पादप जगत (Plant Kingdom)

पादप जगत (Plant Kingdom)

1. विस्तृत प्रस्तावना: पादप जगत (Plantae) क्या है?

पृथ्वी पर जीवन का आधार ‘सूर्य की ऊर्जा’ है, और इस सौर ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा (भोजन) में बदलने का जादुई गुण केवल हरे पौधों के पास है। आर.एच. व्हिटेकर की पाँच-जगत प्रणाली में पादप जगत (Kingdom Plantae) के अंतर्गत उन सभी जीवों को रखा गया है जो:

  1. बहुकोशिकीय (Multicellular) हैं।

  2. यूकैरियोटिक (Eukaryotic – विकसित केंद्रक वाले) हैं।

  3. स्वपोषी (Autotrophic) हैं (अर्थात प्रकाश-संश्लेषण के लिए इनमें ‘क्लोरोफिल’ पाया जाता है)।

  4. जिनकी कोशिका भित्ति (Cell wall) ‘सेल्युलोज’ (Cellulose) की बनी होती है।

पादप जगत का वर्गीकरण (Classification of Plant Kingdom): वर्ष 1883 में वनस्पतिशास्त्री ए.डब्ल्यू. आइक्लर (A.W. Eichler) ने संपूर्ण पादप जगत को बीज और फूलों की उपस्थिति/अनुपस्थिति के आधार पर दो प्रमुख उपजगतों (Sub-kingdoms) में बाँटा:

  • क्रिप्टोगैम्स (Cryptogamae / अपुष्पी पादप): इनमें फूल और बीज नहीं होते। (इसके अंतर्गत थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा और टेरिडोफाइटा आते हैं)।

  • फैनरोगैम्स (Phanerogamae / पुष्पी या बीजीय पादप): इनमें फूल (या शंकु) और बीज पाए जाते हैं। (इसके अंतर्गत जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म आते हैं)।

आइए, इन पाँचों प्रभागों (Divisions) का UPSC के दृष्टिकोण से गहराई से विश्लेषण करें।

2. प्रभाग 1: थैलोफाइटा (Thallophyta) – शैवाल (Algae)

यह पादप जगत का सबसे सरल और आद्य (Primitive) समूह है।

  • थैलस (Thallus): इन पौधों का शरीर जड़, तना और पत्तियों में विभाजित नहीं होता है। इनका शरीर एक ‘थैलस’ (सुकाय) के आकार का होता है।

  • आवास: ये मुख्य रूप से जलीय (Aquatic) होते हैं (मीठे पानी और समुद्री पानी दोनों में)।

  • इनमें संवहनी ऊतक (जाइलम और फ्लोएम) का पूर्णतः अभाव होता है।

  • शैवाल (Algae) इस प्रभाग के सबसे प्रमुख सदस्य हैं। वर्णक (Pigments) के आधार पर शैवाल 3 प्रकार के होते हैं:

  1. क्लोरोफाइसी (Chlorophyceae / हरे शैवाल): इनमें क्लोरोफिल ‘a’ और ‘b’ प्रचुर मात्रा में होता है। ये अपना भोजन ‘स्टार्च’ के रूप में संचित करते हैं। (उदाहरण: क्लैमाइडोमोनास, स्पाइरोगायरा, वॉल्वॉक्स)।

  2. फियोफाइसी (Phaeophyceae / भूरे शैवाल): ये मुख्य रूप से समुद्री होते हैं। भूरा रंग ‘फ्यूकोजैन्थिन’ (Fucoxanthin) वर्णक के कारण होता है। इनमें विशालकाय ‘केल्प’ (Kelp) आते हैं जो 100 मीटर तक लंबे हो सकते हैं। (उदाहरण: फ्यूकस, सार्गसम)।

  3. रोडोफाइसी (Rhodophyceae / लाल शैवाल): इनका लाल रंग ‘फाइकोएरिथ्रिन’ (Phycoerythrin) वर्णक के कारण होता है। ये समुद्र की गहराई में भी प्रकाश-संश्लेषण कर सकते हैं। (उदाहरण: पोरफाइरा, ग्रेसिलेरिया)।

आर्थिक महत्व: पृथ्वी के कुल प्रकाश-संश्लेषण का लगभग 50% शैवालों द्वारा ही किया जाता है। लाल शैवाल (ग्रेसिलेरिया और जिलेडियम) से ‘एगार-एगार’ (Agar-agar) प्राप्त होता है जिसका उपयोग आइसक्रीम, जेली और प्रयोगशालाओं में सूक्ष्मजीवों को उगाने के लिए किया जाता है। ‘क्लोरेला’ (Chlorella) शैवाल का उपयोग अंतरिक्ष यात्री (Space travelers) प्रोटीन युक्त भोजन और ऑक्सीजन के लिए करते हैं।

3. प्रभाग 2: ब्रायोफाइटा (Bryophyta) – पादप जगत के उभयचर

जैसे जंतु जगत में मेंढक पानी और जमीन दोनों पर रहता है, वैसे ही ब्रायोफाइट्स को ‘पादप जगत का उभयचर’ (Amphibians of Plant Kingdom) कहा जाता है।

  • कारण: ये पौधे मिट्टी (जमीन) पर रहते हैं, लेकिन इन्हें ‘लैंगिक प्रजनन’ (Sexual Reproduction) के लिए पानी की आवश्यकता होती है (क्योंकि इनके नर युग्मक तैरकर मादा तक पहुँचते हैं)।

  • संरचना: इनमें भी वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ नहीं होती हैं, लेकिन ये शैवालों से थोड़े अधिक विकसित होते हैं। जड़ों की जगह इनमें धागे जैसी संरचनाएं होती हैं जिन्हें मूलाभास (Rhizoids) कहते हैं।

  • इनमें संवहनी ऊतक (जाइलम और फ्लोएम) नहीं पाए जाते।

  • वर्गीकरण: इन्हें मुख्य रूप से ‘लिवरवर्ट’ (Liverworts – उदा. रिक्सिया, मार्केन्शिया) और ‘मॉस’ (Mosses – उदा. फ्युनेरिया, स्फेग्नम) में बाँटा जाता है।

आर्थिक महत्व: ‘स्फेग्नम’ (Sphagnum) नामक मॉस का उपयोग ‘पीट’ (Peat) कोयले के रूप में ईंधन की तरह किया जाता है। इसमें पानी सोखने की अद्भुत क्षमता होती है, इसलिए माली इसका उपयोग जीवित पौधों को एक जगह से दूसरी जगह भेजने (Packing material) में करते हैं। नंगी चट्टानों पर मिट्टी बनाने (पारिस्थितिक अनुक्रमण) में ब्रायोफाइट्स का सबसे बड़ा योगदान है।

पादप जगत (Plant Kingdom)

4. प्रभाग 3: टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) – प्रथम संवहनी पादप

विकास के क्रम में, टेरिडोफाइट्स पृथ्वी पर उगने वाले पहले सफल स्थलीय पौधे हैं।

  • विशेषता: ये पादप जगत के पहले ऐसे पौधे हैं जिनमें पानी और भोजन के परिवहन के लिए संवहनी ऊतक (Xylem और Phloem) मौजूद होते हैं।

  • संरचना: इनका शरीर वास्तविक जड़, तने और पत्तियों में विभाजित होता है।

  • बीजरहित (Seedless): इनमें फूल और बीज नहीं बनते। ये ‘बीजाणुओं’ (Spores) के माध्यम से प्रजनन करते हैं।

  • इन पौधों को ठंडे, नम और छायादार स्थान पसंद होते हैं।

  • उदाहरण: फर्न (Ferns), हॉर्सटेल (Equisetum), और मार्सिलिया (Marsilea)।

आर्थिक महत्व: इनका मुख्य उपयोग सजावटी पौधों (Ornamentals) के रूप में किया जाता है। चूँकि इनकी जड़ें मिट्टी को मजबूती से जकड़ लेती हैं, इसलिए ये मृदा अपरदन (Soil Erosion) को रोकने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

5. प्रभाग 4: जिम्नोस्पर्म (Gymnosperms) – अनावृतबीजी

ग्रीक भाषा में ‘Gymnos’ का अर्थ है ‘नग्न’ (Naked) और ‘Sperma’ का अर्थ है ‘बीज’। अर्थात, जिम्नोस्पर्म वे पौधे हैं जिनके बीज नग्न होते हैं (इनके बीज फल के अंदर बंद नहीं होते)।

  • इनमें फूल नहीं लगते। फूलों की जगह इनमें ‘शंकु’ (Cones) बनते हैं (नर शंकु और मादा शंकु)।

  • ये पौधे बहुवर्षीय, सदाबहार (Evergreen) और काष्ठीय (Woody) होते हैं।

  • इनकी पत्तियां सुई के आकार (Needle-like) की होती हैं, जो बर्फ और तेज़ हवाओं को सह सकती हैं।

  • उदाहरण: चीड़ (Pinus), देवदार (Cedrus), साइकस (Cycas) और सिकोया (Sequoia)।

विशेष तथ्य:

  1. साइकस (Cycas): इसे ‘जीवित जीवाश्म’ (Living Fossil) कहा जाता है। इसकी जड़ों में ‘कोरेलॉयड जड़ें’ (Coralloid roots) पाई जाती हैं जिनमें साइनोबैक्टीरिया नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं। इससे ‘साबूदाना’ (Sago) प्राप्त होता है।

  2. सिकोया (Sequoia sempervirens): यह कैलिफोर्निया का रेडवुड ट्री है, जो दुनिया का सबसे लंबा पेड़ (लगभग 115 मीटर) है। आर्थिक महत्व: जिम्नोस्पर्म के पेड़ों (जैसे चीड़, देवदार) की लकड़ी इमारती लकड़ी (Timber) और कागज़ बनाने के काम आती है। चीड़ के पेड़ से ‘रेजिन’ (Resin / तारपीन का तेल) निकाला जाता है।

6. प्रभाग 5: एंजियोस्पर्म (Angiosperms) – आवृतबीजी (पुष्पी पादप)

यह वर्तमान में पृथ्वी पर पादप जगत का सबसे बड़ा, सबसे विकसित और सबसे प्रमुख समूह है।

  • ‘Angios’ का अर्थ है ‘ढका हुआ’ और ‘Sperma’ का अर्थ है ‘बीज’। अर्थात, इनके बीज ‘फल’ (Fruit) के अंदर सुरक्षित ढके होते हैं।

  • इन पौधों में ‘फूल’ (Flowers) लगते हैं, जो इनका प्रजनन अंग है।

  • दोहरा निषेचन (Double Fertilization): एंजियोस्पर्म की सबसे अनूठी विशेषता दोहरा निषेचन है, जहाँ एक नर युग्मक अंडकोशिका से और दूसरा नर युग्मक द्वितीयक केंद्रक से जुड़ता है, जिससे ‘भ्रूणपोष’ (Endosperm) बनता है जो बीज को पोषण देता है।

बीजपत्रों (Cotyledons – बीज के अंदर की दाल/पत्तियां) के आधार पर एंजियोस्पर्म को दो वर्गों में बाँटा गया है:

A. एकबीजपत्री (Monocotyledons)

  • इनके बीज में केवल एक बीजपत्र होता है (जैसे गेहूं का दाना दो हिस्सों में नहीं बंटता)।

  • इनकी पत्तियों में ‘समानांतर शिराविन्यास’ (Parallel venation) होता है (पत्तियों की नसें सीधी होती हैं)।

  • इनकी जड़ें झकड़ा जड़ें (Fibrous roots) होती हैं।

  • उदाहरण: गेहूं, चावल, मक्का, गन्ना, बांस (Bamboo), घास, और प्याज।

B. द्विबीजपत्री (Dicotyledons)

  • इनके बीज में दो बीजपत्र होते हैं (जैसे चना या मटर को छीलने पर दो बराबर दालें निकलती हैं)।

  • इनकी पत्तियों में ‘जालिकावत शिराविन्यास’ (Reticulate venation) होता है (नसों का जाल होता है)।

  • इनमें मुख्य ‘मूसला जड़’ (Tap root) पाई जाती है।

  • उदाहरण: आम, नीम, सेब, चना, मटर, सरसों, मूंगफली और गुलाब।

7. निष्कर्ष (Conclusion)

पादप जगत का यह क्रमिक विकास प्रकृति के सबसे अद्भुत चमत्कारों में से एक है। पानी में तैरते सूक्ष्म शैवालों (Thallophyta) से शुरू हुआ जीवन, जब नमी वाले स्थानों (Bryophyta) से होते हुए जमीन (Pteridophyta) पर आया, तो उसने अपनी जड़ों को मजबूत किया। और अंततः, सूखे स्थानों पर जीवित रहने के लिए नग्न बीजों (Gymnosperm) का विकास किया और अपनी प्रजाति को सुरक्षित करने के लिए बीजों को स्वादिष्ट फलों (Angiosperm) में ढंक लिया। पादप जगत न केवल पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का ‘उत्पादक’ (Producer) है, बल्कि यह पूरी मानव सभ्यता के भोजन, ऑक्सीजन, ईंधन और औषधियों का अंतिम स्रोत भी है।

8. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)

प्रश्न 1: पादप जगत के वर्गीकरण के आधार स्पष्ट करें। ए.डब्ल्यू. आइक्लर (Eichler) द्वारा दिए गए ‘क्रिप्टोगैम्स’ और ‘फैनरोगैम्स’ में मूलभूत अंतर क्या हैं? (150 शब्द)

प्रश्न 2: ब्रायोफाइटा (Bryophyta) को ‘पादप जगत का उभयचर’ (Amphibians of Plant Kingdom) क्यों कहा जाता है? इनके पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व की विवेचना करें। (200 शब्द)

प्रश्न 3: टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) विकास के क्रम में पृथ्वी पर प्रथम सफल स्थलीय पादप कैसे सिद्ध हुए? संवहनी ऊतकों (Vascular Tissues) की इसमें क्या भूमिका रही? (150 शब्द)

प्रश्न 4: जिम्नोस्पर्म (अनावृतबीजी) और एंजियोस्पर्म (आवृतबीजी) पौधों के बीच संरचनात्मक और प्रजनन संबंधी प्रमुख अंतर क्या हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट करें। (250 शब्द)

प्रश्न 5: एकबीजपत्री (Monocots) और द्विबीजपत्री (Dicots) पौधों को उनकी जड़, पत्ती के शिराविन्यास और बीजों के आधार पर कैसे पहचाना जा सकता है? मानव आहार में एकबीजपत्री पौधों के महत्व को रेखांकित करें। (200 शब्द)

9. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)

  1. आर.एच. व्हिटेकर की प्रणाली में ‘पादप जगत’ (Kingdom Plantae) के अंतर्गत बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक और प्रकाश-संश्लेषी जीवों को रखा गया है।

  2. पौधों की कोशिका भित्ति (Cell Wall) मुख्य रूप से ‘सेल्युलोज’ (Cellulose) की बनी होती है।

  3. वर्ष 1883 में वनस्पतिशास्त्री ए.डब्ल्यू. आइक्लर ने पादप जगत को दो उपजगतों: क्रिप्टोगैम्स (पुष्पहीन) और फैनरोगैम्स (पुष्पी) में बाँटा था।

  4. ‘थैलोफाइटा’ (Thallophyta) पादप जगत का सबसे सरल समूह है, जिसमें मुख्य रूप से ‘शैवाल’ (Algae) आते हैं।

  5. शैवालों (Algae) का शरीर जड़, तना और पत्तियों में विभाजित नहीं होता; यह एक ‘थैलस’ (सुकाय) के रूप में होता है।

  6. शैवालों के अध्ययन को वनस्पति विज्ञान में ‘फाइकोलॉजी’ (Phycology) कहा जाता है।

  7. ‘हरे शैवालों’ (Chlorophyceae) में क्लोरोफिल a और b पाया जाता है, और ये अपना भोजन ‘स्टार्च’ के रूप में संचित करते हैं।

  8. ‘भूरे शैवालों’ (Phaeophyceae) का रंग भूरा उनके अंदर मौजूद ‘फ्यूकोजैन्थिन’ (Fucoxanthin) वर्णक के कारण होता है।

  9. समुद्र की अत्यंत गहराई में जहाँ प्रकाश बहुत कम पहुँचता है, वहाँ ‘लाल शैवाल’ (Rhodophyceae) पाए जाते हैं।

  10. लाल शैवाल का लाल रंग ‘फाइकोएरिथ्रिन’ (Phycoerythrin) वर्णक के कारण होता है।

  11. ग्रेसिलेरिया और जिलेडियम (लाल शैवाल) से ‘एगार-एगार’ (Agar-agar) प्राप्त होता है, जिसका उपयोग आइसक्रीम और जेली बनाने में होता है।

  12. अंतरिक्ष यात्री ‘क्लोरेला’ (Chlorella) नामक शैवाल को अपने अंतरिक्ष यान के हौज में उगाते हैं ताकि उन्हें ताज़ा ऑक्सीजन और प्रोटीन मिल सके।

  13. ‘ब्रायोफाइटा’ (Bryophyta) समूह के पौधों को ‘पादप जगत का उभयचर’ (Amphibians of the Plant Kingdom) कहा जाता है।

  14. ब्रायोफाइट्स भूमि पर रहते हैं, लेकिन उन्हें लैंगिक जनन (नर युग्मकों को तैरने) के लिए पानी की अनिवार्य आवश्यकता होती है।

  15. ब्रायोफाइट्स में संवहनी ऊतक (जाइलम और फ्लोएम) का पूर्णतः अभाव होता है।

  16. ब्रायोफाइट्स में जड़ों के स्थान पर धागे जैसी संरचनाएं होती हैं, जिन्हें ‘मूलाभास’ (Rhizoids) कहा जाता है।

  17. ‘स्फेग्नम’ (Sphagnum) नामक मॉस (ब्रायोफाइटा) का उपयोग ‘पीट’ (Peat) कोयला बनाने और ईंधन के रूप में किया जाता है।

  18. ‘टेरिडोफाइटा’ (Pteridophyta) पृथ्वी पर विकसित होने वाले पहले स्थलीय पौधे हैं जिनमें संवहनी ऊतक पाए गए।

  19. टेरिडोफाइट्स में जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem) मौजूद होते हैं, जो पानी और भोजन का परिवहन करते हैं।

  20. टेरिडोफाइट्स बीजरहित (Seedless) पौधे हैं; ये प्रजनन के लिए ‘बीजाणुओं’ (Spores) का निर्माण करते हैं।

  21. सजावटी पौधों के रूप में उपयोग होने वाले ‘फर्न’ (Ferns) टेरिडोफाइटा समूह के ही सदस्य हैं।

  22. ‘जिम्नोस्पर्म’ (Gymnosperms / अनावृतबीजी) वे पौधे हैं जिनके बीज ‘नग्न’ होते हैं (यानी फल के अंदर बंद नहीं होते)।

  23. जिम्नोस्पर्म में फूलों का अभाव होता है; फूलों की जगह इनमें प्रजनन के लिए ‘शंकु’ (Cones) पाए जाते हैं।

  24. चीड़ (Pinus), देवदार (Cedrus), और साइकस (Cycas) जिम्नोस्पर्म के प्रमुख उदाहरण हैं।

  25. ‘साइकस’ को पादप जगत का ‘जीवित जीवाश्म’ (Living Fossil) कहा जाता है।

  26. साइकस की जड़ों को ‘कोरेलॉयड जड़ें’ (Coralloid roots) कहते हैं, जिनमें साइनोबैक्टीरिया सहजीवी रूप में रहकर नाइट्रोजन फिक्सेशन करते हैं।

  27. साबूदाना (Sago) ‘साइकस’ के तने से प्राप्त होने वाले मंड (Starch) से बनाया जाता है।

  28. दुनिया का सबसे लंबा पेड़ ‘सिकोया’ (Sequoia sempervirens / Redwood tree) एक जिम्नोस्पर्म ही है।

  29. चीड़ (Pinus) के पेड़ से ‘रेजिन’ प्राप्त होता है जिससे तारपीन का तेल (Turpentine oil) बनाया जाता है।

  30. चिलगोजा (Chilgoza), जिसे ‘जिम्नोस्पर्म का मेवा’ कहा जाता है, ‘पाइनस जिरार्डियाना’ (Pinus gerardiana) से प्राप्त होता है।

  31. ‘एंजियोस्पर्म’ (Angiosperms / आवृतबीजी) पादप जगत का सबसे विकसित और बड़ा समूह है।

  32. एंजियोस्पर्म के बीजों के चारों ओर आवरण (फल) पाया जाता है और इनमें प्रजनन के लिए ‘फूल’ (Flowers) खिलते हैं।

  33. पादप जगत में ‘दोहरा निषेचन’ (Double Fertilization) केवल एंजियोस्पर्म की अद्वितीय विशेषता है।

  34. दुनिया का सबसे छोटा फूल वाला पौधा ‘वोल्फिया’ (Wolffia) है, जो एक एंजियोस्पर्म है।

  35. दुनिया का सबसे बड़ा फूल ‘रैफ्लेशिया’ (Rafflesia) है, जो एक परजीवी (Parasitic) एंजियोस्पर्म पौधा है।

  36. दुनिया का सबसे ऊँचा एंजियोस्पर्म (पुष्पी पादप) पेड़ ‘नीलगिरी’ या ‘यूकेलिप्टस’ (Eucalyptus) है।

  37. एंजियोस्पर्म को बीजों में उपस्थित बीजपत्रों की संख्या के आधार पर एकबीजपत्री (Monocot) और द्विबीजपत्री (Dicot) में बाँटा गया है।

  38. ‘एकबीजपत्री’ (Monocots) पौधों के बीजों में केवल एक ही दाल/बीजपत्र होता है (जैसे गेहूं, चावल, मक्का)।

  39. एकबीजपत्री पौधों की पत्तियों में शिराओं का जाल सीधा होता है, जिसे ‘समानांतर शिराविन्यास’ (Parallel venation) कहते हैं।

  40. एकबीजपत्री पौधों में मुख्य जड़ नहीं होती, बल्कि इनमें बालों जैसी ‘झकड़ा जड़ें’ (Fibrous roots) पाई जाती हैं।

  41. ‘बांस’ (Bamboo) दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली घास है, जो एक एकबीजपत्री (Monocot) एंजियोस्पर्म है।

  42. ‘द्विबीजपत्री’ (Dicots) पौधों के बीज दो बराबर हिस्सों (बीजपत्रों) में बँट जाते हैं (जैसे चना, मटर, मूंगफली)।

  43. द्विबीजपत्री पौधों की पत्तियों में ‘जालिकावत शिराविन्यास’ (Reticulate venation) पाया जाता है।

  44. द्विबीजपत्री पौधों में एक गहरी और मजबूत मुख्य जड़ होती है, जिसे ‘मूसला जड़’ (Tap root) कहते हैं।

  45. पादप जगत के जीवन चक्र में दो पीढ़ियां एकांतर क्रम में आती हैं: ‘गैमेटोफाइट’ (अगुणित/Haploid) और ‘स्पोरोफाइट’ (द्विगुणित/Diploid); इसे पीढ़ी एकांतरण कहते हैं।

  46. शैवाल (Algae) और ब्रायोफाइट्स में ‘गैमेटोफाइट’ (Gametophyte) अवस्था प्रभावी (Dominant) होती है।

  47. टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म में ‘स्पोरोफाइट’ (Sporophyte) अवस्था प्रभावी और मुख्य पादप शरीर होती है।

  48. समुद्री ‘केल्प’ (Kelp), जो भूरे शैवाल हैं, में ‘आयोडीन’ (Iodine) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

  49. जल की सतह पर स्वतंत्र रूप से तैरने वाले सूक्ष्म शैवालों (पादपों) को ‘फाइटोप्लैंकटन’ (Phytoplanktons) कहा जाता है।

  50. आम (Mangifera indica), नीम और सेब सभी विकसित ‘द्विबीजपत्री’ एंजियोस्पर्म (Dicot Angiosperms) के उदाहरण हैं।

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