।
हड्डी और सींग (Bone & Antler) के औजारों का सबसे उन्नत और व्यापक प्रयोग नवपाषाण काल के ‘बुर्जहोम’ और ‘गुफकराल’ (कश्मीर) स्थलों से प्राप्त होता है।
मछलियों का शिकार करने के लिए ‘बोन हारपून’ (Bone Harpoons) और कांटे (Fish hooks) सींगों और हड्डियों को तराश कर बनाए जाते थे।
‘ब्लॉक-ऑन-ब्लॉक’ (Block-on-Block) तकनीक में औजार बनाने वाले पत्थर को एक स्थिर और भारी पत्थर (Anvil/निहाई) पर जोर से पटक कर तोड़ा जाता था।
मध्यपाषाण काल में सूक्ष्म औजार बनाने के लिए विशेष रूप से कैल्सेडोनी (Chalcedony) और एगेट (Agate) जैसे अर्ध-कीमती पत्थरों का प्रयोग किया गया।
बेलन घाटी (उत्तर प्रदेश) एक ऐसा अद्वितीय पुरातात्विक स्थल है जहाँ से पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण काल तीनों के औजार एक ही क्रम में प्राप्त हुए हैं।
पाषाण औजारों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक विज्ञान को ‘लिथिक्स’ (Lithics) या पाषाण शिल्प विज्ञान कहा जाता है।
पाषाण काल के अंत और धातु युग की शुरुआत में पत्थरों के साथ-साथ ‘तांबे’ (Copper) के औजारों का प्रयोग होने लगा, जिसे ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic Age) कहा गया।
मेहरगढ़ (Mehrgarh) से नवपाषाण काल के उत्कृष्ट पॉलिशदार पत्थर के औजारों के साथ-साथ दांतों की ड्रिलिंग (Dentistry) के लिए प्रयुक्त सूक्ष्म चकमक पत्थर (Flint) की ड्रिल भी मिली हैं।
आदिमानव ने जानवरों की खाल सिलने के लिए हड्डियों को घिसकर ‘सूई’ (Bone Needles) का निर्माण किया, जो उच्च पुरापाषाण और नवपाषाण काल की बड़ी उपलब्धि थी।
मध्य प्रदेश की ‘भीमबेटका’ गुफाओं से पाषाण औजारों के निर्माण स्थल (Factory sites) के प्रामाणिक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जहाँ भारी मात्रा में पत्थरों का कचरा (Debris) मिला है।
अति-प्राचीन काल में कुछ पत्थरों के औजारों का उपयोग लकड़ी की छड़ियों को आग (Fire) पैदा करने के लिए रगड़ने के साधन के रूप में भी किया जाता था।
जानवरों के मोटे चमड़े (Hide) में छेद करने के लिए पत्थर के जिस नुकीले और मोटे औजार का उपयोग होता था, उसे ‘आवल’ (Awl) या सूआ कहा जाता था।
औजार निर्माण की ‘लेवालवा तकनीक’ (Levallois Technique) मध्य पुरापाषाण काल में विकसित हुई थी, जिसमें कोर को पहले कछुए की पीठ जैसा आकार दिया जाता था और फिर एक सटीक प्रहार से छिलका निकाला जाता था।
पत्थरों से बने इन औजारों (Microliths) के कारण ही आदिमानव के लिए तेज उड़ने वाले पक्षियों का शिकार करना संभव हो पाया।
पाषाण औजारों का यह संपूर्ण क्रमिक विकास यह प्रमाणित करता है कि तकनीकी नवाचार (Technological Innovation) आधुनिक इंसान की नहीं, बल्कि लाखों वर्ष पूर्व के आदिमानव की ही देन है।
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