
नवपाषाण काल (Neolithic Age):मानव इतिहास की सबसे बड़ी क्रांति
मानव सभ्यता के विकास क्रम में नवपाषाण काल (Neolithic Age) वह मील का पत्थर है, जहाँ से इंसान ने ‘खानाबदोश’ (Nomadic) जीवन को हमेशा के लिए त्याग दिया और एक जगह टिक कर ‘स्थायी जीवन’ (Settled Life) की शुरुआत की।
विश्व के संदर्भ में नवपाषाण काल की शुरुआत लगभग 9000 ईसा पूर्व में मध्य-पूर्व (Middle-East) में हो गई थी। लेकिन भारत के संदर्भ में यह काल सामान्यतः 7000 ईसा पूर्व (मेहरगढ़) से लेकर 1000 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है। भारत के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में यह संस्कृति अलग-अलग समय पर विकसित हुई।
महान पुरातत्वविद वी. गॉर्डन चाइल्ड (V. Gordon Childe) ने अपनी पुस्तक ‘Man Makes Himself’ में इस काल में हुए बदलावों को इतने व्यापक और दूरगामी बताया कि उन्होंने इसे “नवपाषाण कालीन क्रांति” (Neolithic Revolution) का नाम दिया। यह क्रांति हथियारों की नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, रहन-सहन और तकनीक की थी।
1. नवपाषाण काल की प्रमुख विशेषताएँ (Core Features of the Neolithic Age)
मुख्य परीक्षा में अक्सर यह सवाल आता है कि किन विशेषताओं के आधार पर इस काल को ‘क्रांति’ कहा जाता है। इसके मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं:
A. कृषि का आरंभ (Beginning of Agriculture)
यह इस काल की सबसे युगांतकारी घटना थी। मानव अब भोजन का ‘संग्राहक’ (Food Gatherer) नहीं रहा, बल्कि वह भोजन का ‘उत्पादक’ (Food Producer) बन गया।
उसने गेहूं, जौ (Barley), चावल, रागी और दालों की खेती करना सीख लिया।
कृषि के कारण मानव को अपनी फसलों की देखभाल के लिए एक ही स्थान पर लंबे समय तक रुकना पड़ा, जिसने स्थायी बस्तियों (Villages) को जन्म दिया।
B. पशुपालन का विकास (Advanced Domestication)
मध्यपाषाण काल में जहाँ कुत्ता पालतू बना था, वहीं नवपाषाण काल में पशुपालन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार बन गया।
अब गाय, बैल, भेड़, बकरी और सूअर को केवल मांस के लिए नहीं, बल्कि दूध (Dairy), ऊन और कृषि कार्यों (खेत जोतने और बोझा ढोने) के लिए पाला जाने लगा।
C. पॉलिशदार पाषाण उपकरण (Polished Stone Tools – Celts)
नवपाषाण काल का नाम (Neo = नया, Lithic = पत्थर) नए प्रकार के औजारों के कारण पड़ा।
अब औजार खुरदरे नहीं थे, बल्कि उन्हें घिसकर चमकदार (Polished) और बेहद तीखा बनाया जाने लगा। इन पॉलिशदार कुल्हाड़ियों को पुरातात्विक भाषा में ‘सेल्ट’ (Celt) कहा जाता है।
कृषि कार्यों के लिए पत्थर की कुदालें (Hoes), हंसिया (Sickle), और अनाज पीसने के लिए बड़े ‘ओखली और मूसल’ (Mortar and Pestle) का निर्माण हुआ।
D. मृदभांड कला और पहिए का आविष्कार (Pottery & Invention of Wheel)
जब कृषि से अतिरिक्त अनाज (Surplus food) पैदा होने लगा, तो उसे सुरक्षित रखने (Storage) और पकाने के लिए बड़े बर्तनों की आवश्यकता पड़ी।
इसी आवश्यकता ने मिट्टी के बर्तनों (Pottery) को जन्म दिया।
शुरुआत में बर्तन हाथों से बनाए गए, लेकिन बाद में इतिहास का सबसे महान आविष्कार— कुम्हार का चाक (Potter’s Wheel) — हुआ, जिससे सुंदर और मजबूत बर्तन बनने लगे।
2. भारत में नवपाषाण काल के प्रमुख पुरातात्विक स्थल (Geographical Distribution & Sites)
भारत में नवपाषाण संस्कृति को भौगोलिक आधार पर 6 मुख्य भागों में बांटा जाता है। यहाँ से प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) में सर्वाधिक प्रश्न बनते हैं:
A. उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र (बलूचिस्तान और पाकिस्तान)
मेहरगढ़ (Mehrgarh): पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में बोलन दर्रे के पास स्थित। यह भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि (गेहूं और जौ) का सबसे प्राचीन साक्ष्य (लगभग 7000 ईसा पूर्व) देता है। यहाँ के लोग कच्ची ईंटों के आयताकार घरों में रहते थे। सबसे महत्वपूर्ण बात— कपास (Cotton) उगाने का दुनिया का सबसे प्राचीन साक्ष्य यहीं से मिला है।
B. उत्तरी क्षेत्र (कश्मीर घाटी)
कश्मीरी नवपाषाण संस्कृति भारत के अन्य हिस्सों से अलग थी। यहाँ ‘माइक्रोलिथ’ उपकरणों का अभाव था और हड्डी के उपकरणों का अत्यधिक प्रयोग होता था।
बुर्जहोम (Burzahom): श्रीनगर के पास स्थित। यहाँ के लोग जमीन के अंदर गड्ढा खोदकर रहते थे, जिसे ‘गर्तवास’ (Pit-dwelling) कहा जाता है (ताकि कड़ाके की ठंड से बच सकें)। यहाँ की कब्रों में एक अद्भुत साक्ष्य मिला है— मालिक के साथ कुत्ते को दफनाना।
गुफकराल (Gufkral): इसका अर्थ है ‘कुम्हार की गुफा’। यहाँ से भी गर्तवास, हड्डी की सुइयां, और कृषि व पशुपालन के साक्ष्य मिले हैं।
C. विंध्य और मध्य गंगा घाटी (उत्तर प्रदेश)
कोल्डीहवा (Koldihwa): इलाहाबाद (प्रयागराज) के पास बेलन घाटी में स्थित। यहाँ से (लगभग 6000 ईसा पूर्व) चावल (Rice) की खेती का सबसे प्राचीन प्रमाण मिला है।
महगड़ा (Mahagara): यहाँ से एक बड़ी ‘गौशाला’ (Cattle pen) या पशुबाड़े के साक्ष्य मिले हैं जहाँ जानवरों को बांधा जाता था, साथ ही खुरों के निशान भी मिले हैं।
D. मध्य-पूर्वी क्षेत्र (बिहार और बंगाल)
चिरांद (Chirand): बिहार के सारण जिले में स्थित यह स्थल पूरे भारत में हड्डी के उपकरणों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पत्थर के औजार कम, लेकिन बारहसिंगे के सींग (Antlers) से बने औजार और हथियार बहुत बड़ी मात्रा में पाए गए हैं। यहाँ के लोग गोल घरों में रहते थे।
E. दक्षिण भारत (कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु)
दक्षिण भारत का नवपाषाण काल मुख्य रूप से पशुपालन पर आधारित था।
राख के टीले (Ash Mounds): यह दक्षिण भारत की विशिष्ट पहचान है। ये टीले गोबर को एक जगह इकट्ठा करके उसमें आग लगाने से बने हैं।
प्रमुख स्थल: कर्नाटक में संगनकल्लू (Sangankallu), पिकलीहल (Piklihal), मस्की (Maski), और ब्रह्मगिरी। आंध्र प्रदेश में उतनूर (Utnur) और नागार्जुनकोंडा।
दक्षिण भारत के लोग मुख्य रूप से रागी (Ragi) और कुलथी (Horse gram) की खेती करते थे।
F. पूर्वोत्तर भारत (असम और मेघालय)
दाओजली हेडिंग (Daojali Hading): असम के दीमा हसाओ जिले में स्थित। यहाँ से ‘जेडाइट’ (Jadeite – हरे रंग का कीमती पत्थर) से बने उपकरण मिले हैं, जो दर्शाता है कि इनका व्यापार चीन या म्यांमार के साथ होता था।

3. समाज, धर्म और अर्थव्यवस्था (Society, Religion, and Economy)
नवपाषाण काल ने केवल अर्थव्यवस्था को नहीं, बल्कि मानव समाज के ढांचे को भी पूरी तरह से बदल दिया।
निजी संपत्ति और श्रम विभाजन (Private Property & Division of Labor): जब कृषि शुरू हुई, तो जमीन के टुकड़ों पर ‘अधिकार’ की भावना पैदा हुई। यहीं से ‘मेरी जमीन’ और ‘मेरा घर’ (निजी संपत्ति) का कॉन्सेप्ट शुरू हुआ। काम का बंटवारा होने लगा— पुरुष शिकार और खेती करते थे, जबकि महिलाएं घर के काम, बर्तन बनाना और कताई-बुनाई (Weaving) करती थीं।
कबीलाई समाज (Tribal Society): परिवारों के समूह ने मिलकर ‘कबीलों’ (Tribes) का रूप ले लिया। कबीले का एक मुखिया (Chief) होने लगा जो अक्सर उम्र या बहादुरी में सबसे बड़ा होता था।
धर्म और विश्वास (Religion): कृषि प्रकृति पर निर्भर थी (बारिश, धूप, मिट्टी), इसलिए मानव ने ‘प्रकृति की शक्तियों’ की पूजा शुरू कर दी।
मिट्टी की मूर्तियों से पता चलता है कि वे भूमि को ‘उर्वरता की देवी’ (Mother Goddess) मानकर पूजते थे।
शवाधान प्रथाएं और भी जटिल हो गईं। दक्षिण भारत में बच्चों को बड़े मिट्टी के कलश (Urn) में रखकर घर के फर्श के नीचे दफनाया जाता था (कलश शवाधान)।
निष्कर्ष (Conclusion)
नवपाषाण काल मानव विकास का वह शानदार अध्याय है जिसने आज की आधुनिक सभ्यता का ब्लूप्रिंट तैयार किया। गॉर्डन चाइल्ड का इसे ‘क्रांति’ कहना बिल्कुल सटीक है, क्योंकि खेती के कारण जो ‘अतिरिक्त अनाज’ (Surplus Production) पैदा हुआ, उसी ने इंसान को सोचने, कला विकसित करने, व्यापार करने और अंततः ‘हड़प्पा जैसी महान नगरीय सभ्यता’ (Indus Valley Civilization) के निर्माण का समय और संसाधन दिया। नवपाषाण काल वह नींव है जिस पर आज की दुनिया की पूरी इमारत खड़ी है।
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इतिहास और खोज:
‘नवपाषाण काल‘ (Neolithic Age) शब्द का सबसे पहले प्रयोग सर जॉन लुबॉक (John Lubbock) ने 1865 में अपनी पुस्तक ‘Prehistoric Times’ में किया था।
इस काल को ‘नवपाषाण कालीन क्रांति’ (Neolithic Revolution) का नाम वी. गॉर्डन चाइल्ड (V. Gordon Childe) ने अपनी पुस्तक ‘Man Makes Himself’ में दिया।
भारत में नवपाषाण काल के प्रथम उपकरण (पॉलिशदार सेल्ट/कुल्हाड़ी) को 1860 में ले मेसुरियर (Le Mesurier) ने उत्तर प्रदेश की टोंस नदी घाटी से खोजा था।
दक्षिण भारत में नवपाषाण कालीन उपकरण खोजने का श्रेय नेविल फासेट (Neville Fawcett – 1892) को जाता है, जिन्होंने कर्नाटक के बेल्लारी में खोज की थी।
कृषि और पशुपालन:
5. भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि का सबसे प्राचीन साक्ष्य पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित ‘मेहरगढ़’ (लगभग 7000 ईसा पूर्व) से प्राप्त होता है।
6. मेहरगढ़ को ‘बलूचिस्तान की रोटी की टोकरी’ (Breadbasket of Balochistan) भी कहा जाता है।
7. दुनिया में कपास (Cotton) उगाने और उसके प्रयोग का सबसे पहला साक्ष्य मेहरगढ़ से ही मिला है।
8. इलाहाबाद (प्रयागराज) के पास स्थित कोल्डीहवा (Koldihwa) से विश्व में चावल (धान) की खेती का सबसे प्राचीन प्रमाण (लगभग 6000 ई.पू.) मिला है।
9. हाल ही में उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में स्थित ‘लहुरादेव’ से चावल की खेती के और भी प्राचीन (लगभग 9000 से 8000 ई.पू.) साक्ष्य मिले हैं। (यदि विकल्प में लहुरादेव हो, तो उसे प्राथमिकता दें)।
10. दक्षिण भारत के नवपाषाण कालीन लोग मुख्य रूप से रागी (मडुआ) और कुलथी की खेती करते थे।
11. नवपाषाण काल में मुख्य रूप से गेहूं, जौ (Barley), रागी, चावल और दालों की खेती होती थी।
12. कृषि कार्यों के कारण मानव का जीवन ‘स्थायी’ (Sedentary) हो गया और गाँवों का निर्माण हुआ।
उपकरण और तकनीक:
13. इस काल के उपकरणों की सबसे बड़ी विशेषता उनका ‘पॉलिशदार’ (Polished) होना है।
14. इस काल के मुख्य औजार ‘सेल्ट’ (पत्थर की कुल्हाड़ी), कुदाल (Hoe), छेनी (Chisel) और सिलबट्टा (Quern) थे।
15. नवपाषाण काल में पत्थर के उपकरणों के निर्माण के लिए मुख्य रूप से बेसाल्ट (Basalt), डोलेराइट और डियोराइट जैसे कठोर पत्थरों का प्रयोग हुआ।
16. अनाज पीसने के लिए ‘ओखली और मूसल’ (Mortar and Pestle) का आविष्कार इसी काल में हुआ।
17. ‘कुम्हार के चाक’ (Potter’s Wheel) का आविष्कार मानव इतिहास की एक महान तकनीकी उपलब्धि थी, जो नवपाषाण काल में हुई।
18. चाक के आविष्कार से सुडौल और मजबूत मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) बनने लगे, जिनका उपयोग अनाज के भंडारण के लिए किया जाता था।
19. इस काल में कपड़ों की कताई और बुनाई (Spinning & Weaving) की कला का भी विकास हुआ, जिसके साक्ष्य मेहरगढ़ से सूती कपड़े के रूप में मिलते हैं।
कश्मीर और उत्तरी भारत (बुर्जहोम और गुफकराल):
20. कश्मीरी नवपाषाण स्थलों में ‘माइक्रोलिथ’ (सूक्ष्म पाषाण) उपकरणों का पूर्ण अभाव है।
21. यहाँ के लोग जमीन के नीचे गड्ढा खोदकर रहते थे, जिसे ‘गर्तवास’ (Pit-dwelling) कहा जाता है।
22. बुर्जहोम की खोज 1935 में डी. टेरा (De Terra) और पीटरसन ने की थी। ‘बुर्जहोम’ का अर्थ है – ‘भूर्ज (Birch) वृक्ष का स्थान’।
23. बुर्जहोम की एक कब्र में मालिक (मानव) के साथ उसके पालतू कुत्ते (Dog) को दफनाए जाने का अनूठा साक्ष्य मिला है।
24. गुफकराल (अर्थ: कुम्हार की गुफा) से कृषि, पशुपालन और गर्तवास के साथ-साथ सिलबट्टे और हड्डी की सुइयां प्राप्त हुई हैं।
25. कश्मीरी नवपाषाण संस्कृति हड्डी (Bone) के बने हथियारों के भारी उपयोग के लिए प्रसिद्ध है।
मध्य और पूर्वी भारत:
26. उत्तर प्रदेश के बेलन घाटी में स्थित महगड़ा (Mahagara) से पशुओं के बाड़े (Cattle Pen) और धान की खेती के साक्ष्य मिले हैं।
27. बिहार के सारण जिले में स्थित चिरांद (Chirand) पूरे भारत में हड्डी के उपकरणों के सबसे बड़े भंडार के लिए जाना जाता है।
28. चिरांद से प्राप्त उपकरण मुख्य रूप से हिरण/बारहसिंगे के सींग (Antlers) से बने हैं।
29. झारखंड के छोटानागपुर पठार क्षेत्र और उड़ीसा के मयूरभंज (कुचाई नामक स्थल) से भी नवपाषाण कालीन कुल्हाड़ियां मिली हैं।
दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत:
30. दक्षिण भारत के नवपाषाण स्थलों की सबसे बड़ी पहचान ‘राख के टीले’ (Ash Mounds) हैं।
31. विद्वानों के अनुसार, पशुओं के बाड़े (गोबर और कचरा) में अनुष्ठानिक रूप से आग लगाने से ये राख के टीले बने।
32. राख के टीले मुख्य रूप से संगनकल्लू, पिकलीहल, उतनूर, और कुपगल से प्राप्त हुए हैं।
33. कर्नाटक का ब्रह्मगिरी एक महत्वपूर्ण स्थल है, जिसकी खुदाई मोर्टिमर व्हीलर (Mortimer Wheeler) ने की थी।
34. दक्षिण भारत में कृषि से ज्यादा महत्व पशुपालन (विशेषकर गाय-बैल) का था।
35. असम के दीमा हसाओ जिले में स्थित दाओजली हेडिंग (Daojali Hading) से पॉलिशदार पत्थर के औजार और ‘कॉर्ड-इम्प्रेस्ड’ (रस्सी के निशान वाले) मिट्टी के बर्तन मिले हैं।
36. दाओजली हेडिंग से ‘जेडाइट’ पत्थर मिला है, जो दर्शाता है कि ये लोग संभवतः चीन के साथ संपर्क में थे।
समाज और संस्कृति:
37. कृषि और स्थायी जीवन ने ‘निजी संपत्ति’ (Private Property) की अवधारणा को जन्म दिया।
38. नवपाषाण काल का समाज मातृसत्तात्मक (Matriarchal) से धीरे-धीरे पितृसत्तात्मक (Patriarchal) व्यवस्था की ओर बढ़ने लगा था।
39. ‘श्रम का विभाजन’ (Division of Labor) स्पष्ट हो गया था— स्त्री और पुरुष के कार्यों का बंटवारा हो गया।
40. मानव ने प्रकृति की पूजा शुरू कर दी और मातृ देवी (Mother Goddess) की मिट्टी की मूर्तियाँ बनाई जाने लगीं।
41. दक्षिण भारत में मृतकों (विशेषकर शिशुओं) को मिट्टी के कलशों में रखकर घरों के फर्श के नीचे दफनाया जाता था (Urn Burials)।
42. कश्मीर और उत्तर भारत में मृतकों को लाल रंग (Red Ochre) मलकर दफनाने के भी साक्ष्य मिलते हैं।
43. ‘विनिमय प्रणाली’ (Barter System – वस्तुओं की अदला-बदली) के रूप में प्रारंभिक व्यापार की शुरुआत नवपाषाण काल में ही हो गई थी।
44. चित्रकला का विकास जारी रहा; इस काल के बर्तनों पर ज्यामितीय आकृतियां और जानवरों के चित्र बनाए जाने लगे थे।
45. कृषि द्वारा उत्पन्न ‘अतिरिक्त अनाज’ (Surplus Food) ने ही आगे चलकर शिल्पकला (हस्तशिल्प) को पनपने का मौका दिया।
46. मकान आमतौर पर गोलाकार या आयताकार होते थे, जो मिट्टी, लकड़ी, नरकुल और घास-फूस (Wattle and Daub) से बनाए जाते थे।
47. मेहरगढ़ में प्राप्त शवाधानों में मृतकों के साथ बकरियों को दफनाया गया है, जो ‘परलोक’ में उनके भोजन के लिए रखी जाती थीं।
48. कश्मीर के बुर्जहोम में लोग शिकार और मछली पकड़ने पर ज्यादा निर्भर थे, खेती का विकास वहाँ अपेक्षाकृत धीमा था।
49. दक्षिण भारत में नवपाषाण काल का अंत सीधे ‘महापाषाण काल’ (Megalithic culture/लौह युग) में विलीन हो गया (वहाँ ताम्रपाषाण काल का प्रभाव कम था)।
50. भारतीय उपमहाद्वीप में नवपाषाण काल के अंत ने उस शक्तिशाली ‘ताम्रपाषाण संस्कृति’ (Chalcolithic Age) और अंततः ‘सिंधु घाटी सभ्यता’ (Indus Valley Civilization) के लिए आधार तैयार किया।