संविधान सभा (Constituent Assembly): गठन, संरचना, प्रमुख सदस्य, महत्वपूर्ण बहसें और 11 सत्र | UPSC Polity Notes in Hindi

संविधान सभा

संविधान सभा: एक नए भारत का वैचारिक मंच

भारतीय संविधान सभा (Constituent Assembly of India) केवल एक राजनीतिक या कानूनी निकाय नहीं थी, बल्कि यह भारत के भविष्य को संवारने वाला एक ‘महान बौद्धिक और लोकतांत्रिक मंच’ था। यह एक ऐसा सदन था जहाँ एक तरफ रजवाड़ों के प्रतिनिधि बैठे थे, तो दूसरी तरफ दलितों और शोषितों की आवाज़ उठाने वाले नेता; एक तरफ पश्चिमी शिक्षा प्राप्त बड़े-बड़े वकील थे, तो दूसरी तरफ खादी पहनने वाले जमीनी स्वतंत्रता सेनानी।

संविधान सभा का मुख्य कार्य स्वतंत्र भारत के लिए एक ऐसा संविधान तैयार करना था जो देश की विशाल भौगोलिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को एक सूत्र में पिरो सके। आइए इस ऐतिहासिक संस्था की संरचना, इसके सदस्यों और इसकी कार्यप्रणाली का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।

1. संविधान सभा का अर्थ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

संविधान सभा क्या होती है? संविधान सभा जनप्रतिनिधियों का वह समूह (निकाय) होती है जिसे किसी देश का संविधान बनाने (या उसे फिर से लिखने) के विशिष्ट उद्देश्य से गठित किया जाता है। जब संविधान बन जाता है, तो इस सभा का विघटन हो जाता है या यह सामान्य संसद के रूप में कार्य करने लगती है।

भारतीय संविधान सभा की वैचारिक यात्रा:

  • 1922: महात्मा गांधी ने सबसे पहले संकेत दिया था कि “भारतीय संविधान भारतीयों की इच्छा का ही परिणाम होगा।”

  • 1934: एम. एन. रॉय (M.N. Roy) ने औपचारिक रूप से संविधान सभा का विचार प्रस्तुत किया।

  • 1935: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने आधिकारिक रूप से इसकी मांग की।

  • 1946: अंततः ब्रिटिश सरकार के कैबिनेट मिशन प्लान (Cabinet Mission Plan) के तहत इसका गठन हुआ।

2. संविधान सभा की संरचना और जनसांख्यिकी (Demographics and Composition)

संविधान सभा का गठन आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर किया गया था। कुल 389 सदस्यों में से 296 सदस्य ब्रिटिश प्रांतों से और 93 सदस्य देशी रियासतों से आने थे।

लेकिन यह जानना सबसे ज्यादा दिलचस्प है कि सभा के भीतर विभिन्न समुदायों और वर्गों का प्रतिनिधित्व कैसा था। सभा के सदस्य भले ही सीधे जनता द्वारा (सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से) नहीं चुने गए थे, लेकिन इसने भारत के हर वर्ग को प्रतिनिधित्व देने का पूरा प्रयास किया:

  1. राजनीतिक दल: चुनाव के बाद ब्रिटिश प्रांतों की 296 सीटों में से कांग्रेस ने 208 सीटें और मुस्लिम लीग ने 73 सीटें जीतीं। बाकी सीटें छोटे दलों (जैसे- यूनियनिस्ट पार्टी, कृषक प्रजा पार्टी, अनुसूचित जाति संघ) और निर्दलीयों को मिलीं।

  2. धार्मिक प्रतिनिधित्व: सभा में हिंदू, मुस्लिम, सिख, पारसी, एंग्लो-इंडियन, भारतीय ईसाई, और अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) के प्रतिनिधि शामिल थे।

  3. एंग्लो-इंडियन और पारसी: एंग्लो-इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व फ्रैंक एंथोनी (Frank Anthony) ने किया और पारसी समुदाय का प्रतिनिधित्व पी. एच. मोदी (P.H. Modi) ने किया।

  4. अनुसूचित जाति (SC): दलित वर्गों का मजबूत प्रतिनिधित्व डॉ. बी. आर. अंबेडकर के नेतृत्व में था। इसके अलावा कांग्रेस के टिकट पर भी कई दलित नेता सभा में पहुंचे थे।

3. संविधान सभा में महिला सशक्तिकरण: 15 महिला सदस्य (Women in Constituent Assembly)

UPSC और PSC परीक्षाओं में संविधान सभा की महिला सदस्यों से जुड़े प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। 389 सदस्यों की इस विशाल सभा में केवल 15 महिलाएं थीं, लेकिन उनका योगदान और बौद्धिक क्षमता अद्वितीय थी।

कुछ प्रमुख महिला सदस्य और उनका योगदान:

  1. सरोजिनी नायडू: ‘भारत की कोकिला’, जो आगे चलकर भारत की पहली महिला राज्यपाल बनीं।

  2. सुचेता कृपलानी: भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री (उत्तर प्रदेश) बनीं। उन्होंने वंदे मातरम और जन-गण-मन गाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

  3. राजकुमारी अमृत कौर: वे स्वतंत्र भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं और एम्स (AIIMS) की स्थापना में अहम भूमिका निभाई।

  4. हंसा मेहता: इन्होंने मौलिक अधिकारों की उप-समिति में काम किया और यह सुनिश्चित किया कि संविधान में लैंगिक समानता (Gender Equality) हो।

  5. दुर्गाबाई देशमुख: वे एक प्रमुख वकील और समाज सुधारक थीं, जिन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर जोर दिया।

  6. बेगम ऐजाज़ रसूल: वे संविधान सभा में शामिल होने वाली एकमात्र मुस्लिम महिला थीं। इन्होंने धर्म के आधार पर आरक्षण का कड़ा विरोध किया था।

  7. दक्षायनी वेलायुधन: वे संविधान सभा में शामिल होने वाली एकमात्र दलित महिला थीं। सबसे कम उम्र की सदस्य होने के नाते, उन्होंने अस्पृश्यता और जबरन श्रम के खिलाफ पुरजोर आवाज़ उठाई।

  8. अम्मू स्वामीनाथन: इन्होंने कहा था कि संविधान इतना लंबा और जटिल है कि आम आदमी इसे आसानी से नहीं समझ सकता।

  9. विजयलक्ष्मी पंडित: पंडित नेहरू की बहन और संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष।

  10. एनी मास्कारेन: रियासतों (त्रावणकोर) का प्रतिनिधित्व करने वाली एकमात्र महिला।

(अन्य महिला सदस्य: कमला चौधरी, मालती चौधरी, पूर्णिमा बनर्जी, लीला रॉय, और रेणुका राय)।

4. संविधान सभा के प्रमुख बौद्धिक स्तंभ (The Key Figures)

संविधान सभा वैसे तो 299 सदस्यों (विभाजन के बाद) का निकाय थी, लेकिन इसकी दिशा मुख्य रूप से एक छोटे से समूह द्वारा तय की जा रही थी जिसे ग्रैनविले ऑस्टिन ने “अल्पतंत्र” (Oligarchy) कहा है।

इस अल्पतंत्र में चार सबसे प्रमुख नेता थे:

  1. पंडित जवाहरलाल नेहरू: वे सभा के आदर्शवादी विचारक थे। उद्देश्य प्रस्ताव पेश करने से लेकर संघ शक्ति समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने एक मजबूत केंद्र वाले लोकतांत्रिक ढांचे की नींव रखी।

  2. सरदार वल्लभभाई पटेल: वे यथार्थवादी नेता थे। उन्होंने मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों और प्रांतीय संविधान समितियों का नेतृत्व किया। रियासतों को भारतीय संघ में मिलाने का उनका कार्य संविधान को लागू करने की सबसे बड़ी पूर्व-शर्त थी।

  3. डॉ. राजेंद्र प्रसाद: सभा के अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका एक निष्पक्ष ‘अंपायर’ की तरह थी। वे सुनिश्चित करते थे कि हर सदस्य (चाहे वह विरोधी स्वर का ही क्यों न हो) को बोलने का पूरा मौका मिले।

  4. मौलाना अबुल कलाम आजाद: वे देश के प्रमुख मुस्लिम नेता थे जिन्होंने धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए काम किया।

गैर-कांग्रेसी दिग्गज (The Legal Luminaries): कांग्रेस ने जानबूझकर देश के बेहतरीन कानूनी दिमागों को संविधान सभा में जगह दी, भले ही वे कांग्रेस के सदस्य न हों।

  • डॉ. बी. आर. अंबेडकर: प्रारूप समिति के अध्यक्ष। उनके बिना संविधान का वर्तमान स्वरूप संभव नहीं था।

  • अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर और एन. गोपालस्वामी आयंगर: मद्रास के ये दोनों महान न्यायविद संविधान की कानूनी बारीकियों को तय करने में सबसे आगे थे।

  • डॉ. के. एम. मुंशी: एक प्रख्यात वकील जिन्होंने मौलिक अधिकारों और मजबूत केंद्र की वकालत की।

संविधान सभा

5. संविधान सभा की प्रमुख बहसें (Constituent Assembly Debates - CAD)

संविधान का निर्माण किसी बंद कमरे में नहीं हुआ था। इसके हर अनुच्छेद पर सभा में तीखी बहसें हुईं। ये ‘संविधान सभा की बहसें’ (CAD) आज भी सुप्रीम कोर्ट के लिए संविधान की व्याख्या करने का सबसे बड़ा स्रोत हैं।

सभा के सामने तीन सबसे बड़े विवादित मुद्दे थे:

A. भाषा का विवाद (The Language Debate)

संविधान सभा की सबसे गर्म बहस राष्ट्रभाषा को लेकर हुई।

  • हिंदी समर्थक गुट: आर. वी. धुलेकर, सेठ गोविंद दास और संपूर्णानंद जैसे नेता चाहते थे कि हिंदी को एकमात्र राष्ट्रभाषा घोषित किया जाए और संविधान भी हिंदी में लिखा जाए।

  • दक्षिण भारतीय गुट: टी. टी. कृष्णामचारी और जी. दुर्गाबाई जैसे दक्षिणी सदस्यों ने कड़ा विरोध किया। उनका तर्क था कि हिंदी थोपने से दक्षिण भारत में अलगाववाद फैल सकता है।

  • समाधान (मुंशी-आयंगर फॉर्मूला): अंततः एक समझौता हुआ। यह तय किया गया कि हिंदी भारत की ‘राजभाषा’ (Official Language) होगी (राष्ट्रभाषा नहीं), और संविधान लागू होने के बाद 15 वर्षों तक (1965 तक) अंग्रेजी का प्रयोग आधिकारिक कार्यों के लिए जारी रहेगा।

B. संघवाद vs मजबूत केंद्र (Federalism vs Strong Centre)

  • शुरुआत में (कैबिनेट मिशन के तहत) एक कमजोर केंद्र और मजबूत राज्यों की कल्पना की गई थी।

  • लेकिन 1947 में विभाजन के खूनी दंगों को देखने के बाद अंबेडकर, नेहरू और पटेल इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भारत की एकता बनाए रखने के लिए एक मजबूत केंद्र (Strong Centre) का होना अत्यंत आवश्यक है।

  • के. संथानम जैसे सदस्यों ने राज्यों को अधिक वित्तीय शक्तियां देने की मांग की, लेकिन अंततः भारत में ‘एकात्मक झुकाव वाला संघवाद’ (Federalism with unitary bias) अपनाया गया।

C. अल्पसंख्यकों के अधिकार और पृथक निर्वाचन (Separate Electorates)

  • ब्रिटिश काल से चले आ रहे धर्म के आधार पर ‘पृथक निर्वाचन’ (Separate Electorates) की मांग को लेकर सभा में बड़ी बहस हुई।

  • सरदार पटेल और गोविंद बल्लभ पंत ने इसका पुरजोर विरोध किया और इसे “देश को बांटने वाला जहर” करार दिया।

  • अंततः, धर्म के आधार पर राजनीतिक आरक्षण को समाप्त कर दिया गया। केवल अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए ऐतिहासिक पिछड़ेपन के आधार पर सीटें आरक्षित की गईं।

6. संविधान सभा के 11 सत्र (Sessions of the Constituent Assembly)

संविधान सभा ने 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिनों की अवधि में कुल 11 सत्र (Sessions) आयोजित किए। इन सत्रों में कुल 165 दिन बैठकें हुईं।

  • पहला सत्र (9-23 दिसंबर 1946): उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया गया। मुस्लिम लीग ने बहिष्कार किया।

  • दूसरा सत्र (20-25 जनवरी 1947): उद्देश्य प्रस्ताव को पारित किया गया।

  • तीसरा सत्र (28 अप्रैल – 2 मई 1947): विभिन्न समितियों की रिपोर्ट पर प्रारंभिक चर्चा।

  • चौथा सत्र (14-31 जुलाई 1947): 22 जुलाई को राष्ट्रीय ध्वज अपनाया गया। स्वतंत्र भारत की रूपरेखा तैयार हुई।

  • पांचवां सत्र (14-30 अगस्त 1947): 14-15 अगस्त की मध्यरात्रि को सत्ता का हस्तांतरण। यह एक ऐतिहासिक सत्र था।

  • छठा सत्र (27 जनवरी 1948): यह सबसे छोटा सत्र था, जो केवल एक दिन चला।

  • सातवां सत्र (4 नवंबर 1948 – 8 जनवरी 1949): यह सबसे लंबा सत्र था। डॉ. अंबेडकर ने संविधान का पहला मसौदा पेश किया और इस पर खंड-वार (Clause by Clause) चर्चा शुरू हुई।

  • आठवां सत्र (16 मई – 16 जून 1949): चर्चा जारी रही।

  • नौवां सत्र (30 जुलाई – 18 सितंबर 1949): नागरिकता और भाषा जैसे सबसे कठिन मुद्दों पर चर्चा हुई।

  • दसवां सत्र (6-17 अक्टूबर 1949): संविधान के मसौदे का दूसरा वाचन पूरा हुआ।

  • ग्यारहवां सत्र (14-26 नवंबर 1949): संविधान के मसौदे पर अंतिम चर्चा हुई और 26 नवंबर 1949 को इसे अंततः पारित (Adopt) कर लिया गया।

  • (नोट: 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की एक विशेष अंतिम बैठक हुई, जिसमें सदस्यों ने संविधान पर हस्ताक्षर किए और डॉ. राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति चुना। इसे 12वें सत्र के रूप में नहीं गिना जाता)।

7. संविधान सभा: एक संप्रभु और विधायी निकाय के रूप में (Dual Role)

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 ने संविधान सभा को एक अनोखी दोहरी भूमिका (Dual Role) सौंप दी थी।

  1. संविधान निर्माता के रूप में (Constituent Body): जब यह सभा संविधान बनाने के लिए बैठती थी, तो इसकी अध्यक्षता डॉ. राजेंद्र प्रसाद करते थे।

  2. संसद के रूप में (Legislative Body): जब यह सभा देश के लिए आम कानून (Ordinary Laws) बनाने के लिए बैठती थी, तो यह एक अनंतिम संसद (Provisional Parliament) बन जाती थी। तब इसकी अध्यक्षता जी. वी. मावलंकर करते थे।

यह दोहरी व्यवस्था 26 नवंबर 1949 तक जारी रही जब तक कि संविधान बनाने का काम पूरा नहीं हो गया। इसके बाद, 1952 में जब तक भारत की पहली चुनी हुई संसद का गठन नहीं हुआ, तब तक इसी संविधान सभा ने भारत की अनंतिम संसद के रूप में कार्य किया।

परीक्षा के लिए अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर (Quick Revision Facts)

  1. संविधान सभा के चुनाव में कुल 389 सीटों में से 296 सीटों पर ही चुनाव हुए थे, रियासतों के 93 सदस्य मनोनीत थे।

  2. संविधान सभा में कांग्रेस को 208 सीटें, मुस्लिम लीग को 73 सीटें और अन्य को 15 सीटें मिली थीं।

  3. महात्मा गांधी और एम. ए. जिन्ना (विभाजन के बाद) दोनों ही भारत की संविधान सभा के सदस्य नहीं थे।

  4. संविधान सभा में बेगम ऐजाज़ रसूल एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थीं।

  5. संविधान सभा में सबसे कम उम्र की महिला सदस्य दक्षायनी वेलायुधन थीं।

  6. संविधान का पहला मसौदा (Original Draft) बी. एन. राव (संवैधानिक सलाहकार) द्वारा तैयार किया गया था, न कि प्रारूप समिति द्वारा।

  7. संविधान सभा द्वारा संविधान के मसौदे पर कुल 3 वाचन (Readings) किए गए थे।

  8. प्रारूप समिति (Drafting Committee) ने अपना काम पूरा करने के लिए 141 बैठकों का आयोजन किया था।

  9. 26 नवंबर 1949 को संविधान पर कुल 284 सदस्यों ने हस्ताक्षर किए थे (मूल रूप से 299 सदस्य थे, लेकिन उस दिन 15 सदस्य अनुपस्थित थे)।

  10. संविधान सभा के रिकॉर्ड को ‘Constituent Assembly Debates’ के नाम से जाना जाता है और इसे 12 मोटे खंडों (Volumes) में प्रकाशित किया गया है।

निष्कर्ष (Conclusion)

भारतीय संविधान सभा दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे अद्वितीय संस्थाओं में से एक है। इसकी सबसे बड़ी सफलता यह थी कि इसने बिना किसी गृहयुद्ध या तानाशाही के, संवाद और सहमति (Consensus) के आधार पर दुनिया का सबसे विशाल संविधान तैयार किया। इसने साबित कर दिया कि भारतीय न केवल आजादी प्राप्त करने में सक्षम थे, बल्कि वे एक आधुनिक, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक राष्ट्र की मजबूत नींव रखने का राजनीतिक कौशल भी रखते थे।

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