सिंधु सभ्यता का धर्म (Religion of Indus Valley Civilization): पशुपति शिव, मातृदेवी और प्रकृति पूजा का विस्तृत अध्ययन

1. विस्तृत प्रस्तावना: सिंधु सभ्यता का धर्म और उसका स्वरूप
प्राचीन सभ्यताओं के इतिहास में धर्म हमेशा से मानव जीवन का सबसे संवेदनशील और मार्गदर्शक तत्व रहा है। जब हम सिंधु सभ्यता का धर्म (Religion of Indus Valley Civilization) का अध्ययन करते हैं, तो हमारे सामने एक अत्यंत व्यावहारिक, सहिष्णु और प्रकृति-केंद्रित धार्मिक स्वरूप उभर कर आता है। समकालीन मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं के विपरीत, जहाँ धर्म बड़े-बड़े मंदिरों, भव्य पुरोहितों और राजाओं के दैवीय अधिकारों के इर्द-गिर्द घूमता था, सिंधु घाटी में ऐसा कोई भी आडंबर देखने को नहीं मिलता।
सिंधु सभ्यता का धर्म मुख्य रूप से अलौकिक या परलोक की चिंता करने वाला नहीं था, बल्कि वह इहलौकिक (मूर्तरूप और व्यावहारिक) था। चूंकि इस सभ्यता की भावचित्रात्मक लिपि को आज तक पढ़ा नहीं जा सका है, इसलिए इतिहासकार यहाँ के धार्मिक जीवन को समझने के लिए पूरी तरह से पुरातात्विक साक्ष्यों—जैसे मिट्टी की मूर्तियों (Terracotta Figurines), पत्थरों की कलाकृतियों और मुहरों (Seals) पर अंकित चित्रों—पर निर्भर हैं। इन साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि आज के आधुनिक हिंदू धर्म की कई मुख्य परंपराएं, जैसे शिव पूजा, शक्ति पूजा, योग, और वृक्ष पूजा, वास्तव में इसी सिंधु सभ्यता की देन हैं। आइए, इसके विभिन्न आयामों का गहराई से विश्लेषण करें।
2. मातृदेवी की पूजा: समाज की सर्वोच्च शक्ति (Worship of Mother Goddess)
सिंधु सभ्यता का धर्म मुख्य रूप से नारी शक्ति या मातृसत्तात्मक चेतना से ओत-प्रोत था। उत्खनन के दौरान हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और अन्य स्थलों से भारी संख्या में मिट्टी की बनी स्त्री मूर्तियां (Female Terracotta Figurines) प्राप्त हुई हैं, जिन्हें इतिहासकार ‘मातृदेवी’ (Mother Goddess) कहते हैं।
A. उर्वरता की देवी और पृथ्वी पूजा
हड़प्पा से प्राप्त एक अत्यंत प्रसिद्ध मुहर में एक स्त्री को दिखाया गया है, जिसके सिर के बल खड़े होने की मुद्रा है और उसके गर्भ (Womb) से एक पौधा (Plant) निकलता हुआ दिखाई दे रहा है।
यह चित्र अकाट्य रूप से यह प्रमाणित करता है कि सिंधु वासी पृथ्वी को ‘उर्वरता की देवी’ (Goddess of Fertility) या ‘धरती माता’ मानते थे। वे प्रकृति को जीवन देने वाली शक्ति के रूप में पूजते थे, ठीक उसी तरह जैसे मिस्र के लोग नील नदी की देवी ‘आइसिस’ (Isis) की पूजा करते थे।
B. बलि और अनुष्ठान के संकेत
कुछ मुहरों पर मातृदेवी के सामने हाथ जोड़े खड़े मनुष्यों और पशुओं (जैसे बकरे) के चित्र मिले हैं, जिससे इतिहासकार यह अनुमान लगाते हैं कि उस समय देवी को प्रसन्न करने के लिए प्रतीकात्मक या वास्तविक ‘बलि प्रथा’ (Sacrifice) भी अस्तित्व में रही होगी।
3. पशुपति नाथ और पुरुष देवता की संकल्पना (Worship of Proto-Shiva)
सिंधु सभ्यता का धर्म केवल देवी पूजा तक सीमित नहीं था; इसमें एक सर्वोच्च पुरुष देवता की पूजा का भी विधान था, जिसे आधुनिक भगवान शिव का प्रारंभिक रूप माना जाता है।
A. पशुपति शिव की ऐतिहासिक मुहर
मोहनजोदड़ो से सेलखड़ी पत्थर की बनी एक विश्व-प्रसिद्ध मुहर प्राप्त हुई है। इस मुहर पर एक पुरुष देवता को त्रि-मुख (Three Faces) और सिर पर दो सींग वाले मुकुट के साथ एक ऊंचे चबूतरे पर योग की ‘पद्मासन’ मुद्रा में बैठे दिखाया गया है। उनकी आंखें नासाग्र (नाक के अग्र भाग पर टिकी हुई ध्यान मुद्रा में) हैं।
B. पांच जानवरों का रहस्य (UPSC का पसंदीदा प्रश्न)
इस योगी के चारों ओर जंतु जगत के पांच महत्वपूर्ण पशु विराजमान हैं, जो उनकी ‘पशुपति’ (पशुओं के स्वामी) की उपाधि को सिद्ध करते हैं:
योगी के दाईं ओर: एक हाथी (Elephant) और एक बाघ (Tiger)।
योगी के बाईं ओर: एक गैंडा (Rhinoceros) और एक भैंसा (Water Buffalo)।
योगी के आसन के नीचे: दो हिरण (Deer) चौकड़ी भरते हुए दिखाए गए हैं।
भारतीय पुरातत्व के महान निदेशक सर जॉन मार्शल ने इस आकृति को ‘आद्य-शिव’ (Proto-Shiva) का नाम दिया था, जो उत्तर वैदिक काल के ‘रुद्र’ और आधुनिक ‘शिव’ के बिल्कुल समान है।
4. लिंग एवं योनि पूजा (Lingam and Yoni Worship)
हड़प्पा सभ्यता के विभिन्न स्थलों से पत्थर, मिट्टी और सीप के बने बड़ी संख्या में छोटे-बड़े छल्ले (Rings) और बेलनाकार पत्थर (Cylindrical Stones) मिले हैं।
इतिहासकारों (जैसे मार्शल और व्हीलर) का मानना है कि ये बेलनाकार पत्थर वास्तव में ‘शिवलिंग’ का और पत्थर के छल्ले ‘योनि’ का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यह इस बात का संकेत है कि सिंधु सभ्यता का धर्म सृष्टि के सृजन और जनन शक्ति (Creative Energy) की पूजा को अत्यंत पवित्र मानता था। हालांकि, कुछ आधुनिक पुरातत्वविद इन्हें केवल इमारतों के खंभों के आधार (Pillar Bases) भी मानते हैं, लेकिन शैव धर्म के विकास में इनके धार्मिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता।
5. प्रकृति पूजा: वृक्ष, जल और पशु (Nature Worship)
सिंधु वासी प्रकृति के तत्वों में ईश्वरीय शक्ति का वास देखते थे। उनका धार्मिक जीवन पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल और पारिस्थितिक संतुलन को बढ़ावा देने वाला था।
A. वृक्ष पूजा (Tree Worship)
मुहरों पर पेड़-पौधों के चित्रण से स्पष्ट है कि वे वृक्षों की पूजा करते थे। उनका सबसे पवित्र वृक्ष पीपल (Peepal Tree) था।
एक मुहर पर पीपल के पेड़ की दो शाखाओं के बीच एक त्रिशूलधारी देवता को खड़े दिखाया गया है, जिसके सामने एक उपासक घुटनों के बल बैठा है। इसके अलावा वे बबूल और नीम की भी पूजा करते थे।
B. पशु पूजा (Animal Worship)
पशु पूजा सिंधु सभ्यता का धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा थी। पशुओं को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में पूजा जाता था:
वास्तविक पशु: इनमें सबसे प्रमुख स्थान कूबड़ वाले सांड (Humped Bull / वृषभ) का था। इसे शक्ति और दिव्यता का प्रतीक माना जाता था। इसके अलावा हाथी, बाघ और गैंडे की भी पूजा होती थी।
काल्पनिक या मिथकीय पशु: कई मुहरों पर एक सींग वाला जादुई घोड़ा या सांड दिखाई देता है, जिसे ‘एक-श्रृंगी पशु’ (Unicorn) कहा जाता है। इसके अलावा मानव और पशु के मिश्रित शरीर (जैसे व्याघ्र-मानव) वाले विचित्र जीवों की पूजा भी प्रचलित थी।
C. जल और अग्नि की पवित्रता
जल पूजा: मोहनजोदड़ो का ‘विशाल स्नानागार’ (Great Bath) यह सिद्ध करता है कि वे जल को अत्यंत पवित्र मानते थे और किसी भी धार्मिक कार्य से पहले सामूहिक स्नान (Ritual Bathing) करना अनिवार्य था।
अग्नि पूजा: लोथल (गुजरात) और कालीबंगा (राजस्थान) के दुर्ग क्षेत्रों से पकी ईंटों से बनी कई ‘अग्नि वेदिकाएं’ (Fire Altars / हवन कुंड) मिली हैं, जिनमें राख और पशुओं की हड्डियां मिली हैं। यह साबित करता है कि वे यज्ञ और अग्नि पूजा से भी परिचित थे।
6. अंधविश्वास, ताबीज और प्रतीकात्मक चिन्ह (Superstitions & Symbols)
ताबीज और भूत-प्रेत: सिंधु सभ्यता के स्थलों से बड़ी संख्या में मिट्टी और तांबे के बने ‘ताबीज’ (Amulets) मिले हैं। इससे इतिहासकार यह निष्कर्ष निकालते हैं कि सिंधु सभ्यता का धर्म तंत्र-मंत्र, जादू-टोने और भूत-प्रेत या बुरी शक्तियों के अस्तित्व में विश्वास करता था, जिनसे बचने के लिए वे ताबीज पहनते थे।
स्वास्तिक का चिन्ह (Swastika): हड़प्पा से प्राप्त कई मुहरों और बर्तनों पर ‘स्वास्तिक’ और ‘क्रॉस’ के चिन्ह मिले हैं। स्वास्तिक का यह प्राचीनतम साक्ष्य सिद्ध करता है कि वे सूर्य पूजा (Sun Worship) और वास्तु दोष निवारण से परिचित थे।
7. शवाधान पद्धतियां और परलोक की परिकल्पना (Burial Practices)
मृतकों के संस्कार की पद्धतियां सिंधु सभ्यता का धर्म और उनके दार्शनिक दृष्टिकोण (मृत्यु के बाद का जीवन) को समझने का सबसे बड़ा जरिया हैं। यहाँ मुख्य रूप से तीन प्रकार के शवाधान प्रचलित थे:
पूर्ण शवाधान (Complete Burial): इसमें शव को उत्तर-दक्षिण दिशा (सिर उत्तर में, पैर दक्षिण में) में रखकर सीधे गड्ढे या कब्र में दफना दिया जाता था। शव के साथ मिट्टी के बर्तन, आभूषण और भोजन रखा जाता था, जो ‘पारलौकिक जीवन’ (Life after death) में उनके गहरे विश्वास को दर्शाता है।
आंशिक शवाधान (Fractional Burial): इसमें मृत शरीर को पहले कुछ दिनों के लिए खुले जंगल में पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था, और बाद में बचे हुए कंकाल और हड्डियों को मिट्टी में दफना दिया जाता था (जैसी प्रथा आज पारसी धर्म में है)।
दाह संस्कार (Cremation): शव को पूरी तरह अग्नि के हवाले कर जलाने के बाद, उसकी राख और अस्थियों को एक कलश (Urn) में भरकर जमीन के अंदर गाड़ दिया जाता था। मोहनजोदड़ो में यह प्रथा अत्यधिक लोकप्रिय थी।
8. निष्कर्ष (Conclusion)
विस्तृत पुरातात्विक विश्लेषण के उपरांत यह कहा जा सकता है कि सिंधु सभ्यता का धर्म (Harappan Religion) एक अत्यंत प्रगतिशील, सहिष्णु, शांतिप्रिय और जीवंत व्यवस्था थी। इस धर्म की सबसे बड़ी खूबसूरती यह थी कि यहाँ आस्था थोपने के लिए न तो कोई भव्य मंदिर थे, न मूर्तियों के विशाल महल थे और न ही पुरोहितों का कोई अत्याचारी वर्ग था। यह पूरी तरह से एक ‘लौकिक धर्म’ (Secular and Practical Religion) था जो प्रकृति की शक्तियों के सम्मान पर आधारित था। मातृदेवी की शक्ति पूजा, पशुपति शिव की योग मुद्रा, पीपल की पवित्रता, स्वास्तिक का कल्याणकारी चिन्ह और योगिक ध्यान की पद्धतियां—ये सब इस बात का अकाट्य प्रमाण हैं कि आधुनिक भारतीय सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म की गंगा का मूल उद्गम वास्तव में इसी सिंधु सभ्यता का धर्म की प्राचीन मिट्टी से हुआ था।
9. अभ्यास प्रश्न (PYQ Type Practice Questions for Mains)
प्रश्न 1: सिंधु सभ्यता का धर्म समकालीन मिस्र और मेसोपोटामिया की धार्मिक प्रणालियों से किस प्रकार भिन्न था? पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर इसके लौकिक स्वरूप की विवेचना कीजिए। (250 शब्द)
प्रश्न 2: मोहनजोदड़ो से प्राप्त ‘पशुपति मुहर’ (Pashupati Seal) का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करें। सर जॉन मार्शल द्वारा इसे ‘आद्य-शिव’ (Proto-Shiva) कहे जाने के क्या ऐतिहासिक तर्क हैं? (250 शब्द)
प्रश्न 3: “आधुनिक हिंदू धर्म की कई निरंतरताएं (Continuities) सीधे तौर पर सिंधु सभ्यता का धर्म से जुड़ी हुई हैं।” मातृदेवी, प्रकृति पूजा और प्रतीकात्मक चिन्हों के संदर्भ में इस कथन की पुष्टि कीजिए। (200 शब्द)
प्रश्न 4: हड़प्पा संस्कृति के अंतर्गत प्रचलित विभिन्न प्रकार की शवाधान पद्धतियों (Burial Practices) का वर्णन करें। यह उनके पारलौकिक जीवन के विश्वास को कैसे दर्शाती हैं? (150 शब्द)
प्रश्न 5: लोथल और कालीबंगा से प्राप्त ‘अग्नि वेदिकाओं’ (Fire Altars) और सिंधु सभ्यता से प्राप्त ‘ताबीजों’ के आधार पर उनके अनुष्ठानिक और अंधविश्वासी पक्षों का मूल्यांकन करें। (150 शब्द)

10. परीक्षा के लिए 50 अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर तथ्य (Mega Quick Revision Notes)
सिंधु सभ्यता का धर्म मुख्य रूप से लौकिक (Secular) और व्यावहारिक था, जिसमें परलोक के बजाय इसी लोक के जीवन पर ध्यान दिया गया था।
लिपि न पढ़े जाने के कारण इस सभ्यता के धार्मिक इतिहास की पूरी जानकारी केवल पुरातात्विक साक्ष्यों (मूर्तियों, मुहरों) पर आधारित है।
सिंधु घाटी सभ्यता के किसी भी नगर से बड़े मंदिरों (Temples) या धार्मिक महलों के अवशेष नहीं मिले हैं।
मिट्टी की बनी स्त्री मूर्तियों (Terracotta Figurines) की भारी संख्या में प्राप्ति यह दर्शाती है कि समाज में देवी पूजा का सर्वोच्च स्थान था।
हड़प्पा से प्राप्त एक मुहर में स्त्री के गर्भ से पौधा निकलता दिखाई देता है, जिसे इतिहासकार ‘उर्वरता की देवी’ या पृथ्वी माता मानते हैं।
सिंधु वासी पृथ्वी को मिस्र की ‘आइसिस’ (Isis) देवी की तरह ही जीवन और अन्न देने वाली देवी मानकर पूजते थे।
मोहनजोदड़ो से प्राप्त सेलखड़ी की बनी एक मुहर पर सर्वोच्च पुरुष देवता ‘पशुपति शिव’ का चित्र अंकित है।
पशुपति मुहर पर पुरुष योगी को तीन मुख (Three Faces) और सींग वाले मुकुट के साथ ‘पद्मासन’ मुद्रा में बैठे दिखाया गया है।
पशुपति शिव की मुहर पर मुख्य रूप से पांच प्रकार के जानवर (कुल 6 पशु) अंकित हैं।
पशुपति योगी के दाईं ओर एक हाथी (Elephant) और एक बाघ (Tiger) स्थित हैं।
पशुपति योगी के बाईं ओर एक गैंडा (Rhinoceros) और एक भैंसा (Water Buffalo) विराजमान हैं।
पशुपति शिव के आसन या चबूतरे के ठीक नीचे दो हिरण (Deer) बैठे हुए दिखाए गए हैं।
सर जॉन मार्शल ने पशुपति मुहर वाले इस देवता को ‘आद्य-शिव’ (Proto-Shiva) का नाम दिया था।
सिंधु सभ्यता में पत्थरों के बने बेलनाकार लिंग और छल्लेदार योनि के साक्ष्य मिले हैं, जो लिंग-योनि पूजा को दर्शाते हैं।
प्रकृति पूजा के अंतर्गत सिंधु सभ्यता के लोगों का सबसे पवित्र और पूजनीय वृक्ष पीपल (Peepal Tree) था।
मुहरों पर पीपल के अलावा बबूल, नीम और खजूर के पेड़ों के भी धार्मिक अंकन प्राप्त हुए हैं।
पशु पूजा में सिंधु वासियों का सबसे पवित्र और प्रिय वास्तविक पशु कूबड़ वाला सांड (Humped Bull / वृषभ) था।
काल्पनिक या मिथकीय पशुओं में मुहरों पर सबसे ज्यादा ‘एक-श्रृंगी पशु’ (Unicorn / एक सींग वाला सांड) का चित्र मिलता है।
मुहरों पर पाए जाने वाले मिश्रित पशु (जैसे व्याघ्र का शरीर और मानव का सिर) उनके जादुई और पौराणिक विश्वासों को दर्शाते हैं।
मोहनजोदड़ो का ‘विशाल स्नानागार’ (Great Bath) यह सिद्ध करता है कि वे अनुष्ठानिक स्नान और ‘जल पूजा’ को अत्यंत पवित्र मानते थे।
गुजरात के लोथल और राजस्थान के कालीबंगा से पकी ईंटों से बनी ‘अग्नि वेदिकाएं’ (Fire Altars / हवन कुंड) मिली हैं।
इन अग्नि वेदिकाओं में राख, कोयला और पशुओं की जली हुई हड्डियां मिली हैं, जो यज्ञ और पशु बलि की ओर इशारा करती हैं।
सिंधु सभ्यता के विभिन्न स्थलों से भारी मात्रा में तांबे और मिट्टी के ‘ताबीज’ (Amulets) मिले हैं।
ताबीजों की इतनी अधिक संख्या यह सिद्ध करती है कि वे लोग भूत-प्रेत, अंधविश्वास और जादू-टोने में विश्वास करते थे।
हड़प्पा से प्राप्त मुहरों पर ‘स्वास्तिक’ (Swastika) का प्राचीनतम चिन्ह मिला है, जो सूर्य पूजा का प्रतीक माना जाता है।
स्वास्तिक के अलावा मुहरों पर ‘क्रॉस’ और ‘दशमलव’ के धार्मिक चिन्ह भी उकेरे गए हैं।
सिंधु सभ्यता का धर्म पूरी तरह से शांतिप्रिय था क्योंकि धार्मिक रक्षा के नाम पर भी हथियारों का कोई बड़ा साक्ष्य नहीं मिला है।
मुहरों पर नाग (सांप) के चित्र और चबूतरे पर नाग को दूध पिलाते हुए मानव आकृतियां मिली हैं, जो ‘नाग पूजा’ को प्रमाणित करती हैं।
‘कबूतर’ (Dove) को सिंधु सभ्यता में एक अत्यंत पवित्र और पूजनीय पक्षी माना जाता था।
शवों के अंतिम संस्कार के लिए मुख्य रूप से तीन पद्धतियां—पूर्ण शवाधान, आंशिक शवाधान और दाह संस्कार प्रचलित थीं।
पूर्ण शवाधान में शव को हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा (सिर उत्तर में, पैर दक्षिण में) में लिटाकर दफनाया जाता था।
कब्रों में शवों के साथ मिट्टी के बर्तन (मृदभांड), दर्पण और खाद्य सामग्रियां रखी जाती थीं।
कब्रों में सामान रखना यह सिद्ध करता है कि वे मृत्यु के बाद पारलौकिक जीवन (Life after death) में विश्वास करते थे।
हड़प्पा के ‘R-37 कब्रिस्तान’ से लकड़ी के ताबूत (Wooden Coffin) में दफनाए गए एक शव का अनोखा साक्ष्य मिला है।
रोपड़ (पंजाब) से एक कब्र में मानव के साथ पालतू कुत्ता दफनाए जाने का अनूठा साक्ष्य मिला है।
लोथल (गुजरात) से तीन और कालीबंगा से एक ‘युग्म शवाधान’ (Joint/Double Burials – स्त्री और पुरुष एक साथ) के साक्ष्य मिले हैं।
आंशिक शवाधान के तहत शव को पहले जंगल में पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ा जाता था, जो आधुनिक पारसी धर्म की ‘दखमा’ प्रथा जैसा है।
मोहनजोदड़ो में शव को जलाने के बाद उसकी राख को कलश में भरकर दफनाने की ‘कलश शवाधान’ (Urn Burial) प्रथा सबसे ज्यादा लोकप्रिय थी।
धौलावीरा से पत्थरों से ढकी हुई विशाल मेगालिथिक कब्रें (Megalithic tombs) मिली हैं, जिनमें कंकाल नहीं हैं (प्रतीकात्मक शवाधान)।
सिंधु सभ्यता की मुहरों पर किसी भी प्रकार के ‘गाय’ (Cow) या सिंह (Lion) का धार्मिक अंकन नहीं मिलता है।
एक मुहर पर एक पुरुष को बाघ से लड़ते हुए दिखाया गया है, जो संभवतः उनके किसी वीर देवता (जैसे मेसोपोटामिया के गिल्गामेश) का प्रतीक है।
सिंधु सभ्यता के लोग तंत्र-मंत्र में दिशाओं और चौराहों को भी तांत्रिक महत्व देते थे।
ध्यान और योग की मुद्राओं में बैठे कई पुरुषों की मूर्तियां यह बताती हैं कि ‘योग’ (Yoga) की शुरुआत इसी सभ्यता से हुई थी।
पुरोहित राजा (Priest King) की आधी झुकी आंखें उनके ‘ध्यान’ (Meditation) की आध्यात्मिक अवस्था को प्रकट करती हैं।
कुछ बर्तनों पर ‘अमूर्त आकृतियां’ और स्वास्तिक के साथ सूर्य की किरणें उकेरी गई हैं, जो ब्रह्मांडीय ऊर्जा की पूजा को दर्शाती हैं।
इतिहासकारों के अनुसार, सिंधु सभ्यता का धार्मिक नियंत्रण किसी पुरोहित राजा के हाथ में नहीं, बल्कि ‘वणिज’ (अमीर व्यापारी वर्ग) के हाथ में था।
मातृदेवी की कुछ मूर्तियों के सिर पर धुआं इकट्ठा होने के निशान मिले हैं, जिससे पता चलता है कि उनके सामने ‘धूप या अगरबत्ती’ जलाई जाती थी।
सिंधु सभ्यता का धार्मिक ढांचा अत्यंत लचीला था, जिसके कारण अलग-अलग नगरों में (जैसे लोथल में अग्नि पूजा, मोहनजोदड़ो में शिव पूजा) क्षेत्रीय विविधताएं थीं।
जल की महत्ता के कारण वे नदियों (विशेषकर सिंधु नदी) को भी साक्षात लोक-देवता मानकर पूजते थे।
सिंधु सभ्यता का धर्म आज नष्ट हो चुका है, लेकिन उसकी पीपल पूजा, शिव आराधना, शक्ति पूजा और स्वास्तिक के रूप में उसकी विरासत आज भी हिंदू धर्म में जीवित है।