
मध्यपाषाण काल: बदलाव का युग (The Age of Transition)
प्राचीन इतिहास को मुख्य रूप से तीन पाषाण कालों में बांटा गया है— पुरापाषाण (Paleolithic), मध्यपाषाण (Mesolithic) और नवपाषाण (Neolithic)।
लगभग 10,000 ईसा पूर्व से 4,000 ईसा पूर्व के समय को मध्यपाषाण काल कहा जाता है। यह पुरापाषाण काल के खुरदरे जीवन और नवपाषाण काल की कृषि क्रांति के बीच का एक ‘संक्रमण काल’ (Transitional Phase) था। इसी समय पृथ्वी पर ‘होलोसीन’ (Holocene) युग की शुरुआत हुई, जिससे जलवायु गर्म और शुष्क हो गई। इस जलवायु परिवर्तन ने वनस्पतियों, जीव-जंतुओं और इंसानों के रहन-सहन में भारी बदलाव ला दिया। मानव अब बड़े जानवरों की जगह छोटे और तेज दौड़ने वाले जानवरों का शिकार करने लगा था।
1. मध्यपाषाण काल की प्रमुख विशेषताएँ (Key Features of Mesolithic Age)
मुख्य परीक्षा (Mains) में मध्यपाषाण काल की विशेषताओं पर सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
A. सूक्ष्म पाषाण उपकरण (Microliths)
पुरापाषाण काल के बड़े और भद्दे हथियारों की जगह अब छोटे, धारदार और सुडौल पत्थरों ने ले ली थी।
इन उपकरणों को ‘माइक्रोलिथ’ (Microliths) या सूक्ष्म पाषाण कहा जाता था। इनकी लंबाई सामान्यतः 1 से 5 सेंटीमीटर होती थी।
उपकरण ज्यामितीय आकारों में बनाए जाने लगे, जैसे— त्रिभुज (Triangle), अर्धचंद्राकार (Crescent) और समलंब (Trapeze)।
ये उपकरण मुख्य रूप से चर्ट (Chert), कैल्सेडोनी (Chalcedony) और एगेट जैसे कीमती पत्थरों से बनाए जाते थे।
B. पशुपालन की शुरुआत (Domestication of Animals)
इस काल की सबसे बड़ी क्रांति थी— जानवरों को पालतू बनाना।
मानव ने सबसे पहले कुत्ते (Dog) को पालतू बनाया, जो शिकार में उसकी मदद करता था और शिविरों की सुरक्षा करता था।
इसके बाद भेड़, बकरी और गाय-बैल को भी पाला जाने लगा।
C. शिकार के नए तरीके (New Hunting Techniques)
छोटे जानवरों और पक्षियों का शिकार करने के लिए प्रक्षेपास्त्र तकनीक (Projectile Technology) का विकास हुआ।
इसी काल में तीर-कमान (Bow and Arrow) का आविष्कार हुआ। साथ ही मछली पकड़ने के लिए हड्डियों से बने ‘हारपून’ का इस्तेमाल शुरू हुआ।
D. शवाधान प्रथा (Burial Practices)
इस काल में मृतकों को दफनाने (Burial) की व्यवस्थित प्रथा शुरू हो गई थी। कब्रों में मृतकों के साथ खाद्य सामग्री, औजार और कभी-कभी कुत्ते भी दफनाए जाते थे, जो यह दर्शाता है कि मध्यपाषाण कालीन मानव ‘पारलौकिक जीवन’ (Life after death) में विश्वास करने लगा था।
भारत में मध्यपाषाण काल के प्रमुख स्थल (Major Sites in India)
UPSC और State PSC की प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) के लिए ये स्थल अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
| स्थल का नाम | राज्य / स्थान | प्राप्त महत्वपूर्ण साक्ष्य |
| बागोर (Bagor) | राजस्थान (कोठारी नदी) | भारत का सबसे बड़ा मध्यपाषाणिक स्थल। यहाँ से पशुपालन के सबसे प्राचीन साक्ष्य मिले हैं। |
| आदमगढ़ (Adamgarh) | मध्य प्रदेश (नर्मदा घाटी) | बागोर के साथ ही यहाँ से भी पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। |
| सराय नाहर राय | प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) | यहाँ से 4 कंकाल एक साथ दफनाए जाने के साक्ष्य, और एक कंकाल में धंसा हुआ तीर (युद्ध का पहला साक्ष्य) मिला है। |
| महदहा (Mahadaha) | प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) | हड्डी और सींग से बने उपकरण तथा आभूषण बड़ी मात्रा में मिले हैं। |
| दमदमा (Damdama) | प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) | यहाँ से 41 मानव शवाधान मिले हैं, जिनमें एक ही कब्र में तीन कंकाल एक साथ दफनाए गए हैं। |
| चौपानी माण्डो | बेलन घाटी (उत्तर प्रदेश) | यहाँ से संसार के मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) के प्राचीनतम साक्ष्यों में से एक प्राप्त हुआ है। |
| लंघनाज (Langhnaj) | गुजरात | रेत के टीलों (Sand dunes) के लिए प्रसिद्ध, 14 मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं। |
| भीमबेटका | मध्य प्रदेश | इस काल की उत्कृष्ट गुफा चित्रकला (Rock Painting) के साक्ष्य। |
2. जीवन निर्वाह और आहार प्रणाली (Subsistence Pattern)
इस काल के मानव का जीवन निर्वाह मुख्य रूप से ‘ब्रॉड स्पेक्ट्रम इकॉनमी’ (Broad Spectrum Economy) पर आधारित था, जिसका अर्थ है केवल बड़े शिकार पर निर्भर रहने के बजाय भोजन के विविध स्रोतों का उपयोग करना।
आखेट (Hunting) और मछली पकड़ना: तीर-कमान के आविष्कार से पक्षियों और तेज दौड़ने वाले जानवरों का शिकार आसान हो गया। पानी के स्रोतों के पास रहने वाले मानव ने हड्डियों से बने ‘हारपून’ की मदद से मछलियां पकड़ना (Fishing) शुरू किया।
खाद्य संग्रहण (Food Gathering): आहार में जंगली अनाज, फल, जड़ें और शहद का महत्वपूर्ण स्थान था। सिलबट्टे (Quern and Muller) के प्रारंभिक साक्ष्य बताते हैं कि वे अनाज और जड़ों को पीसकर खाते थे।
पशुपालन की शुरुआत (Domestication of Animals): यह सबसे बड़ी उपलब्धि थी। मानव ने जानवरों के व्यवहार को समझा और उन्हें मार कर खाने के बजाय पालना ज्यादा लाभदायक समझा। कुत्ता (Dog) सबसे पहला पालतू जानवर बना, जो शिकार में मदद करता था। बाद में भोजन (दूध/मांस) के लिए भेड़, बकरी और मवेशियों को पाला जाने लगा।
भारत में मध्यपाषाण काल के प्रमुख पुरातात्विक स्थल (Detailed Site Analysis)
भारत में मध्यपाषाण कालीन स्थल लगभग हर भौगोलिक क्षेत्र (सिंधु और गंगा के कुछ जलोढ़ मैदानों को छोड़कर) में पाए गए हैं। आइए इनका विस्तृत विश्लेषण करें:
A. विंध्य और मध्य भारत (Madhya Pradesh)
आदमगढ़ (Adamgarh): नर्मदा नदी घाटी में स्थित इस स्थल की खुदाई आर. वी. जोशी ने की थी। यहाँ से लगभग 5500 ईसा पूर्व के पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य (कुत्ते, मवेशी, सुअर, भेड़-बकरियों की हड्डियां) मिले हैं।
भीमबेटका (Bhimbetka): विंध्य पर्वतमाला में स्थित। यहाँ से गुफा आश्रय (Rock Shelters) और फर्श बनाने के साक्ष्य मिले हैं। यह स्थल अपनी चित्रकला के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
B. राजस्थान (Rajasthan)
बागोर (Bagor): भीलवाड़ा जिले में कोठारी नदी के तट पर स्थित। वी. एन. मिश्र द्वारा उत्खनित यह भारत का सबसे बड़ा और सबसे व्यवस्थित मध्यपाषाण स्थल है। यहाँ से भी आदमगढ़ के समकालीन पशुपालन के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। यहाँ तीन सांस्कृतिक चरण पाए गए हैं, जो मध्यपाषाण काल से लेकर लौह युग तक जाते हैं।
तिलवाड़ा (Tilwara): लूनी नदी के किनारे स्थित एक अन्य महत्वपूर्ण स्थल जहाँ से माइक्रोलिथ और आग के अलाव (Hearths) के साक्ष्य मिले हैं।
C. गंगा घाटी – उत्तर प्रदेश (The Ganga Valley Sites)
जी. आर. शर्मा और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की टीम द्वारा उत्खनित प्रतापगढ़ जिले के तीन स्थल अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
सराय नाहर राय (Sarai Nahar Rai): यहाँ से झोपड़ियों के साक्ष्य (स्तंभ गर्त/Post-holes) और कई कब्रें मिली हैं। सबसे चौंकाने वाला साक्ष्य एक कंकाल है जिसकी पसली में माइक्रोलिथ (पत्थर का तीर) धंसा हुआ है, जो मानव इतिहास में युद्ध या हत्या (Warfare/Inter-group conflict) का सबसे प्राचीन प्रमाण है।
महदहा (Mahadaha): यहाँ से एक बड़ी ‘कसाईखाना’ (Butchery area) या बूचड़खाने का साक्ष्य मिला है। इसके अलावा, यहाँ से हड्डी (Bone) और बारहसिंगे के सींग (Antler) से बने उपकरण तथा आभूषण (कान की बालियाँ, हार) भारी मात्रा में प्राप्त हुए हैं।
दमदमा (Damdama): यहाँ से कुल 41 मानव शवाधान (कब्रें) मिली हैं। इनमें से 5 कब्रें ‘युग्म शवाधान’ (Double burials) हैं, और एक कब्र में तो तीन मानव कंकालों को एक साथ दफनाया गया है।
चौपानी माण्डो (Chopani Mando): बेलन घाटी में स्थित यह स्थल इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि यहाँ से हस्तनिर्मित मिट्टी के बर्तनों (Pottery) के विश्व के प्राचीनतम साक्ष्यों में से एक (लगभग 6000 ईसा पूर्व) प्राप्त हुआ है।
D. गुजरात और पश्चिमी भारत (Gujarat)
लंघनाज (Langhnaj): गुजरात के शुष्क क्षेत्र में रेत के टीलों (Sand Dunes) पर स्थित। एच. डी. सांकलिया ने इसका उत्खनन किया। यहाँ से बड़ी मात्रा में माइक्रोलिथ, जानवरों की हड्डियाँ, 14 मानव कंकाल और मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े मिले हैं।
E. पूर्वी और दक्षिणी भारत (Eastern & Southern India)
वीरभानपुर (पश्चिम बंगाल): बी. बी. लाल द्वारा उत्खनित। दामोदर नदी के पास स्थित यह स्थल माइक्रोलिथ उपकरणों का एक बड़ा कारखाना (Factory site) प्रतीत होता है।
टेरी स्थल (Teri Sites, Tamil Nadu): तिरुनेलवेली जिले में समुद्र तट के किनारे लाल बालू के टीलों को ‘टेरी’ कहा जाता है। यहाँ से प्राप्त माइक्रोलिथ पर लाल रंग की परत (Patination) चढ़ी है जो इनकी प्राचीनता दर्शाती है।
समाज, धर्म और शवाधान प्रथाएं (Society, Religion & Burials)
मध्यपाषाण काल में मानव समाज ‘खानाबदोश’ (Nomadic) अवस्था से निकलकर ‘अर्द्ध-स्थायी’ (Semi-sedentary) जीवन की ओर बढ़ रहा था।
शवाधान (Burial Practices): पहली बार मृतकों को व्यवस्थित ढंग से दफनाने की प्रथा शुरू हुई।
कब्रें आमतौर पर आवास क्षेत्र के भीतर ही उथले गड्ढों में बनाई जाती थीं।
कंकालों की दिशा अमूमन पश्चिम-पूर्व (West-East) रखी जाती थी।
कई कब्रों में मृतकों के साथ औजार, आभूषण और जानवरों के कंकाल (विशेषकर कुत्ते के) मिले हैं। यह दर्शाता है कि उस समय के लोग ‘मृत्यु के बाद जीवन’ (Life after death) और पारलौकिक शक्तियों में विश्वास करने लगे थे।
सामाजिक असमानता: कुछ कब्रों में बहुत सी कीमती वस्तुएं (हड्डी के आभूषण) मिली हैं, जबकि कुछ एकदम खाली हैं। यह समाज में उभरती हुई सामाजिक असमानता (Social Stratification) या हैसियत के अंतर का प्रारंभिक संकेत है।
मध्यपाषाण कालीन कला: भीमबेटका की चित्रकला (Rock Art)
इस काल के मानव ने अपनी रचनात्मकता को गुफाओं की दीवारों पर उकेरा। हालांकि कला की शुरुआत पुरापाषाण काल के अंत में हो गई थी, लेकिन इसका वास्तविक विकास मध्यपाषाण काल में हुआ।
भीमबेटका (Bhimbetka): डॉ. वी. एस. वाकणकर द्वारा 1957 में खोजी गई इन गुफाओं में 500 से अधिक चित्रित शैलाश्रय हैं।
विषय वस्तु (Themes): चित्रकला के विषय दैनिक जीवन से जुड़े थे। इनमें मुख्य रूप से आखेट (शिकार), पशु (बाघ, हाथी, गैंडा, जंगली सूअर, हिरण), पक्षी, मछलियाँ और समूह नृत्य (Group Dance) को दर्शाया गया है। महिलाओं को अनाज पीसते और बच्चों को खेलते हुए भी चित्रित किया गया है।
रंगों का प्रयोग: चित्रों में मुख्य रूप से गहरा लाल (गेरू/Ochre), सफेद, हरा और पीला रंग प्रयोग हुआ है। रंग बनाने के लिए खनिजों को पीसकर उसमें जानवरों की चर्बी (Animal fat) या पेड़ का गोंद मिलाया जाता था।
यह कला केवल मनोरंजन नहीं थी, बल्कि यह शिकार में सफलता पाने के लिए किए गए किसी ‘जादू-टोने’ (Sympathetic Magic) या अनुष्ठान का हिस्सा भी हो सकती है।

3. कला और संस्कृति (Art & Culture)
मध्यपाषाण कालीन मानव ने अपनी रचनात्मकता को गुफाओं की दीवारों पर उकेरा।
भीमबेटका (मध्य प्रदेश) की गुफाओं में इस काल के सर्वाधिक चित्र मिले हैं।
इन चित्रों में शिकार खेलते हुए मानव, समूह नृत्य (Group Dance), और पशुओं (हिरण, बारहसिंगा, सुअर) को दर्शाया गया है।
चित्रों में मुख्य रूप से लाल और सफेद रंगों का प्रयोग किया गया है। ये चित्र उस समय के सामाजिक जीवन और मान्यताओं का जीवंत दस्तावेज हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
मध्यपाषाण काल भले ही एक छोटा कालखंड था, लेकिन यह मानव इतिहास का एक बड़ा ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ। माइक्रोलिथ का आविष्कार, तीर-कमान का प्रयोग और सबसे बढ़कर पशुपालन की शुरुआत ने इंसान को खानाबदोश (Nomadic) जीवन से हटाकर ‘स्थाई बस्तियों’ (Settled life) की ओर धकेल दिया। इसी मध्यपाषाण काल के अंतिम चरण ने उस महान ‘नवपाषाण कालीन कृषि क्रांति’ (Neolithic Agricultural Revolution) की मजबूत नींव रखी, जिसने मानव सभ्यता का चेहरा हमेशा के लिए बदल दिया।
परीक्षा के लिए 40+ अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)
मध्यपाषाण काल पुरापाषाण और नवपाषाण काल के बीच का ‘संक्रमण काल’ (Transitional Period) है।
भारत में मध्यपाषाण काल की खोज का श्रेय A.C.L. कार्लाइल (A.C.L. Carlleyle) को जाता है, जिन्होंने 1867 ई. में विंध्य क्षेत्र से ‘माइक्रोलिथ’ खोजे थे।
इस काल के उपकरणों को ‘माइक्रोलिथ’ (Microliths) या ‘सूक्ष्म पाषाण’ कहा जाता है।
माइक्रोलिथ उपकरणों की लंबाई सामान्यतः 1 से 5 सेंटीमीटर के बीच होती थी।
जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम गर्म हुआ, जिसे भूवैज्ञानिक भाषा में होलोसीन (Holocene) युग कहा जाता है।
इस काल में पहली बार प्रक्षेपास्त्र तकनीक यानी तीर-कमान (Bow and Arrow) का विकास हुआ।
मानव ने सर्वप्रथम जिस जानवर को पालतू बनाया, वह कुत्ता (Dog) था।
भारत में पशुपालन के सबसे प्राचीन साक्ष्य ‘आदमगढ़’ (मध्य प्रदेश) और ‘बागोर’ (राजस्थान) से मिलते हैं।
राजस्थान का ‘बागोर’ स्थल कोठारी नदी के तट पर स्थित है।
बागोर भारत का सबसे बड़ा और सबसे अच्छी तरह से प्रलेखित (Documented) मध्यपाषाणिक स्थल है।
आदमगढ़ (होशंगाबाद, मध्य प्रदेश) नर्मदा नदी के तट पर स्थित है।
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में तीन प्रमुख स्थल हैं: सराय नाहर राय, महदहा और दमदमा।
‘सराय नाहर राय’ से युद्ध या मानवीय आक्रमण का प्राचीनतम साक्ष्य मिलता है (एक कंकाल की पसली में पत्थर का तीर धंसा हुआ है)।
‘सराय नाहर राय’ से एक ही कब्र में 4 कंकाल एक साथ दफनाए जाने के साक्ष्य मिले हैं।
‘महदहा’ (UP) से बड़ी मात्रा में हड्डी और सींग से बने उपकरण और आभूषण (कान के कुंडल आदि) प्राप्त हुए हैं।
‘दमदमा’ (UP) से 41 मानव शवाधान (कब्रें) मिले हैं।
दमदमा की एक कब्र में तीन मानव कंकाल एक साथ दफनाए गए हैं।
उत्तर प्रदेश के बेलन घाटी में स्थित ‘चौपानी माण्डो’ से दुनिया में मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) के प्राचीनतम साक्ष्य मिलते हैं।
शवाधान (Burial) प्रक्रिया यानी मृतकों को विधिपूर्वक दफनाने की शुरुआत इसी काल में मानी जाती है।
भारत में मानव के अस्थि पंजर (Human Skeleton) का सबसे पहला साक्ष्य मध्यपाषाण काल से ही प्राप्त होता है।
गुजरात का ‘लंघनाज’ स्थल रेत के टीलों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की खुदाई एच. डी. सांकलिया ने करवाई थी।
लंघनाज से 14 मानव कंकाल और तांबे का एक चाकू भी प्राप्त हुआ है।
‘भीमबेटका’ (मध्य प्रदेश) से मध्यपाषाण काल की उत्कृष्ट गुफा चित्रकला प्राप्त हुई है।
भीमबेटका की खोज 1957-58 में डॉ. वी. एस. वाकणकर ने की थी।
भीमबेटका के चित्रों में मुख्य रूप से शिकार (Hunting) और समूह नृत्य के दृश्य हैं।
गुफा चित्रों में सबसे ज्यादा लाल (Red) और सफेद (White) रंगों का प्रयोग किया गया है।
दक्षिण भारत में तमिलनाडु के टेरी (Teri) स्थल मध्यपाषाण काल के बालू के टीले हैं।
पश्चिम बंगाल का ‘वीरभानपुर’ एक महत्वपूर्ण मध्यपाषाणिक स्थल है, जिसकी खुदाई बी. बी. लाल ने की थी।
मध्यपाषाण काल के उपकरण मुख्य रूप से चर्ट, कैल्सेडोनी, जैस्पर और एगेट पत्थरों से बनाए जाते थे।
उपकरणों के आकार ज्यामितीय (Geometric) होते थे, जिनमें त्रिभुज, समलंब और अर्धचंद्राकार प्रमुख थे।
इस काल के लोग मुख्यतः शिकार (Hunting), मछली पकड़ने (Fishing) और खाद्य संग्रहण (Gathering) पर निर्भर थे।
हड्डियों से बने तीर के अग्र भाग और ‘हारपून’ का उपयोग मछली पकड़ने के लिए बहुतायत में होने लगा था।
मध्य प्रदेश के पंचमढ़ी के आसपास के क्षेत्रों (जैसे जम्बूद्वीप) में भी मध्यपाषाण काल के गुफा आश्रय मिले हैं।
राजस्थान का ‘तिलवाड़ा’ लूनी नदी के तट पर स्थित एक और महत्वपूर्ण माइक्रोलिथ स्थल है।
बिहार के ‘पैसरा’ (मुंगेर) से मध्यपाषाण काल की झोपड़ियों और कार्यस्थलों (Workshops) के साक्ष्य मिले हैं।
चोपाणी मांडो की खुदाई से पता चलता है कि प्रारंभिक ‘झोपड़ियां’ गोल या अंडाकार आकार की होती थीं।
पुरापाषाण काल के भारी औजारों जैसे ‘हस्तकुठार’ (Handaxe) और ‘क्लीवर’ का प्रयोग इस काल में लगभग समाप्त हो गया था।
‘सिलबट्टा’ (Quern and Muller) का प्रारंभिक रूप जंगली अनाजों को पीसने के लिए प्रयोग होने लगा था।
इस काल में आग (Fire) का उपयोग भोजन पकाने और जंगली जानवरों से बचने के लिए व्यापक रूप से होने लगा।
आंध्र प्रदेश की ‘कुरनूल की गुफाओं’ में भी मध्यपाषाण काल से संबंधित सूक्ष्म पाषाण और जानवरों की हड्डियां मौजूद हैं।
नवपाषाण कालीन ‘कृषि क्रांति’ की आधारशिला मध्यपाषाण काल के अंतिम चरण में ही रखी गई थी।