ब्रह्मांड का एक अनोखा रहस्य
हमारा सौरमंडल असीम ब्रह्मांड का एक छोटा सा हिस्सा है, और इस सौरमंडल में हमारी पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ज्ञात खगोलीय पिंड है, जहाँ जीवन की धड़कन मौजूद है। नीले रंग का यह खूबसूरत ग्रह आज जैसा दिखाई देता है—हरे-भरे जंगलों, विशाल महासागरों, ऊंचे पर्वतों और जीवन की अगाध विविधताओं से भरा हुआ—करोड़ों-अरबों वर्ष पहले ऐसा बिल्कुल नहीं था। पृथ्वी का इतिहास थका देने वाले संघर्षों, विनाशकारी टक्करों, भयानक ज्वालामुखीय विस्फोटों और निरंतर होने वाले भूवैज्ञानिक परिवर्तनों की एक लंबी गाथा है।
मानव सभ्यता के उदय के साथ ही ‘पृथ्वी की उत्पत्ति’ (Origin of Earth) का प्रश्न विचारकों, दार्शनिकों और वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी जिज्ञासा का विषय रहा है। शुरुआत में इस प्रश्न के उत्तर धार्मिक और पौराणिक कथाओं में ढूंढे जाते थे, लेकिन आधुनिक विज्ञान के आगमन ने इस रहस्यमयी पर्दे को हटाना शुरू कर दिया। आज भूगोल, खगोल विज्ञान (Astronomy) और भूविज्ञान (Geology) के संमिश्रण से वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के जन्म की कड़ियों को आपस में जोड़ा है। किसी भी प्रशासनिक सेवा (UPSC, State PSC) की तैयारी करने वाले छात्र के लिए इस विषय को समझना अनिवार्य है, क्योंकि यह भूगोल की सबसे बुनियादी आधारशिला है।

पृथ्वी का वैज्ञानिक परिचय एवं कुछ विस्मयकारी तथ्य
पृथ्वी की उत्पत्ति के सिद्धांतों में उतरने से पहले, हमें अपने इस गृह-ग्रह के वर्तमान खगोलीय और भौतिक स्वरूप से परिचित होना आवश्यक है।
सौरमंडल में स्थिति: पृथ्वी सूर्य से दूरी के क्रम में तीसरा ग्रह है। आकार और द्रव्यमान (Mass) की दृष्टि से यह हमारे सौरमंडल का पाँचवाँ सबसे बड़ा ग्रह है।
दूरी और परिक्रमा: सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी लगभग 14 करोड़ 96 लाख किलोमीटर (लगभग 15 करोड़ किमी) है। प्रकाश को सूर्य से पृथ्वी तक पहुँचने में लगभग 8 मिनट 20 सेकंड का समय लगता है।
पृथ्वी की वास्तविक आयु: आधुनिक रेडियोमेट्रिक डेटिंग तकनीकों (विशेष रूप से उल्कापिंडों और प्राचीनतम चट्टानों के अध्ययन) के आधार पर पृथ्वी की सटीक आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष (454 करोड़ वर्ष) निर्धारित की गई है।
जल और स्थल का संतुलन: पृथ्वी की सतह का लगभग 70.8 प्रतिशत (लगभग 71%) भाग जल से ढका हुआ है, जिसे हम महासागर कहते हैं। शेष 29.2 प्रतिशत (लगभग 29%) भाग स्थलमंडल के रूप में महाद्वीपों का निर्माण करता है।
प्राकृतिक उपग्रह: पृथ्वी का केवल एक ही प्राकृतिक उपग्रह है जिसे हम ‘चंद्रमा’ (Moon) कहते हैं। चंद्रमा की उत्पत्ति भी पृथ्वी के इतिहास से गहराई से जुड़ी हुई है।
पृथ्वी की उत्पत्ति का अध्ययन प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोगों की मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन (GS) प्रथम प्रश्नपत्र में ‘पृथ्वी की उत्पत्ति और विकास’ एक अनिवार्य खंड है। इसका अध्ययन केवल कुछ फैक्ट्स को रटने के लिए नहीं, बल्कि निम्नलिखित महत्वपूर्ण अवधारणाओं को समझने के लिए आवश्यक है:
सौरमंडल के निर्माण की समझ: यह हमें बताता है कि सूर्य और उसके चारों ओर घूमने वाले ग्रहों का जन्म एक ही प्रक्रिया के तहत हुआ था या अलग-अलग।
ग्रहों के क्रमिक विकास का ज्ञान: इसके माध्यम से हम समझ पाते हैं कि आंतरिक ग्रह (बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल) चट्टानी क्यों हैं, जबकि बाहरी ग्रह (बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण) गैसीय अवस्था में क्यों हैं।
जीवन के अनुकूल परिस्थितियों का विश्लेषण: यह विषय हमें समझाता है कि ऐसी कौन सी खास खगोलीय घटनाएं घटीं, जिन्होंने पृथ्वी पर पानी को तरल अवस्था में बनाए रखा और एक सुरक्षात्मक वायुमंडल का निर्माण किया।
वर्तमान भू-आकृतियों की व्याख्या: आज जो हम पर्वत, नदियाँ और महासागरीय बेसिन देखते हैं, उनकी उत्पत्ति का सीधा संबंध पृथ्वी के शुरुआती ठंडे होने और परतों के निर्माण की प्रक्रिया से है।

पृथ्वी की उत्पत्ति के प्रमुख वैज्ञानिक सिद्धांत (Core Scientific Theories)
वैज्ञानिकों ने पृथ्वी और सौरमंडल की उत्पत्ति को समझाने के लिए जो सिद्धांत दिए हैं, उन्हें मुख्य रूप से दो वैचारिक श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
अद्वैतवादी संकल्पना (Monistic / Parent Hypothesis): इस विचारधारा के अनुसार, पृथ्वी और पूरे सौरमंडल का निर्माण केवल एक ही तारे (यानी एक ही स्रोत) से हुआ है।
द्वैतवादी संकल्पना (Dualistic / Binary Hypothesis): इस विचारधारा के अनुसार, सौरमंडल के निर्माण में सूर्य के अलावा एक और साथी तारा (Companion Star) शामिल था।
आइए, अब तुम्हारे ड्राफ्ट में शामिल चारों प्रमुख सिद्धांतों का अत्यंत गहराई से और विश्लेषणात्मक अध्ययन करते हैं।
1. नीहारिका सिद्धांत (Nebular Hypothesis) — अद्वैतवादी दृष्टिकोण
यह पृथ्वी और सौरमंडल की उत्पत्ति को समझाने का सबसे पहला और सबसे प्रभावशाली वैज्ञानिक प्रयास माना जाता है। इस सिद्धांत के विकास में दो महान विचारकों का योगदान रहा है:
इमैनुएल कांट का गैसीय सिद्धांत (1755):
जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट ने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियमों के आधार पर अपना ‘वायव्य राशि सिद्धांत’ (Gas Theory) प्रस्तुत किया। कांट के अनुसार, प्रारंभ में अंतरिक्ष में दैवीय रूप से निर्मित अत्यंत ठंडे, गतिहीन और बिखरे हुए आदि-पदार्थ (Primordial Matter) मौजूद थे। गुरुत्वाकर्षण के कारण ये कण आपस में टकराने लगे। टकराने से घर्षण पैदा हुआ, जिससे तापमान बढ़ा और इन कणों के बादल में गति (घूर्णन) पैदा हो गई। यह घूमता हुआ गर्म बादल ही ‘नीहारिका’ (Nebula) कहलाया। कांट ने कहा कि अत्यधिक तेज गति के कारण इस नीहारिका के मध्य भाग से अपकेंद्रीय बल (Centrifugal Force) के प्रभाव से एक-एक करके नौ छल्ले अलग हो गए, जो ठंडे होकर नौ ग्रह बन गए और शेष बचा हुआ मध्य भाग सूर्य बना।
लाप्लास का नीहारिका सिद्धांत (1796):
फ्रांसीसी गणितज्ञ पियरे साइमन लाप्लास ने कांट के सिद्धांत की कमियों को दूर करते हुए इसे संशोधित किया। लाप्लास ने कांट की इस बात की आलोचना की कि ठंडे कणों के टकराने से गति अपने आप कैसे पैदा हो सकती है (जो कोणीय संवेग के नियम के खिलाफ था)। लाप्लास ने माना कि अंतरिक्ष में पहले से ही एक अत्यंत विशाल, गर्म और निरंतर घूमती हुई नीहारिका (Nebula) मौजूद थी।
जैसे-जैसे समय बीता, यह नीहारिका अंतरिक्ष में अपनी गर्मी खोने लगी (ठंडी होने लगी)। ठंडी होने के कारण इसका आकार सिकुड़ने लगा। भौतिकी के नियम के अनुसार, आकार छोटा होने से इसकी घूमने की गति अत्यधिक तेज हो गई। गति इतनी बढ़ गई कि इसके बाहरी किनारे पर अपकेंद्रीय बल, गुरुत्वाकर्षण बल से अधिक हो गया। इसके परिणामस्वरूप नीहारिका के मध्य भाग से एक विशाल छल्ला (Ring) बाहर निकल आया। यह छल्ला बाद में नौ छोटे-छोटे छल्लों में टूट गया। ये सभी छल्ले ठंडे होकर अलग-अलग ग्रहों में बदल गए, जिनमें से एक हमारी पृथ्वी थी।
इस सिद्धांत की सीमाएं और आलोचना:
कोणीय संवेग का विरोधाभास: इस सिद्धांत की सबसे बड़ी कमी यह है कि आज हमारे सौरमंडल का 99 प्रतिशत कोणीय संवेग (Angular Momentum) ग्रहों के पास है, जबकि सूर्य के पास केवल 1 प्रतिशत है। लाप्लास के सिद्धांत के अनुसार, सूर्य के पास सबसे ज्यादा गति होनी चाहिए थी।
आधुनिक विज्ञान से मेल न खाना: आधुनिक खगोलीय शोध बताते हैं कि किसी घूमते हुए गैसीय छल्ले के ठंडे होने से इतने बड़े ठोस ग्रहों का निर्माण इस तरह नहीं हो सकता।
2. ज्वारीय सिद्धांत (Tidal Theory) — द्वैतवादी दृष्टिकोण
20वीं सदी की शुरुआत में जब अद्वैतवादी सिद्धांतों की कमियां सामने आईं, तो इतिहासकारों और वैज्ञानिकों ने द्वैतवादी सिद्धांतों की ओर रुख किया। इसमें ब्रिटिश वैज्ञानिक सर जेम्स जीन्स (1919) और बाद में हैरोल्ड जेफ्रीज़ (1929) द्वारा प्रतिपादित ‘ज्वारीय सिद्धांत’ सबसे प्रमुख था।
सिद्धांत की मुख्य कार्यप्रणाली:
सर जेम्स जीन्स के अनुसार, प्रारंभ में हमारा सूर्य अंतरिक्ष में अपनी जगह पर शांत घूम रहा था और वह आज की तुलना में बहुत बड़ा और गैसीय अवस्था में था। उसी समय अंतरिक्ष में एक दूसरा अत्यधिक विशालकाय तारा (Impacting Star) बहुत तेज गति से सूर्य की ओर बढ़ रहा था।
जैसे-जैसे वह विशाल तारा सूर्य के निकट आने लगा, उसके शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Pull) का प्रभाव सूर्य की सतह पर पड़ने लगा। इस गुरुत्वाकर्षण के कारण सूर्य की सतह पर एक बहुत ऊंची गैसीय ज्वार (Tide) उठने लगी। जब वह तारा सूर्य के सबसे नजदीक पहुँचा, तो उसके आकर्षण के कारण सूर्य की सतह से सिगार के आकार का (बीच में मोटा और किनारों पर पतला) एक विशाल गैसीय तंतु या फिलामेंट (Filament) टूटकर सूर्य से बाहर निकल गया।
इसके बाद वह तारा अपने निश्चित मार्ग पर अंतरिक्ष में आगे बढ़ गया और सूर्य से बहुत दूर चला गया। लेकिन जो गैसीय फिलामेंट बाहर निकला था, वह उस तारे के बहुत दूर चले जाने और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के कारण वापस सूर्य में नहीं लौट सका। वह सिगारनुमा फिलामेंट अंतरिक्ष में तैरने लगा और धीरे-धीरे ठंडा होने लगा। ठंडा होने पर वह कई टुकड़ों में टूट गया। सिगार के आकार के कारण, इसके बीच के टुकड़े बड़े बने (जैसे बृहस्पति और शनि) और किनारों के टुकड़े छोटे बने (जैसे बुध और हमारी पृथ्वी)।
इस सिद्धांत की आलोचना:
दूरी का गणित: आधुनिक खगोलशास्त्रियों का कहना है कि अंतरिक्ष में तारे एक-दूसरे से इतनी अविश्वसनीय दूरी पर हैं कि किसी तारे का सूर्य के इतने निकट से गुजरने की संभावना लगभग शून्य है।
फिलामेंट का बिखरना: वैज्ञानिकों के अनुसार, सूर्य से निकला अत्यधिक गर्म गैसीय पदार्थ अंतरिक्ष के अत्यधिक ठंडे वातावरण में आते ही संघनित होने के बजाय बिखर (Disperse) जाता, उससे ठोस ग्रहों का बनना संभव नहीं था।
3. ग्रहाणु सिद्धांत (Planetesimal Theory) — टक्कर और संचय
इस सिद्धांत का प्रतिपादन वर्ष 1905 में थॉमस चेम्बरलिन और फारेस्ट मोल्टन द्वारा किया गया था। यह भी एक द्वैतवादी सिद्धांत है, जो सौरमंडल के निर्माण को एक अलग नजरिए से देखता है।
सिद्धांत की मुख्य बातें:
चेम्बरलिन और मोल्टन के अनुसार, प्रारंभ में सूर्य पूरी तरह ठंडा और ठोस कणों से निर्मित था। उसी समय एक अन्य विशाल भ्रमणशील तारा सूर्य के अत्यंत पास से गुजरा। इस तारे के तीव्र गुरुत्वाकर्षण के कारण सूर्य की सतह से कोई गैस नहीं निकली, बल्कि असंख्य छोटे-छोटे ठोस कण और मलबे के टुकड़े बाहर छिटक गए।
इन छोटे-छोटे ठोस कणों को ‘ग्रहाणु’ (Planetesimals) कहा गया। जब वह तारा दूर चला गया, तो ये असंख्य ग्रहाणु सूर्य के चारों ओर अपनी-अपनी कक्षाओं में चक्कर लगाने लगे। चक्कर लगाने के दौरान ये छोटे ग्रहाणु आपस में टकराने लगे। गुरुत्वाकर्षण के कारण छोटे कण बड़े कणों की ओर आकर्षित हुए और आपस में जुड़ते चले गए। इस संचय (Accretion) की प्रक्रिया के कारण धीरे-धीरे बड़े पिंडों का निर्माण हुआ, जिन्हें आज हम ग्रह कहते हैं। इसी ग्रहाणुओं के आपस में मिलने से हमारी पृथ्वी का भी जन्म हुआ।
इस सिद्धांत का महत्व:
यह सिद्धांत इस मायने में महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पहली बार समझाता है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना में ठोसपन कहाँ से आया। यह ग्रहों के निर्माण में ‘ठोस कणों के संचय’ की वकालत करता है, जिसे आधुनिक विज्ञान भी आंशिक रूप से स्वीकार करता है।
4. आधुनिक नीहारिका सिद्धांत (Modern Nebular Theory)
यह वर्तमान समय में सौरमंडल और ग्रहों की उत्पत्ति को समझाने का सबसे प्रामाणिक और वैज्ञानिक रूप से स्वीकार्य सिद्धांत है। इसका विकास 20वीं सदी के मध्य में ओटो श्मिट (रूस), कार्ल वॉन वाइज़सेकर (जर्मनी) और जेरार्ड कुइपर जैसे वैज्ञानिकों के सामूहिक प्रयासों से हुआ।
वैज्ञानिक विश्लेषण:
इस आधुनिक सिद्धांत के अनुसार, लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले अंतरिक्ष के एक कोने में गैस (मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम) और अत्यधिक सूक्ष्म धूल के कणों का एक विशालकाय, ठंडा अंतरतारकीय बादल (Interstellar Cloud) मौजूद था। किसी निकटवर्ती सुपरनोवा (तारे के विस्फोट) से निकली शॉकवेव (आघात तरंग) के कारण इस बादल के भीतर गुरुत्वाकर्षण असंतुलन पैदा हो गया, जिससे यह बादल अपने ही केंद्र की ओर सिकुड़ने लगा।
जैसे-जैसे बादल सिकुड़ता गया, भौतिकी के कोणीय संवेग संरक्षण के नियम के अनुसार, इसके घूमने की गति अत्यधिक तेज हो गई। तेज गति के कारण यह गोल बादल एक चपटी घूमती हुई डिस्क (Accretion Disk) के आकार में बदल गया।
सूर्य का जन्म: इस डिस्क के केंद्र में सारा द्रव्यमान (लगभग 99.8%) इकट्ठा हो गया, जहाँ अत्यधिक दबाव और तापमान के कारण ‘नाभिकीय संलयन’ (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया शुरू हुई और हमारे सूर्य का जन्म हुआ।
ग्रहों का जन्म: डिस्क के बाहरी हिस्सों में बचे हुए धूल और गैस के कण आपस में टकराकर ‘इलेक्ट्रोस्टैटिक बल’ के कारण चिपकने लगे। छोटे कणों से कंकड़ बने, कंकड़ों से चट्टानें बनीं और चट्टानों के गुरुत्वाकर्षण से बड़े-बड़े ‘प्रोटो-प्लैनेट्स’ (Proto-planets) बने। इसी चक्राकार डिस्क के मलबे के आपस में संघनित होने से लगभग 4.54 अरब वर्ष पहले पृथ्वी का निर्माण हुआ।
बिग बैंग सिद्धांत (Big Bang Theory) और पृथ्वी का संबंध
पृथ्वी की उत्पत्ति की कहानी अधूरी है अगर हम ब्रह्मांड की उत्पत्ति के महा-सिद्धांत यानी ‘बिग बैंग सिद्धांत’ की चर्चा न करें। इसका प्रतिपादन जॉर्ज लेमैत्रे (1927) ने किया था और एडविन हबल ने 1929 में इसके पक्ष में प्रमाण दिए थे।
सृष्टि का महाविस्फोट:
इस सिद्धांत के अनुसार, आज से लगभग 13.8 अरब वर्ष पहले हमारा पूरा ब्रह्मांड, आकाशगंगाएं, तारे और परमाणु सब कुछ एक अत्यंत छोटे, अत्यधिक घने और अनंत तापमान वाले एक ही बिंदु (Singularity) के रूप में सिमटे हुए थे। इस बिंदु के भीतर अचानक एक अकल्पनीय महाविस्फोट हुआ, जिसे ‘बिग बैंग’ कहा जाता है।
इस विस्फोट के साथ ही समय, स्थान (Space) और मलबे का तेजी से विस्तार होने लगा। जैसे-जैसे ब्रह्मांड फैलता गया, यह ठंडा होता गया। उप-परमाणु कणों से हाइड्रोजन और हीलियम जैसी गैसें बनीं। करोड़ों वर्षों के अंतराल में इन गैसों के बादलों से आकाशगंगाएं (Galaxies) बनीं, उन आकाशगंगाओं के भीतर तारों का जन्म हुआ। उन्हीं तारों में से एक हमारा सूर्य था, और सूर्य के बनने की इसी प्रक्रिया में अंततः हमारी पृथ्वी का निर्माण हुआ। अर्थात्, बिग बैंग ही वह मूल कारण है जिससे पृथ्वी की उत्पत्ति का रास्ता साफ हुआ।
पृथ्वी के निर्माण की चार क्रमिक प्रक्रियाएं (Step-by-Step Formation)
आधुनिक खगोलीय और भूवैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी के जन्म से लेकर उसके ठोस रूप में आने तक की प्रक्रिया को चार मुख्य चरणों में समझा जा सकता है:
चरण 1: सौर नीहारिका में धूल का संचय
शुरुआती दौर में सूर्य के चारों ओर घूम रही डिस्क में केवल गैस और धूल के सूक्ष्म कण थे। ये कण आपस में टकराकर छोटे-छोटे पिंडों में बदलने लगे।
चरण 2: ग्रहाणुओं (Planetesimals) का तीव्र निर्माण
जब ये पिंड थोड़े बड़े (लगभग 1 से 10 किलोमीटर व्यास के) हो गए, तो इनका अपना गुरुत्वाकर्षण पैदा हो गया। अब ये अपने आस-पास के मलबे को तेजी से अपनी ओर खींचने लगे। इन्हें ग्रहाणु कहा गया।
चरण 3: प्रोटो-अर्थ (Proto-Earth) का उद्भव
लाखों ग्रहाणुओं के आपस में टकराने और विलीन होने से एक बहुत बड़ा पिंड बना, जिसे ‘प्रोटो-अर्थ’ या प्रारंभिक पृथ्वी कहा जाता है। इस दौर में भयंकर टक्करें हो रही थीं, जिससे अत्यधिक ऊष्मा पैदा हो रही थी।
चरण 4: अंतिम आकार और चंद्रमा का जन्म (The Big Splat)
निर्माण के अंतिम दौर में, मंगल ग्रह के आकार का एक विशालकाय खगोलीय पिंड (जिसे वैज्ञानिक ‘थिया’ कहते हैं) हमारी प्रारंभिक पृथ्वी से टकराया। इस भयानक टक्कर से पृथ्वी का एक बहुत बड़ा हिस्सा टूटकर अंतरिक्ष में बिखर गया, जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण चारों ओर घूमने लगा और बाद में इकट्ठा होकर चंद्रमा (Moon) बना। इस टक्कर के बाद पृथ्वी को अपना अंतिम द्रव्यमान और आकार प्राप्त हुआ।
प्रारंभिक पृथ्वी की नरक जैसी अवस्था और विभेदन प्रक्रिया
जब पृथ्वी का निर्माण पूरा हुआ, तब वह आज जैसी शांत और सुंदर बिल्कुल नहीं थी। वह अंतरिक्ष में तैरता हुआ “पिघली हुई चट्टानों का एक धधकती आग का गोला” थी।
प्रारंभिक पृथ्वी की मुख्य विशेषताएं:
अत्यधिक तापमान: भयंकर टक्करों, रेडियोधर्मी तत्वों के विघटन और अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी का तापमान हजारों डिग्री सेल्सियस था। सतह पर लावा के महासागर (Magma Oceans) बह रहे थे।
उल्कापिंडों की अनवरत वर्षा: सौरमंडल में बचा हुआ मलबा लगातार पृथ्वी पर बमबारी की तरह गिर रहा था, जिससे तापमान कम नहीं हो पा रहा था।
कोई वायुमंडल नहीं: शुरुआती दौर में पृथ्वी पर सांस लेने योग्य कोई वायुमंडल या पानी मौजूद नहीं था।
पृथ्वी का विभेदन (Core Differentiation Process):
जैसे-जैसे करोड़ों वर्षों में पृथ्वी ने अपनी गर्मी अंतरिक्ष में छोड़ी, वह धीरे-धीरे ठंडी होने लगी। ठंडे होने की इसी प्रक्रिया के दौरान गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना घटी, जिसे भूविज्ञान में ‘विभेदन’ (Differentiation) कहा जाता है।
भारी तत्वों का डूबना: पृथ्वी के पिघले हुए रूप में होने के कारण, जो तत्व अत्यधिक भारी और घने थे, जैसे— लोहा (Iron) और निकेल (Nickel), वे गुरुत्वाकर्षण के कारण डूबकर पृथ्वी के बिल्कुल केंद्र (Center) में चले गए। इससे पृथ्वी के सबसे भीतरी भाग यानी ‘क्रोड’ (Core) का निर्माण हुआ।
हल्के तत्वों का तैरना: जो तत्व तुलनात्मक रूप से हल्के और कम घने थे, जैसे— सिलिका (Silica), एल्युमिनियम (Aluminium) और मैग्नीशियम, वे तैरकर ऊपर आ गए और ठंडे होकर जम गए। इससे पृथ्वी की बाहरी परतों का निर्माण हुआ।
पृथ्वी की आंतरिक परतों का विकास (Evolution of Layers)
विभेदन (Differentiation) की इसी जादुई प्रक्रिया के कारण हमारी पृथ्वी अंदर से प्याज के छिलकों की तरह तीन प्रमुख और स्पष्ट परतों में विभाजित हो गई, जिसका अध्ययन प्रशासनिक परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:
1. भू-पर्पटी (Crust):
यह पृथ्वी की सबसे बाहरी, सबसे पतली और ठोस परत है जिस पर हम रहते हैं और महाद्वीपों व महासागरों का निर्माण होता है। यह मुख्य रूप से सिलिका और एल्युमिनियम से बनी है, इसलिए इसे ‘सियाल’ (SIAL) भी कहा जाता है। इसकी मोटाई महाद्वीपों के नीचे लगभग 30-50 किमी और महासागरों के नीचे केवल 5 किमी होती है।
2. मैंटल (Mantle):
यह क्रस्ट के नीचे स्थित पृथ्वी की मध्यवर्ती परत है, जो लगभग 2900 किलोमीटर की गहराई तक फैली हुई है। यह पृथ्वी के कुल आयतन का लगभग 83% हिस्सा घेरती है। यह मुख्य रूप से सिलिका और मैग्नीशियम से बनी है, इसलिए इसे ‘सीमा’ (SIMA) कहा जाता है। इसका ऊपरी भाग अर्ध-पिघली अवस्था में है, जिसे एस्थेनोस्फीयर (Asthenosphere) कहते हैं, जहाँ से ज्वालामुखी का लावा निकलता है।
3. क्रोड (Core):
यह पृथ्वी का सबसे भीतरी और केंद्रीय भाग है, जो 2900 किमी से लेकर 6371 किमी (पृथ्वी के केंद्र) तक फैला है। अत्यधिक दबाव के कारण इसका आंतरिक भाग ठोस है। यह मुख्य रूप से निकेल और लोहे से बना है, इसलिए इसे ‘नीफे’ (NIFE) कहा जाता है। यहाँ का तापमान सूर्य की सतह के बराबर (लगभग 6000°C) होता है।
वायुमंडल और महासागरों का क्रमिक निर्माण (The Blue Planet)
पिघली हुई पृथ्वी के ठोस होने के बाद उसके वायुमंडल और पानी के बनने की कहानी किसी रोमांचक फिल्म जैसी है।
द्वितीयक वायुमंडल का विकास (Outgassing):
पृथ्वी के बनने के समय जो पहला सौर वायुमंडल (हाइड्रोजन और हीलियम का) था, उसे सूर्य की तेज सौर पवनों (Solar Winds) ने उड़ाकर नष्ट कर दिया था। इसके बाद, जब पृथ्वी ठंडी हो रही थी, तो उसके भीतर छिपी हुई गैसें भयंकर ज्वालामुखीय विस्फोटों के माध्यम से बाहर निकलने लगीं। इस प्रक्रिया को विज्ञान में ‘डीगैसिंग’ या ‘गैस उत्सर्जन’ (Outgassing) कहा जाता है।
इन विस्फोटों से बड़े पैमाने पर जलवाष्प (Water Vapor), कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), नाइट्रोजन, अमोनिया और मीथेन जैसी गैसें बाहर आईं। इसी से पृथ्वी के ‘द्वितीयक वायुमंडल’ का निर्माण हुआ। इस शुरुआती वायुमंडल में मुक्त ऑक्सीजन (O2) बिल्कुल नहीं थी।
महासागरों का जन्म:
जैसे-जैसे वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा बढ़ती गई, पृथ्वी के ठंडे होने से वह जलवाष्प संघनित (Condense) होकर बादलों में बदलने लगी। इसके बाद पृथ्वी पर जो बारिश शुरू हुई, उसकी कल्पना करना भी असंभव है। करोड़ों वर्षों तक अनवरत और मूसलाधार बारिश होती रही। आकाश से गिरने वाला पानी जब गर्म धरती पर गिरता, तो वह तुरंत भाप बनकर वापस उड़ जाता और फिर बादल बनकर बरसता। धीरे-धीरे जब धरती इतनी ठंडी हो गई कि पानी उसकी सतह पर टिक सके, तो इस मूसलाधार बारिश का पानी पृथ्वी के बड़े-बड़े गड्ढों और निचले बेसिनों में इकट्ठा होने लगा। इन्हीं विशाल गड्ढों के पानी से भरने के कारण पृथ्वी पर महासागरों (Oceans) का निर्माण हुआ।
पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति: एक अद्भुत चमत्कार
महासागरों के बनने के बाद ही पृथ्वी पर जीवन के पनपने की पृष्ठभूमि तैयार हुई। लगभग 3.8 अरब वर्ष पहले महासागरों का पानी विभिन्न रसायनों और खनिजों से समृद्ध हो चुका था, जिसे वैज्ञानिक ‘प्राइमॉर्डियल सूप’ (Primordial Soup) कहते हैं।
रासायनिक विकास: इस गर्म पानी के भीतर कार्बनिक अणुओं (Organic Molecules) और अमीनो एसिड का रासायनिक संयोजन हुआ, जिससे पहली बार जीवन की बुनियादी इकाई ‘आरएनए’ (RNA) और ‘डीएनए’ (DNA) का निर्माण हुआ।
पहला जीव (लगभग 3.5 अरब वर्ष पूर्व): पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत महासागरों की गहराइयों में एक अत्यंत सरल, एककोशिकीय (Single-celled) और बिना ऑक्सीजन के जीवित रहने वाले सूक्ष्म जीव (अवायवीय बैक्टीरिया) के रूप में हुई।
ऑक्सीजन क्रांति (Cyanobacteria): लगभग 2.5 अरब वर्ष पहले महासागरों में ‘साइनोबैक्टीरिया’ (Blue-green Algae) का विकास हुआ। इन सूक्ष्म पौधों ने सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया शुरू की। इसके परिणामस्वरूप उन्होंने बड़े पैमाने पर ऑक्सीजन गैस छोड़नी शुरू की। धीरे-धीरे यह ऑक्सीजन महासागरों से निकलकर वायुमंडल में फैल गई, जिससे आज के सांस लेने योग्य वायुमंडल का निर्माण हुआ और जटिल जीवों व अंततः मानव के विकास का रास्ता खुला।
पृथ्वी को सौरमंडल का सबसे विशिष्ट ग्रह क्यों माना जाता है?
भूगोल के छात्रों को यह विश्लेषणात्मक समझ होनी चाहिए कि आखिर हमारा ग्रह इतना खास क्यों है कि यहाँ जीवन फल-फूल सका, जबकि हमारे पड़ोसी मंगल और शुक्र पूरी तरह बंजर रह गए। इसके पांच मुख्य भौगोलिक कारण हैं:
गोल्डीलॉक्स ज़ोन (Goldilocks Zone) में स्थिति: हमारी पृथ्वी सूर्य से एक ऐसी आदर्श दूरी पर स्थित है जिसे ‘हैरिटेबल ज़ोन’ या गोल्डीलॉक्स ज़ोन कहा जाता है। यहाँ न तो शुक्र ग्रह की तरह अत्यधिक गर्मी है और न ही मंगल या बृहस्पति की तरह अत्यधिक कड़ाके की ठंड। इसी आदर्श तापमान के कारण पृथ्वी पर पानी तरल अवस्था (Liquid Water) में रह पाता है।
तरल जल की प्रचुरता: पानी जीवन के लिए सबसे उत्तम विलायक (Solvent) है। सौरमंडल के किसी अन्य ग्रह की सतह पर तरल पानी का ऐसा विशाल भंडार मौजूद नहीं है।
सुरक्षात्मक वायुमंडल और ओजोन परत: पृथ्वी का वायुमंडल न केवल हमें सांस लेने के लिए ऑक्सीजन प्रदान करता है, बल्कि इसकी ओजोन परत (Ozone Layer) सूर्य से आने वाली विनाशकारी पराबैंगनी किरणों (UV Rays) को सोख लेती है, जिससे धरातल पर जीवन सुरक्षित रहता है।
सशक्त चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field): पृथ्वी के क्रोड में घूमते हुए पिघले लोहे के कारण एक बहुत ही शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र का निर्माण होता है। यह चुंबकीय ढांचा अंतरिक्ष से आने वाले खतरनाक सौर तूफानों (Solar Flares) और ब्रह्मांडीय विकिरण को पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से रोक देता है।
प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics): पृथ्वी की सतह पर प्लेटों की गतियां निरंतर होती रहती हैं। यह प्रक्रिया कार्बन डाइऑक्साइड को रीसायकल करने और पृथ्वी के दीर्घकालिक तापमान को नियंत्रित रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाती है।
परीक्षा के लिए 40+ अति महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision Points)
पृथ्वी की उत्पत्ति प्रागैतिहासिक काल से ही मानव की जिज्ञासा का विषय रही है।
पृथ्वी की वास्तविक आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष (454 करोड़ वर्ष) आँकी गई है।
ब्रह्मांड की कुल अनुमानित आयु लगभग 13.8 अरब वर्ष है।
पृथ्वी और सौरमंडल की उत्पत्ति का सबसे पहला वैज्ञानिक प्रयास इमैनुएल कांट ने 1755 में किया था।
कांट का सिद्धांत न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियमों पर आधारित था।
प्रसिद्ध ‘नीहारिका सिद्धांत’ (Nebular Hypothesis) का प्रतिपादन पियरे लाप्लास ने 1796 में किया था।
लाप्लास की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘एक्सपोजिशन ऑफ द वर्ल्ड सिस्टम’ है।
लाप्लास के अनुसार सौरमंडल का निर्माण एक ही घूमती हुई गर्म नीहारिका से हुआ है।
‘ज्वारीय सिद्धांत’ (Tidal Theory) का प्रतिपादन सर जेम्स जीन्स ने 1919 में किया था।
जेम्स जीन्स के ज्वारीय सिद्धांत में संशोधन हैरोल्ड जेफ्रीज़ ने 1929 में किया था।
ज्वारीय सिद्धांत के अनुसार ग्रहों का निर्माण सूर्य से निकले सिगारनुमा ‘फिलामेंट’ से हुआ है।
‘ग्रहाणु सिद्धांत’ (Planetesimal Theory) के प्रतिपादक टी.सी. चेम्बरलिन और एफ.आर. मोल्टन थे।
ग्रहाणु सिद्धांत के अनुसार ग्रहों का निर्माण ठोस कणों के आपस में संचय (Accretion) से हुआ है।
‘द्वैतारक सिद्धांत’ (Binary Theory) के अनुसार सौरमंडल के निर्माण में सूर्य के अलावा दो अन्य तारे शामिल थे।
अंतरतारकीय धूल सिद्धांत (Interstellar Dust Theory) का प्रतिपादन ओटो श्मिट ने 1943 में किया था।
वर्तमान में सौरमंडल की उत्पत्ति के लिए ‘आधुनिक नीहारिका सिद्धांत’ को सर्वाधिक स्वीकार्य माना जाता है।
ब्रह्मांड की उत्पत्ति का सबसे आधुनिक और सर्वमान्य सिद्धांत ‘बिग बैंग सिद्धांत’ है।
बिग बैंग सिद्धांत का प्रतिपादन बेल्जियम के खगोलविद जॉर्ज लेमैत्रे ने किया था।
एडविन हबल ने 1929 में साबित किया था कि हमारा ब्रह्मांड निरंतर फैल रहा है (Expanding Universe)।
पृथ्वी के निर्माण के शुरुआती दौर में मंगल के आकार के पिंड की टक्कर को ‘द बिग स्प्लैट’ (The Big Splat) कहा जाता है।
इसी ‘बिग स्प्लैट’ टक्कर के परिणामस्वरूप पृथ्वी के मलबे से चंद्रमा का जन्म हुआ था।
प्रारंभिक पृथ्वी पिघली हुई चट्टानों और लावा का एक धधकती आग का गोला थी।
पृथ्वी के ठंडे होने के दौरान भारी तत्वों के नीचे बैठने और हल्के तत्वों के ऊपर तैरने की प्रक्रिया को ‘विभेदन’ (Differentiation) कहते हैं।
विभेदन प्रक्रिया के कारण ही पृथ्वी अंदर से तीन स्पष्ट परतों में विभाजित हो गई।
पृथ्वी की सबसे बाहरी ठोस परत को ‘भू-पर्पटी’ या क्रस्ट (Crust) कहा जाता है।
क्रस्ट मुख्य रूप से सिलिका और एल्युमिनियम से बना है, इसलिए इसे ‘सियाल’ (SIAL) भी कहते हैं।
पृथ्वी की मध्यवर्ती परत को मैंटल (Mantle) कहा जाता है, जो 2900 किमी गहराई तक है।
मैंटल मुख्य रूप से सिलिका और मैग्नीशियम से बनी है, इसलिए इसे ‘सीमा’ (SIMA) कहते हैं।
ज्वालामुखी विस्फोट के समय निकलने वाला मैग्मा मैंटल के ऊपरी भाग ‘एस्थेनोस्फीयर’ से आता है।
पृथ्वी के सबसे भीतरी और केंद्रीय भाग को क्रोड या कोर (Core) कहा जाता है।
क्रोड मुख्य रूप से निकेल और लोहे (Ferrum) से बना है, इसलिए इसे ‘नीफे’ (NIFE) कहते हैं।
पृथ्वी के प्रारंभिक वायुमंडल के नष्ट होने के बाद ज्वालामुखियों से गैस निकलने की प्रक्रिया को ‘डीगैसिंग’ (Outgassing) कहते हैं।
प्रारंभिक वायुमंडल में जलवाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन की प्रधानता थी, मुक्त ऑक्सीजन नहीं थी।
वायुमंडल की जलवाष्प के संघनित होकर करोड़ों वर्षों तक बरसने से महासागरों का निर्माण हुआ।
पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति आज से लगभग 3.5 से 3.8 अरब वर्ष पहले महासागरों में हुई थी।
पृथ्वी पर प्रकाश-संश्लेषण के जरिए पहली बार ऑक्सीजन छोड़ने वाले जीव ‘साइनोबैक्टीरिया’ (नील-हरित शैवाल) थे।
पृथ्वी की आयु का निर्धारण करने के लिए ‘रेडियोमेट्रिक डेटिंग’ (यूरेनियम-लेड विधि) का उपयोग किया जाता है।
किसी ग्रह के चारों ओर का वह क्षेत्र जहाँ का तापमान तरल जल के लिए उपयुक्त होता है, ‘गोल्डीलॉक्स ज़ोन’ कहलाता है।
पृथ्वी का शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र इसके बाहरी क्रोड में पिघले हुए लोहे की गतियों (जियोडायनेमो) के कारण बनता है।
पृथ्वी सौरमंडल का एकमात्र ऐसा ग्रह है जहाँ सक्रिय प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) पाई जाती है।
विस्तृत FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले वैचारिक प्रश्न)
प्रश्न 1: लाप्लास के नीहारिका सिद्धांत और कांट के गैसीय सिद्धांत में क्या मुख्य अंतर है? उत्तर: कांट का सिद्धांत मानता था कि आदि-पदार्थ प्रारंभ में अत्यंत ठंडे और गतिहीन थे, जो गुरुत्वाकर्षण के कारण टकराए और गर्म होकर घूमने लगे (जो वैज्ञानिक रूप से गलत था)। इसके विपरीत, लाप्लास ने अपने सिद्धांत की शुरुआत ही एक पहले से ही अत्यंत गर्म, विशाल और निरंतर घूमती हुई नीहारिका से की थी, जिसके ठंडे होने और सिकुड़ने से छल्ले अलग हुए।
प्रश्न 2: पृथ्वी की उत्पत्ति के संदर्भ में ‘अद्वैतवादी’ और ‘द्वैतवादी’ संकल्पनाओं में क्या अंतर है? उत्तर: अद्वैतवादी संकल्पना (Monistic) यह मानती है कि संपूर्ण सौरमंडल और पृथ्वी का निर्माण केवल एक ही मूल तत्व या एक ही तारे (सूर्य/नीहारिका) से हुआ है। जबकि द्वैतवादी संकल्पना (Dualistic) के अनुसार, सौरमंडल के निर्माण के लिए दो तारों का होना आवश्यक था—एक हमारा आदि-सूर्य और दूसरा उसके पास से गुजरने वाला कोई अन्य विशालकाय तारा।
प्रश्न 3: पृथ्वी के विकास में ‘विभेदन प्रक्रिया’ (Differentiation Process) का क्या महत्व है? उत्तर: यदि पृथ्वी में विभेदन की प्रक्रिया नहीं होती, तो हमारी पृथ्वी अंदर से बाहर तक एक जैसी ही होती। विभेदन के कारण ही घनत्व के आधार पर भारी तत्व (लोहा, निकेल) केंद्र में चले गए और हल्के तत्व ऊपर आ गए। इसी प्रक्रिया से पृथ्वी को उसकी तीन स्पष्ट परतें (क्रस्ट, मैंटल, कोर) प्राप्त हुईं, जिससे पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र और महाद्वीपीय ढांचा बन सका।
प्रश्न 4: पृथ्वी के प्रारंभिक वायुमंडल में ऑक्सीजन कब और कैसे शामिल हुई? उत्तर: पृथ्वी के शुरुआती वायुमंडल में ज्वालामुखियों से निकली जहरीली गैसें और जलवाष्प थीं, लेकिन ऑक्सीजन गैस स्वतंत्र रूप से मौजूद नहीं थी। लगभग 2.5 अरब वर्ष पहले महासागरों में ‘साइनोबैक्टीरिया’ नामक सूक्ष्म जीवों का विकास हुआ। इन जीवों ने सूर्य के प्रकाश की मदद से ‘प्रकाश-संश्लेषण’ शुरू किया और बाई-प्रोडक्ट के रूप में बड़े पैमाने पर ऑक्सीजन छोड़ी, जिससे धीरे-धीरे पूरा वायुमंडल ऑक्सीजन से भर गया।
प्रश्न 5: ‘गोल्डीलॉक्स ज़ोन’ (Goldilocks Zone) क्या है और यह पृथ्वी के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? उत्तर: अंतरिक्ष विज्ञान में किसी तारे (जैसे सूर्य) के चारों ओर के उस रहने योग्य क्षेत्र (Habitable Zone) को गोल्डीलॉक्स ज़ोन कहा जाता है, जहाँ का तापमान न तो बहुत अधिक गर्म होता है और न ही बहुत अधिक ठंडा। हमारी पृथ्वी सूर्य से इसी ज़ोन में स्थित है, जिसके कारण यहाँ पानी न तो भाप बनकर उड़ता है और न ही हमेशा के लिए बर्फ बनकर जमा रहता है, बल्कि जीवन के लिए जरूरी तरल अवस्था में मौजूद रहता है।
अभ्यास हेतु 10 उच्च-स्तरीय बहुविकल्पीय प्रश्न (Deep-Level MCQs)
1. पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित सुप्रसिद्ध ‘वायव्य राशि सिद्धांत’ (Gas Theory) का प्रतिपादन 1755 में किस दार्शनिक ने किया था? (A) पियरे लाप्लास (B) इमैनुएल कांट (C) जेम्स जीन्स (D) थॉमस चेम्बरलिन उत्तर: (B) इमैनुएल कांट
2. लाप्लास द्वारा प्रतिपादित ‘नीहारिका सिद्धांत’ के अनुसार, नीहारिका के सिकुड़ने पर उसकी घूर्णन गति पर क्या प्रभाव पड़ा? (A) घूर्णन गति कम हो गई (B) घूर्णन गति अत्यधिक तेज हो गई (C) घूर्णन गति पूरी तरह रुक गई (D) गति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा उत्तर: (B) घूर्णन गति अत्यधिक तेज हो गई (आकार छोटा होने से अपकेंद्रीय बल बढ़ गया)
3. “सौरमंडल के निर्माण में सूर्य की सतह से सिगार के आकार का एक गैसीय फिलामेंट बाहर निकला था।” यह कथन किस सिद्धांत की मूल विशेषता है? (A) ग्रहाणु सिद्धांत (B) नीहारिका सिद्धांत (C) ज्वारीय सिद्धांत (D) बिग बैंग सिद्धांत उत्तर: (C) ज्वारीय सिद्धांत (सर जेम्स जीन्स)
4. चेम्बरलिन और मोल्टन द्वारा दिए गए ‘ग्रहाणु सिद्धांत’ (Planetesimal Theory) के अनुसार ग्रहों का निर्माण किस प्रक्रिया के तहत हुआ था? (A) गैसीय छल्लों के अचानक फटने से (B) असंख्य ठोस कणों के आपस में संचय (Accretion) से (C) सूर्य के दो टुकड़ों में विभाजित होने से (D) एक विशाल धूमकेतु की टक्कर से उत्तर: (B) असंख्य ठोस कणों के आपस में संचय से
5. ब्रह्मांड की उत्पत्ति और उसके निरंतर विस्तार को समझाने वाले ‘बिग बैंग सिद्धांत’ (Big Bang Theory) का प्रतिपादन किसने किया था? (A) एडविन हबल (B) जॉर्ज लेमैत्रे (C) अलेक्जेंडर हम्बोल्ट (D) ओटो श्मिट उत्तर: (B) जॉर्ज लेमैत्रे
6. पृथ्वी के इतिहास में ‘द बिग स्प्लैट’ (The Big Splat) नामक खगोलीय घटना का संबंध निम्नलिखित में से किसकी उत्पत्ति से माना जाता है? (A) प्रशांत महासागर की उत्पत्ति (B) चंद्रमा की उत्पत्ति (C) वायुमंडल के निर्माण (D) हिमालय पर्वत के उत्थान उत्तर: (B) चंद्रमा की उत्पत्ति (थिया नामक पिंड की पृथ्वी से टक्कर)
7. पृथ्वी के ठंडे होने के दौरान भारी तत्वों के केंद्र में बैठने और हल्के तत्वों के ऊपर तैरने की भूवैज्ञानिक प्रक्रिया को क्या कहा जाता है? (A) विवर्तनिकी (Tectonics) (B) संघनन (Condensation) (C) विभेदन (Differentiation) (D) गैस उत्सर्जन (Outgassing) उत्तर: (C) विभेदन
8. पृथ्वी की कौन सी आंतरिक परत मुख्य रूप से सिलिका और एल्युमिनियम से बनी होने के कारण ‘सियाल’ (SIAL) के नाम से जानी जाती है? (A) मैंटल (B) बाहरी क्रोड (C) भू-पर्पटी (Crust) (D) आंतरिक क्रोड उत्तर: (C) भू-पर्पटी (Crust)
9. प्रारंभिक पृथ्वी के वायुमंडल के विकास में सहायक ‘डीगैसिंग’ या ‘आउटगैस उत्सर्जन’ (Outgassing) की प्रक्रिया का मुख्य स्रोत क्या था? (A) सौर पवनों का प्रभाव (B) भयंकर ज्वालामुखीय विस्फोट (C) उल्कापिंडों की बर्फ का पिघलना (D) महासागरों का वाष्पीकरण उत्तर: (B) भयंकर ज्वालामुखीय विस्फोट
10. वैज्ञानिकों द्वारा पृथ्वी की सटीक आयु (4.54 अरब वर्ष) का निर्धारण मुख्य रूप से किस वैज्ञानिक तकनीक के आधार पर किया गया है? (A) कार्बन डेटिंग विधि (B) रेडियोमेट्रिक डेटिंग (यूरेनियम-लेड विधि) (C) जीवाश्मों की परतों का अध्ययन (D) वृक्ष वलय विश्लेषण (Dendrochronology) उत्तर: (B) रेडियोमेट्रिक डेटिंग (इसके लिए प्राचीनतम उल्कापिंडों के नमूनों का परीक्षण किया गया है)
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