सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था (Economy of Indus Valley Civilization): कृषि, शिल्प और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का विस्तृत अध्ययन

1. विस्तृत प्रस्तावना: सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था का आधार
किसी भी महान और उन्नत नगरीय सभ्यता के विकास के पीछे एक अत्यंत सुदृढ़ और गतिशील आर्थिक ढांचा कार्य करता है। जब हम सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था (Economy of Indus Valley Civilization) का अध्ययन करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इनका आर्थिक जीवन उस समय के विश्व में सबसे समृद्ध और संतुलित था। हड़प्पावासी केवल बेहतरीन नगर नियोजक ही नहीं थे, बल्कि वे असाधारण दूरदर्शी अर्थशास्त्री, कुशल किसान, निपुण शिल्पी और अंतरराष्ट्रीय स्तर के व्यापारी भी थे।
सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा रहस्य उनका ‘कृषि अधिशेष’ (Agricultural Surplus) था। इसका अर्थ यह है कि सिंधु नदी की उपजाऊ मिट्टी के कारण यहाँ के किसान अपनी जरूरत से कहीं अधिक अनाज पैदा कर लेते थे। इसी अतिरिक्त अनाज ने शहर के उन लोगों (जैसे लोहार, कुम्हार, राजमिस्त्री, प्रशासनिक अधिकारी और व्यापारी) को भोजन उपलब्ध कराया जो खुद खेती नहीं करते थे। इस प्रकार, कृषि के मजबूत आधार पर ही उनके घरेलू और विदेशी व्यापार का एक विशाल महल खड़ा हुआ। आइए, इस समृद्ध अर्थव्यवस्था के प्रत्येक स्तंभ का गहराई से विश्लेषण करें।
2. कृषि व्यवस्था: अर्थव्यवस्था का प्राथमिक स्तंभ (Agriculture System)
सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कृषि पर टिकी हुई थी। सिंधु और उसकी सहायक नदियां प्रतिवर्ष अपने साथ उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) बहाकर लाती थीं, जिससे बिना किसी रासायनिक खाद के भी बंपर पैदावार होती थी।
A. बुवाई और कटाई की तकनीक
हड़प्पा के किसान प्राकृतिक चक्र को बहुत अच्छी तरह समझते थे। वे प्रतिवर्ष नवंबर के महीने में (बाढ़ का पानी उतरने के बाद) बाढ़ वाले मैदानों में बीज बो देते थे और अप्रैल के महीने में अगली बाढ़ आने से पहले फसल की कटाई कर लेते थे।
हल का प्रयोग: यद्यपि लकड़ी के बने होने के कारण वास्तविक हल नष्ट हो गए हैं, लेकिन हरियाणा के बनवाली (Banawali) से मिट्टी का बना हुआ एक खिलौना हल (Terracotta Plough) मिला है। इसके अतिरिक्त, राजस्थान के कालीबंगा (Kalibangan) से प्राक-हड़प्पा काल के ‘जुते हुए खेत’ (Ploughed Field) के साक्ष्य मिले हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि वे खेतों की जुताई के लिए बैलों और हलों का प्रयोग करते थे।
B. उत्पादित फसलें और कपास का गौरव
सिंधु घाटी के लोग मुख्य रूप से 9 प्रकार की फसलों से परिचित थे, जिनमें गेहूं (Wheat) और जौ (Barley) उनकी मुख्य खाद्य फसलें थीं। इसके अलावा वे मटर, सरसों, तिल, मसूर और तरबूज के बीज भी उगाते थे।
चावल के साक्ष्य: गुजरात के लोथल (Lothal) और रंगपुर से धान की भूसी (Rice Husk) के अवशेष मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि वे चावल की खेती से भी परिचित थे।
कपास का विश्व रिकॉर्ड: दुनिया में सबसे पहले कपास (Cotton) उगाने का श्रेय सिंधु सभ्यता के लोगों को ही जाता है। इसी कारण यूनान (Greece) के लोगों ने कपास को ‘सिंडोन’ (Sindon) नाम दिया, जो ‘सिंधु’ शब्द से ही निकला है। कपास का उत्पादन उनके कपड़ा उद्योग और निर्यात का मुख्य आधार था।
C. सिंचाई के साधन
चूंकि अधिकांश नगर नदियों के किनारे थे, इसलिए वे मुख्य रूप से बाढ़ के पानी और प्राकृतिक नमी पर निर्भर थे। हालांकि, अफगानिस्तान के शोर्टुघई (Shortughai) नामक हड़प्पाई स्थल से ‘नहरों’ (Canals) के स्पष्ट साक्ष्य मिले हैं। धौलावीरा में जलाशयों (Reservoirs) द्वारा पानी को सिंचित करने के भी प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
3. पशुपालन: कृषि और परिवहन के सहायक (Animal Husbandry)
सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था में पशुपालन का स्थान द्वितीयक और सहायक आर्थिक गतिविधि के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण था। पशुओं का उपयोग भोजन (दूध, मांस), कृषि कार्य और माल परिवहन के लिए किया जाता था।
प्रिय पशु: हड़प्पावासियों का सबसे प्रिय और पूजनीय पशु कूबड़ वाला सांड (Humped Bull) या वृषभ था, जिसका अंकन उनकी मुहरों पर सबसे ज्यादा मिलता है। इसके अलावा वे गाय, भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता और सूअर भी पालते थे।
भारवाहक पशु: माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए वे मुख्य रूप से बैल और गधे (Donkeys) का उपयोग करते थे। कूबड़ रहित सांड और ऊँट के साक्ष्य भी कालीबंगा से मिले हैं।
घोड़े का रहस्य: सिंधु सभ्यता के लोग सामान्यतः घोड़े (Horse) से परिचित नहीं थे और उनकी अर्थव्यवस्था अश्व-केंद्रित नहीं थी। लेकिन अपवाद स्वरूप, गुजरात के सुरकोटदा (Surkotada) से घोड़े की अस्थियों (Bones) के अवशेष मिले हैं और लोथल से मिट्टी की बनी घोड़े की मूर्ति (Terracotta Figurine) मिली है, जो संभवतः बाहरी व्यापार के माध्यम से आए घोड़ों की ओर इशारा करती है।
4. शिल्प, उद्योग और तकनीकी कौशल (Crafts and Industries)
नगरीय उद्योगों और शिल्पों की विविधता सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था को एक आधुनिक रूप प्रदान करती है। यहाँ के लोग धातुओं और पत्थरों को तराशने की कला में अत्यंत निपुण थे।
A. कांस्य और धातु उद्योग (Metallurgy)
सिंधु सभ्यता एक कांस्य युगीन (Bronze Age) संस्कृति थी। यहाँ के धातुकारों ने तांबे (Copper) में टिन (Tin) मिलाकर ‘कांसा’ (Bronze) बनाने की जटिल रासायनिक कला सीख ली थी।
कांसे का उपयोग वे औजार, हथियार (कुल्हाड़ी, आरी, चाकू) और मूर्तियां बनाने में करते थे। मोहनजोदड़ो से प्राप्त कांसे की नर्तकी की प्रसिद्ध मूर्ति उनकी ‘लुप्त मोम तकनीक’ (Lost Wax Technique) का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।
UPSC फैक्ट: हड़प्पावासी लोहे (Iron) धातु से पूर्णतः अपरिचित थे। लोहे का ज्ञान न होने के कारण उनके हथियार रक्षात्मक और शिकार के अनुकूल अधिक थे, युद्ध के लिए नहीं।
B. मनके और शंख उद्योग (Bead-Making & Shell Industries)
अर्द्ध-कीमती पत्थरों (जैसे- सुलेमानी, गोमेद, लाजवर्द मणि) से सुंदर और सूक्ष्म मनके (Beads) बनाना उनका एक बहुत बड़ा उद्योग था। सिंध के चन्हूदड़ो (Chanhudaro) और गुजरात के लोथल से मनके बनाने के कारखाने (Bead Factories) और कारीगरों की कार्यशालाएं मिली हैं।
समुद्र तट के किनारे स्थित नगरों (जैसे बालाकोट, लोथल, धौलावीरा) में शंख और सीप उद्योग (Shell Industry) अपने चरम पर था, जहाँ से चूड़ियां और सजावटी सामान बनाकर विदेशों में भेजा जाता था।
C. मृदभांड और वस्त्र उद्योग (Pottery & Textile)
कुम्हार के चाक का प्रयोग बड़े पैमाने पर होता था। वे लाल रंग के मिट्टी के बर्तन (Red Pottery) बनाते थे और उन पर काले रंग से सुंदर ज्यामितीय और प्राकृतिक चित्रकारी करते थे।
मोहनजोदड़ो से सूती कपड़े के अवशेष और विभिन्न स्थलों से मिली मिट्टी की ‘तकलियां’ (Spindles) यह सिद्ध करती हैं कि बड़े पैमाने पर सूत की कताई और कपड़ा बुनाई (Textile Industry) का घरेलू उद्योग फल-फूल रहा था।
5. व्यापार और वाणिज्य: अर्थव्यवस्था का चरमोत्कर्ष (Trade and Commerce)
सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था का सबसे चमकीला और विकसित पक्ष उनका व्यापारिक संगठन था। उनका व्यापार केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार तत्कालीन महान विदेशी सभ्यताओं के साथ भी होता था।
A. आंतरिक व्यापार और कच्चे माल का आयात
हड़प्पावासी अपनी जरूरत की सभी वस्तुएं एक ही जगह नहीं पाते थे, इसलिए वे भारत के विभिन्न क्षेत्रों से कच्चे माल का आयात करते थे:
तांबा (Copper): राजस्थान की खेतड़ी (Khetri) खदानों और बलूचिस्तान से।
सोना (Gold): दक्षिण भारत के कोलार (Kolar) खदानों (कर्नाटक) और अफगानिस्तान से।
चांदी (Silver): मुख्य रूप से अफगानिस्तान और ईरान से।
लाजवर्द मणि (Lapis Lazuli): अफगानिस्तान के बदख्शां और शोर्टुघई से।
टिन (Tin): अफगानिस्तान और मध्य एशिया से।
सेलखड़ी (Steatite): राजस्थान और गुजरात से (जिससे मुहरें बनती थीं)।
B. विदेशी व्यापार और मेसोपोटामिया से संबंध
सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था का अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक) के साथ उनके गहरे व्यापारिक संबंधों से प्रमाणित होता है।
메सोपोटामिया के सम्राट सारगोन (Sargon) के अभिलेख (2350 ई.पू.) में उल्लेख मिलता है कि उनके बंदरगाह पर ‘दिलमुन’ (बहरीन), ‘माकन’ (ओमान) और ‘मेलुहा’ के जहाज लंगर डालते थे। इतिहासकार सर्वसम्मति से मानते हैं कि मेसोपोटामिया के लोग सिंधु घाटी सभ्यता को ‘मेलुहा’ (Meluhha) कहते थे।
लोथल का गोदीबाड़ा (Dockyard): गुजरात के लोथल से प्राप्त पकी ईंटों का विशाल बंदरगाह यह सिद्ध करता है कि वे अरब सागर के रास्ते जहाजों द्वारा विदेशी व्यापार करते थे। लोथल से ‘फारस की खाड़ी’ की मुहर (Persian Gulf Seal) का मिलना इस बात का अकाट्य प्रमाण है।
6. विनिमय प्रणाली, बाट और माप-तौल का विज्ञान (Weights and Measures)
इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय व्यापार को संचालित करने के लिए हड़प्पावासियों ने एक अत्यंत कड़ा और मानकीकृत (Standardized) माप-तौल तंत्र विकसित किया था।
वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System): सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था में किसी भी प्रकार के ‘सिक्कों’ (Coins) या धातु की मुद्रा के साक्ष्य नहीं मिले हैं। पूरा व्यापार वस्तु-विनिमय (Goods Exchange) पर आधारित था। अनाज या अन्य कीमती वस्तुओं के बदले दूसरी वस्तुएं ली-दी जाती थीं। मुहरों का उपयोग मुद्रा के रूप में नहीं, बल्कि माल की प्रामाणिकता और सुरक्षा (पैकिंग लॉक) के लिए होता था।
बाटो का विज्ञान: तौलने के लिए वे ‘चर्ट’ (Chert) और जैस्पर नामक पत्थरों से बने सुंदर घनाकार (Cubical Weights) बाटों का प्रयोग करते थे।
16 का गुणक: इन बाटों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि ये निचले स्तर पर द्वि-आधारी (Binary – 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64) थे और ऊपरी स्तर पर दशमलव प्रणाली के तहत 16 के गुणक (Multiples of 16) में चलते थे (जैसे- 16, 32, 64, 160, 320, 640 आदि)। भारत में आजादी के बाद तक ‘एक रुपया = 16 आना’ की जो व्यवस्था चली, उसका मूल स्रोत यही हड़प्पाई तौल प्रणाली थी।
पैमाना (Scale): दूरी या लंबाई मापने के लिए लोथल से हाथीदांत का पैमाना (Ivory Scale) और मोहनजोदड़ो से सीप का बना स्केल मिला है।
7. निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में, सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था (Harappan Economy) एक आत्मनिर्भर, संतुलित और अत्यधिक अधिशेष-संचालित (Surplus-driven) व्यवस्था थी। उनके आर्थिक जीवन में युद्ध या साम्राज्यवाद का कोई स्थान नहीं था; इसके बजाय उनका पूरा ध्यान शांतिपूर्ण व्यापार, कृषि उत्पादकता और शिल्प कौशल पर केंद्रित था। नगरों की विशाल अन्नागार प्रणालियां यह दर्शाती हैं कि राज्य के पास अकाल या आपातकाल से निपटने के लिए एक मजबूत केंद्रीय आर्थिक नियंत्रण था। तौल के बाटों से लेकर बर्तनों और मुहरों की समरूपता (Uniformity) यह सिद्ध करती है कि पूरे 13 लाख वर्ग किलोमीटर के साम्राज्य में एक कड़ा आर्थिक अनुशासन लागू था। इसी आर्थिक सुदृढ़ता के बल पर यह सभ्यता लगभग 1000 वर्षों तक प्राचीन विश्व के शिखर पर चमकती रही।
8. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)
प्रश्न 1: “कृषि अधिशेष (Agricultural Surplus) ही सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था और उसके अभूतपूर्व नगरीकरण का मुख्य आधार था।” इस कथन की पुरातात्विक साक्ष्यों के आलोक में समीक्षा कीजिए। (250 शब्द)
प्रश्न 2: हड़प्पा सभ्यता के आंतरिक और बाह्य व्यापारिक संबंधों का विस्तृत विवरण दें। मेसोपोटामिया के अभिलेखों में प्रयुक्त ‘मेलुहा’ शब्द और लोथल के गोदीबाड़ा के आर्थिक महत्व को स्पष्ट करें। (250 शब्द)
प्रश्न 3: सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था में प्रयुक्त होने वाले माप-तौल के साधनों, बाटों के विज्ञान और विनिमय प्रणाली (Barter System) पर एक विश्लेषणात्मक टिप्पणी लिखिए। (200 शब्द)
प्रश्न 4: हड़प्पा संस्कृति के प्रमुख शिल्पों और उद्योगों (जैसे कांस्य कला, मनके और शंख उद्योग) की तकनीकी विशेषताओं का मूल्यांकन करें। (150 शब्द)
प्रश्न 5: सिंधु घाटी के लोग किन-किन प्रमुख कच्चे मालों का आयात भारत के किन क्षेत्रों और किन विदेशी देशों से करते थे? एक तालिका या विवरण द्वारा स्पष्ट करें। (150 शब्द)
9. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)
सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि अधिशेष (Agricultural Surplus) और फलता-फूलता आंतरिक व बाह्य व्यापार था।
सिंधु सभ्यता की पूरी आर्थिक व्यवस्था ‘वस्तु-विनिमय प्रणाली’ (Barter System) पर आधारित थी; यहाँ सिक्कों का प्रचलन नहीं था।
हड़प्पावासी अपनी मुहरों (Seals) का उपयोग मुद्रा के रूप में नहीं, बल्कि व्यापारिक सामान की सुरक्षा और पहचान के लिए करते थे।
दुनिया में सबसे पहले कपास (Cotton) का उत्पादन करने का गौरव सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों को प्राप्त है।
कपास के उत्पादन के कारण ही यूनानियों (Greeks) ने इस क्षेत्र को ‘सिंडोन’ (Sindon) नाम दिया था।
सिंधु सभ्यता के लोग मुख्य रूप से 9 प्रकार की फसलों से परिचित थे, जिनमें गेहूं और जौ उनकी मुख्य खाद्य फसलें थीं।
राजस्थान के ‘कालीबंगा’ से प्राक-हड़प्पा काल के ‘जुते हुए खेत’ (Ploughed field) के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं।
हरियाणा के ‘बनवाली’ से मिट्टी का बना हुआ एक खिलौना हल (Terracotta Plough) प्राप्त हुआ है।
गुजरात के ‘लोथल’ और ‘रंगपुर’ से धान की भूसी (Rice Husk) के साक्ष्य मिले हैं, जो चावल की खेती को प्रमाणित करते हैं।
फसलों की कटाई के लिए ये लोग पत्थर के हंसिए या तांबे के औजारों का प्रयोग करते थे।
अफगानिस्तान के ‘शोर्टुघई’ से हड़प्पा काल की कृत्रिम ‘नहरों’ (Canals) के साक्ष्य मिले हैं जो सिंचाई में काम आती थीं।
पशुपालन में हड़प्पावासियों का सबसे प्रिय और पूजनीय पशु ‘कूबड़ वाला सांड’ (Humped Bull / वृषभ) था।
माल परिवहन के लिए ये लोग मुख्य रूप से बैलों द्वारा खींची जाने वाली बैलगाड़ियों और गधों का उपयोग करते थे।
सिंधु सभ्यता के लोग सामान्यतः ‘घोड़े’ (Horse) से परिचित नहीं थे और उनकी अर्थव्यवस्था में घोड़े का कोई विशेष महत्व नहीं था।
अपवाद स्वरूप, गुजरात के ‘सुरकोटदा’ से घोड़े की अस्थियों (Bones of horse) के विवादास्पद अवशेष मिले हैं।
लोथल से मिट्टी की बनी हुई घोड़े की एक लघु मूर्ति (Terracotta figurine) भी प्राप्त हुई है।
सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था एक कांस्य युगीन (Bronze Age) ढांचा थी, जहाँ तांबे में टिन मिलाकर कांसा बनाया जाता था।
सिंधु घाटी के लोग ‘लोहे’ (Iron) धातु से पूर्णतः अपरिचित थे, जिसके कारण वे भारी युद्धक हथियार नहीं बना सके।
मोहनजोदड़ो से प्राप्त कांसे की नर्तकी (Dancing Girl) की मूर्ति ‘लुप्त मोम तकनीक’ (Lost Wax Technique) का बेहतरीन उदाहरण है।
कीमती और अर्द्ध-कीमती पत्थरों से ‘मनके’ (Beads) बनाना सिंधु सभ्यता का एक बहुत बड़ा और आकर्षक उद्योग था।
गुजरात के ‘लोथल’ और सिंध के ‘चन्हूदड़ो’ से मनके बनाने के कारखाने (Bead factories) प्राप्त हुए हैं।
समुद्र तट के पास स्थित नगरों (जैसे बालाकोट और धौलावीरा) में ‘शंख और सीप उद्योग’ (Shell Industry) अत्यंत विकसित था।
मोहनजोदड़ो से चांदी के एक बर्तन में लिपटा हुआ ‘सूती कपड़े’ (Woven Cotton) का वास्तविक टुकड़ा मिला है।
कताई और बुनाई उद्योग के साक्ष्य के रूप में विभिन्न स्थलों से मिट्टी और शंख की बनी ‘तकलियां’ (Spindles) मिली हैं।
कुम्हार के चाक पर बने लाल रंग के बर्तन जिन पर काले रंग से चित्रकारी (Red and Black Pottery) की जाती थी, उनका बड़ा घरेलू बाजार था।
हड़प्पावासी तांबे (Copper) का आयात मुख्य रूप से राजस्थान की ‘खेतड़ी’ (Khetri) खदानों और बलूचिस्तान से करते थे।
आभूषणों के लिए सोने (Gold) का आयात दक्षिण भारत के ‘कोलार’ (कर्नाटक) खदानों और अफगानिस्तान से किया जाता था।
चांदी (Silver) और टिन (Tin) का आयात मुख्य रूप से अफगानिस्तान और ईरान (Persia) से होता था।
भवनों और मुहरों के निर्माण में प्रयुक्त नीले ‘लाजवर्द मणि’ (Lapis Lazuli) का आयात अफगानिस्तान के बदख्शां क्षेत्र से होता था।
मुहरों को बनाने के लिए प्रयुक्त मुलायम पत्थर ‘सेलखड़ी’ (Steatite) का आयात राजस्थान और गुजरात से किया जाता था।
हरा कीमती पत्थर ‘अमाजोनाइट’ दक्षिण भारत (नीलगिरी पहाड़ियों) से मंगाया जाता था।
मेसोपोटामिया (इराक) के साथ सिंधु सभ्यता का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार बहुत ही उन्नत अवस्था में था।
मेसोपोटामिया के राजा सारगोन के 2350 ई.पू. के अभिलेखों में सिंधु सभ्यता को ‘मेलुहा’ (Meluhha) कहा गया है।
सारगोन के अभिलेखों के अनुसार मेलुहा के अलावा ‘दिलमुन’ (बहरीन) और ‘माकन’ (ओमान) भी व्यापारिक केंद्र थे।
दिलमुन (बहरीन) को प्राचीन काल में ‘साफ-सुथरे नगरों का देश’ या सूर्योदय का देश भी कहा जाता था, जो एक मध्यस्थ बंदरगाह था।
गुजरात के ‘लोथल’ से दुनिया का सबसे प्राचीन और पकी ईंटों से बना ‘गोदीबाड़ा’ या बंदरगाह (Dockyard) मिला है।
लोथल का यह गोदीबाड़ा ‘भोगवा नदी’ के माध्यम से खंभात की खाड़ी और अरब सागर से जुड़ा हुआ था।
लोथल से ‘फारस की खाड़ी की मुहर’ (Persian Gulf Seal) मिली है, जो उनके अरब देशों से सीधे व्यापार को दर्शाती है।
मोहनजोदड़ो और लोथल से मुहरों पर ‘नाव या जहाज’ (Boat/Ship) के चित्र मिले हैं, जो जलीय व्यापार के साक्ष्य हैं।
तौलने के लिए ये लोग ‘चर्ट’ (Chert) नामक पत्थर से बने हुए सुंदर ‘घनाकार बाटों’ (Cubical Weights) का प्रयोग करते थे।
तौल के ये बाट निचले स्तर पर बाइनरी प्रणाली (1, 2, 4, 8, 16, 32, 64) पर काम करते थे।
ऊपरी स्तर पर ये बाट मुख्य रूप से 16 के गुणक (Multiples of 16) जैसे 160, 320, 640, 1600 आदि में चलते थे।
दूरी और लंबाई मापने के लिए लोथल से ‘हाथीदांत का पैमाना’ (Ivory Scale) प्राप्त हुआ है।
मोहनजोदड़ो से लंबाई मापने के लिए सीप (Shell) का बना हुआ एक स्केल प्राप्त हुआ है।
हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त मुहरों पर सबसे अधिक अंकन ‘एक-श्रृंगी पशु’ (Unicorn) का मिलता है, जो एक व्यापारिक लोगो (Logo) रहा होगा।
नगरों में पाए जाने वाले विशाल ‘अन्नागार’ (Granaries) यह सिद्ध करते हैं कि राज्य कर (Tax) के रूप में अनाज इकट्ठा करता था।
सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से शांतिप्रिय थी, क्योंकि यहाँ से अस्त्र-शस्त्रों और भारी सैन्य साक्ष्यों का पूर्ण अभाव है।
सुत्तकागेंडोर (बलूचिस्तान) और लोथल जैसे तटीय नगर विदेशी व्यापार के प्रमुख निकास द्वार (Ports) थे।
मेसोपोटामिया को मुख्य रूप से कपास, मनके, हाथीदांत की वस्तुएं और शंख की चूड़ियां निर्यात (Export) की जाती थीं।
सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था का अंत धीरे-धीरे जलवायु परिवर्तन, रेगिस्तान के बढ़ने और विदेशी व्यापारिक मार्गों के ठप होने के कारण हुआ।