जंतु जगत (Animal Kingdom)

जंतु जगत (Animal Kingdom)

1. विस्तृत प्रस्तावना: जंतु जगत (Animalia) क्या है?

पृथ्वी पर मौजूद जैव विविधता (Biodiversity) में जंतुओं की संख्या और प्रकार सबसे अधिक हैं। आर.एच. व्हिटेकर की पाँच-जगत प्रणाली में जंतु जगत (Kingdom Animalia) के अंतर्गत उन सभी जीवों को रखा गया है जो:

  1. बहुकोशिकीय (Multicellular) हैं।

  2. यूकैरियोटिक (Eukaryotic – विकसित केंद्रक वाले) हैं।

  3. विषमपोषी (Heterotrophic) हैं (अर्थात अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते)।

  4. जिनकी कोशिकाओं में ‘कोशिका भित्ति’ (Cell wall) और ‘क्लोरोप्लास्ट’ का पूर्णतः अभाव होता है।

वर्तमान में जंतु जगत में लगभग 1.2 मिलियन (12 लाख) से अधिक प्रजातियों की खोज की जा चुकी है। इतने विशाल जगत का अध्ययन करने के लिए इन्हें वैज्ञानिक आधारों पर विभिन्न ‘संघों’ (Phyla) में वर्गीकृत किया गया है।

वर्गीकरण का मुख्य आधार (Basis of Classification)

जंतुओं को बाँटने के लिए वैज्ञानिक मुख्य रूप से इन शारीरिक विशेषताओं का उपयोग करते हैं:

  • संगठन का स्तर: कोशिकीय स्तर (Cellular), ऊतक स्तर (Tissue), या अंग तंत्र स्तर (Organ system)।

  • सममिति (Symmetry): अरीय सममिति (Radial – शरीर को किसी भी धुरी से 2 बराबर भागों में काटा जा सके) या द्विपार्श्व सममिति (Bilateral – केवल एक ही अक्ष से 2 बराबर भाग हो सकें, जैसे मानव)।

  • प्रगुहा (Coelom / Body Cavity): शरीर की भित्ति और आहारनाल के बीच की खाली जगह।

  • पृष्ठरज्जु (Notochord): भ्रूणीय अवस्था में पीठ की ओर पाई जाने वाली एक छड़ जैसी संरचना। (जिनमें यह होती है वे कॉर्डेट्स/कशेरुकी कहलाते हैं, और जिनमें नहीं होती वे नॉन-कॉर्डेट्स/अकशेरुकी कहलाते हैं)।

आइए, जंतु जगत के प्रमुख संघों (Phyla) का UPSC की दृष्टि से विस्तृत और विश्लेषणात्मक अध्ययन करें।

अकशेरुकी जंतु (Non-Chordates / Invertebrates)

2. अकशेरुकी जंतु (Non-Chordates / Invertebrates)

इन जंतुओं के शरीर में रीढ़ की हड्डी (Notochord/Backbone) नहीं पाई जाती है। संपूर्ण जंतु जगत का लगभग 95% हिस्सा अकशेरुकी जंतुओं का ही है।

A. संघ – पोरिफेरा (Phylum – Porifera)

  • विशेषता: ग्रीक भाषा में ‘Pori’ का अर्थ है ‘छेद’ (Pores)। इस संघ के जंतुओं के पूरे शरीर पर असंख्य छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिन्हें ‘ऑस्टिया’ (Ostia) कहते हैं।

  • इन्हें आम भाषा में ‘स्पंज’ (Sponges) कहा जाता है। ये जलीय होते हैं और ज्यादातर समुद्र में किसी चट्टान से चिपके रहते हैं (चल-फिर नहीं सकते)।

  • इनमें केवल ‘कोशिका स्तर’ का संगठन होता है (ऊतक नहीं बनते)।

  • इनके शरीर में एक विशेष जल नाल प्रणाली (Water Canal System) होती है, जिसके द्वारा ये भोजन ग्रहण करते हैं और श्वसन करते हैं।

  • उदाहरण: साइकॉन (Sycon), स्पॉन्जिला (मीठे पानी का स्पंज) और यूस्पॉन्जिया (Euspongia – जिसे ‘बाथ स्पंज’ भी कहते हैं)।

B. संघ – सीलेन्ट्रेटा या निडेरिया (Phylum – Coelenterata / Cnidaria)

  • विशेषता: ये मुख्य रूप से समुद्री होते हैं। इनका शरीर ऊतक स्तर (Tissue level) का होता है और अरीय सममिति (Radial symmetry) वाला होता है।

  • इनके शरीर में एक विशेष प्रकार की दंश कोशिकाएं (Cnidoblasts) पाई जाती हैं, जिनका उपयोग ये अपने बचाव और शिकार को पकड़ने (और पैरालाइज करने) के लिए करते हैं।

  • इनके शरीर के बीच में एक बड़ी खाली गुहा होती है जिसे ‘सीलेन्ट्रॉन’ कहते हैं।

  • प्रवाल (Corals): इस संघ के कुछ जंतु कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO3) का कठोर कंकाल बनाते हैं, जिनसे समुद्र में विशाल ‘मूंगे की चट्टानें’ (Coral Reefs) बनती हैं (जैसे ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ)।

  • उदाहरण: हाइड्रा (Hydra), जेलीफ़िश (Aurelia), सी-एनीमोन (Sea anemone) और मूंगा (Corals)।

C. संघ – प्लैटीहेल्मिंथीज (Phylum – Platyhelminthes)

  • विशेषता: इन्हें ‘चपटे कृमि’ (Flatworms) कहा जाता है क्योंकि इनका शरीर ऊपर से नीचे तक चपटा होता है (जैसे कोई रिबन या पत्ता)।

  • ये मनुष्य और अन्य जानवरों के शरीर के अंदर परजीवी (Parasites) के रूप में रहते हैं और बीमारियां फैलाते हैं।

  • इनमें उत्सर्जन (Excretion) के लिए एक विशेष प्रकार की कोशिकाएं पाई जाती हैं जिन्हें ‘ज्वाला कोशिकाएं’ (Flame Cells) कहते हैं।

  • उदाहरण: टीनिया (Taenia / फीता कृमि – जो सुअर के अधपके मांस से इंसानों में जाता है), फैसिओला (Fasciola / यकृत कृमि) और प्लैनेरिया (Planaria – इसमें पुनरुद्भवन/Regeneration की अद्भुत क्षमता होती है)।

D. संघ – एस्केलमिंथीज (Phylum – Aschelminthes)

  • विशेषता: इन्हें ‘गोल कृमि’ (Roundworms) कहा जाता है क्योंकि इन्हें आड़े काटने पर इनका आकार गोल दिखाई देता है।

  • ये भी ज्यादातर परजीवी होते हैं और मनुष्य के पेट/आंतों में संक्रमण करते हैं।

  • ये ‘कूटगुहिक’ (Pseudocoelomate) होते हैं, यानी इनके शरीर की गुहा सच्ची नहीं होती।

  • उदाहरण: एस्केरिस (Ascaris – पेट के केंचुए), और वाउचेरेरिया (Wuchereria – यह फाइलेरिया या ‘हाथीपाँव’ रोग फैलाता है)।

E. संघ – ऐनेलिडा (Phylum – Annelida)

  • विशेषता: इनके शरीर पर बहुत सारे छल्ले या खंड (Segments/Metameres) बने होते हैं। ‘Annulus’ का अर्थ होता है छोटा छल्ला।

  • ये जल और थल दोनों जगह पाए जाते हैं।

  • इनमें चलने के लिए ‘सीटा’ (Setae) या ‘पैरापोडिया’ पाए जाते हैं। इनमें बंद प्रकार का रक्त परिसंचरण तंत्र (Closed circulatory system) होता है।

  • उत्सर्जन: इनमें उत्सर्जन के लिए ‘नेफ्रीडिया’ (Nephridia) नामक अंग पाए जाते हैं।

  • उदाहरण: केंचुआ (Earthworm – जिसे किसानों का मित्र कहा जाता है क्योंकि यह मिट्टी को भुरभुरा बनाता है), जोंक (Leech – जो खून चूसती है), और नेरीस (Nereis)।

F. संघ – आर्थ्रोपोडा (Phylum – Arthropoda) – जंतु जगत का सबसे बड़ा संघ

  • विशेषता: यह संपूर्ण जंतु जगत का सबसे बड़ा संघ (Largest Phylum) है। पृथ्वी पर मौजूद लगभग दो-तिहाई (66%) ज्ञात प्रजातियां आर्थ्रोपोडा की ही हैं।

  • ‘Arthro’ का अर्थ है ‘जोड़’ (Joints) और ‘Poda’ का अर्थ है ‘पैर’। यानी इनके पैर जुड़े हुए (Jointed appendages) होते हैं।

  • इनके शरीर के बाहर एक बहुत कठोर कंकाल (Exoskeleton) होता है जो ‘काइटिन’ (Chitin) का बना होता है।

  • इनका शरीर तीन भागों में बंटा होता है: सिर, वक्ष और उदर (Head, Thorax, Abdomen)।

  • इनमें खुला परिसंचरण तंत्र (Open circulatory system) होता है और इनका खून (हीमोलिम्फ) लाल नहीं होता।

  • उदाहरण: कीड़े-मकोड़े (Insects), मकड़ी (Spider), बिच्छू (Scorpion), कॉकरोच, तितली, झींगा मछली (Prawn), और केकड़ा (Crab)।

G. संघ – मोलस्का (Phylum – Mollusca) – जंतु जगत का दूसरा सबसे बड़ा संघ

  • विशेषता: यह जंतु जगत का दूसरा सबसे बड़ा संघ है। ‘Mollis’ का अर्थ होता है ‘नरम’। इन जंतुओं का शरीर बहुत कोमल होता है।

  • इनके कोमल शरीर की रक्षा के लिए इसके बाहर ‘कैल्शियम कार्बोनेट’ (CaCO3) का एक कठोर आवरण (Shell / कवच) पाया जाता है।

  • इनके मुँह में भोजन पीसने के लिए रेती के समान एक अंग होता है जिसे ‘रेडुला’ (Radula) कहते हैं।

  • उदाहरण: घोंघा (Snail), सीप (Oyster – जिससे असली मोती निकलता है), ऑक्टोपस (Octopus – जिसे डेविल फिश कहते हैं और इसके 8 हाथ होते हैं), और स्क्विड (Squid)। (विशेष तथ्य: ऑक्टोपस का खून नीले रंग का होता है क्योंकि उसमें कॉपर युक्त हीमोसाइनिन होता है)।

H. संघ – इकाइनोडर्मेटा (Phylum – Echinodermata)

  • विशेषता: ग्रीक में ‘Echinos’ का अर्थ है ‘कांटे’ और ‘Derma’ का अर्थ है ‘त्वचा’। यानी इनकी त्वचा पर कांटे (Spiny skinned) पाए जाते हैं।

  • ये विशेष रूप से केवल समुद्री (Marine) होते हैं।

  • इनकी सबसे अनूठी विशेषता इनका ‘जल संवहन तंत्र’ (Water Vascular System) है, जो इन्हें चलने, भोजन पकड़ने और सांस लेने में मदद करता है।

  • इनमें चलने के लिए ‘ट्यूब फीट’ (Tube feet) होते हैं।

  • उदाहरण: तारा मछली (Starfish / Asterias), समुद्री अर्चिन (Sea Urchin), और समुद्री ककड़ी (Sea Cucumber)।

कशेरुकी जंतु (Chordata / Vertebrates)

3. कशेरुकी जंतु (Chordata / Vertebrates)

कॉर्डेटा संघ जंतु जगत का सबसे उन्नत और विकसित समूह है। इस संघ के सभी जंतुओं में उनके जीवन की किसी न किसी अवस्था में तीन मुख्य चीजें जरूर पाई जाती हैं:

  1. पृष्ठरज्जु (Notochord): जो बाद में रीढ़ की हड्डी (Vertebral column) में बदल जाती है।

  2. पृष्ठीय खोखली तंत्रिका रज्जु (Dorsal hollow nerve cord): जो बाद में मस्तिष्क और स्पाइनल कॉर्ड बनाती है।

  3. ग्रसनीय क्लोम छिद्र (Pharyngeal gill slits): जो मछलियों में गिल्स और उच्च जंतुओं में फेफड़ों का आधार बनते हैं।

कशेरुकी (Vertebrata) उपसंघ को मुख्य रूप से 5 वर्गों (Classes) में बांटा गया है:

A. वर्ग – मत्स्य (Class – Pisces / Fishes)

  • ये पानी में रहने वाले जंतु हैं, जिनका शरीर नाव के आकार (Streamlined) का होता है ताकि पानी को चीर सकें।

  • इनके शरीर पर ‘शल्क’ (Scales) पाए जाते हैं और ये ‘गिल्स’ (Gills/गलफड़ों) द्वारा सांस लेते हैं।

  • इनका हृदय 2-कक्षीय (2-Chambered) होता है (एक अलिंद और एक निलय)।

  • ये असमतापी (Cold-blooded) होते हैं, यानी इनके शरीर का तापमान वातावरण के अनुसार बदलता रहता है।

  • मछलियों को दो भागों में बांटा जाता है:

    1. उपास्थिल मछलियां (Chondrichthyes): इनका कंकाल नरम हड्डी (Cartilage) का होता है। (उदा: शार्क/Shark, स्टिंग रे)। शार्क में एयर ब्लैडर नहीं होता, इसलिए उन्हें डूबने से बचने के लिए लगातार तैरना पड़ता है।

    2. अस्थिल मछलियां (Osteichthyes): इनका कंकाल मजबूत हड्डियों (Bones) का होता है। (उदा: रोहू, कतला, समुद्री घोड़ा / Sea horse)।

B. वर्ग – उभयचर (Class – Amphibia)

  • ‘Amphi’ का अर्थ है ‘दोहरा’ और ‘Bios’ का अर्थ है ‘जीवन’। ये जंतु जल और थल (पानी और जमीन) दोनों जगह रह सकते हैं।

  • इनके शरीर पर शल्क नहीं होते, इनकी त्वचा नम (Moist) और चिकनी होती है जिससे ये सांस भी लेते हैं।

  • इनका हृदय 3-कक्षीय (3-Chambered) होता है (दो अलिंद, एक निलय)।

  • ये भी असमतापी (Cold-blooded) होते हैं और अंडे देते हैं।

  • उदाहरण: मेंढक (Frog), टोड (Toad), और सैलामैंडर (Salamander)।

C. वर्ग – सरीसृप (Class – Reptilia)

  • ‘Reptum’ का अर्थ है ‘रेंगना’। इस वर्ग के जंतु रेंगकर या खिसककर चलते हैं।

  • ये पूरी तरह से जमीन पर रहने वाले जंतु हैं और इनकी त्वचा सूखी तथा शल्कों (Scales) से ढकी होती है।

  • ये फेफड़ों (Lungs) द्वारा सांस लेते हैं।

  • इनका हृदय भी 3-कक्षीय होता है, अपवाद: मगरमच्छ (Crocodile) का हृदय 4-कक्षीय होता है।

  • ये असमतापी होते हैं और कठोर छिलके वाले अंडे देते हैं।

  • उदाहरण: साँप (Snakes), छिपकली (Lizards), कछुआ (Turtle), और मगरमच्छ।

D. वर्ग – पक्षी (Class – Aves)

  • इस वर्ग में उड़ने वाले सभी पक्षियों को रखा गया है। (कुछ अपवाद जो उड़ नहीं सकते: शुतुरमुर्ग, कीवी, पेंगुइन)।

  • इनका शरीर ‘पंखों’ (Feathers) से ढका होता है और इनके आगे के दोनों पैर उड़ने के लिए ‘पंखों’ (Wings) में बदल जाते हैं।

  • इनकी हड्डियां खोखली और हवा से भरी होती हैं (Pneumatic bones), ताकि उड़ते समय शरीर हल्का रहे।

  • ये समतापी (Warm-blooded) होते हैं। यानी इनके शरीर का तापमान हमेशा एक जैसा रहता है, वातावरण के साथ बदलता नहीं है।

  • इनका हृदय 4-कक्षीय (4-Chambered) होता है।

  • इनके जबड़े ‘चोंच’ (Beak) में बदल जाते हैं और इनमें दांत नहीं होते।

  • उदाहरण: कबूतर, तोता, मोर, कौवा, शुतुरमुर्ग (Ostrich – यह सबसे बड़ा पक्षी है और सबसे बड़ी कोशिका इसका अंडा है)।

E. वर्ग – स्तनधारी (Class – Mammalia)

  • यह जंतु जगत का सबसे विकसित और बुद्धिमान वर्ग है।

  • इनकी सबसे अनूठी विशेषता ‘स्तन ग्रंथियों’ (Mammary Glands) का पाया जाना है, जिनसे ये अपने बच्चों को दूध पिलाते हैं।

  • इनकी त्वचा पर ‘बाल’ (Hair) होते हैं और त्वचा में पसीने और तेल की ग्रंथियां होती हैं।

  • इनमें बाह्य कर्ण (Pinna / कान का बाहरी हिस्सा) पाया जाता है।

  • ये समतापी (Warm-blooded) होते हैं और इनका हृदय 4-कक्षीय होता है।

  • अपवादों को छोड़कर, अधिकांश स्तनधारी सीधे बच्चों को जन्म देते हैं (जरायुज / Viviparous)।

  • अपवाद: डकबिल प्लैटिपस (Platypus) और एकिडना (Echidna) ऐसे स्तनधारी हैं जो ‘अंडे’ देते हैं (Oviparous)।

  • कंगारू: यह अपरिपक्व बच्चे को जन्म देता है और अपनी पेट की थैली (Marsupium) में उसे बड़ा करता है।

  • उदाहरण: मानव (Human), गाय, कुत्ता, शेर, चमगादड़ (Bat – यह पक्षी नहीं, उड़ने वाला स्तनधारी है), ब्लू व्हेल (Blue Whale – मछली नहीं, बल्कि पृथ्वी का सबसे बड़ा स्तनधारी जंतु है), और डॉल्फिन (Dolphin)।

4. निष्कर्ष (Conclusion)

जंतु जगत का यह संपूर्ण वर्गीकरण केवल नामों की एक सूची नहीं है, बल्कि यह डार्विन के ‘विकासवाद’ (Theory of Evolution) का जीता-जागता प्रमाण है। एककोशिकीय स्तर के स्पंज (पोरिफेरा) से शुरू होकर जीवन ने ऊतक (सीलेन्ट्रेटा), अंग (प्लैटीहेल्मिंथीज) और अंततः अंग-तंत्र (कशेरुकी) का सफर तय किया। पानी में रहने वाली मछलियां (Pisces) जब जमीन पर आईं तो उभयचर (Amphibia) बनीं, फिर सूखी जमीन पर पूरी तरह बसने के लिए सरीसृप (Reptilia) का विकास हुआ, जिनसे अंततः हवा में उड़ने वाले पक्षी (Aves) और सबसे बुद्धिमान स्तनधारी (Mammals) उत्पन्न हुए। यह समझना ही जीव विज्ञान की असली सुंदरता है।

5. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)

प्रश्न 1: जंतु जगत के वर्गीकरण के प्रमुख आधार क्या हैं? सममिति (Symmetry) और प्रगुहा (Coelom) के आधार पर जंतुओं का वर्गीकरण स्पष्ट करें। (150 शब्द)

प्रश्न 2: आर्थ्रोपोडा (Arthropoda) को जंतु जगत का सबसे बड़ा और सबसे सफल संघ (Phylum) क्यों माना जाता है? इसकी प्रमुख शारीरिक और रूपात्मक विशेषताओं का वर्णन करें। (200 शब्द)

प्रश्न 3: अकशेरुकी (Non-Chordates) और कशेरुकी (Chordates) जंतुओं के बीच मूलभूत अंतर क्या हैं? कशेरुकी जंतुओं के प्रमुख उप-वर्गों का संक्षिप्त परिचय दें। (200 शब्द)

प्रश्न 4: वर्ग मत्स्य (Pisces) और वर्ग उभयचर (Amphibia) के जंतुओं के हृदय संरचना, श्वसन प्रणाली और आवास में पाए जाने वाले प्रमुख विकासवादी अंतरों का विश्लेषण कीजिए। (150 शब्द)

प्रश्न 5: स्तनधारी (Mammalia) वर्ग की उन विशिष्ट विशेषताओं का वर्णन करें जो उन्हें जंतु जगत के अन्य वर्गों (जैसे पक्षी और सरीसृप) से अलग और उन्नत बनाती हैं। (150 शब्द)

6. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)

  1. आर.एच. व्हिटेकर की 5-जगत प्रणाली में ‘जंतु जगत’ (Animalia) में बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक और विषमपोषी जीवों को रखा गया है।

  2. जंतु कोशिकाओं में ‘कोशिका भित्ति’ (Cell wall) और ‘क्लोरोप्लास्ट’ पूर्णतः अनुपस्थित होते हैं।

  3. जंतु अपना अतिरिक्त भोजन मुख्य रूप से ‘ग्लाइकोजन’ (Glycogen) के रूप में संचित करते हैं।

  4. ‘पोरिफेरा’ (Porifera) संघ के जंतुओं को सामान्यतः ‘स्पंज’ (Sponges) कहा जाता है।

  5. स्पंजों के पूरे शरीर पर असंख्य छोटे छिद्र होते हैं जिन्हें ‘ऑस्टिया’ (Ostia) कहा जाता है, जहाँ से पानी अंदर जाता है।

  6. पोरिफेरा संघ के जंतुओं में भोजन, श्वसन और उत्सर्जन के लिए एक ‘जल नाल प्रणाली’ (Water Canal System) पाई जाती है।

  7. ‘सीलेन्ट्रेटा’ (Coelenterata / निडेरिया) संघ के जंतुओं में शिकार पकड़ने और सुरक्षा के लिए विशेष ‘दंश कोशिकाएं’ (Cnidoblasts) होती हैं।

  8. ऑस्ट्रेलिया की प्रसिद्ध ‘ग्रेट बैरियर रीफ’ का निर्माण सीलेन्ट्रेटा संघ के ‘प्रवाल’ (Corals/मूंगा) जीवों के कैल्शियम कार्बोनेट के कंकाल से हुआ है।

  9. हाइड्रा (Hydra), जेलीफ़िश और सी-एनीमोन ‘सीलेन्ट्रेटा’ संघ के प्रमुख उदाहरण हैं।

  10. ‘प्लैटीहेल्मिंथीज’ संघ के जीवों को ‘चपटे कृमि’ (Flatworms) कहा जाता है; फीता कृमि (Tapeworm) इसका प्रमुख उदाहरण है।

  11. चपटे कृमियों में उत्सर्जन (Excretion) और परासरण नियंत्रण के लिए ‘ज्वाला कोशिकाएं’ (Flame Cells) पाई जाती हैं।

  12. ‘एस्केलमिंथीज’ संघ के जीवों को ‘गोल कृमि’ (Roundworms) कहा जाता है; एस्केरिस (Ascaris) इसी संघ का सदस्य है।

  13. फाइलेरिया (हाथीपाँव) रोग ‘वाउचेरेरिया’ (Wuchereria) नामक गोल कृमि के कारण होता है।

  14. ‘ऐनेलिडा’ (Annelida) संघ के जंतुओं का शरीर छल्लेदार खंडों (Segments) में बँटा होता है।

  15. केंचुआ (Earthworm) और जोंक (Leech) ऐनेलिडा संघ के प्रमुख सदस्य हैं।

  16. केंचुए को ‘किसानों का मित्र’ कहा जाता है क्योंकि यह मिट्टी को खाकर उसे भुरभुरा और उपजाऊ (वर्मीकम्पोस्ट) बनाता है।

  17. ऐनेलिडा संघ के जंतुओं में उत्सर्जन के लिए ‘नेफ्रीडिया’ (Nephridia) नामक अंग पाए जाते हैं।

  18. ‘आर्थ्रोपोडा’ (Arthropoda) संपूर्ण जंतु जगत का सबसे बड़ा संघ (Largest phylum) है।

  19. आर्थ्रोपोडा का अर्थ है ‘जुड़े हुए पैर’ (Jointed appendages); कीट-पतंगे, मकड़ी, बिच्छू, कॉकरोच इसके सदस्य हैं।

  20. आर्थ्रोपोडा संघ के जंतुओं का बाह्य कंकाल बहुत कठोर होता है, जो ‘काइटिन’ (Chitin) नामक शर्करा से बना होता है।

  21. ‘मोलस्का’ (Mollusca) जंतु जगत का दूसरा सबसे बड़ा संघ है; इनके शरीर बहुत कोमल होते हैं।

  22. मोलस्का जंतुओं के कोमल शरीर की रक्षा के लिए ‘कैल्शियम कार्बोनेट’ का एक कठोर कवच (Shell) होता है (जैसे घोंघा/Snail में)।

  23. ‘ऑक्टोपस’ (Octopus) एक मोलस्का है; इसके 8 हाथ होते हैं और इसका खून कॉपर (हीमोसाइनिन) की उपस्थिति के कारण नीले (Blue) रंग का होता है।

  24. ‘सीप’ (Oyster) जिससे असली और कीमती ‘मोती’ (Pearl) प्राप्त होता है, वह मोलस्का संघ का ही जंतु है।

  25. ‘इकाइनोडर्मेटा’ (Echinodermata) संघ के जंतु केवल समुद्री होते हैं और इनकी त्वचा पर कांटे (Spiny skin) पाए जाते हैं।

  26. तारा मछली (Starfish), समुद्री अर्चिन (Sea Urchin) और समुद्री ककड़ी (Sea Cucumber) इकाइनोडर्मेटा के सदस्य हैं।

  27. ‘जल संवहन तंत्र’ (Water vascular system) और चलने के लिए ‘ट्यूब फीट’ इकाइनोडर्मेटा की मुख्य विशेषता है।

  28. कॉर्डेटा (Chordata) संघ के जंतुओं के जीवन की किसी न किसी अवस्था में ‘पृष्ठरज्जु’ (Notochord) अवश्य पाई जाती है।

  29. मछलियों (Pisces) का हृदय 2-कक्षीय (एक अलिंद, एक निलय) होता है और ये असमतापी (Cold-blooded) होती हैं।

  30. मछलियां पानी में घुली हुई ऑक्सीजन को ‘गिल्स’ (Gills/गलफड़ों) के माध्यम से ग्रहण करती हैं।

  31. ‘शार्क’ (Shark) एक उपास्थिल मछली (Cartilaginous fish) है, जिसके शरीर में एक भी असली हड्डी (Bone) नहीं होती।

  32. ‘समुद्री घोड़ा’ (Sea horse / हिप्पोकैम्पस) कोई घोड़ा नहीं, बल्कि एक असली ‘मछली’ (Fish) है।

  33. ‘उभयचर’ (Amphibia) वर्ग के जंतु जल और थल दोनों स्थानों पर रह सकते हैं (जैसे मेंढक, सैलामैंडर)।

  34. उभयचर जंतुओं का हृदय 3-कक्षीय (दो अलिंद, एक निलय) होता है और इनकी त्वचा शल्करहित और नम होती है।

  35. ‘सरीसृप’ (Reptilia) वर्ग के जंतु रेंगकर चलते हैं और इनकी त्वचा सूखी तथा शल्कों (Scales) से ढकी होती है (साँप, छिपकली)।

  36. अधिकांश सरीसृपों का हृदय 3-कक्षीय होता है, लेकिन ‘मगरमच्छ’ (Crocodile) एक अपवाद है जिसका हृदय 4-कक्षीय होता है।

  37. पक्षी (Aves) वर्ग के जंतु ‘समतापी’ (Warm-blooded) होते हैं, यानी इनके शरीर का तापमान मौसम के साथ नहीं बदलता।

  38. पक्षियों की हड्डियां खोखली और हवा से भरी होती हैं, जिन्हें ‘न्यूमेटिक हड्डियां’ (Pneumatic bones) कहा जाता है, जो उन्हें उड़ने में मदद करती हैं।

  39. शुतुरमुर्ग (Ostrich), कीवी (Kiwi) और पेंगुइन (Penguin) ऐसे पक्षी हैं जो ‘उड़ नहीं सकते’ (Flightless birds)।

  40. स्तनधारी (Mammalia) जंतु जगत का सबसे विकसित वर्ग है; इनमें बच्चों को दूध पिलाने के लिए ‘स्तन ग्रंथियां’ (Mammary glands) पाई जाती हैं।

  41. स्तनधारियों की त्वचा पर बाल (Hair) होते हैं और इनका हृदय 4-कक्षीय होता है।

  42. ‘चमगादड़’ (Bat) एक पक्षी नहीं है; यह उड़ने वाला एक ‘स्तनधारी’ (Mammal) जंतु है जो बच्चे पैदा करता है और दूध पिलाता है।

  43. ‘ब्लू व्हेल’ (Blue Whale) और ‘डॉल्फिन’ (Dolphin) मछलियां नहीं हैं; ये समुद्र में रहने वाले ‘स्तनधारी’ (Mammals) जंतु हैं।

  44. अधिकांश स्तनधारी बच्चे पैदा करते हैं (Viviparous), लेकिन ‘डकबिल प्लैटिपस’ (Platypus) और ‘एकिडना’ अंडे देने वाले (Oviparous) स्तनधारी हैं।

  45. ‘कंगारू’ (Kangaroo) एक मार्सुपियल (Marsupial) स्तनधारी है, जो अविकसित बच्चे को जन्म देता है और अपनी पेट की थैली में उसे बड़ा करता है।

  46. मनुष्य (Human) का वैज्ञानिक नाम ‘Homo sapiens’ है और यह स्तनधारी वर्ग के ‘प्राइमेट्स’ (Primates) गण में आता है।

  47. कीटों (Insects) की पहचान यह है कि उनके शरीर में हमेशा पैरों के ‘तीन जोड़े’ (Six legs) होते हैं।

  48. मकड़ी (Spider) एक कीट (Insect) नहीं है क्योंकि इसके ‘आठ पैर’ (Four pairs) होते हैं।

  49. ‘रजत मीन’ (Silver Fish) नाम में मछली है, लेकिन वास्तव में यह किताबों में लगने वाला एक पंखहीन ‘कीट’ (Insect / आर्थ्रोपोडा) है।

  50. डॉल्फिन (Dolphin) को भारत का ‘राष्ट्रीय जलीय जीव’ (National Aquatic Animal) घोषित किया गया है, जो गंगा नदी में पाई जाती है।

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