
कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन (Cell Cycle and Cell Division)
विस्तृत प्रस्तावना: कोशिका विभाजन क्या है और क्यों आवश्यक है?
प्रसिद्ध जर्मन जीवविज्ञानी रुडोल्फ विर्चो (Rudolf Virchow) ने 1855 में एक ऐतिहासिक कथन दिया था— “ओम्निस सेल्युला ई सेल्युला” (Omnis cellula-e-cellula), जिसका अर्थ है कि “सभी नई कोशिकाओं का निर्माण पहले से मौजूद कोशिकाओं के विभाजन से ही होता है।”
एक विशालकाय हाथी हो या एक सूक्ष्म अमीबा, सभी के जीवन की शुरुआत एक ‘एकल कोशिका’ (Single cell – युग्मनज/Zygote) से ही होती है। यह एकल कोशिका बार-बार विभाजित होकर अरबों कोशिकाओं का एक शरीर बनाती है। कोशिका विभाजन की आवश्यकता क्यों है?
वृद्धि और विकास (Growth): बहुकोशिकीय जीवों के शरीर के आकार को बढ़ाने के लिए।
मरम्मत (Repair): चोट लगने पर या पुरानी, मृत कोशिकाओं (जैसे त्वचा और रक्त कोशिकाओं) को बदलने के लिए।
प्रजनन (Reproduction): एककोशिकीय जीवों में यह प्रजनन का तरीका है, और बहुकोशिकीय जीवों में यह युग्मक (Sperm/Egg) बनाने के लिए आवश्यक है।
एक कोशिका के बनने, उसके बढ़ने और अंततः दो नई ‘संतति कोशिकाओं’ (Daughter cells) में विभाजित होने की पूरी क्रमिक प्रक्रिया को ‘कोशिका चक्र’ (Cell Cycle) कहा जाता है।
2. कोशिका चक्र की अवस्थाएं (Phases of Cell Cycle)
मानव की एक सामान्य कोशिका को विभाजित होने में लगभग 24 घंटे का समय लगता है। इस पूरे कोशिका चक्र को मुख्य रूप से दो बड़ी अवस्थाओं में बाँटा गया है: अंतरावस्था (Interphase) और एम-अवस्था (M-Phase)।
A. अंतरावस्था (Interphase) – तैयारी का चरण
इसे पहले ‘विश्राम अवस्था’ (Resting phase) कहा जाता था, लेकिन वास्तव में यह कोशिका चक्र की सबसे सक्रिय (Most active) अवस्था है। कोशिका अपने कुल समय का 95% से अधिक हिस्सा इसी अवस्था में बिताती है (यानी 24 घंटे में से 23 घंटे)। इसे 3 उप-चरणों में बांटा गया है:
G1-फेज (Gap 1 / प्रथम अंतराल अवस्था):
यह M-फेज और DNA प्रतिकृतिकरण (S-फेज) के बीच का समय है।
इस अवस्था में कोशिका शारीरिक रूप से बढ़ती है और विभाजन के लिए आवश्यक प्रोटीन और RNA का निर्माण करती है। इस दौरान DNA का निर्माण नहीं होता है।
S-फेज (Synthesis / संश्लेषण अवस्था) – सबसे महत्वपूर्ण:
इस अवस्था में DNA का प्रतिकृतिकरण (DNA Replication) होता है।
यानी कोशिका के अंदर DNA की मात्रा ‘दोगुनी’ (Double) हो जाती है (2C से 4C हो जाती है)।
ध्यान दें: DNA की मात्रा दोगुनी होती है, लेकिन ‘गुणसूत्रों’ (Chromosomes) की संख्या समान रहती है (मानव में 46 ही रहते हैं)। जंतु कोशिका में इसी अवस्था में ‘तारककाय’ (Centriole) का भी विभाजन होता है।
G2-फेज (Gap 2 / द्वितीय अंतराल अवस्था):
इस अवस्था में कोशिका विभाजन (Mitosis) के लिए आवश्यक विशेष प्रोटीन (जैसे ट्युबुलिन) का निर्माण होता है और कोशिका की वृद्धि जारी रहती है।
विराम अवस्था (G0 Phase / Quiescent Stage): कुछ कोशिकाएं (जैसे मानव के हृदय की कोशिकाएं और तंत्रिका कोशिकाएं / Neurons) जीवन में कभी विभाजित नहीं होतीं। वे G1 अवस्था से बाहर निकलकर एक निष्क्रिय अवस्था में चली जाती हैं, जिसे G0 अवस्था कहते हैं। ये कोशिकाएं जीवित रहती हैं लेकिन विभाजन नहीं करतीं।
3. एम-अवस्था (M-Phase / Mitosis Phase) – वास्तविक विभाजन
अंतरावस्था में पूरी तैयारी करने के बाद कोशिका M-फेज में प्रवेश करती है, जहाँ वास्तविक कोशिका विभाजन होता है। इसमें केवल 1 घंटे का समय लगता है। इसे दो भागों में बाँटा गया है:
कैरियोकाइनेसिस (Karyokinesis): केंद्रक (Nucleus) का विभाजन।
साइटोकाइनेसिस (Cytokinesis): कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) का विभाजन।
विभाजन के प्रकार के आधार पर M-Phase दो प्रकार का होता है: समसूत्री (Mitosis) और अर्धसूत्री (Meiosis)।
4. समसूत्री विभाजन (Mitosis) – कायिक विभाजन
‘समसूत्री’ का अर्थ है ‘समान सूत्र’ (Equal Chromosomes)। इसे समीकरण विभाजन (Equational Division) भी कहा जाता है क्योंकि इसमें बनने वाली नई संतति कोशिकाओं (Daughter cells) में गुणसूत्रों की संख्या अपनी मातृ कोशिका (Mother cell) के बिल्कुल ‘बराबर’ रहती है।
यह विभाजन हमारे शरीर की ‘कायिक कोशिकाओं’ (Somatic cells) (जैसे त्वचा, बाल, यकृत की कोशिकाओं) में होता है।
समसूत्री विभाजन (Mitosis) शब्द ‘वाल्थर फ्लेमिंग’ (Walther Flemming) ने 1882 में दिया था।
केंद्रक विभाजन (Karyokinesis) की 4 प्रमुख अवस्थाएं होती हैं:
I. पूर्वावस्था (Prophase) – सबसे लंबी अवस्था
यह समसूत्री विभाजन की सबसे लंबी अवस्था है।
उलझे हुए क्रोमैटिन धागे (DNA) संघनित होकर स्पष्ट ‘गुणसूत्र’ (Chromosomes) का रूप लेने लगते हैं।
अंतरावस्था में विभाजित हुए दोनों तारककाय (Centrioles) कोशिका के विपरीत ध्रुवों (Poles) की ओर जाने लगते हैं।
इस अवस्था के अंत में केंद्रक झिल्ली (Nuclear envelope), केंद्रिका (Nucleolus) और गॉल्जी काय पूरी तरह से गायब (Disappear) हो जाते हैं।
II. मध्यावस्था (Metaphase) – सबसे स्पष्ट अवस्था
सभी गुणसूत्र कोशिका के बिल्कुल बीचों-बीच (भूमध्य रेखा पर) आकर एक लाइन में व्यवस्थित हो जाते हैं, जिसे ‘मध्यावस्था पट्टिका’ (Metaphase plate) कहते हैं।
तारककाय से निकलने वाले ‘तर्कु तंतु’ (Spindle fibres) गुणसूत्रों के ‘काइनेटोकोर’ (Kinetochore) से जुड़ जाते हैं।
UPSC फैक्ट: सूक्ष्मदर्शी (Microscope) के नीचे गुणसूत्रों के आकार और उनकी संख्या का अध्ययन (Morphology of chromosomes) करने के लिए यह सबसे बेहतरीन (Best) अवस्था है।
III. पश्चावस्था (Anaphase) – सबसे छोटी अवस्था
यह समसूत्री विभाजन की सबसे छोटी (Shortest) अवस्था है।
गुणसूत्रों का ‘सेंट्रोमियर’ (Centromere) बीच में से फट जाता है।
तर्कु तंतु (Spindle fibres) सिकुड़ते हैं और गुणसूत्रों के आधे-आधे हिस्से (Chromatids) विपरीत ध्रुवों (Opposite poles) की ओर खिंचने लगते हैं।
ध्रुवों की ओर जाते समय गुणसूत्र V, J, L या I के आकार के दिखाई देते हैं।
IV. अंत्यावस्था (Telophase) – पूर्वावस्था की उल्टी
गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों पर पहुँचकर फिर से उलझे हुए क्रोमैटिन धागों में बदल जाते हैं।
गायब हुई ‘केंद्रक झिल्ली’ और ‘केंद्रिका’ (Nucleolus) फिर से प्रकट हो जाती हैं। एक ही कोशिका के अंदर दो स्पष्ट केंद्रक बन जाते हैं।
साइटोकाइनेसिस (Cytokinesis – कोशिकाद्रव्य विभाजन)
केंद्रक के विभाजन के बाद पूरी कोशिका को भी दो हिस्सों में बटना होता है।
जंतु कोशिका में: प्लाज्मा झिल्ली में बाहर से अंदर की ओर एक खांच (Cleavage furrow) बनती है, जो गहरी होकर कोशिका को दो भागों में बाँट देती है।
पादप कोशिका में: कोशिका भित्ति कठोर होती है, इसलिए इनमें विभाजन अंदर से बाहर की ओर एक ‘कोशिका पट्टिका’ (Cell Plate) के निर्माण द्वारा होता है।
समसूत्री विभाजन का महत्व: यह जीवों की वृद्धि और पुरानी कोशिकाओं की मरम्मत के लिए जिम्मेदार है। यह सुनिश्चित करता है कि शरीर की हर कोशिका में समान अनुवांशिक सामग्री (DNA) हो।
5. अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) – न्यूनतमकारी विभाजन
‘अर्धसूत्री’ का अर्थ है ‘आधे सूत्र’। इसे न्यूनकारी विभाजन (Reductional Division) भी कहा जाता है क्योंकि इसमें मातृ कोशिका से बनने वाली 4 नई संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या ‘आधी’ (Half) रह जाती है। (जैसे मानव में 46 से 23 हो जाती है)।
यह विभाजन हमारे शरीर में केवल ‘जनन कोशिकाओं’ (Germ cells – वृषण और अंडाशय) में होता है ताकि शुक्राणु (Sperms) और अंडाणु (Eggs) बन सकें।
‘अर्धसूत्री’ (Meiosis) शब्द ‘फार्मर और मूर’ (Farmer and Moore) ने 1905 में दिया था।
यह विभाजन लगातार दो चरणों में पूरा होता है:
A. अर्धसूत्री विभाजन – I (Meiosis I)
यही वह मुख्य चरण है जिसमें गुणसूत्रों की संख्या आधी होती है। इसकी ‘पूर्वावस्था-I’ (Prophase-I) बहुत लंबी और अत्यंत जटिल होती है, जिसे 5 उप-अवस्थाओं में बांटा गया है:
लेप्टोटीन (Leptotene): गुणसूत्र स्पष्ट होने लगते हैं और गुलदस्ते (Bouquet) की तरह दिखते हैं।
जाइगोटीन (Zygotene): समजात गुणसूत्र (Homologous chromosomes) जोड़े (Pairs) बनाने लगते हैं। इस प्रक्रिया को ‘सिनैप्सिस’ (Synapsis) कहते हैं।
पैकटीन (Pachytene) – सबसे महत्वपूर्ण: इस अवस्था में दो समजात गुणसूत्रों के बीच DNA के टुकड़ों की अदला-बदली होती है। इसे ‘जीन विनिमय’ (Crossing Over) कहा जाता है। ‘रिकॉम्बिनेज’ (Recombinase) एंजाइम इसमें मदद करता है। दुनिया के किसी भी दो इंसानों की शक्ल एक जैसी न होने का कारण यही ‘क्रॉसिंग ओवर’ है।
डिप्लोटीन (Diplotene): गुणसूत्र अलग होने लगते हैं, लेकिन जहाँ क्रॉसिंग ओवर हुआ था, वहाँ वे X-आकार की संरचना बनाते हैं जिसे ‘काइज़्मेटा’ (Chiasmata) कहते हैं।
डायकाइनेसिस (Diakinesis): काइज़्मेटा समाप्त हो जाते हैं और केंद्रक झिल्ली गायब हो जाती है।
इसके बाद Metaphase-I (गुणसूत्र बीच में आते हैं), Anaphase-I (गुणसूत्र अलग होकर विपरीत ध्रुवों पर जाते हैं), और Telophase-I होता है।
B. अर्धसूत्री विभाजन – II (Meiosis II)
यह बिल्कुल ‘समसूत्री विभाजन’ (Mitosis) के समान ही होता है।
Meiosis I में बनी दो कोशिकाएं फिर से विभाजित होती हैं, जिससे अंततः 4 अगुणित (Haploid) कोशिकाएं (जैसे 4 शुक्राणु) बन जाती हैं, जिनमें गुणसूत्रों की संख्या मातृ कोशिका से आधी होती है।
अर्धसूत्री विभाजन का महत्व: यह सुनिश्चित करता है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या स्थिर रहे (पिता के 23 + माता के 23 = बच्चे में फिर से 46)। पैकटीन अवस्था में होने वाले ‘क्रॉसिंग ओवर’ के कारण जीवों में ‘अनुवांशिक विविधता’ (Genetic Variation) आती है, जो विकास (Evolution) का मुख्य आधार है।

6. समसूत्री (Mitosis) और अर्धसूत्री (Meiosis) विभाजन में अंतर
| आधार | समसूत्री विभाजन (Mitosis) | अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) |
| कोशिका का प्रकार | यह शरीर की कायिक कोशिकाओं (Somatic cells) में होता है। | यह केवल जनन कोशिकाओं (Germ cells) में होता है। |
| गुणसूत्रों की संख्या | नई कोशिकाओं में गुणसूत्र मातृ कोशिका के बराबर (2n) रहते हैं। | नई कोशिकाओं में गुणसूत्र मातृ कोशिका के आधे (n) रह जाते हैं। |
| संतति कोशिकाएं | इसमें एक मातृ कोशिका से 2 नई कोशिकाएं बनती हैं। | इसमें एक मातृ कोशिका से 4 नई कोशिकाएं बनती हैं। |
| क्रॉसिंग ओवर | इसमें ‘जीन विनिमय’ (Crossing Over) नहीं होता है। | इसके प्रोफेज-I की पैकटीन अवस्था में क्रॉसिंग ओवर होता है। |
| महत्व | शरीर की वृद्धि, विकास और घावों को भरने में। | युग्मकों (शुक्राणु/अंडाणु) के निर्माण और अनुवांशिक विविधता में। |
7. निष्कर्ष (Conclusion)
कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन जीव विज्ञान की सबसे सूक्ष्म, सटीक और जीवन को निरंतर बनाए रखने वाली प्रक्रिया है। जहाँ एक ओर समसूत्री विभाजन (Mitosis) जीव के आकार को बढ़ाता है और उसे चोटों से उबरने में मदद करता है, वहीं अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) जीवन की विविधता का आधार है। यदि क्रॉसिंग ओवर न होता, तो आज हम सभी इंसान बिल्कुल कार्बन कॉपी (क्लोन) की तरह दिखते और बदलते पर्यावरण में शायद हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जाता। कोशिका विभाजन का यह जटिल नियंत्रण ही ‘जीवन’ है, और इसके नियंत्रण का खो जाना ‘कैंसर’ (Cancer) का कारण बनता है।
8. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)
प्रश्न 1: कोशिका चक्र (Cell Cycle) की विभिन्न अवस्थाओं (G1, S, G2 और M) का विस्तृत वर्णन करें। ‘अंतरावस्था’ (Interphase) को विश्राम अवस्था कहना क्यों तकनीकी रूप से गलत है? (250 शब्द)
प्रश्न 2: समसूत्री विभाजन (Mitosis) और अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) के बीच मूलभूत अंतर क्या हैं? जीवों के जीवन चक्र में इन दोनों के महत्व की विवेचना करें। (250 शब्द)
प्रश्न 3: कोशिका विभाजन के दौरान ‘S-अवस्था’ (Synthesis Phase) का क्या महत्व है? स्पष्ट करें कि इस अवस्था में DNA की मात्रा और गुणसूत्रों की संख्या में क्या परिवर्तन होता है। (150 शब्द)
प्रश्न 4: अर्धसूत्री विभाजन की ‘पूर्वावस्था-I’ (Prophase-I) की विभिन्न उप-अवस्थाओं का वर्णन करें। विकासवाद (Evolution) के दृष्टिकोण से ‘पैकटीन’ (Pachytene) अवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण क्यों है? (200 शब्द)
प्रश्न 5: जंतु कोशिका और पादप कोशिका में ‘साइटोकाइनेसिस’ (कोशिकाद्रव्य विभाजन) किस प्रकार एक-दूसरे से भिन्न होता है? इसके कारणों को स्पष्ट करें। (150 शब्द)
9. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)
रुडोल्फ विर्चो (Rudolf Virchow) ने 1855 में सिद्ध किया था कि नई कोशिकाएं पूर्ववर्ती (पुरानी) कोशिकाओं के विभाजन से ही बनती हैं (“Omnis cellula-e-cellula”)।
एक कोशिका विभाजन, DNA प्रतिकृतिकरण और वृद्धि के संपूर्ण घटनाक्रम को ‘कोशिका चक्र’ (Cell Cycle) कहा जाता है।
मानव कोशिका को एक बार विभाजित होने में औसतन 24 घंटे का समय लगता है; जबकि यीस्ट (Yeast) की कोशिका मात्र 90 मिनट में विभाजित हो जाती है।
कोशिका चक्र की दो मुख्य अवस्थाएं होती हैं: अंतरावस्था (Interphase) और एम-अवस्था (M-Phase)।
अंतरावस्था (Interphase) कोशिका चक्र की सबसे लंबी अवस्था है, जिसमें कोशिका अपने कुल समय का 95% से अधिक हिस्सा बिताती है।
G1-अवस्था (Gap 1) में कोशिका विभाजन के लिए आवश्यक RNA और प्रोटीन का निर्माण करती है, लेकिन इसमें DNA का निर्माण नहीं होता।
‘S-अवस्था’ (Synthesis Phase) कोशिका चक्र की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है, जिसमें DNA का प्रतिकृतिकरण (Replication) होता है।
S-अवस्था में DNA की मात्रा दोगुनी (2C से 4C) हो जाती है, लेकिन गुणसूत्रों (Chromosomes) की संख्या समान (46) ही रहती है।
जंतु कोशिका में S-अवस्था के दौरान ही कोशिकाद्रव्य में ‘तारककाय’ (Centriole) का भी दोगुना होना (Duplication) होता है।
G2-अवस्था में कोशिका M-फेज के लिए विशेष प्रोटीन (जैसे स्पिंडल फाइबर बनाने के लिए ट्युबुलिन प्रोटीन) का निर्माण करती है।
मानव हृदय की कोशिकाएं और तंत्रिका कोशिकाएं (Neurons) विभाजन नहीं करतीं; वे G1 से निकलकर ‘विराम अवस्था’ (G0 Phase / Quiescent Stage) में चली जाती हैं।
कैंसर (Cancer) तब होता है जब कोशिकाएं ‘कोशिका चक्र’ पर अपना नियंत्रण खो देती हैं और अनियंत्रित रूप से विभाजित होने लगती हैं।
एम-अवस्था (M-Phase) में ही कोशिका का वास्तविक विभाजन होता है; मानव कोशिका में इसमें केवल 1 घंटे का समय लगता है।
केंद्रक के कोशिका विभाजन को ‘कैरियोकाइनेसिस’ (Karyokinesis) और कोशिकाद्रव्य के विभाजन को ‘साइटोकाइनेसिस’ (Cytokinesis) कहा जाता है।
‘समसूत्री विभाजन’ (Mitosis) की खोज 1879 में वाल्थर फ्लेमिंग (Walther Flemming) ने की थी और उन्होंने ही इसे यह नाम दिया था।
समसूत्री विभाजन केवल ‘कायिक कोशिकाओं’ (Somatic Cells – शरीर की सामान्य कोशिकाओं) में होता है।
समसूत्री विभाजन को ‘समीकरण विभाजन’ (Equational Division) कहा जाता है क्योंकि नई कोशिकाओं में गुणसूत्र मातृ कोशिका के बराबर (2n) रहते हैं।
समसूत्री विभाजन में एक मातृ कोशिका से 2 नई संतति कोशिकाएं (Daughter cells) बनती हैं।
‘पूर्वावस्था’ (Prophase) समसूत्री विभाजन की सबसे लंबी अवस्था है, जिसमें उलझे हुए क्रोमैटिन धागे संघनित होकर गुणसूत्र (Chromosomes) बनाते हैं।
पूर्वावस्था के अंत में ‘केंद्रक झिल्ली’ (Nuclear envelope), गॉल्जी काय और ‘केंद्रिका’ (Nucleolus) पूरी तरह से गायब हो जाते हैं।
‘मध्यावस्था’ (Metaphase) में सभी गुणसूत्र कोशिका के बिल्कुल मध्य (Equator) में आकर एक पट्टिका बनाते हैं जिसे ‘मध्यावस्था पट्टिका’ (Metaphase plate) कहते हैं।
सूक्ष्मदर्शी से गुणसूत्रों के आकार और संरचना का अध्ययन करने के लिए ‘मध्यावस्था’ (Metaphase) सबसे बेहतरीन (Best) अवस्था है।
तर्कु तंतु (Spindle fibres) गुणसूत्रों के बीच में स्थित डिस्क जैसी संरचना ‘काइनेटोकोर’ (Kinetochore) से जुड़ते हैं।
‘पश्चावस्था’ (Anaphase) समसूत्री विभाजन की सबसे छोटी (Shortest) अवस्था है।
पश्चावस्था में सेंट्रोमियर फट जाता है और गुणसूत्रों के आधे हिस्से (Chromatids) विपरीत ध्रुवों (Opposite poles) की ओर जाने लगते हैं।
ध्रुवों की ओर जाते समय गुणसूत्र V, J, L या I (अंग्रेजी अक्षरों) के आकार के दिखाई देते हैं।
‘अंत्यावस्था’ (Telophase) पूर्वावस्था के बिल्कुल विपरीत (Reverse) होती है; इसमें केंद्रक झिल्ली और केंद्रिका पुनः प्रकट हो जाते हैं।
पादप कोशिकाओं में साइटोकाइनेसिस अंदर से बाहर की ओर एक ‘कोशिका पट्टिका’ (Cell Plate) बनने से होता है क्योंकि इनकी कोशिका भित्ति कठोर होती है।
जंतु कोशिकाओं में साइटोकाइनेसिस बाहर से अंदर की ओर प्लाज्मा झिल्ली में ‘खांच’ (Cleavage furrow) बनने से होता है।
समसूत्री विभाजन (Mitosis) का मुख्य कार्य शरीर की वृद्धि करना, पुरानी कोशिकाओं को बदलना और घावों को भरना है।
‘अर्धसूत्री विभाजन’ (Meiosis) की खोज 1905 में ‘फार्मर और मूर’ (Farmer and Moore) ने की थी।
अर्धसूत्री विभाजन शरीर की केवल ‘जनन कोशिकाओं’ (Germ cells – वृषण और अंडाशय) में होता है जिससे शुक्राणु (Sperms) और अंडाणु (Eggs) बनते हैं।
अर्धसूत्री विभाजन को ‘न्यूनकारी विभाजन’ (Reductional Division) कहा जाता है क्योंकि इसमें गुणसूत्रों की संख्या आधी (Haploid / n) रह जाती है।
अर्धसूत्री विभाजन में एक मातृ कोशिका से कुल 4 नई संतति कोशिकाएं (Daughter cells) बनती हैं।
अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis I) की ‘पूर्वावस्था-I’ (Prophase-I) कोशिका विभाजन की सबसे लंबी और सबसे जटिल अवस्था है।
पूर्वावस्था-I को 5 उप-अवस्थाओं में बाँटा गया है: लेप्टोटीन, जाइगोटीन, पैकटीन, डिप्लोटीन और डायकाइनेसिस (Trick: L-Z-P-D-D)।
‘जाइगोटीन’ (Zygotene) अवस्था में समजात गुणसूत्र (Homologous chromosomes) जोड़े (Pairs) बनाने लगते हैं; इस प्रक्रिया को ‘सिनैप्सिस’ (Synapsis) कहते हैं।
‘पैकटीन’ (Pachytene) अवस्था सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी अवस्था में समजात गुणसूत्रों के बीच DNA के टुकड़ों की अदला-बदली होती है, जिसे ‘जीन विनिमय’ (Crossing Over) कहते हैं।
क्रॉसिंग ओवर (Crossing Over) प्रक्रिया के लिए ‘रिकॉम्बिनेज’ (Recombinase) नामक एंजाइम की आवश्यकता होती है।
मनुष्यों और अन्य जीवों में पाई जाने वाली ‘अनुवांशिक विविधता’ (Genetic Variation) का मुख्य कारण पैकटीन अवस्था में होने वाला क्रॉसिंग ओवर ही है।
‘डिप्लोटीन’ (Diplotene) अवस्था में गुणसूत्र अलग होने लगते हैं और जहाँ क्रॉसिंग ओवर हुआ था, वहाँ X-आकार की संरचना बनती है जिसे ‘काइज़्मेटा’ (Chiasmata) कहते हैं।
मानव मादाओं (स्त्रियों) के अंडाशय (Ovary) में अंडे (Oocytes) जन्म के समय ‘डिप्लोटीन’ अवस्था में ही कई वर्षों तक (यौवनारंभ तक) रुके रहते हैं।
‘डायकाइनेसिस’ (Diakinesis) में काइज़्मेटा समाप्त हो जाते हैं और पूर्वावस्था-I समाप्त हो जाती है।
अर्धसूत्री विभाजन-I (Meiosis I) में गुणसूत्रों की संख्या आधी होती है, जबकि अर्धसूत्री विभाजन-II (Meiosis II) बिल्कुल समसूत्री विभाजन (Mitosis) के समान होता है।
दो अर्धसूत्री विभाजनों (Meiosis I और Meiosis II) के बीच की छोटी सी अवस्था को ‘इंटरकाइनेसिस’ (Interkinesis) कहा जाता है।
इंटरकाइनेसिस अवस्था में DNA का प्रतिकृतिकरण (Replication) नहीं होता है।
प्याज के जड़ के सिरे (Onion root tip) का उपयोग प्रयोगशालाओं में समसूत्री विभाजन (Mitosis) के अध्ययन के लिए सबसे अधिक किया जाता है।
टिड्डे (Grasshopper) के वृषण (Testis) का उपयोग प्रयोगशाला में अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) का अध्ययन करने के लिए किया जाता है।
बहुकेंद्रिक कोशिकाएं (Syncytium) तब बनती हैं जब कैरियोकाइनेसिस (केंद्रक विभाजन) के बाद साइटोकाइनेसिस (कोशिकाद्रव्य विभाजन) नहीं होता है (उदाहरण: नारियल का तरल भ्रूणपोष)।
अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) यह सुनिश्चित करता है कि एक ही प्रजाति (Species) के जीवों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या निश्चित (Constant) बनी रहे।