संविधान का निर्माण (Making of the Indian Constitution): ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, कार्यप्रणाली, समितियां और आलोचना |

संविधान का निर्माण

संविधान का निर्माण: एक संप्रभु राष्ट्र के सबसे बड़े दस्तावेज़ का उदय

किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक सर्वोच्च कानून की आवश्यकता होती है, जिसे ‘संविधान’ कहा जाता है। भारत का संविधान कोई एक दिन, एक महीने या एक वर्ष में तैयार किया गया दस्तावेज़ नहीं है। यह लगभग दो सदियों के ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, अनगिनत आंदोलनों, और देश के सबसे महान विचारकों के बौद्धिक मंथन का परिणाम है।

भारतीय संविधान न केवल दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है, बल्कि यह एक ऐसा जीवंत दस्तावेज़ है जो भारत जैसी विशाल विविधताओं (भाषा, धर्म, जाति, और संस्कृति) वाले देश को एक सूत्र में पिरोता है। इस लेख में हम ‘संविधान के निर्माण’ की पूरी ऐतिहासिक यात्रा, संविधान सभा की जटिल कार्यप्रणाली, और इसके सामने आने वाली चुनौतियों का विस्तार से विश्लेषण करेंगे।

1. संविधान सभा की मांग: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत के लिए एक स्वतंत्र ‘संविधान सभा’ (Constituent Assembly) की मांग रातों-रात नहीं उठी थी। इसका एक क्रमिक इतिहास रहा है:

  • 1934 – पहली औपचारिक मांग: भारत में वामपंथी आंदोलन के प्रणेता एम. एन. रॉय (M.N. Roy) ने सबसे पहले भारत के लिए एक संविधान सभा के गठन का विचार रखा।

  • 1935 – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रस्ताव: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) ने पहली बार आधिकारिक तौर पर भारत के संविधान के निर्माण के लिए एक संविधान सभा के गठन की मांग की।

  • 1938 – पंडित नेहरू की घोषणा: पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस की ओर से घोषणा की कि “स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के, वयस्क मताधिकार (Adult Franchise) के आधार पर चुनी गई संविधान सभा द्वारा किया जाएगा।”

  • 1940 – अगस्त प्रस्ताव (August Offer): ब्रिटिश सरकार ने पहली बार सैद्धांतिक रूप से इस मांग को स्वीकार किया, जिसे ‘अगस्त प्रस्ताव’ के नाम से जाना जाता है।

  • 1942 – क्रिप्स मिशन (Cripps Mission): सर स्टैफोर्ड क्रिप्स एक मसौदा प्रस्ताव लेकर भारत आए, जिसमें द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र संविधान के निर्माण की बात कही गई। लेकिन मुस्लिम लीग ने इसे अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह भारत को दो स्वायत्त हिस्सों में बांटना चाहती थी।

  • 1946 – कैबिनेट मिशन (Cabinet Mission): अंततः लॉर्ड पैथिक लॉरेंस, सर स्टैफोर्ड क्रिप्स और ए.वी. अलेक्जेंडर के नेतृत्व में कैबिनेट मिशन भारत आया। इसने दो संविधान सभाओं की मांग को तो ठुकरा दिया, लेकिन एक ऐसी योजना प्रस्तुत की जिसने काफी हद तक मुस्लिम लीग को संतुष्ट कर दिया। इसी के आधार पर हमारी संविधान सभा का गठन हुआ।

2. संविधान सभा का गठन (Composition of the Constituent Assembly)

कैबिनेट मिशन योजना के प्रस्तावों के तहत नवंबर 1946 में संविधान सभा का गठन किया गया। इसकी संरचना अत्यंत जटिल और गणितीय अनुपात पर आधारित थी।

सीटों का बंटवारा:

संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या 389 निर्धारित की गई थी। इसका विभाजन इस प्रकार था:

  1. ब्रिटिश भारत (British India): 296 सीटें

    • 292 सदस्य 11 गवर्नरों वाले प्रांतों से चुने जाने थे।

    • 4 सदस्य मुख्य आयुक्तों के प्रांतों (Chief Commissioners’ Provinces) – दिल्ली, अजमेर-मारवाड़, कुर्ग और ब्रिटिश बलूचिस्तान (प्रत्येक से एक) से आने थे।

  2. देशी रियासतें (Princely States): 93 सीटें

चुनाव का आधार:

  • जनसंख्या का अनुपात: हर प्रांत और देशी रियासत को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आवंटित की गई थीं। मोटे तौर पर, हर 10 लाख की आबादी पर एक सीट दी गई थी।

  • समुदायों के बीच विभाजन: ब्रिटिश प्रांतों को आवंटित सीटों को तीन प्रमुख समुदायों के बीच उनकी जनसंख्या के अनुपात में बांटा गया था— मुस्लिम, सिख और सामान्य (मुस्लिम और सिख को छोड़कर बाकी सभी)।

  • चुनाव की विधि: प्रांतीय विधान सभा के प्रत्येक समुदाय के सदस्यों ने एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) के माध्यम से आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) के तरीके से अपने प्रतिनिधियों का चुनाव किया।

  • रियासतों के प्रतिनिधि: देशी रियासतों के प्रतिनिधियों का चयन रियासतों के प्रमुखों (राजाओं/नवाबों) द्वारा किया जाना था (अर्थात ये सदस्य मनोनीत थे)।

निष्कर्ष: इस प्रकार, संविधान सभा आंशिक रूप से चुनी हुई (Partly Elected) और आंशिक रूप से मनोनीत (Partly Nominated) संस्था थी। साथ ही, इसके सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से (Indirectly) प्रांतीय सभाओं के सदस्यों द्वारा चुने गए थे, न कि सीधे जनता द्वारा।

.

संविधान सभा के चुनाव परिणाम (जुलाई-अगस्त 1946):

ब्रिटिश भारत के लिए आवंटित 296 सीटों के लिए चुनाव हुए।

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: 208 सीटें

  • मुस्लिम लीग: 73 सीटें

  • छोटे समूह और निर्दलीय: 15 सीटें

  • नोट: 93 देशी रियासतों ने शुरू में संविधान सभा से दूर रहने का फैसला किया, इसलिए उनकी सीटें खाली रहीं।

संविधान का निर्माण

3. संविधान सभा की कार्यप्रणाली (Working of the Constituent Assembly)

संविधान सभा का काम किसी भी सूरत में आसान नहीं था। भारत उस समय सांप्रदायिक दंगों, विभाजन की त्रासदी और गरीबी से जूझ रहा था।

  • प्रथम बैठक (9 दिसंबर 1946): संविधान सभा की पहली बैठक नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन हॉल (जिसे अब संसद भवन का सेंट्रल हॉल कहा जाता है) में हुई। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग पर अड़ते हुए इस बैठक का बहिष्कार किया। परिणामस्वरूप, इसमें केवल 211 सदस्यों ने भाग लिया।

  • अस्थायी अध्यक्ष का चुनाव: फ्रांस की संसदीय परंपरा का पालन करते हुए, सभा के सबसे वयोवृद्ध सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को सर्वसम्मति से सभा का अस्थायी अध्यक्ष चुना गया।

  • स्थायी अध्यक्ष (11 दिसंबर 1946): डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थायी अध्यक्ष और एच. सी. मुखर्जी (H.C. Mukherjee) तथा वी. टी. कृष्णामचारी (V.T. Krishnamachari) को उपाध्यक्ष चुना गया। (ध्यान दें: संविधान सभा के दो उपाध्यक्ष थे)।

  • संवैधानिक सलाहकार: प्रख्यात न्यायविद सर बी. एन. राव (B.N. Rau) को सभा का संवैधानिक सलाहकार नियुक्त किया गया।

उद्देश्य प्रस्ताव (The Objective Resolution)

संविधान के निर्माण की वास्तविक दिशा तब तय हुई जब 13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ऐतिहासिक ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ पेश किया। यह प्रस्ताव हमारे संविधान का दर्शन (Philosophy) और मूल आधार था।

उद्देश्य प्रस्ताव की मुख्य बातें:

  1. भारत एक स्वतंत्र, संप्रभु, गणराज्य (Independent Sovereign Republic) होगा।

  2. ब्रिटिश भारत के सभी क्षेत्र, देशी रियासतें और ऐसे अन्य क्षेत्र जो स्वतंत्र भारत में शामिल होना चाहते हैं, वे सभी भारतीय संघ का हिस्सा होंगे।

  3. संघ की सभी शक्तियां और अधिकार जनता से प्राप्त होंगे (लोकतांत्रिक शक्ति)।

  4. भारत के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; अवसर और कानून के समक्ष समानता; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और संघ बनाने की स्वतंत्रता मिलेगी।

  5. अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और जनजातीय क्षेत्रों के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय किए जाएंगे।

  6. विश्व शांति और मानव कल्याण को बढ़ावा दिया जाएगा।

इस प्रस्ताव को 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। इसी प्रस्ताव के परिवर्तित रूप ने आगे चलकर भारतीय संविधान की प्रस्तावना (Preamble) का रूप लिया।

4. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 द्वारा हुए परिवर्तन

जब माउंटबेटन योजना (3 जून 1947) के तहत भारत के विभाजन को स्वीकार कर लिया गया, तो देशी रियासतों के जो प्रतिनिधि सभा से दूर थे, वे धीरे-धीरे इसमें शामिल होने लगे। 1947 के स्वतंत्रता अधिनियम ने संविधान सभा की स्थिति में तीन बड़े बदलाव किए:

  1. सभा एक संप्रभु निकाय बन गई (Sovereign Body): सभा अब किसी भी प्रकार के बाहरी नियंत्रण से मुक्त थी। वह भारत के लिए कोई भी संविधान बना सकती थी और ब्रिटिश संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून को निरस्त कर सकती थी या बदल सकती थी।

  2. सभा एक विधायिका (Legislative Body) भी बन गई: संविधान सभा को अब दो अलग-अलग काम सौंपे गए— स्वतंत्र भारत के लिए संविधान बनाना और देश के लिए सामान्य कानून बनाना।

    • जब यह संविधान सभा के रूप में बैठती थी, तो इसकी अध्यक्षता डॉ. राजेंद्र प्रसाद करते थे।

    • जब यह विधायिका (संसद) के रूप में बैठती थी, तो इसकी अध्यक्षता जी. वी. मावलंकर (G.V. Mavalankar) करते थे। यह व्यवस्था 26 नवंबर 1949 तक जारी रही।

  3. सदस्यों की संख्या में कमी: मुस्लिम लीग के सदस्य (जो पाकिस्तान के क्षेत्रों से थे) भारतीय संविधान सभा से अलग हो गए। इससे सभा की कुल संख्या 389 से घटकर 299 रह गई। भारतीय प्रांतों की संख्या 296 से घटकर 229 हो गई और देशी रियासतों की संख्या 93 से 70 हो गई।

5. संविधान सभा द्वारा किए गए अन्य महत्वपूर्ण कार्य

संविधान बनाने और सामान्य कानून लागू करने के अलावा, संविधान सभा ने राष्ट्र निर्माण के कई अन्य महत्वपूर्ण कार्य भी किए:

  • मई 1949 में राष्ट्रमंडल (Commonwealth) में भारत की सदस्यता का सत्यापन किया।

  • 22 जुलाई 1947 को ‘राष्ट्रीय ध्वज’ (National Flag – तिरंगा) को अपनाया।

  • 24 जनवरी 1950 को ‘राष्ट्रीय गान’ (National Anthem – जन गण मन) को अपनाया।

  • 24 जनवरी 1950 को ही ‘राष्ट्रीय गीत’ (National Song – वंदे मातरम) को अपनाया।

  • 24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में चुना गया।

6. संविधान सभा की प्रमुख और उप-समितियां (Committees of the Assembly)

संविधान निर्माण के अलग-अलग कार्यों को तेजी से और विशेषज्ञता के साथ पूरा करने के लिए संविधान सभा ने 8 प्रमुख (Major) और 13 से अधिक छोटी (Minor) समितियों का गठन किया।

प्रमुख समितियां (Major Committees) और उनके अध्यक्ष:

  1. संघ शक्ति समिति (Union Powers Committee): पंडित जवाहरलाल नेहरू

  2. संघीय संविधान समिति (Union Constitution Committee): पंडित जवाहरलाल नेहरू

  3. प्रांतीय संविधान समिति (Provincial Constitution Committee): सरदार वल्लभभाई पटेल

  4. प्रारूप समिति (Drafting Committee): डॉ. बी. आर. अंबेडकर

  5. मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों और जनजातीय क्षेत्रों पर सलाहकार समिति: सरदार वल्लभभाई पटेल। इस समिति की महत्वपूर्ण उप-समितियां थीं:

    • मौलिक अधिकार उप-समिति (जे. बी. कृपलानी)

    • अल्पसंख्यक उप-समिति (एच. सी. मुखर्जी)

  6. प्रक्रिया नियम समिति (Rules of Procedure Committee): डॉ. राजेंद्र प्रसाद

  7. राज्यों के लिए समिति (States Committee – राज्यों से बातचीत के लिए): पंडित जवाहरलाल नेहरू

  8. संचालन समिति (Steering Committee): डॉ. राजेंद्र प्रसाद

महत्वपूर्ण छोटी समितियां (Minor Committees):

  • राष्ट्रध्वज तदर्थ समिति (Ad-hoc Committee on National Flag): डॉ. राजेंद्र प्रसाद

  • सर्वोच्च न्यायालय तदर्थ समिति: एस. वर्धाचारी (वे सभा के सदस्य नहीं थे)

  • आवास समिति (House Committee): बी. पट्टाभि सीतारमैय्या

  • कार्य संचालन समिति (Order of Business Committee): डॉ. के. एम. मुंशी

.

7. सबसे महत्वपूर्ण: प्रारूप समिति (The Drafting Committee)

सभी समितियों में सबसे महत्वपूर्ण ‘प्रारूप समिति‘ थी। इसका गठन 29 अगस्त 1947 को किया गया था। इस समिति का मुख्य कार्य संवैधानिक सलाहकार (बी.एन. राव) द्वारा तैयार किए गए मूल मसौदे पर विचार करना और नए संविधान का अंतिम ‘प्रारूप’ (Draft) तैयार करना था।

प्रारूप समिति के 7 सदस्य इस प्रकार थे:

  1. डॉ. बी. आर. अंबेडकर (अध्यक्ष) – उनके गहन कानूनी ज्ञान के कारण उन्हें ‘भारतीय संविधान का जनक’ (Father of the Indian Constitution) कहा जाता है।

  2. एन. गोपालस्वामी आयंगर

  3. अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर

  4. डॉ. के. एम. मुंशी

  5. सैयद मोहम्मद सादुल्लाह

  6. एन. माधव राव (इन्होंने बी. एल. मित्तर की जगह ली, जिन्होंने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दे दिया था)।

  7. टी. टी. कृष्णामचारी (इन्होंने डी. पी. खेतान की मृत्यु के बाद 1948 में उनकी जगह ली)।

प्रारूप का प्रकाशन: प्रारूप समिति ने विभिन्न समितियों के प्रस्तावों पर विचार करने के बाद भारत के संविधान का पहला प्रारूप तैयार किया, जिसे फरवरी 1948 में प्रकाशित किया गया। भारत के लोगों को इस पर चर्चा करने और संशोधन प्रस्तावित करने के लिए 8 महीने का समय दिया गया। जन-सुझावों के बाद दूसरा प्रारूप अक्टूबर 1948 में प्रकाशित किया गया। प्रारूप समिति ने अपना ड्राफ्ट तैयार करने में कुल 141 दिन बैठकें कीं।

8. संविधान का वाचन (Readings of the Constitution) और अधिनियमन

संसद की तरह, संविधान सभा में भी संविधान के मसौदे पर तीन बार वाचन (Readings/Discussions) हुए।

  1. प्रथम वाचन (First Reading): डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने 4 नवंबर 1948 को संविधान का अंतिम प्रारूप पेश किया। इस पर 5 दिनों तक सामान्य चर्चा हुई।

  2. द्वितीय वाचन (Second Reading): यह सबसे महत्वपूर्ण चरण था, जो 15 नवंबर 1948 से शुरू होकर 17 अक्टूबर 1949 तक चला। इसमें संविधान के प्रत्येक खंड (Clause by Clause) पर विस्तार से विचार किया गया। इस दौरान लगभग 7653 संशोधन (Amendments) प्रस्तावित किए गए, जिनमें से 2473 पर सभा में वास्तविक रूप से चर्चा हुई। यह दर्शाता है कि संविधान को कितनी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से गुजारा गया था।

  3. तृतीय वाचन (Third Reading): यह 14 नवंबर 1949 को शुरू हुआ।

अंततः डॉ. अंबेडकर द्वारा पेश किया गया प्रस्ताव “द कॉन्स्टिट्यूशन एज़ सेटल्ड बाय द असेंबली बी पास्ड” (The Constitution as settled by the Assembly be passed) 26 नवंबर 1949 को पारित घोषित किया गया।

इस दिन उपस्थित 299 सदस्यों में से 284 सदस्यों ने संविधान पर हस्ताक्षर किए। मूल संविधान (1949) में 1 प्रस्तावना (Preamble), 395 अनुच्छेद (Articles) और 8 अनुसूचियां (Schedules) शामिल थीं। (प्रस्तावना को पूरे संविधान के अधिनियमित होने के बाद लागू किया गया ताकि यह संविधान के प्रावधानों के अनुरूप रहे)।

9. संविधान का लागू होना (Enforcement of the Constitution)

हालांकि हमारा संविधान 26 नवंबर 1949 को बनकर तैयार हो गया था, लेकिन इसके सभी प्रावधान उसी दिन लागू नहीं हुए।

  • आंशिक रूप से लागू (Partial Enforcement): नागरिकता (Citizenship), चुनाव (Elections), अस्थायी संसद (Provisional Parliament), और कुछ अल्पकालिक प्रावधान से जुड़े अनुच्छेद (जैसे- 5, 6, 7, 8, 9, 60, 324, 366, 367, 379, 380, 388, 391, 392 और 393) 26 नवंबर 1949 को ही लागू हो गए।

  • पूर्ण रूप से लागू (Full Enforcement): संविधान के शेष प्रावधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुए। इस दिन को संविधान के ‘प्रारंभ की तिथि’ (Date of its commencement) कहा जाता है और हम इसे गणतंत्र दिवस (Republic Day) के रूप में मनाते हैं।

26 जनवरी का ऐतिहासिक महत्व: इस तारीख को जानबूझकर चुना गया था क्योंकि इसी दिन 1930 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (दिसंबर 1929) में पारित संकल्प के आधार पर पूरे देश में पहली बार ‘पूर्ण स्वराज दिवस’ (Purna Swaraj Day) मनाया गया था।

10. विभिन्न देशों के संविधानों से लिए गए स्रोत (Borrowed Features)

UPSC और State PSC में यहाँ से सीधे सवाल बनते हैं। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने दुनिया के बेहतरीन संविधानों का अध्ययन किया और भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल उनमें बदलाव करके उन्हें अपनाया।

  1. भारत सरकार अधिनियम 1935: संविधान का लगभग 70% हिस्सा यहीं से लिया गया है। (संघीय तंत्र, राज्यपाल का कार्यालय, न्यायपालिका का ढांचा, लोक सेवा आयोग)।

  2. ब्रिटेन (UK): संसदीय शासन प्रणाली, एकल नागरिकता (Single Citizenship), कानून का शासन (Rule of Law), विधायी प्रक्रिया, कैबिनेट प्रणाली, विशेषाधिकार रिट (Prerogative Writs)।

  3. संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): मौलिक अधिकार (Fundamental Rights), न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review), राष्ट्रपति पर महाभियोग, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों को हटाना, उपराष्ट्रपति का पद।

  4. आयरलैंड (Ireland): राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP), राष्ट्रपति के चुनाव की विधि, राज्यसभा के लिए सदस्यों का नामांकन।

  5. कनाडा (Canada): सशक्त केंद्र के साथ संघीय व्यवस्था, अवशिष्ट शक्तियों (Residuary Powers) का केंद्र में निहित होना, केंद्र द्वारा राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति, सर्वोच्च न्यायालय का परामर्शी न्यायनिर्णयन।

  6. ऑस्ट्रेलिया (Australia): समवर्ती सूची (Concurrent List), व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता, संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting)।

  7. जर्मनी का वाइमर संविधान (Weimar Constitution): आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों का निलंबन।

  8. सोवियत संघ (USSR/Russia): मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties), प्रस्तावना में न्याय (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) का आदर्श।

  9. फ्रांस (France): गणतंत्र (Republic) की व्यवस्था, प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (Liberty, Equality and Fraternity) के आदर्श।

  10. दक्षिण अफ्रीका (South Africa): संविधान में संशोधन की प्रक्रिया (Amendment Procedure), राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव।

  11. जापान (Japan): कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure established by Law)।

11. संविधान सभा की आलोचना (Criticisms of the Constituent Assembly)

मुख्य परीक्षा (Mains) में अक्सर संविधान सभा की कमियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने को कहा जाता है। आलोचकों (जैसे ग्रेनविले ऑस्टिन, विंस्टन चर्चिल आदि) द्वारा लगाए गए मुख्य आरोप निम्नलिखित हैं:

  1. प्रतिनिधि निकाय नहीं (Not a Representative Body): आलोचकों का तर्क है कि संविधान सभा के सदस्य भारत के लोगों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं चुने गए थे। यह प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुनी गई थी, जो स्वयं सीमित मताधिकार (केवल कर दाताओं, शिक्षितों) के आधार पर चुनी गई थीं।

  2. संप्रभु निकाय नहीं (Not a Sovereign Body): यह तर्क दिया जाता है कि संविधान सभा का गठन ब्रिटिश सरकार के प्रस्ताव (कैबिनेट मिशन) द्वारा किया गया था, इसलिए इसकी संप्रभुता सीमित थी। (हालाँकि 1947 के अधिनियम ने इसे पूरी तरह संप्रभु बना दिया था)।

  3. समय की बर्बादी (Time Consuming): भारत का संविधान बनाने में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा, जो दुनिया के अन्य संविधानों (जैसे अमेरिका का संविधान सिर्फ 4 महीने में बना) की तुलना में बहुत अधिक था। निरुद्दीन अहमद ने तो प्रारूप समिति को ‘अपवहन समिति’ (Drifting Committee) कहकर ताना मारा था।

  4. कांग्रेस का प्रभुत्व (Dominated by Congress): ब्रिटिश संवैधानिक विशेषज्ञ ग्रेनविले ऑस्टिन ने टिप्पणी की थी कि “संविधान सभा एक-दलीय देश का एक-दलीय निकाय थी। सभा ही कांग्रेस थी और कांग्रेस ही भारत था।”

  5. वकीलों और राजनीतिज्ञों का प्रभुत्व (Lawyer-Politician Domination): संविधान की भाषा बहुत जटिल और कानूनी है (जिसे Legalese कहा जाता है)। सर आइवर जेनिंग्स ने इसे “वकीलों का स्वर्ग” (Paradise for Lawyers) कहा था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सभा में समाज के अन्य वर्गों (किसानों, मजदूरों, व्यापारियों) का प्रतिनिधित्व न के बराबर था और कानूनी दिग्गजों का दबदबा था।

  6. हिंदुओं का प्रभुत्व (Dominated by Hindus): लॉर्ड विस्काउंट साइमन ने इसे “हिंदुओं का एक निकाय” कहा था। इसी तरह विंस्टन चर्चिल ने टिप्पणी की थी कि संविधान सभा भारत के केवल एक बड़े समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है।

12. परीक्षा के लिए अति महत्वपूर्ण तथ्य (One-Liner Master Notes)

  • भारत का संविधान बनाने में 64 लाख रुपये (लगभग) का कुल खर्च आया।

  • संविधान सभा में कुल 15 महिला सदस्य थीं (जैसे- सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी, विजयलक्ष्मी पंडित, राजकुमारी अमृत कौर, हंसा मेहता आदि)।

  • संविधान सभा का प्रतीक (Seal) हाथी (Elephant) था, जो संविधान के विशाल आकार को दर्शाता है।

  • प्रेम बिहारी नारायण रायजादा (Prem Behari Narain Raizada) ने भारतीय संविधान की मूल प्रति को अपने हाथों से इतालिक शैली (Italic style) में लिखा था (Calligraphy)। उन्होंने इस काम के लिए कोई पैसा नहीं लिया, बस हर पन्ने पर अपना नाम लिखने की शर्त रखी थी।

  • मूल संविधान के पन्नों को शांतिनिकेतन के कलाकारों द्वारा सजाया गया था। इस काम का नेतृत्व नंदलाल बोस और ब्योहर राममनोहर सिन्हा ने किया था। प्रस्तावना के पृष्ठ को राममनोहर सिन्हा ने सजाया था।

  • संविधान के हिंदी संस्करण का सुलेखन (Calligraphy) वसंत कृष्णन वैद्य द्वारा किया गया और इसे नंदलाल बोस द्वारा सजाया गया।

  • संविधान सभा के सचिव (Secretary) एच. वी. आर. आयंगर थे।

  • एस. एन. मुखर्जी को संविधान सभा का मुख्य प्रारूपकार (Chief Draftsman) नियुक्त किया गया था।

  • संविधान सभा ने कुल 11 सत्र (Sessions) आयोजित किए, जो कुल 165 दिनों तक चले, जिनमें से 114 दिन केवल संविधान के प्रारूप पर विचार करने में बिताए गए।

निष्कर्ष (Conclusion)

आलोचनाओं के बावजूद, यह निर्विवाद सत्य है कि भारत की संविधान सभा ने उस युग की परिस्थितियों को देखते हुए एक ‘चमत्कारिक’ दस्तावेज़ तैयार किया। जो लोग इसे अप्रतिनिधिक (Non-representative) कहते हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि सभा में उस समय के सभी शीर्ष राष्ट्रीय नेता (चाहे वे कांग्रेस के हों या नहीं) शामिल थे। डॉ. अंबेडकर, के. एम. मुंशी, और अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर जैसे दिग्गजों ने यह सुनिश्चित किया कि भारत का संविधान किसी एक विचारधारा का गुलाम न बने, बल्कि यह एक लचीला (Flexible) और कठोर (Rigid) संतुलन स्थापित करे, जो आने वाली सदियों तक भारत की नींव को मजबूत रखे।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top