प्रागैतिहासिक

1.प्रागैतिहासिक भारत के प्रमुख पुरातात्विक स्थल: प्रागैतिहासिक काल का अर्थ और पृष्ठभूमि

‘प्रागैतिहासिक काल’ (Prehistoric Period) मानव इतिहास का वह सुदीर्घ कालखंड है, जिसका हमारे पास कोई भी लिखित साक्ष्य या लिपिबद्ध विवरण उपलब्ध नहीं है। इस काल के मानव जीवन, उसकी संस्कृति, अर्थव्यवस्था और तकनीकी विकास को समझने के लिए इतिहासकार और पुरातत्वविद् पूरी तरह से ‘पुरातात्विक साक्ष्यों’ (Archaeological Evidences) पर निर्भर करते हैं। इन साक्ष्यों में पत्थर के औजार, गुफा चित्र, जानवरों और इंसानों के जीवाश्म (Fossils), राख के ढेर और मृदभांड शामिल हैं।

भारत में प्रागैतिहासिक काल का अध्ययन मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया जाता है:

  1. पुरापाषाण काल (Paleolithic Age): 20 लाख ई.पू. से 10,000 ई.पू. (आखेटक और खाद्य संग्राहक युग)

  2. मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age): 10,000 ई.पू. से 4,000 ई.पू. (सूक्ष्म पाषाण उपकरणों और पशुपालन की शुरुआत का युग)

  3. नवपाषाण काल (Neolithic Age): 4,000 ई.पू. से 2,500 ई.पू. (कृषि क्रांति और स्थायी बस्तियों का युग)

इन युगों की समझ केवल उन विशिष्ट स्थानों के अध्ययन से ही प्राप्त की जा सकती है जहाँ आदिमानव ने निवास किया। आइए, भारत के इन प्रमुख पुरातात्विक स्थलों का युग-अनुसार विस्तृत विश्लेषण करते हैं।

2. पुरापाषाण काल (Paleolithic Age) के प्रमुख पुरातात्विक स्थल

यह काल प्लाइस्टोसीन (Pleistocene – हिमयुग) युग से संबंधित है, जब पृथ्वी का अधिकांश भाग बर्फ से ढका हुआ था। इस समय मानव क्वार्टजाइट (Quartzite) पत्थर से बने भद्दे और अनगढ़े औजारों का उपयोग करता था।

A. भीमबेटका की गुफाएँ (Bhimbetka Caves), मध्य प्रदेश

  • भौगोलिक स्थिति: मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में विंध्य पर्वतमाला की तलहटी में स्थित। यह स्थल भोपाल से लगभग 45 किलोमीटर दूर है।

  • उत्खनन और खोज: इस विश्व प्रसिद्ध स्थल की खोज 1957-58 में डॉ. वी. एस. वाकणकर (V.S. Wakankar) द्वारा की गई थी।

  • पुरातात्विक साक्ष्य और महत्व: यहाँ 700 से अधिक रॉक शेल्टर (Rock Shelters) मौजूद हैं, जिनमें से 400 से अधिक में चित्रकारी की गई है। भीमबेटका की गुफाएं न केवल पुरापाषाण काल, बल्कि मध्यपाषाण काल और ऐतिहासिक काल तक के निरंतर मानव निवास को दर्शाती हैं। यहाँ के चित्रों में शिकार करते हुए मानव, नृत्य, हाथी, गैंडा, जंगली सुअर और बाघ जैसे जानवरों को लाल और सफेद रंगों में बड़ी कुशलता से उकेरा गया है। यह स्थल हमें आदिमानव की संज्ञानात्मक क्रांति (Cognitive Revolution) और कलात्मक अभिव्यक्ति का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक प्रमाण देता है। इसे 2003 में यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।

B. अतिरम्पक्कम (Attirampakkam), तमिलनाडु

  • भौगोलिक स्थिति: चेन्नई के पास कोरटलायार (Kortalayar) नदी बेसिन में स्थित।

  • उत्खनन: इसकी खोज 1863 में ब्रिटिश भूविज्ञानी रॉबर्ट ब्रूस फुट (Robert Bruce Foote) और विलियम किंग द्वारा की गई थी।

  • पुरातात्विक महत्व: यह भारत में खोजा गया सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण पुरापाषाणिक स्थल है। यहाँ से एश्यूलियन (Acheulean) संस्कृति के हस्तकुठार (Handaxes) और विदारणी (Cleavers) प्राप्त हुए हैं। हाल ही में यहाँ से प्राप्त पत्थर के औजारों की थर्मोल्यूमिनेसेंस (TL) डेटिंग से पता चला है कि भारत में मानव उपस्थिति लगभग 15 लाख साल पुरानी हो सकती है, जिसने भारतीय इतिहास के कालक्रम को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है।

C. हुंसगी और बाइसबल घाटी (Hunsgi & Baichbal Valley), कर्नाटक

  • भौगोलिक स्थिति: उत्तरी कर्नाटक के गुलबर्गा जिले में स्थित।

  • महत्व: यह पुरापाषाण काल का एक प्रमुख “कारखाना स्थल” (Factory Site) था। यहाँ के आदिमानव उपकरण बनाने के लिए मुख्य रूप से चूना पत्थर (Limestone) का उपयोग करते थे। चूँकि यहाँ पानी के स्रोत (झरने) साल भर उपलब्ध रहते थे, इसलिए यह लंबे समय तक मानव निवास का केंद्र बना रहा।

D. कुरनूल की गुफाएँ (Kurnool Caves), आंध्र प्रदेश

  • महत्वपूर्ण साक्ष्य: यहाँ से राख के ढेर (Traces of Ash) प्राप्त हुए हैं। यह भारतीय उपमहाद्वीप में ‘आग के उपयोग’ (Use of Fire) का सबसे प्राचीन साक्ष्य है। आग के ज्ञान ने मानव को ठंड से बचने, जंगली जानवरों को दूर भगाने और मांस को भूनकर खाने में मदद की, जो मानव विकास में एक क्रांतिकारी कदम था।

3. मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age) के प्रमुख स्थल

हिमयुग की समाप्ति के बाद होलोसीन (Holocene) युग की शुरुआत हुई। जलवायु गर्म और शुष्क हो गई, जिससे वनस्पतियों और जीवों में परिवर्तन आया। इस काल में औजारों का आकार बहुत छोटा हो गया, जिन्हें ‘माइक्रोलिथ’ (Microliths – सूक्ष्म पाषाण) कहा गया।

A. बागौर (Bagor), राजस्थान

  • भौगोलिक स्थिति: राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में कोठारी नदी के तट पर स्थित।

  • उत्खनन: वी. एन. मिश्रा (V. N. Misra) द्वारा 1967-70 के बीच उत्खनन कार्य किया गया।

  • महत्व: बागौर भारत का सबसे बड़ा और सबसे अच्छी तरह से प्रलेखित मध्यपाषाणिक स्थल है। यहाँ से पशुपालन (Animal Husbandry) के सबसे प्राचीन साक्ष्य (लगभग 5000 ई.पू.) प्राप्त हुए हैं। यहाँ से भारी मात्रा में माइक्रोलिथ औजार, जानवरों की हड्डियाँ और मानव कंकाल मिले हैं।

B. आदमगढ़ (Adamgarh), मध्य प्रदेश

  • भौगोलिक स्थिति: नर्मदा नदी के दक्षिण में होशंगाबाद जिले में स्थित।

  • साक्ष्य: बागौर के समान ही आदमगढ़ से भी पशुपालन (विशेषकर कुत्ते, भेड़ और बकरी) के प्राचीनतम साक्ष्य मिलते हैं। यहाँ के शैलाश्रयों में 20 से अधिक चित्र मिले हैं जो मध्यपाषाण कालीन जीवन शैली को स्पष्ट करते हैं।

C. सराय नाहर राय और महदहा (Sarai Nahar Rai & Mahadaha), उत्तर प्रदेश

  • भौगोलिक स्थिति: उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में गंगा के मैदानी भाग में स्थित।

  • अद्वितीय साक्ष्य: यहाँ से स्तंभ गर्त (Post-holes – तंबू गाड़ने के निशान) और गर्तावास (Pit-hearths) मिले हैं। सराय नाहर राय से युद्ध या मानवीय आक्रमण का प्राचीनतम साक्ष्य मिलता है, जहाँ एक मानव कंकाल की पसली में पत्थर का तीर घुसा हुआ पाया गया है। यहाँ एक ही कब्र में एक साथ कई लोगों को दफनाने (Multiple Burials) के भी साक्ष्य मौजूद हैं।

4. नवपाषाण काल (Neolithic Age) के प्रमुख स्थल: कृषि और बस्तियों की क्रांति

इस काल में मानव ने ‘खाद्य उत्पादक’ (Food Producer) की भूमिका अपना ली। कृषि की शुरुआत, पहिए का आविष्कार, मृदभांडों का निर्माण और स्थायी ग्राम्य जीवन इस काल की सबसे बड़ी उपलब्धियां थीं। पत्थर के औजार अब पॉलिश किए हुए (Polished) और अधिक धारदार थे।

A. मेहरगढ़ (Mehrgarh), बलूचिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान)

  • भौगोलिक स्थिति: बोलन दर्रे के पास, बलूचिस्तान के कछी मैदान में स्थित।

  • महत्व: इसे “भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन कृषि बस्ती” कहा जाता है। 7000 ई.पू. के आसपास यहाँ के लोगों ने गेहूं और जौ उगाना और भेड़-बकरी पालना शुरू कर दिया था। यहाँ धूप में सुखाई गई कच्ची ईंटों के वर्गाकार और आयताकार घर मिले हैं। मेहरगढ़ सिंधु घाटी सभ्यता के उदय की पूर्वपीठिका तैयार करता है।

B. बुर्जहोम (Burzahom) और गुफकराल (Gufkral), जम्मू और कश्मीर

  • भौगोलिक स्थिति: श्रीनगर के पास स्थित। बुर्जहोम का अर्थ है ‘भूर्ज वृक्ष का स्थान’ (Place of Birch)।

  • विशिष्ट साक्ष्य: इन स्थलों की जलवायु ठंडी होने के कारण लोग जमीन के अंदर गड्ढे खोदकर ‘गर्तावास’ (Pit-dwellings) में रहते थे। बुर्जहोम की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहाँ मालिक के शव के साथ उसके पालतू कुत्ते को भी कब्र में दफनाया गया है, जो जीवन के बाद के अस्तित्व (Life after death) में उनके विश्वास को दर्शाता है। यहाँ हड्डी के औजार (Bone tools) भारी मात्रा में मिले हैं।

C. चिरांद (Chirand), बिहार

  • भौगोलिक स्थिति: बिहार के सारण जिले में गंगा नदी के तट पर।

  • महत्व: बुर्जहोम के अलावा चिरांद ही वह स्थान है जहाँ से भारी मात्रा में हड्डी के उपकरण (विशेष रूप से हिरण के सींगों से बने) प्राप्त हुए हैं। यहाँ के निवासी धान (चावल) की खेती से परिचित थे और जल स्रोतों के पास बांस और मिट्टी के घरों में निवास करते थे।

D. कोल्डिहवा (Koldihwa) और महगड़ा (Mahagara), उत्तर प्रदेश

  • भौगोलिक स्थिति: बेलन नदी घाटी, प्रयागराज के पास।

  • कृषि क्रांति: कोल्डिहवा विश्व के उन चुनिंदा स्थानों में से एक है जहाँ से चावल (Rice) की खेती के सबसे प्राचीन साक्ष्य (लगभग 6000 ई.पू.) प्राप्त हुए हैं। यह खोज इस बात को प्रमाणित करती है कि धान की खेती केवल चीन तक सीमित नहीं थी, बल्कि भारत में भी इसका स्वतंत्र रूप से विकास हुआ था।

5. महापाषाण काल (Megalithic Culture) के स्थल

दक्षिण भारत में नवपाषाण काल के बाद सीधे लौह युग की शुरुआत हुई, जिसे ‘मेगालिथिक’ या महापाषाण काल कहा गया। ‘मेगा’ का अर्थ है बड़ा और ‘लिथ’ का अर्थ है पत्थर।

A. आदिचनल्लूर (Adichanallur), तमिलनाडु और ब्रह्मगिरि (Brahmagiri), कर्नाटक

  • महत्व: इन स्थलों पर मृतकों को कब्रिस्तानों में दफनाकर उनके चारों ओर बड़े-बड़े पत्थरों का घेरा बना दिया जाता था। इन कब्रों से लोहे के उपकरण (त्रिशूल, भाले), काले और लाल रंग के बर्तन (Black and Red Ware) और घोड़ों के कंकाल मिले हैं, जो उस समय के समाज की जटिल दफन प्रथाओं और लौह तकनीक के उपयोग को दर्शाते हैं।

6. निष्कर्ष (Conclusion)

भारत में प्रागैतिहासिक पुरातात्विक स्थलों का यह विस्तृत अध्ययन यह सिद्ध करता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में मानव विकास की यात्रा अत्यंत निरंतर और विविधतापूर्ण रही है। अतिरम्पक्कम के आदिमानव से लेकर मेहरगढ़ के कुशल किसानों और बुर्जहोम के गर्तावास निवासियों तक, प्रत्येक स्थल ने पर्यावरण के साथ मानव के अनुकूलन की एक नई कहानी लिखी है। ये पुरातात्विक साक्ष्य केवल मूक पत्थर नहीं हैं, बल्कि वे उस महान यात्रा के मील के पत्थर हैं जिन्होंने आगे चलकर दुनिया की सबसे महान सभ्यताओं में से एक—सिंधु घाटी सभ्यता—की आधारशिला रखी। इन स्थलों का संरक्षण और निरंतर शोध न केवल इतिहास को जानने के लिए, बल्कि मानव के अस्तित्व और विकास को समझने के लिए भी अपरिहार्य है।

7. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions)

प्रश्न 1: भारतीय उपमहाद्वीप में मध्यपाषाण काल की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करते हुए बागौर और आदमगढ़ के पुरातात्विक महत्व का विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)

प्रश्न 2: “मेहरगढ़ नवपाषाणिक क्रांति का एक ज्वलंत उदाहरण है और यह सिंधु घाटी सभ्यता की पूर्वपीठिका है।” पुरातात्विक साक्ष्यों के आलोक में इस कथन की पुष्टि कीजिए। (200 शब्द)

प्रश्न 3: भारत में पुरापाषाण कालीन कला के साक्ष्यों के संदर्भ में भीमबेटका गुफा चित्रों की विषयवस्तु और उनके ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालिए। (150 शब्द)

प्रश्न 4: बुर्जहोम और चिरांद के नवपाषाणिक स्थलों में प्राप्त साक्ष्यों के बीच की समानताओं और असमानताओं का नृजातीय (Ethnographic) दृष्टिकोण से मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)

प्रश्न 5: दक्षिण भारत की महापाषाण (Megalithic) संस्कृति किस प्रकार उत्तर भारत की समकालीन संस्कृतियों से भिन्न थी? प्राप्त कब्रों और साक्ष्यों के आधार पर तर्क दीजिए। (200 शब्द)

8. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)

  1. प्रागैतिहासिक काल इतिहास का वह कालखंड है जिसके अध्ययन के लिए पूर्णतः पुरातात्विक उत्खननों, जीवाश्मों और पाषाण उपकरणों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

  2. रॉबर्ट ब्रूस फुट वह पहले ब्रिटिश भूविज्ञानी थे जिन्होंने 1863 में पल्लवरम (चेन्नई) से भारत का पहला पुरापाषाण कालीन हस्तकुठार खोजा था।

  3. पुरापाषाण काल के दौरान मानव जीवन पूर्णतः घुमक्कड़ था और वे मुख्य रूप से आखेट (शिकार) तथा कंद-मूल फल के संग्रहण पर निर्भर रहते थे।

  4. भीमबेटका की गुफाओं की खोज 1957-58 में डॉ. वी. एस. वाकणकर द्वारा की गई थी, जो अपनी हजारों साल पुरानी शैल चित्रकला के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

  5. भीमबेटका के चित्रों में लाल और सफेद रंग का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है, जिनमें शिकार, नृत्य और सामूहिक उत्सवों के दृश्यों को प्रमुखता दी गई है।

  6. कुरनूल की गुफाओं (आंध्र प्रदेश) से राख के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि पुरापाषाण कालीन मानव आग के प्रयोग से भलीभांति परिचित हो चुका था।

  7. बोरी (महाराष्ट्र) पुरापाषाण काल का एक महत्वपूर्ण स्थल है जहाँ से मानव बस्तियों और पत्थर के उपकरणों के अत्यंत प्राचीन कालक्रम के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

  8. मध्यपाषाण काल को होलोसीन युग से जोड़ा जाता है जब जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम गर्म हुआ और नए जीवों तथा वनस्पतियों का उदय हुआ।

  9. मध्यपाषाण काल की सबसे बड़ी तकनीकी विशेषता पत्थर के अत्यंत छोटे और सूक्ष्म औजारों का प्रयोग था, जिन्हें इतिहास में ‘माइक्रोलिथ’ (Microliths) कहा गया है।

  10. राजस्थान के बागौर और मध्य प्रदेश के आदमगढ़ वे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल हैं जहाँ से भारत में पशुपालन के सबसे प्रारंभिक साक्ष्य प्राप्त होते हैं।

  11. उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में स्थित महदहा से बड़ी मात्रा में हड्डियों और सींगों से बने आभूषण और उपकरण प्राप्त हुए हैं, जो उस समय की शिल्पकला को दर्शाते हैं।

  12. सराय नाहर राय में एक ही कब्र में कई कंकालों का एक साथ पाया जाना और युद्ध के साक्ष्य मिलना तत्कालीन समाज के आपसी संघर्षों की ओर इशारा करता है।

  13. नवपाषाण काल भारतीय इतिहास की वह युगान्तकारी घटना है जब मानव ने पहली बार अन्न का उत्पादन शुरू किया और स्थायी बस्तियां बसाकर रहना आरंभ किया।

  14. मेहरगढ़ (वर्तमान बलूचिस्तान) को भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि जीवन की जन्मस्थली माना जाता है, जहाँ से 7000 ई.पू. के गेहूं और जौ की खेती के प्रमाण मिलते हैं।

  15. नवपाषाण काल के मानव ने पहली बार कुम्हार के चाक (Potter’s Wheel) का आविष्कार किया, जिससे भोजन पकाने और अनाज को सुरक्षित रखने के लिए मजबूत बर्तनों का निर्माण संभव हुआ।

  16. उत्तर प्रदेश की बेलन घाटी में स्थित कोल्डिहवा पूरे विश्व के उन चुनिंदा स्थानों में से एक है जहाँ चावल (धान) की खेती के अत्यंत प्राचीन साक्ष्य विद्यमान हैं।

  17. कश्मीर के बुर्जहोम स्थल की सबसे विचित्र विशेषता यह है कि वहाँ के लोग जमीन के नीचे गड्ढा खोदकर बनाए गए घरों (जिन्हें गर्तावास कहा जाता है) में निवास करते थे।

  18. बुर्जहोम के पुरातात्विक उत्खनन में कब्रों के अंदर मानव कंकालों के साथ उनके पालतू कुत्तों को भी दफनाए जाने के हैरान कर देने वाले साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

  19. बिहार के सारण जिले में स्थित चिरांद नामक स्थल अपने प्रचुर मात्रा में पाए गए हड्डी के औजारों के लिए प्रसिद्ध है, जो विशेषकर हिरण के सींगों (Antlers) से निर्मित हैं।

  20. नवपाषाण युग के पाषाण उपकरणों की सबसे बड़ी पहचान उनका चमकदार और पॉलिश किया हुआ होना था, जिससे पेड़ों को काटना और कृषि भूमि तैयार करना आसान हो गया।

  21. दक्षिण भारत के मास्की, ब्रह्मगिरि, पय्यमपल्ली और हल्लूर नवपाषाण काल के प्रमुख केंद्र रहे हैं जहाँ रागी और चने जैसी फसलों का बहुतायत में उत्पादन किया जाता था।

  22. नवपाषाण युग के अंत में धातुओं का प्रयोग प्रारंभ हुआ और तांबा वह पहली धातु बनी जिसका उपयोग मानव ने पाषाण के साथ मिलाकर हथियार बनाने के लिए किया।

  23. नवपाषाण युग में अग्नि का प्रयोग केवल बचाव के लिए नहीं बल्कि मिट्टी के बर्तनों को उच्च तापमान पर पकाने (Baking Pottery) के लिए भी बड़े पैमाने पर होने लगा।

  24. दक्षिण भारत की लौह युगीन संस्कृतियों को महापाषाण (Megalithic) कहा जाता है क्योंकि वे अपने मृतकों की कब्रों के चारों ओर विशालकाय और भारी पत्थरों के घेरे बनाया करते थे।

  25. आदिचनल्लूर के महापाषाणिक कब्रिस्तानों से भारी मात्रा में लोहे के त्रिशूल, भाले, कृषि उपकरण और काले-लाल रंग के उत्कृष्ट मृदभांड प्राप्त हुए हैं।

  26. अतिरम्पक्कम (तमिलनाडु) के उत्खनन से मिले साक्ष्यों की आधुनिक डेटिंग विधियों ने यह साबित कर दिया है कि भारत में मानव सभ्यता का उदय पहले के अनुमानों से कहीं अधिक प्राचीन है।

  27. सोहन घाटी (वर्तमान पाकिस्तान का पंजाब क्षेत्र) में पुरापाषाण काल के ‘चॉपर-चॉपिंग’ (Chopper-Chopping) पेबुल उपकरणों की बहुतायत मिली है, जो एक विशिष्ट उपकरण परंपरा का हिस्सा है।

  28. नर्मदा घाटी में स्थित हथनोरा (मध्य प्रदेश) से एक पुरातात्विक उत्खनन के दौरान मानव खोपड़ी का जीवाश्म मिला था, जिसे ‘नर्मदा मानव’ (Narmada Man) के नाम से जाना जाता है।

  29. मध्य प्रदेश की सोन घाटी से भी पशुओं के पदचिह्न और पाषाण उपकरणों के विपुल साक्ष्य मिले हैं जो उस क्षेत्र में सघन और निरंतर मानव गतिविधियों की पुष्टि करते हैं।

  30. इनामगांव एक ऐसा ताम्रपाषाणिक और प्रारंभिक ऐतिहासिक स्थल है जहाँ से घरों के विन्यास और सामाजिक पदानुक्रम को समझने में पुरातत्वविदों को बहुत मदद मिली है।

  31. भारत में नवपाषाण काल शब्द का सबसे पहली बार प्रयोग सर जॉन लुबॉक (Sir John Lubbock) द्वारा 1865 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘प्रीहिस्टोरिक टाइम्स’ (Prehistoric Times) में किया गया था।

  32. चौपानी मांडो (उत्तर प्रदेश) वह महत्वपूर्ण स्थल है जहाँ पुरापाषाण काल के अंतिम चरण से लेकर नवपाषाण काल तक के निरंतर सभ्यतागत विकास का क्रम स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

  33. मानव द्वारा पाले जाने वाला सबसे पहला पशु कुत्ता था, जिसे संभवतः शिकार में मदद करने और बस्तियों की रखवाली करने के उद्देश्य से मध्यपाषाण काल में पालतू बनाया गया था।

  34. पहिए (Wheel) का आविष्कार मानव इतिहास की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांतियों में से एक था, जिसने नवपाषाण काल में परिवहन और मिट्टी के बर्तन बनाने की कला को पूरी तरह से बदल दिया।

  35. डोलमेन (Dolmen), सिस्ट (Cist) और मेन्हिर (Menhir) महापाषाण कालीन दफन प्रथाओं के विभिन्न प्रकार हैं जो मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत के पहाड़ी और पठारी क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

  36. पिकलीहल (कर्नाटक) के नवपाषाण कालीन स्थल से गोबर की राख के विशाल ढेर मिले हैं जो यह दर्शाते हैं कि यहाँ के लोग बड़ी संख्या में पशुओं के झुंड पालते थे और उनके बाड़ों में आग लगाते थे।

  37. मध्यपाषाण युग में तीर-कमान (Bow and Arrow) का विकास हुआ, जिससे तेज दौड़ने वाले छोटे जानवरों का शिकार करना और दूर से निशाना लगाना आदिमानव के लिए संभव हो सका।

  38. नवपाषाण काल में श्रम विभाजन (Division of Labour) की शुरुआत हुई, जहाँ कृषि, पशुपालन, बर्तन बनाना और कपड़े बुनना जैसे अलग-अलग कार्य स्त्री-पुरुषों के बीच बांटे गए होंगे।

  39. प्रागैतिहासिक मानव की कला केवल सौंदर्य के लिए नहीं थी, बल्कि यह उनके दैनिक संघर्षों, जादू-टोने (Magic and Rituals) और सफल शिकार की कामना से जुड़ी एक आध्यात्मिक अभिव्यक्ति थी।

  40. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संस्थापक और पहले महानिदेशक अलेक्जेंडर कनिंघम (Alexander Cunningham) थे, हालांकि प्रागैतिहासिक शोध में वी.डी. कृष्णस्वामी जैसे भारतीय विद्वानों का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है।

  41. बेलन घाटी (उत्तर प्रदेश) भारतीय उपमहाद्वीप का वह अनूठा क्षेत्र है जहाँ पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल और नवपाषाण काल—तीनों कालों के पुरातात्विक साक्ष्य एक ही भौगोलिक अनुक्रम में प्राप्त होते हैं।

  42. पाषाण युग के उपकरणों को बनाने की ‘दबाव शल्कन तकनीक’ (Pressure Flaking Technique) का उपयोग करके मानव ने पत्थरों को अत्यधिक धारदार और बारीक आकार देना सीख लिया था।

  43. डाहोद (गुजरात) और लंघनाज क्षेत्र मध्यपाषाणिक मानव के जीवन पर प्रकाश डालते हैं जहाँ से जानवरों की हड्डियों के साथ-साथ कई मानव कंकाल भी सीधे लेटी हुई अवस्था में प्राप्त हुए हैं।

  44. नवपाषाण काल में कपास और जूट जैसे रेशों का उपयोग कर कपड़े बुनने (Weaving) की कला विकसित हुई, जो मानव के सांस्कृतिक रूप से सभ्य होने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम था।

  45. गुफकराल (जिसका शाब्दिक अर्थ है कुम्हार की गुफा) में बुर्जहोम की तरह ही गर्तावास मिले हैं और यहाँ हड्डी की सूइयां (Bone needles) प्राप्त हुई हैं जो कपड़े सिलने के काम आती थीं।

  46. अतिरम्पक्कम और पलवर्म के उपकरणों से यह सिद्ध होता है कि भारतीय उपमहाद्वीप का मानव अफ़्रीकी महाद्वीप के होमो इरेक्टस (Homo erectus) के समकालीन था और उनकी उपकरण परंपराओं में समानता थी।

  47. महापाषाण कालीन लोग लौह अयस्क (Iron Ore) को पिघलाने और उसे पीटकर विभिन्न प्रकार के कृषि और युद्ध उपकरण बनाने में अत्यधिक दक्ष थे, जो उनके उन्नत धातुकर्म का प्रतीक है।

  48. प्रागैतिहासिक बस्तियां अक्सर नदियों, झीलों या प्राकृतिक झरनों के किनारे स्थित होती थीं क्योंकि जीवित रहने के लिए पेयजल, शिकार के लिए आने वाले जानवर और उपकरण बनाने के लिए पत्थर वहीं आसानी से मिलते थे।

  49. जोरवे संस्कृति के स्थलों से प्राप्त बड़े अन्नागार (Granaries) इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि प्रागैतिहासिक और ताम्रपाषाणिक मानव ने भविष्य की आपातकालीन जरूरतों के लिए अधिशेष अन्न का भंडारण करना सीख लिया था।

  50. संपूर्ण प्रागैतिहासिक अध्ययन हमें यह सिखाता है कि मानव सभ्यता का विकास कोई रातों-रात हुआ चमत्कार नहीं था, बल्कि यह हजारों वर्षों के कठोर संघर्ष, जलवायु अनुकूलन और निरंतर बौद्धिक नवाचारों का परिणाम था।

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